
आप हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने इक दफा खुत्बा देते हुए फरमाया कि “उसके अलावा, हर सुनने वाला खफीफ आवाजों को सुनने से कासिर होता है और बड़ी आवाजें उसे बहरा बना देती हैं।”
जब तक इंसानों को इल्म नहीं था वह ये ही मानते थे कि हम सारी आवाजें सुन सकते हैं। कुछ सदियों पहले तक भी ये ही सोच चली आ रही थी। फिर कुछ वैज्ञानिकों ने देखा कि कई बार हम कोई आवाज़ नहीं सुनते लेकिन जानवर अपने कान खड़े कर लेते हैं, चौंक जाते हैं या अजीब ओ गरीब बर्ताव करते हैं, आदमी और औरत की भी आवाज़ अगर देखी जाए तो अलग-अलग पिच, फ्रीक्वेंसी होती है, जानवरों की आवाजों में भी फर्क होता है।
जब इस पर खोज़ की गई तो पाया कि कुछ ऐसी भी आवाजें हैं जो जानवर, परिंदे तो सुन लेते हैं लेकिन इंसान नहीं सुन पाते। बाद में अल्ट्रासोनिक, इन्फ्रासोनिक आवाजों की खोज़ हुई. फिर वैज्ञानिकों ने ये माना कि आवाजें तो कई हैं लेकिन इंसान के सुनने की एक हद होती है।
अक्सर ये भी देखा जाता है कि ज़लज़ला, सुनामी या अचानक की बारिश वगैरह आने के पहले जानवरों के बर्ताव में फर्क आ जाता है क्योंकि वह उस दौरान आ रही आवाजों को सुन सकते हैं।
ऐसा माना जाता है कि अगर आवाज़ 20 Hz से कम है तो इंसान नहीं सुन पाता और अगर 20000 Hz से ज़्यादा है तो भी नहीं सुन पाता। इससे कुछ कम या ज़्यादा रेंज की कुछ आवाजें जानवर या परिंदे सुन लेते हैं लेकिन उनके सुनने की भी एक हद मुकर्रर कर दी गई है।
अब ज़रा सोचकर देखिए कि जो खोज़ आज हुई है, उसे हमारे मौला अली अलैहिस्सलाम ने आज से तकरीबन 1400 साल पहले बता दिया कि अल्लाह उतनी धीमी आवाजें भी सुनता है, जिन्हें इंसान सुनने से कासिर है और उतनी तेज़ आवाजें भी सुनता है जो इंसान को बहरा बना देती हैं यानी जो इंसान नहीं सुन पाता।

