Qaul e Ghaus e Azam

#मुहब्बत क्याहै?

एक दफा हज़रत सय्यिदिना शैख मुहय्युद्दीन अब्दुल क़ादिर जीलानी قدس سرہ النورانی से दरियाफ्त किया गया कि:
“मुहब्बत क्या है?”
तो आप رحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ ने फ़रमाया:
“मुहब्बत” महबूब की तरफ से दिल में एक तशवीश(बेकरारी) होती है फिर दुनियां उसके सामने ऐसी होती है जैसे अंगूठी का हल्क़ा या छोटा सा हुजूम, मुहब्बत एक नशा है जो होश खत्म कर देता है,आशिक़ ऐसे मह्व हैं कि अपने महबूब के मुशाहिदा के सिवा किसी चीज़ का इन्हे होश नहीं,वो ऐसे बीमार हैं कि अपने मतलूब (यानी महबूब)को देखे बगैर तन्दुरुस्त नहीं होते,वो अपने खालिक़ की मुहब्बत के अलावा कुछ नहीं जानते और उसके ज़िक्र के सिवा किसी चीज़ की ख्वाहिश नहीं रखते-“

*#ख़ौफ_क्या_है?*

हज़रत महबूबे सुब्हानी,क़ुत्बे रब्बानी शैख अब्दुल क़ादिर जीलानीرحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ से खौफ के मुताल्लिक़ दरियाफ्त किया गया तो आपرحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ ने फ़रमाया कि:
“उसकी बहुत सी क़िस्में हैं (1)खौफ…ये गुनाहगारों को होता है,(2)रुहबा…ये आबिदीन को होता है,(3)खशियत….ये ओलमा को होती है-“*
नीज़ इरशाद फ़रमाया:
“गुनाहगार का खौफ अज़ाब से,आबिद का खौफ इबादत के सवाब के ज़ाया होने से और आलिम का खौफ ताआत में शिर्के खफी से होता है-“

*#वज्द_क्या_है?*

हज़रत सय्यिदिना शैख मुहय्युद्दीन अब्दुल क़ादिर जीलानी क़ुत्बे रब्बानीرحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ से वज्द के बारे में दरियाफ्त किया गया तो आपرحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ ने इरशाद फ़रमाया:
“रूहुल्लाहعزوجل के ज़िक्र की हलावत में मुस्तग़रक़ हो जाए और हक़ तआला के लिए सच्चे तौर पर गैर की मुहब्बत दिल से निकाल दे-“


(بهجة الاسرار ) *#वफा_क्या_है?*

हज़रत शैख मुहय्युद्दीन अब्दुल क़ादिर जीलानी قدس سرہ النورانی से दरियाफ्त किया गया कि:
“वफा क्या है ?”
तो आप رحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ ने इरशाद फ़रमाया:
“वफा ये है कि अल्लाह عزوجل की हराम कर्दा चीज़ों में अल्लाह عزوجل के हुक़ूक़ की रिआयत करते हुए ना तो दिल में इनके वसवसों पर ध्यान दे और ना ही इन पर नज़र डाले और अल्लाह عزوجل की हुदूद की अपने क़ौल और फअल से हिफाज़त करे,उसकी रज़ा वाले कामों की तरफ ज़ाहिर व बातिन से पूरे तौर पर जल्दी की जाए-“
?*

(بهجة الاسرار) *#सिद्क़_क्या_है

हज़रत सय्यिदिना शैख मुहय्युद्दीन अब्दुल कादिर जीलानी क़ुत्बे रब्बानी رحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ से सिद्क़ के बारे में दरियाफ्त किया गया तो आप رحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ ने फ़रमाया कि:
“(1)….अक़्वाल में सिद्क़ तो ये है कि दिल की मुवाफिक़त क़ौल के साथ अपने वक़्त में हो-“
“(2)….आमाल में सिद्क़ ये है कि आमाल इस तसव्वुर के साथ बजा कि अल्लाहعزوجل उसको देख रहा है और खुद को भूल जाए-“
(المرجع السابق، ص۲۳۵)

(تفريح الخاطر، ص۱۸) *#सब्र_की_हक़ीक़त*

हज़रत सय्यिदिना शैख अब्दुल क़ादिर जीलानी क़ुत्बे रब्बानी गौसे समदानी رحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ से सब्र के मुताल्लिक़ दरियाफ्त किया गया तो आप رحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ ने फ़रमाया कि:
“बला ओ मुसीबत के वक़्त अल्लाह عزوجل के साथ हुस्ने अदब रखे और उसके फैसलों के आगे सरे तस्लीम खम कर दे-“
(بهجة الاسرار، ذکرشي من اجوبته ممايدل علي قدم راسخ،)*

*#शुक्र_क्या_है?

सय्यिदिना शैख मुहय्युद्दीन अब्दुल क़ादिर जीलानी رحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ से शुक्र के बारे में दरियाफ्त किया गया तो आप رحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ ने इरशाद फ़रमाया कि:
“शुक्र की हक़ीक़त ये है कि आजिज़ी करते हुए नेमत देने वाले की नेमत का इक़रार हो और इसी तरह आजिज़ी करते हुए अल्लाहعزوجل के एहसान को माने और ये समझ ले कि वो शुक्र अदा करने से आजिज़ है-“
(بهجة الاسرار، ذکرشي من اجوبته ممايدل علي قدم راسخ، ص۲۳۴) *#*

दुनियां_को_दिल_से_निकाल_दो

हुज़ूर सय्यिदिना गौसे आज़म शैख अब्दुल क़ादिर رحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ से दुनियां के बारे में पूछा गया तो आप رحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ ने फ़रमाया कि:
“दुनियां को अपने दिल से मुकम्मल तौर पर निकाल दे फिर वो तुझे ज़रर यानी नुक़सान नहीं पहुंचाएगी-“

*#तवक्कुल_की_हक़ीक़त*

हज़रत महबूबे सुब्हानी क़ुत्बे रब्बानी सय्यिदिना शैख अब्दुल क़ादिर जीलानी رحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ से तवक्कुल के बारे में दरियाफ्त किया गया तो आप رحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ ने इरशाद फ़रमाया कि:
“दिल अल्लाह عزوجل की तरफ लगा रहे और उसके गैर से अलग रहे-“
नीज़ इरशाद फ़रमाया कि:
“तवक्कुल ये है कि जिन चीज़ों पर क़ुदरत हासिल है उनके पोशीदा राज़ को मारिफत की आंख से झांकना और “मज़हबे मारिफत” में दिल के यक़ीन की हक़ीक़त का नाम एतिक़ाद है क्यूंकि वो लाज़मी उमूर हैं इनमें कोई एतराज़ करने वाला नुक़्स नहीं निकाल सकता-“

*#तवक्कुल_और_इख्लास*

हज़रत सय्यिदिना शैख अब्दुल क़ादिर जीलानी हुज़ूर गौसे पाक رحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ से दरियाफ्त किया गया कि:
“तवक्कुल क्या है?”
तो आप رحمۃ اللہ تعالیٰ علیہ ने फ़रमाया कि:
“तवक्कुल की हक़ीक़त इख्लास की हक़ीक़त की तरह है और इख्लास की हक़ीक़त ये है कि कोई भी अमल,बदला हासिल करने के लिए ना करे और ऐसा ही तवक्कुल है कि अपनी हिम्मत को जमा करके सुकून से अपने रब عزوجل की तरफ निकल जाए…!”
(المرجع السابق، ص۲۳۳

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