हिजरत का तीसरा साल part 2

हज़रते मुसअब बिन उमैर भी शहीद

फिर बड़ा गजब ये हुआ कि लश्करे इस्लाम के अलमवरदार हज़रते मुसअब बिन उमैर रदियल्लाहु अन्हु पर इब्ने कमीय्या काफिर झपटा। और उनके दाएँ हाथ पर इस ज़ोर से तलवार चला दी कि इनका दायाँ हाथ कटकर गिर पड़ा। इस जबाज मुहाजिर ने झपटकर इस्लामी झन्डे को बाएँ हाथ से सभाल लिया। मगर इब्ने कमीय्या ने तलवार मारकर उनके बाएँ हाथ को भी शहीद कर दिया। दोनों हाक्थ कट चुके थे मगर हज़रते उमैर रदियल्लाहु अन्हु अपने दोनों कटे हुए बाजुओं से परचमे इस्लाम को अपने सीने से लगाए हुए खड़े रहे। और बुलन्द आवाज़ से ये आयत. पढ़ते रहे कि SPrakrius

  • “वमा मुहम्मदुन इल्ला रसूला कद ख़लत मिन कब-लिहिर रुसुल।” फिर इब्ने कमीय्या ने उनको तीर मारकर शहीद कर दिया। हज़रते मुसअब बिन उमैर रदियल्लाहु अन्हु जो’ सूरत में हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से कुछ मुशाबह थे। उनको ज़मीन पर गिरते हुए देखकर कुफ्फार ने गुल मचा दिया कि “(मआजल्लाह) हुजूर ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कत्ल हो गए।”.

अल्लाहु अकबर! इस आवाज़ ने तो ग़ज़ब ही ढा दिया। मुसलमान ये सुनकर बिल्कुल ही सरासीमा और परागंदा दिमाग हो गए और मैदाने जंग छोड़कर भागने लगे। बड़े बड़े बहादुरों के पाँव उखड़ गए। और मुसलमानों में तीन गिरोह हो गए। कुछ लोग भागकर मदीना के करीब पहुंच गए। कुछ लोग सहमकर मुर्दा दिल हो गए। जहाँ थे वहीं रह गए अपनी जान बचाते रहे। या जंग

करते रहे। कुछ लोग जिन की तअदाद तकरीबन बारह थी जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ साबित कदम रहे। इस हलचल और भगदड़ में बहुत से लोगों ने तो बिल्कुल ही हिम्मत हार दी। और जो जाँबाजी के साथ लड़ना चाहते थे। वो भी दुश्मनों के दो तरफा हमलों के नर्गे में फंसकर मजबूर व लाचार हो चुके थे। ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कहाँ हैं? और किस हाल में हैं? किसी को इसकी खबर नहीं थी हज़रते अली शेरे खुदा रदियल्लाहु अन्हु तलवार चलाते और दुश्मनों की सफों को दरहम बरहम करते चले जाते थे। मगर वो हर तरफ़ मुड़ मुड़कर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को देखते थे। मगर जमाले नुबूव्वत नज़र न आने से वो इन्तिहाई इज्तिराब और बे करारी के आलम में थे। हज़रते अनस बिन नज़र रदियल्लाहु अन्हु ने पूछा कि तुम लोग यहाँ बैठे क्या कर रहे हो? लोगों ने जवाब दिया कि अब हम लड़कर क्या करेंगे? जिनके लिए लड़ते थे वो तो शहीद हो गए। हजरते अनस बिन नज़र रदियल्लाहु अन्हु ने फरमाया कि अगर वाकेई रसूले खुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम शहीद हो गए तो फिर हम उनके बाद जिन्दा रहकर कया करेंगे? चलो हम भी इसी मैदान में शहीद होकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास पहुँच जाएँ। ये कहकर आप दुश्मनों के लश्कर में लड़ते हुए घुस गए। और आख़िरी दम तक इन्तिहाई जोशे जिहाद और जाँ बाजी के साथ जंग करते रहे। यहाँ तक कि शहीद हो गए। लड़ाई ख़त्म होने के बाद जब उनकी लाश देखी गई तो अस्सी से ज़्यादा तीर- तलवार और नीज़ों के जख्म उन के बदन पर थे। काफिरों ने उनके बदन को छलनी बना दिय था। और नाक कान वगैरा काटकर उनकी सूरत बिगाड़ दी थी। कोई शख्स उनकी लाश को पहचान न सका। सिर्फ उनकी बहन ने उनकी उंगलियों को देखकर उनको पहचाना।

(बुख़ारी गजवए उहुद जि. २ स.५७९. मुस्लिम जि. २ स.३८)

इसी तरह हजरते साबित बिन वहदाह रदियल्लाहु अन्हु ने मायूस हो जाने वाले अन्सारियों से कहा कि ऐ जमाअते अन्सार अगर बिल फ़र्ज़ रसूले अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम शहीद भी हो गए तो तुम हिम्मत क्यों हार गए? तुम्हारा अल्लाह तो जिन्दा है। लिहाज़ा तुम लोग उठो और अल्लाह के दीन के लिए जिहाद करो। ये कहकर आपने चन्द अन्सारियों को अपने साथ लिया। और लश्करे कुफ्फार पर भूके शेरों की तरह हमला आवर हो गए। और आखिर खालिद बिन वलीद की तलवार से जामे शहादत नोश कर लिया। (उसाबा तर्जमा साबित बिन वहदाह)

जंग जारी थी और जाँ निसाराने इस्लाम जो जहाँ थे वहीं लड़ाई में मसरूफ़ थे। मगर सब की निगाहें इन्तिहाई बेकरारी के साथ जमाले नुबूव्वत को तलाश करती थीं। जैन मायूसी के । आलम में सब से पहले जिसने ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का जमाल देखा वो हज़रते कब बिन मालिक रदियल्लाहु अन्हु की खुश नसीब आँखें हैं। उन्होंने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को पहचानकर मुसलमानों को

पुकारा कि ऐ मुसलमानो! इधर आओ रसूले खुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ये हैं। इस आवाज़ को सुनकर तमाम जाँ निसारों में जान पड़ गई। और हर तरफ़ से दौड़ दौड़कर मुसलमान आने लगे। कुफ्फार ने भी हर तरफ से हमला रोककर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर कातिलाना हमला करने के लिए सारा ज़ोर लगा दिया। लश्करे कुफ्फार का दल बादल हुजूम के साथ उमड़ पड़ा। और बार बार मदनी ताजदार पर यलगार करने लगा। मगर जुल फिकार की बिजली से ये बादल फट फटकर रह जाता था।

ज़ियाद बिन सकन की शुजाअत और शहादत

एक मर्तबा कुफ्फार का हुजूम हमला आवर हुआ तो सरवरे

आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि “कौन है जो मेरे ऊपर अपनी जान कुर्बान करता है? ये सुनते ही हजरते जियाद बिन सकन रदियल्लाहु अन्हु पाँच अन्सारियों को साथ लेकर आगे बढ़े। और हर एक ने लड़ते हुए अपनी जानें फ़िदा कर दी। हज़रते ज़ियाद बिन सकन रदियल्लाहु अन्हु ज़ख्मों से लाचार होकर जमीन पर गिर पड़े थे मगर कुछ कुछ जान बाकी थी। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हुक्म दिया कि उनकी लाश को मेरे पास उठा लाओ। जब लोगों ने उनकी लाश को बारगाहे रिसालत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम में पेश किया। तो हज़रते ज़ियाद बिन सकन रदियल्लाहु अन्हु ने खिसक कर महबूबे खुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के कदमों पर अपना मुँह रख दिया और इसी हालत में उनकी रूह परवाज़ कर गई। अल्लाहु अकबर! हज़रते ज़ियाद बिन सकन रदियल्लाहु अन्हु की इस मौत पर लाखों ज़िन्दगीयाँ कुर्बान । सुब्हानल्लाह!

बच्चा नाज़ रफ़्ता बाशद जि जहाँ नियाज मंदे कि बवक्ते जाँ सिपुर्दन सरश रसीदा बाशी

खजूर खाते खाते जन्नत में

/ इस घमसान की लड़ाई और मार धाड़ के हंगामों में एक बहादुर मुसलमान खड़ा हुआ। निहायत बे परवाई के साथ खजूरें खा रहा था। एक दम आगे बढ़ा और अर्ज किया कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अगर मैं इस वक्त शहीद हो जाऊँ तो मेरा ठिकाना कहाँ होगा। आप ने फरमाया कि तु जन्नत मे जायेगा वो बहादुर इस फरमाने विशारत को सुनकर मस्त व बेखुद हो गया। एक दम कुफ्फार के हुजूम में कूद पड़ा। और ऐसी शुजाअत के साथ लड़ने लगा कि काफिरों के दिल हिल गए। इसी तरह जंग करते करते शहीद हो गया।

(बुख़ारी गजवए उहुद जि.२ सं.५७९)

लंगड़ाते हुए बहिश्त में हजरते अमर बिन जमूह अन्सारी रदियल्लाहु अन्हु लंगड़े थे। ये घर से निकलते वक़्त ये दुआ माँगकर चले थे कि या अल्लाह! मुझको मैदाने जंग से अहल- इयाल में आना नसीब मत कर। उन के चार फ़रज़न्द भी जिहाद में मसरूफ थे। लोगों ने उनको लंगड़ा होने की बिना पर जंग करने से रोक दिया। तो वो सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में गिड़ गिड़ाकर अर्ज करने लगे कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मुझ को जंग में लड़ने की इजाज़त अता फरमाईए। मेरी तमन्ना है कि मैं भी लंगड़ाता हुआ बागे बहिश्त में ख़रामाँ ख़रामाँ चला जाऊँ। उनकी बेकरारी और गिरया वज़ारी से रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का कल्ब मुबारक मुतास्सिर हो गया। और आपने उनको जंग की इजाजत दे दी। ये खुशी से उछल पड़े और अपने एक फरज़नद को साथ लेकर काफिरों के हुजूम में घुस गए । हज़रते अबू तलहा रदियल्लाहु अन्हु का बयान । है कि मैं ने हज़रते अमर बिन जमूह रदियल्लाहु अन्हु को देखा कि वो मैदाने जंग में ये कहते हुए चल रहे थे कि “खुदा की कसम! मैं जन्न्त का मुश्ताक हूँ” उनके साथ साथ उनको सहारा देते हुए उनका लड़का भी इन्तिहाई शुजाअत के साथ लड़ रहा था। यहाँ तक कि ये दोनों शहादत से सरफ़राज़ हो कर बागे बहिश्त में पहुँच गए। लड़ाई ख़त्म हो जाने के बादउनकी बीवी हुन्द ज़ौजए अमर बिन जमूह मैदाने जंग में पहुँची। और उसने एक ऊँट पर उनकी और अपने भाई और बेटे की लाश को लादकर दफ्न के लिए मदीना लाना चाहा तो हज़ारों कोशिशें के बावुजूद किसी तरह भी वो ऊँट एक कदम भी मदीना की तरफ़ नहीं चला। बल्कि वो मैदाने जंग ही की तरफ भाग भागकर जाता रहा। हुन्द ने जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से ये माजरा अर्ज किया तो आपने फरमाया कि ये बताओ क्या अमर बिन जमूह ने घर से

निकलते वक्त कुछ कहा था? हुन्द ने कहा कि जी हाँ! वो ये दुआ करके घर से निकले थे कि “या अल्लाह! मुझको मैदाने जंग से अहल- इयाल में आना नसीब मत कर ।” आप ने इर्शाद फरमाया कि यही वजह है कि ऊँट मदीना की तरफ़ नहीं चल रहा है।

(मदारिज जि.२ स. १२४)

ताजदारे दो आलम

जख्मी इसी सरासीमगी और परेशानी के आलम में जब कि बिखरे हुए मुसलमान अभी रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास जमअ भी नहीं हुए थे कि अब्दुल्लाह बिन कमीय्या जो कुरैश के बहादुरों में बहुत ही नामवर था। उसने नागहाँ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को देख लिया। एक दम बिजली की तरह सफ़ों को चीरता हुआ आया। और ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर कातिलाना हमला कर दिया। ज़ालिम ने पूरी ताकत से आपके चेहरए अनवर पर तलवार मारी जिससे खुद की दो कड़ियाँ रुखे अनवर में चुभ गईं। एक दूसरे काफ़िर ने आपके चेहरए अकदस पर ऐसा पत्थर मारा कि आपके दो दन्दाने मुबारक शहीद, और नीचे का मुकद्दस होंट जख्मी हो गया इसी हालत में उबई बिन खलीफ मलऊन अपने घोडे पर सवार होकर आपको शहीद कर देने की नीय्यत से आगे बढ़ा। हुजूर अक़दंस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने एक जाँ निसार सहाबी हज़रते हारिस बिन सिम्मा रदियल्लाहु अन्हु से एक छोटा सा नेजा लेकर उबई बिन खलफ की गर्दन पर मारा जिससे वो तिलमिला गया। गर्दन पर बहुत मामूली ज़ख्म आया और वो भाग निकला मगर अपने लश्कर में जा कर अपनी गर्दन के जख्म के बारे में लोगों से अपनी तकलीफ और परेशानी जाहिर करने लगा। और बे पनाह ना काबिले बर्दाश्त दर्द की शिकायत करने लगा। इस पर उसके

साथियों ने कहा कि “ये तो मामूली ख़राश है। तुम इस कदर परेशान क्यों हो? उसने कहा कि तुम लोग नहीं जानते एक मर्तबा मुझसे मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) ने कहा था कि मैं तुमको कत्ल करूँगा। इस लिए ये तो बहर हाल जख्म है। मेरा तो ये एअतिकाद है कि अगर वो मेरे ऊपर थूक देते तो भी मैं समझ लेता कि मेरी मौत यकीनी है।

इस का वाकिआ ये है कि उबई ने मक्का में एक घोड़ा पाला था। जिसका नाम उसने “ऊद रखा था। वो रोज़ाना उसको चराता था। और लोगों से कहता था कि मैं इसी घोड़े पर सवार होकर मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) को कत्ल करूँगा। जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इसकी ख़बर हुई। तो आपने फ़रमाया कि इन्शा अल्लाह तआला मैं उबई बिन ख़लफ़ को क़त्ल करूँगा। चुनान्चे उबई बिन ख़लफ़ नेजे के ज़ख्म से बेकरार हो कर रास्ता भर तड़पता और बिलबिलाता रहा। यहाँ तक कि जंगे उहुद से वापस लौटते हुए मकाम “सरिफ़ में मर गयां । (जुरकानी अलल मवाहिबअ जि.२ स.४५)

इसी तरह बिन कमीय्या मलऊन जिसने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के रुखे अनवर पर अपनी तलवार चलादी थी। एक पहाड़ी बकरे को खुदावंदे कहार व जब्बार ने उसपर मुसल्लत फ़रमा दिया। और उसने उसको सींग मार माकर छलनी बना डाला। और पहाड़ की बुलन्दी से नीचे गिरा दिया जिससे उसकी लाश टुकड़े टुकड़े होकर ज़मीन पर बिखर गई।

(जरकानी जि.२ स.३९)

सहाबा का जोशे जाँ निसारी

जब हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जख्मी हो गए। तो चारों तरफ से कुफ्फार ने आप पर तीर- तलवार का वार शुरू कर दिया। और कुफ्फार का बे पनाह हुजूम आपके हर

चहार तरफ से हमला करने लगा जिससे आप कुफ्फार के नर्गे में महसूर होने लगे। ये मंजर देखकर जाँ निसार सहाबा का जोशे जाँ निसारी से

खून

खौलने लगा। और वो अपना सर हथेली पर रखकर आपको बचाने के लिए इस जंग की आग में कूद पड़े । और आपके गिर्द एक हल्का बना लिया। हजरते अबू दुजाना रदियल्लाहु अन्हु झुककर आपके लिए ढाल बन गए। और चारों तरफ से जो तलवारें बरस रही थीं उनको वो अपनी पुश्त पर लेते रहे। और आप तक किसी तलवार या नीजे की मारको पहुँचने ही नहीं देते थे। हज़रते तलहा रदियल्लाहु अन्हु की जाँ निसारी का ये आलम था कि वो कुफ्फार की तलवारों के वार को अपने हाथ पर रोकते थे। यहाँ तक कि उनका एक हाथ कटकर शल हो गया। और उनके बदन पर पैंतीस या संतालीस ज़ख्म लगे। गर्ज जाँ निसार सहाबा ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की हिफाज़त में अपनी जानों की परवाह नहीं की। और ऐसी बहादुरी और जाँ बाजी से जंग करते रहे कि तारीखे आलम में इसकी मिसाल नहीं मिल सकती। हज़रते अबू तलहा रदियल्लाहु अन्हु निशाना बाजी में मशहूर

थे। उन्होंने इस मौकअ पर इस कदर तीर बरसाए कि कई कमाने टूट गईं उन्होंने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अपनी पीठ के पीछे बिठा लिया ताकि दुश्मनों के तीर या तलवचार का काई वार आप पर न आ सके। कभी कभी आप दुश्मनों की फौज को देखने के लिए गर्दन उठाते तो हज़रते अबू तलहा रदियल्लाहु अन्हु अर्ज करते कि या रसूलल्लाह! मेरे माँ बाप आप पर कुर्बान आप गर्दन न उठाएँ। कहीं ऐसा न हो कि दुश्मनों का कोई तीर आप को लग जाए। या रसूलल्लाह! आप मेरी पीठ के पीछे ही रहें मेरा सीना आपके लिए ढाल बना हुआ है।

(बुख़ारी गजवए उहुद स.५८१)

हज़रते कतादह बिन नुअमान अन्सारी रदियल्लाहु अन्हु हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के चेहरए अनवर को बचाने के लिए अपना चेहरा दुश्मनों के सामने किए हुए थे। नागहाँ काफिरों

का एक तीर उनकी आँख में लगा। और आँख बहकर उनके रुख्सार पर आ गई। हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने दस्ते मुबारक से उनकी आँख को उठाकर आँख के हल्के में रख दिया। और यूँ दुआ फ़रमाई कि या अल्लाह कतादह की आँख बचाले जिसने तेरे रसूल के चेहरे को बचाया। मशहूर है कि उनकी वो आँख दूसरी आँख से ज्यादा रौशन और खूबसरत हो गई।

(जरकानी जि.२ स.४२) हजरते सब्द बिन अबी वक्कास रदियल्लाहु अन्हु भी तीरन्दाजी में इन्तिहाई बा कमाल थे। ये भी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की मदाफ़अत में जल्दी जल्दी तीर चला रहे थे। और हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम खुद अपने दस्ते मुबारक से तीर उठा उठा कर उनको देते थे और फरमाते थे कि ऐ सद! तीर बरसाते जाओ। तुम पर मेरे माँ बाप कुरबान।

(बुखारी गजवए उहुद स. ५८०) जालिम कुफ्फार इन्तिहाई बेदर्दी के साथ हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर तीर बरसा रहे थे, मगर उस वक़्त भी ज़बाने मुबारक पर ये दुआ थी

“रब्बिग-फिर कौमि फ़-इन्नहुम ला या लमून। (यानी ऐ अल्लाह! मेरी कौम को बख्श दे वो मुझे जानते नहीं हैं।)

(मुस्लिम गजवए उहुद जि.२ स.९०)

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम दन्दाने मुबारक के सदमे और चेहरए अनवर के जख्मों से निढाल हो रहे थे इस हालत में आप उन गढ़ों में से एक गढ़े में गिर पड़े जो अबू आमिर फासिक ने जा बजा खोदकर उनको छुपा दिया था। ताकि मुसलमान ला इल्मी में इन गढ़ों के अन्दर गिर पड़ें हजरते अली रदियल्लाहु अन्हु ने आपका दस्ते मुबाकरपकड़ाऔर हजरते तलहा बिन अब्दुल्लाह रदियल्लाहु अन्हु ने आपको उठाया। हज़रते अबू उबैदा बिनुल जर्रह रदियल्लाहु अन्हु ने खूद (लोहे की टोपी) की

कड़ी का एक हल्का जो चेहरए अनवर में चुभ गया था अपने दाँतों से पकड़कर इस जोर के साथ खींचा कि उनका एक दाँत टूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। फिर दूसरा हल्का जो दाँतों से पकड़कर , खींचा तो दूसरा दाँत भी टूट गया। चेहरए अनवर से जो खून बहा उसको हजरते अबू सईद खुदरी रदियल्लाहु अन्हु के वालिद हज़रते मालिक बिन सुनान रदियल्लाहु अन्हु ने ज़ोशे अकीदत से चूस चूसकर पी लिया। और एक कतरा भी ज़मीन पर गिरने नहीं दिया। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमायश कि ऐ मालिक बिन सुनान! क्या तूने मेरा खून पी डाला। अर्ज किया कि जी हाँ । या रसूलल्लाह! इर्शाद फरमाया कि जिसने मेरा खून पी लिया। जहन्नम की क्या मजाल जो उसको छू सके।

(जरकानी जि.२ स.३९) इस हालत में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपने जाँ निसारों के साथ पहाड़ की बुलन्दी पर चढ़ गए। जहाँ कुफ्फार के लिए पहुँचना दुश्वार था। अबू सफ़यान ने देख लिया। और फौज लेकर वो भी पहाड़ पर चढ़ने लगा। लेकिन हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु और दूसरे जाँ निसार सहाबा ने काफ़िरों पर इस ज़ोर से पत्थर बरसाया कि अबू सुफ़यान उसकी ताब न ला सका। और पहाड़ से उतर गया।

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपने ‘चन्दं सहाबा के साथ पहाड़ की एक घाटी में तशरीफ़ फ़रमा थे। और चेहरए अनवर से खून बह रहा था। हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हु अपनी ढाल में पानी भर भरकर ला रहे थे। और हज़रते फ़ातिमा जुहरा रदियल्लाहु अन्हा अपने हाथों से खून धो रही थीं। मगर खून बंद नहीं होता था। बिल आख़िर खजूर की चटाई का एक टुकड़ा जलाया और उसकी राख ज़ख्म पर रख दी। तो

फौरन ही थम गया। बुख़ारी गजवए उहुद जि.२ स.५८४)

Swaneeh e Hazrat Alauddeen Ali Ahmad Sabir Kalyari Hasani Chishti رضي الله عنه

🔹13 Rabiul Awwal Urs Mubarak, Aaftaabe Silsilaye chishtiya,Alauddeen Ali Ahmad Sabir Kalyari Hasani Chishti رضي الله عنه

🔹Aap Silsilaye Chishtiya ke Azeem Buzurgo me se hai, Aapka paikare Jalaal Hai , Aur Gause Aazam Shaikh Abdul qadir jilani رضي الله عنه ke Khandan se hai, Aapke Mamu Jaan Hazrat Baba Farriduddin Masood Ganje shakar Hai, Jo Ke Hazrat Farooqe e Aazam Ki Aulad se hai.

🔹Aap Bachpan se Jalali kaifiyat ke maalik the ,ek Martaba Aap ke bachpan me Aapke ghar walo ne dekha ke aapke samne ek saanp mara hua pada hai aur aap bade gusse me use dekh rahe hai…aur farma rahe hai ke humne ise Maar diya Aajke bad koi sanp hamare khanwade ko nuqsan na pohchayega .. 🔹Aapki Ammi jaan ne aapki kam umri me hi Aapko Baba Fariduddun رحمه الله تعالي ke supurd kar diya tha Aur kaha tha ke iska khyal rakhna ye khane pine me dhyan nahi dete.,,,to Baba Farid ne kaha ke Aap fikr na kare mai iski zimmedari langar par laga dunga fir khane ki koi fikr na rahegi…to Baba Farid ne Aapko Apne langar taqseem karne ki zimmedari dedi, Aapt humesha ibadat karte aur langar Ke waqt taqseem karne ke waqt aajate fir taqseem krke khud jangalo ki taraf nikal jaate aur ek dana bhi na khate, balke jangal ke ghaas aur patte khakar ibadat me rehte,

🔹Aapko isi Tarah 12 saal Baba Sahab ki khidmat me Guzar gaye the, Jab Aapki Ammi wapas ai to dekha ke Sabir to nidhaal hai goya ke kai salo se sahi khana na mila ho , ye dekhkar aapne apme bhai Baba Farid ko kaha ke , ye kya Humne apni amanat aapko di thi aur aapne Uska ye hal kar diya…baba Ne Kaha ke behen humne to ise langar ki taqseem par lagaya tha ke jab chahe kha sakta tha..isi se puchu kyu na khaya….to Sabir paak ne farmaya ke Baba Ne To Mujhe Sirf langar khilane kaya tha ye kab kaha tha ke khud bhi khana? Mene 12 sal se ek dana is langar se nahi khaya…!!!

🔹Jab baba Sahab ne ye baat suni to Aap ne kaha ke Ali Ahmad tum.Saabir ho…tabhi se Aapka laqab saabir Mashhoor hogaya,Baba Sahab Ne fir Aapki riyazat dekh kar apne mureedo me shamil farmaya aur kuch waqt baad khilaafat aur ijazat aapko ata ki, Aur delhi ki Khilafat likhdi aur jaane ka hukm diya…Aur kaha ke Hamari .Mohar ispar lag walo jo ke Hamare khalifa Jamaluddin Hanswi ke pas hai..

🔹To aap pakpattan se hansi sharif tashreef le gaye..aap waha raat me pahuche aur Khwaja jamaluddin ne aapse kaha ke abhi aram karlen kal subha hum mohar laga dege to sabir paak ne kaha ke abhi laga dijiye to aapne kaha ke bada andhera bhi hai kal kardege, to sabir paak ne kaha ke andhera mai dur kiye deta hu…aapne apni ungli par Kuch padh ke phuka to wo shama ki tarah roshan hogai,

🔹Ye dekh ke Khwaja jamaluddin Jalal me ate aur aapka khilafat nama chaak krdiya…Sabir paak Ko bhi jalal aa gaya ke mere peer ka likha hua chaak kar diya to aapne farmaya, tumne mera khilafat nama chaak kiya maine tumhara silsila chaak kar diya…

🔹Aur Khwaja jamaluddin ne farmaya ke agar delhi aapke supurd ho jayegi to aap jala ke raakh kardo ge .

🔹Iske baad sabir paak khilafat nama leke Baba sahab ke pas gaye… baba sahab ne Dekha to farmaya ke jamaluddin ka chaak kiya hua mai to nahi si sakta,Albatta Tumhe Kaliyar ki Khilafat Ata karta hu jaao aur kaliyar me jakar Khuda ke deen ka charcha karo… 🔹To Aap fir uspe Mohar lagwakar Kaliyar Sharrif (Dist. Haridwar, India) Rawana hue, Aap yaha akele aye the koi apke sath na tha..Yaha jab aye to dekha ke Yaha Buthi ki kasart se puja hoti hai aur Bade bade ghaat hai aur jo musalman bhi hai kuch wo bhi duniyadar aur takabbur me dube hai, Gareeb log dabe hue aur ameer takabbur krne wale aur Namazi aise hai ke Unki jagah masjid me Fix hai jahan jiski jagah hai wo wahi baithega…al garz Khud pasandi takabbur riya kari sab thi,

🔹Kai log aapke Mitaqid bhi hogaye khaas kar gareeb tabqe ke .Aapne logo se kaha ke logo mujhe Baba Farid ne Yaha bheja hai aur tum log jo kar rahe ho ye chize Buri hai isse baaz ajao lekin Log baz na aate aur Jabr aur Akad karte, 🔹Ek Martaba Aap jama gaye to Wahs sab logo ki jagah makhsus thi ke yaha Qazi bethe ga yaha Fulaa seth , to aap ek jagah jakar baith gaye…to aapko waha se hata diya aur kaha ke piche jakar baitho, aapne unse bahes ki ke ye kya baat hui ke Allah ke ghar me jabar karte ho, To logo ne aapko sabse piche sidhio ke pas kar diya..

🔹Aapne Baba Farid ko Khat likha ke yaha log meri baat nahi man rahe aap kuch kahe..to Baba Farid ne Qazi aur ameer ko khat likha aur usme takeed ki ke sabir ko humne kaliyar ki khilafat di hai uski baat mano,

🔹Khat jab aaya to Un logo ne Baba Farid ke khat ko phaad diya, ye dekh kar sabir paak ko bada ranj hua, Aapne dobara khat likha baba ko aur sab bataya , Baba ne fir takeed ki shaher walo ko ke Akad mat karo samajh jao is shaher ki badshai sabir ki hai…lekin log na mane, to Baba farid ne Sabir paak ko khat likha ke Saabir Humne kaliyar ko tumhare hawale kiya hai Jo tumhe samajh aaye tum jo chahe karo….

🔹Ek martaba aapne Zameen par kuch padh ke dam kiya to shaher me zalzala agaya log ghabragaye aur aapke paas kai log akar taube krne lage lekin bade rayees aur ameer log akad me hi rahe… 🔹Kisi gareeb ki Bakri kisi ne chura liya tha aur wo aapke pas shikayat lekar aaya to aapne jispar shak tha use jama kiya aur kaha ke sach sach batao kisne iski bakri churai hai to logo ne inkaar kiya..to aapne kaha ke ab qusrad ka jalwa dekho, awaz di aapne aye fula fula ki bakri Tu hi bata kisne tujhe churaya, to kuch logo ke pet se awaz aaee ke in in logo me mujhe zubah karke khaliya hai…ye dekh ke wo log ghabrakar mazerat khaa hue

🔹Ek martaba fir aap jama masjid gaye to aap jakar ek jagah baithe , logo ne piche karte karte aapko bahar nikaal diya aur aap bahar aakar jalaal me agaye ,Jab Namaz shuru hui to Aap ne kaha, “Aye Masjid Sab log Sajda kar rahe hai tu kyon sajda nahi karti” aapka kehna.tha ke Masjid Zameen dos hogayi aur usme kai log dafan hogaye… 🔹Is karamat ke baad aapka jalal Aur bhi badh gaya Aap Ne Logo ko kehdiya ke Logo ye ilaqa chor ke chale jao Ab kuch waqt me yaha koi na reh payega…Aur aap ek gular ke jhaad se tek lagaje khade hogaye aur jalal badhta gaya aut halate istegraq me chale gaye, Logo ne dekha ke jahan aapki nazar padti waha aag lag jaati, Log dhire dhire ilaqa chor ke chale gaye aur charo taraf kai kos tak aag hi aag thi aur aapke siwa koi na tha..Yaha tak ke aapko khade khade 12 saal guzar gaye.kisi ko khabar na thi ke aap kaha hai kaise hai.

🔹Baba Farid Aapke Haalat se waqif the Aapne Apne shagirdo me se ek shagird Hazrat Haafiz qari shamsuddun turk ko Hukum diya ke Jaao Hamara sabir 12 saal se Khuda ki yaad me ek jhaad se teka lagaye khada hai…jakar use Mamool par lao lekin khabardar ,sabir ke saamne na jana..Aur suno, tumhara Hisse ka faiz sabir ke paas hai…

🔹Hazrat shamsuddun Turk Aapke Hukm ke Mutabiq Kaliyar sharif gaye wahan aag kam ho jati baba farid ki Dua Aapke sath thi..

🔹Aap jab poche to dekha ke sabir pak ka sukha hua jism ek gular ke jhaad ke sath khada hai aur aap upar dekh rahe hai aur aapke samne aag ke shole badhak rahe hai..aapke sabir paak ke piche quran ki tilawat shuru kardi aur kai der tilawat karte rahe…

🔹ab Khuda ke kalam ki tilawat ki awaz aapke kano me padi to aapne harkat ki aur hosh me aye, kehne lage ke kon ho..peeth piche quran padhna thik nahi aage aao, aap aage na gaye lekin sabir pak ke bazu akar padhne lage..jab kafi der hogai to sabir pak ne kaha ke Khade khade na padho baith jao, to hafiz shamsuddin ne kaha ke Kaise hosakta hai Hazrat khade rahe aur gulam baith jaye..to sabir paak ne kaha ke Thik hai mujhe bithao…apne kai der ki kohsish ke bad hazrat ko tek laga kar bithadiya, 🔹Hazrat ne pucha kaha se aye ho, to Hafiz Sahab ne kaha Mujhe Shaikh Fariduddeen ne bheja hai….peer murshid ka naam sunna tha ke Sabir paak ki Aankhi me ansu agaye aur kaha ke “Hamare shaikh kaise hai”…Baba Farid ne Jab padha ke Sabir ne Mujhko shaikh kaha hai to wajd me agaye aur aapke kurte ki batan toot gai ..

🔹12 saal se kuch khaya piya na tha aapne Hafiz sahab se kaha ke jhaad me se kuch gular Ko ubaal kar namak k sath le aao fir tanawul farmaya..

🔹Aur aapko chand wasiyate ki Aur Apni khilafat Aur silsile badhane ki zimedari aapko di aur kaha ke Hamara silsila tumse chalega, aur Rawana kiya aur Kahan ke Jab Tum wapas aaoge toh hamare wisaal hogaya hoga ,

🔹Aur wasiyate ki ke Hamara visaal ke waqt hamare qarib na aana Aur gusal karne ke waqt sirf ungli se ishara karna jaha ka irada karoge waya gusl hojayga aur Hamara janazah Padhane ke waqt intezar karna Ek Shakhs ayega jo janaza padhayega, Hazrat hafiz shamsuddin Aapse Kai marbata Fanaa Aur Baqaa ke bare me pucha krte the ke Hazrat Fana baqa kya hai…Aapne kaha ke Jo Hamara janaza Padhayega Wo tumhe ye raaz batayga..fir Hafiz sahab wahan se rawana hue.Jab Hafiz sahaba Ek Fauj ke daste me the raat me achanak tufan aya jisse sare khaime ud gaye siway Hafiz sahab ke…aapko samajh gaya ke Hazrat ka visal hogaya hai..

🔹aap waha se aye aur Wasiyat ke mutabiq Gusal diya aur dusre Faraiz anjam diye…Jab Aap janaze ki tayari karne lage to koi maujud na tha, aap intezar karne lage ke koi aaye..to Dur se ek ghode par sawar hokar ek shakhs naqab posh aaya tha , wo Aakar khada hogaya aur kehne laga Hum janazah padhayge, Hazrat ne Unke piche janaza padha to koi sath na tha aur jab Salam phera to Dekha ke jahan tak nazar jarahi hai waha tak Auliya ka hujoom hai,

🔹 Jab wo Shakhs janazah padhakar Wapas jaane lage to Hafiz shamsuddin ne Aapko rok liya, Aur kehne lage Ke Hazrat aap kon hai , Jab Un Shakhs Ne apne chehre se Naqab hataya to Aap dekh kar hairan hogaye ke Koi Aur Nahi balke Alauddeen Ali ahmad Sabir paak khud the, Kehne lage ke Shamsuddin tum Pucha karte the na Fanaa Aur baqaa kya hai to dekhlo…Jo janazah me Rakha hai wo Fanaa Hai Aur jo Tumhare saamne khada hai wo Baqa hai (yaani Humme Apne jism Haqeeqe ko Allah ki khatir fanaa krdiya tha to Allah ne hume visaal ke baad bhi Baqaa yaani zindagi ata krdi) , Allahu Akbar…

🔹Aapke janaze aur Visaal ke baad Aapko dafn kiya gaya to Farishte aur auliya ki arwaah Maujudd thi …

🔹Hafiz Shamsuddin turk ko panipat jaane ka Ishara hua tha , aap mazaae Mubarak Banakar galiban chand din rahe aur fir panipat chale gaye the.. 🔹Lekin Sabir paak ke dafn hone ke baad Aaapke Qabr ka alam ye tha ke aapke qabr ke upar ek bijli humesha Chamka karti, agar koi parinda janwar qarib na aata Aur kafir dur tak Jalal ke sabab log is jagah na aate…250 saal Aapki qabr Mubarak logon ki nigaho se chhupi rahi…

🔹taqriban 250 saal bad Aapke silsile ke ek buzurg Hazrat abdul quddus Gangohi رحمة الله عليه ne Muraqba kiya Aur Ye beda uthaya ke Aapki qabr paak ko dhunda jaye, Ek roz aapko ilhaam se Aabre Mubarak Ki nishandahi karwadi gayi Aap rawana hue Aur Dekha ke Har taraf Haibat Aur jalaal hai, Aapne Jagah jagah namaz ada ki Aur dua ki jahan jahan aap aage ate jalal kam hota, Bil akhir aap qabre Mubarak tak pohche aur dur khade rahe dekha ke ek bijli Jalwa numa hai, hazrat ki ruhe paak se Aage jaane ki ijazat li to aapko ijazat mili…

🔹AapneRe kakauza gherao kardiya Aur qabr paak ki nishandahi ki…Aap hi ke badaulat aaj Hum Sabir paak ke raoze ko jaante hai..Aur Kaliyar Sharif Me Aaj bhi Marjaye khalayeq hai, Aapko karamate Aaj bhi jaari hai, Bade Bade aseb Aur Jinn Aur jadu wale Aapke Roze par jaakr thik hojate hai, Cancer, la ilaj Bimari wale bhi shifa paate hai aapke astane se…Aapke raoze par Ek ajeeb jalal aur haibat hai..aur

🔹Allah Paak se dua hai ke Hume Sabir paak ke Faizan se malamal farmaye aur Aapke Rang me Rangde, Aur Allah sada hume bhi Rah e haq par chalne ki taufeeq ata farmaye..

Al Faatihaa 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

14 Rabi ul Awwal Urs Hazrat Khawaja Syed Qutubuddin Bakhtiyar Kaki (Rehmatullah Alaih)

Hazrat Qutbuddin Bakhtiyar Kaki(رحمتہ اللہ علیہ)

809wa URS MUBARAK

Qutub ul Islaam Maalik ul Mashaikh Sultan ul Tariqat Burhan ul Haqiqat Siraj ul Aulia Hazrat Khawaja Syed Qutubuddin Bakhtiyar Kaki (Rehmatullah Alaih)

Aapki Wiladat 2 Ramzan ul Mubarak 569 Hijri Mutabik 1173 Esvi Me Osh, Mawaa-un-Naher, Kyrgyzstan Me Hui, Aapka Wisaal 14 Rabi ul Awwal Sharif 633 Hijri Mutabik 27 November 1235 Esvi Me Hua, Aap Khawaja e Khawajgan Shehansha e Hindustan Hazrat Khawaja Moinuddin Hasan Chishti Sarkar Khawaja Gareeb Nawaz (Razi Allahu Tala Anhu) Ke Mureed wa Khalifa Hain, Aapke Khalifa Zuhad ul Ambiya Hazrat Baba Fareed ud Deen Masood Ganj Shakar (Rehmatullah Alaih) Hain, Aapka Mazar Mubarak Mehroli Sharif, Delhi, India Me Marjai Khaliak Hain…

🌹🌹Urs Mubarak🌹🌹
Urs Hazrat Qutub ul Aqtab Hazrat Khwaja Qutubuddin Bakhtiyar Kaki R.A bht bht Mubarak
Aap Shaheed e Ishq hain aur aapka wisal Dauran e Mehfil e Sama Shaykh Ahmed Jaam almaruf Zinda peel ke ashar sunte hue hua. Aapke kaafi Khulafa hue aur Jahan Jahan bhi Tashreef le gaye unhone mehar o muhabbat se ishat e Deen kiya aur kaafi logo ko silsila e chishtiya main dakhil bhi kiya.
Aapko Hazrat Khwaja e Khwajagaan Hazrat Khwaja Moinuddin Hasan Chishty R.A se tamam wo tabarrukat mile jo Khwaja e Azam R.A ke pass jo the aur jo unko Mashaikh se mile aur khud Khwaja e Azam ke Tabarrukat aur Khirqah Khilafat hasil hua
Note – Aksar Mashaikh e Chisht main Khwaja e Azam R.A se le kar Khwaja Naseeruddin Chiragh Dehalvi R.A tak Mashaikh apna Janasheen yani sajjadanashin jo ahl hota tha uska intekhab kiya karte the is wajah se Khwaja Gharib Nawaz R.A ke Haqiqi Janasheen aur Sajjadanashin Hazrat Khwaja Qutubuddin Bakhtiyar Kaki R.A hai
Aur jo koi bhi Khwaja e Azam ke Janasheen aur Sajjadanashin ka Dawa kare wo batil hai.
Kyuki ye tasawwuf ki naimat kisi ki miras nahi hai iske liye ba qaul Shaykh Jami ke

Banda e ishq shudi tark nasab kun Jami
Ke dar ein rah falaan ibne falaan cheezi neest

Aey Jami! Tu ishq ka ghulaam hai, naam o nasb tark kar de kyuki is rah main Falaan Ibne Falaan be-maani hota hai

us waqt ye naimat maurusi nahi thi sirf jo Ahl hota tha usko is nimat se sarfaraz kiya jata tha.

Hazrat Khwaja Qutubuddin Bakhtiyar Kaki R.A ne apne peer o murshid Khwaja e Azam R.A ke Malfuzat ko jama kiya jiska naam Dalil ul Arifeen hai
Alhamdulillah iska Farsi se English zuban main tehqiqi tarjuma ho chuka hai.
Aur Hazrat Khwaja e Azam R.A aur Hazrat Khwaja Qutubuddin Bakhtiyar Kaki R.A ke darmiyan jo khat o kitabat hue wo maktubat bhi dastiyab hai