SERMON About the Ahlu’l-bayt (of the Holy Prophet) and their opposers

About the Ahlu’l-bayt (of the Holy Prophet) and their opposers


ومن خطبة له (عليه السلام)
[يذكر فيها فضائل أهل البيت(عليهم السلام)]

وَنَاظِرُ قَلْبِ  اللَّبِيبِ بِهِ يُبْصِرُ أَمَدَهُ، وَيَعْرِفُ غَوْرَهُ  وَنَجْدَهُ . دَاع دَعَا، وَرَاع رَعَى، فَاسْتَجِيبُوا لِلدَّاعِي، وَاتَّبِعُوا الرَّاعِيَ.

قَدْ خَاضُوا بِحَارَ الْفِتَنِ، وَأَخَذُوا بِالْبِدَعِ دُونَ السُّنَنِ، وَأَرَزَ  الْمُؤْمِنُونَ،

وَنَطَقَ الضَّالُّونَ الْمُكَذِّبُونَ.

نَحْنُ الشِّعَارُ  وَالاَْصْحَابُ، وَالْخَزَنَةُ وَالاَْبْوَابُ، [وَلاَ] تُؤْتَى الْبُيُوتُ إِلاَّ مِنْ أَبْوَابِهَا، فَمَنْ أَتَاهَا مِنْ غَيْرِ أَبْوَابِهَا سُمِّيَ سَارِقاً.

منها:

فِيهِمْ كَرَائِمُ  الْقُرْآنِ، وَهُمْ كُنُوزُ الرَّحْمنِ، إِنْ نَطَقُوا صَدَقُوا، وَإِنْ صَمَتُوا لَمْ يُسْبَقُوا. فَلْيَصْدُقْ رَائِدٌ أَهْلَهُ، وَلْيُحْضِرْ عَقْلَهُ، وَلْيَكُنْ مِنْ أَبْنَاءِ الاْخِرَةِ، فَإِنَّهُ مِنْهَا قَدِمَ، وَإِلَيْهَا يَنْقَلِبُ.

وَالنّاظِرُ بِالْقَلْبِ، الْعَامِلُ بِالْبَصَرِ، يَكُونُ مُبْتَدَأُ عَمَلِهِ أَنْ يَعْلَمَ: أَعَمَلُهُ عَلَيْهِ أَمْ لَهُ؟! فَإِنْ كَانَ لَهُ مَضَى فِيهِ، وَإِنْ كَانَ عَليْهِ وَقَفَ عِنْدَهُ.

فَإِنَّ الْعَامِلَ بَغَيْرِ عِلْم كَالسَّائِرِ عَلَى غيْرِ طَرِيق، فَلاَ يَزِيدُهُ بُعْدُهُ عَنِ الطَّرِيقِ الْوَاضِحِ إِلاَّ بُعْداً مِنْ حَاجَتِهِ، وَالْعَامِلُ بالْعِلْمِ كَالسَّائِرِ عَلَى الطَّرِيقِ الْوَاضِحِ، فَلْيَنْظُرْ نَاظِرٌ: أَسَائِرٌ هُوَ أَمْ رَاجِعٌ؟!

وَاعْلَمْ أَنِّ لِكُلِّ ظَاهِر بَاطِناً عَلى مِثَالِهِ، فَمَا طَابَ ظَاهِرُهُ طَابَ بَاطِنُهُ، وَمَا خَبُثَ ظَاهِرُهُ خَبُثَ بَاطِنُهُ، وَقَدْ قَالَ الرَّسُولُ الصَّادِقُ(صلى الله عليه وآله): «إِنَّ اللهَ يُحِبُّ

الْعَبْدَ وَيُبْغِضُ عَمَلَهُ، وَيُحِبُّ الْعَمَلَ وَيُبْغِضُ بَدَنَهُ».

فَاعْلَمْ أَنَّ كُلَّ عَمَل نَبَاتٌ، وَكُلَّ نَبَات لاَ غِنَى بِهِ عَنِ الْمَاءِ، وَالْمِيَاهُ مُخْتَلِفَةٌ، فَمَا طَابَ سَقْيُهُ طَابَ غَرْسُهُ وَحَلَتْ ثَمَرَتُهُ، وَمَا خَبُثَ سَقْيُهُ خَبُثَ غَرْسُهُ وَأَمَرَّتْ ثَمَرَتُهُ.

SERMON

About the Ahlu’l-bayt (of the Holy Prophet) and their opposers

He who has an intelligent mind looks to his goal. He knows his low road as well as his high road. The caller has called. The shepherd has tended (his flocks). So respond to the caller and follow the shepherd.

They (the opposers) have entered the oceans of disturbance and have taken to innovations instead of the Sunnah (the Prophet’s holy deeds, utterances and his unspoken approvals), while the believers have sunk down, and the misguided and the liars are speaking. We are the near ones, companions, treasure holders and doors (to the Sunnah). Houses are not entered save through their doors. Whoever enters them from other than the door is called a thief.
A part of the same sermon

The delicacies of the Qur’an are about them (Ahlu’l-bayt, the descendants of the Prophet) and they are the treasurers of Allah. When they speak they speak the truth, but when they keep quiet no one can speak unless they speak. The forerunner should report correctly to his people, should retain his wits and should be one of the children (a man) of the next world, because he has come from there and would return to it.

The beginning of the action of one who sees with heart and acts with eyes it is to assess whether the action will go against him or for him. If it is for him he indulges in it, but if it is against him he keeps away from it. For, he who acts without knowledge is like one who treads without a path. Then his deviation from the path keeps him at a distance from his aim. And he who acts according to knowledge is like he who treads the clear path. Therefore, he who can see should see whether he should proceed or return.

You should also know that the outside (of every thing) has a similar inside. Of whatever the outside is good, its inside too is good, and whatever the outside is bad, its inside too is bad. The truthful Prophet (peace and blessing of Allah be upon him and his progeny) has said that: “Allah may love a man but hate his action, and may love the action but hate the man.” You should also know that every action is like a vegetation, and a vegetation cannot do without water while waters are different. So where the water is good the plant is good and its fruits are sweet, whereas where the water is bad. the plant will also be bad and its fruits will be bitter.

𝙃𝙖𝙯𝙧𝙖𝙩 𝙎𝙮𝙚𝙙 𝘼𝙗𝙙𝙪𝙡𝙡𝙖𝙝 𝙎𝙝𝙪𝙩𝙩𝙖𝙧𝙞 𝙪𝙡 𝙌𝙪𝙙𝙧𝙞 𝙍𝙖𝙝𝙢𝙖𝙢𝙖𝙩𝙪𝙡𝙡𝙖𝙝𝙖𝙡𝙚𝙝

𝙌𝙪𝙩𝙖𝙗 𝙐𝙡 𝘼𝙦𝙩𝙖𝙗 𝙅𝙖𝙣𝙖𝙝𝙞𝙣 𝙚 𝙂𝙝𝙤𝙪𝙨 𝙂𝙬𝙖𝙡𝙞𝙤𝙧 𝘼𝙗𝙪𝙡 𝙒𝙖𝙟𝙞𝙝 𝙃𝙖𝙯𝙧𝙖𝙩 𝙎𝙮𝙚𝙙 𝘼𝙗𝙙𝙪𝙡𝙡𝙖𝙝 𝙎𝙝𝙪𝙩𝙩𝙖𝙧𝙞 𝙪𝙡 𝙌𝙪𝙙𝙧𝙞 𝙍𝙖𝙝𝙢𝙖𝙢𝙖𝙩𝙪𝙡𝙡𝙖𝙝𝙖𝙡𝙚𝙝

𝘽𝙖𝙧𝙩𝙝 : 𝘼𝙖𝙥 𝙠𝙞 𝙬𝙞𝙡𝙖𝙙𝙖𝙩 17 𝙍𝙖𝙗𝙞 𝙪𝙡 𝘼𝙬𝙖𝙖𝙡 𝘽𝙖𝙧𝙤𝙯 𝙅𝙪𝙢𝙢𝙖𝙩 𝙪𝙡 𝙈𝙪𝙗𝙖𝙧𝙖𝙠 938𝙃𝙞𝙟𝙧𝙞 𝙢𝙚𝙞𝙣 𝙎𝙝𝙖𝙝𝙟𝙖𝙝𝙖𝙣 𝘼𝙖𝙗𝙖𝙙 𝙈𝙚𝙞𝙣 𝙃𝙤𝙞 𝘼𝙖𝙥 𝙆𝙖 𝙎𝙝𝙖𝙟𝙧𝙖 (𝙬𝙖𝙡𝙞𝙙 𝙠𝙞 𝙅𝙖𝙣𝙞𝙗 𝙨𝙚) 22 𝙬𝙖𝙨𝙩𝙤𝙣 𝙨𝙚 𝙄𝙈𝘼𝙈 𝙃𝙐𝙎𝙎𝘼𝙄𝙉ع 𝙎𝙚 𝙢𝙞𝙡𝙩𝙖 𝙝𝙖𝙞

𝘼𝙪𝙧 𝙬𝙖𝙡𝙞𝙙𝙖 𝙨𝙚 𝙎𝙃𝘼𝙄𝙆𝙃 𝙐𝙇 𝙄𝙎𝙇𝘼𝙈 𝙕𝙐𝙃𝘼𝘿 𝙐𝙇 𝘼𝙈𝘽𝙄𝙔𝘼 𝘽𝘼𝘽𝘼 𝙁𝘼𝙍𝙀𝙀𝘿 𝙈𝘼𝙎𝙊𝙊𝘿 𝙂𝘼𝙉𝙂 𝙀 𝙎𝙃𝘼𝙆𝘼𝙍 𝙧𝙖𝙝𝙢𝙖𝙩𝙪𝙡𝙡𝙖𝙝𝙖𝙡𝙚𝙝 𝙨𝙚 𝙢𝙞𝙡𝙩𝙖 𝙝𝙖𝙞
𝘼𝙪𝙧 18/ 𝙈𝙪𝙝𝙖𝙧𝙧𝙖𝙢 𝙐𝙡 𝙃𝙖𝙧𝙖𝙢 1021 𝙃𝙞𝙟𝙧𝙞 𝙆𝙤 𝘼𝙖𝙥 𝙄𝙨 𝙁𝙖𝙣𝙞 𝘿𝙪𝙣𝙮𝙖 𝙎𝙚 𝙋𝙖𝙧𝙙𝙖 𝙁𝙖𝙧𝙢𝙖𝙜𝙖𝙮𝙚 ..

𝙆𝙖𝙧𝙖𝙢𝙖𝙖𝙩 🌹

𝙒𝙖𝙡𝙞 𝙆𝙚 𝙇𝙞𝙮𝙚 𝙄𝙯𝙝𝙖𝙧 𝙚 𝙆𝙖𝙧𝙖𝙢𝙖𝙖𝙩 𝙕𝙖𝙧𝙤𝙧𝙞 𝙉𝙖𝙝𝙞 𝙃𝙤𝙩𝙖 𝘽𝙖𝙨𝙨 𝘼𝙡𝙡𝙖𝙝 𝘼𝙥𝙣𝙚 𝘽𝙖𝙣𝙙𝙤𝙣 𝙆𝙖 𝙈𝙖𝙦𝙖𝙢 𝘽𝙖𝙩𝙖𝙣𝙚 𝙆𝙚 𝙇𝙞𝙮𝙚 𝙐𝙣 𝙨𝙚 𝙆𝙤𝙘𝙝 𝙆𝙖𝙖𝙢 𝘼𝙚𝙮𝙨𝙚 𝙎𝙖𝙙𝙞𝙧 𝙁𝙖𝙧𝙢𝙖𝙙𝙚𝙩𝙖 𝙃𝙖𝙞 𝙅𝙞𝙨 𝙎𝙚 𝘼𝙖𝙢 𝙊 𝙆𝙝𝙖𝙨 𝙆𝙞 𝘼𝙦𝙖𝙡 𝘿𝙖𝙣𝙜 𝙍𝙖𝙝𝙟𝙖𝙩𝙞 𝙃𝙖𝙞 𝙆𝙪𝙡𝙮𝙖𝙩 𝙚 𝙂𝙬𝙖𝙡𝙞𝙤𝙧 𝙢𝙚𝙞𝙣 𝙎𝙮𝙚𝙙 𝙁𝙖𝙯𝙖𝙡 𝘼𝙡𝙞 𝙎𝙝𝙖𝙝 𝙧𝙖𝙝𝙖𝙢𝙩𝙪𝙡𝙡𝙖𝙝 𝘼𝙡𝙚𝙝 𝙁𝙖𝙧𝙢𝙖𝙩𝙚 𝙃𝙖𝙞𝙣 𝘼𝙪𝙧 𝙔𝙚 𝙒𝙖𝙦𝙞𝙮𝙖 𝘼𝙖𝙥 𝙉𝙚 𝘼𝙥𝙣𝙞 𝘼𝙖𝙠𝙝𝙤𝙣 𝙎𝙚 𝘿𝙚𝙠𝙝𝙖…

𝘼𝙖𝙥 𝙂𝙝𝙤𝙪𝙨 𝙪𝙡 𝘼𝙪𝙡𝙞𝙖 𝙃𝙖𝙯𝙧𝙖𝙩 𝙈𝙤𝙝𝙖𝙢𝙢𝙖𝙙 𝙂𝙝𝙤𝙪𝙨 𝙂𝙬𝙖𝙡𝙞𝙤𝙧𝙞 𝙍𝙖𝙝𝙢𝙖𝙩𝙪𝙡𝙡𝙖𝙝𝙖𝙖𝙡𝙚𝙝 𝙠𝙚 𝘽𝙖𝙙𝙚 𝙛𝙖𝙧𝙯𝙖𝙣𝙙 𝘼𝙪𝙧 𝙅𝙖𝙣𝙖𝙨𝙝𝙚𝙚𝙣 𝙝𝙤𝙮𝙚 𝘼𝙜𝙖𝙧 𝘾𝙝𝙚 𝙆𝙚 𝘼𝙖𝙥 𝙆𝙚 𝙏𝙖𝙢𝙖𝙢 𝘽𝙝𝙖𝙞 𝙈𝙖𝙧𝙞𝙛𝙖𝙩 𝙆𝙞 𝙈𝙖𝙣𝙯𝙞𝙡𝙤𝙣 𝙆𝙚 𝙎𝙞𝙩𝙖𝙧𝙚𝙚 𝙏𝙝𝙮𝙚 𝘼𝙪𝙧 𝙎𝙖𝙗 𝙄𝙡𝙖𝙢 𝘼𝙪𝙧 𝙄𝙧𝙛𝙖𝙣 𝙆𝙞 𝘿𝙪𝙡𝙖𝙩 𝙎𝙚 𝙢𝙖𝙡𝙖𝙢𝙖𝙡 𝙏𝙝𝙮𝙚 𝙇𝙚𝙠𝙞𝙣 𝙅𝙤 𝙈𝙖𝙦𝙖𝙢 𝙃𝙖𝙯𝙧𝙖𝙩 𝘼𝙗𝙙𝙪𝙡𝙡𝙖𝙝 𝙎𝙝𝙪𝙩𝙩𝙖𝙧𝙞 𝙍𝙖𝙝𝙢𝙖𝙩𝙪𝙡𝙡𝙖𝙝𝙖𝙡𝙚𝙝 𝙆𝙤 𝙃𝙖𝙨𝙞𝙡 𝙃𝙤𝙬𝙖 𝘼𝙪𝙧 𝙆𝙞𝙨𝙞 𝘽𝙝𝙖𝙞 𝙠𝙤 𝙃𝙖𝙨𝙞𝙡 𝙉𝙖𝙝𝙞 𝙃𝙤𝙬𝙖

𝘼𝙖𝙥 𝙠𝙤 𝙂𝙝𝙤𝙪𝙨 𝙐𝙡 𝘼𝙪𝙡𝙞𝙖 𝙉𝙚 𝘼𝙥𝙣𝙖 𝙅𝙖𝙣𝙖𝙨𝙝𝙚𝙣 𝙄𝙣𝙩𝙚𝙠𝙝𝙖𝙗 𝙁𝙖𝙧𝙢𝙖𝙮𝙖…

𝙏𝙖𝙡𝙚𝙚𝙢 𝙬𝙖 𝙩𝙖𝙧𝙗𝙞𝙮𝙖𝙩 𝘼𝙖𝙥 𝙉𝙚 𝘿𝙞𝙣𝙞 𝙐𝙡𝙤𝙤𝙢 𝙆𝙞 𝙏𝙖𝙡𝙚𝙚𝙢 👉𝙈𝙪𝙟𝙖𝙙𝙙𝙞𝙙 𝙚 𝙯𝙖𝙢𝙖𝙣 𝙌𝙖𝙯𝙞 𝙪𝙡 𝙌𝙪𝙯𝙖𝙩 𝙃𝙖𝙞𝙙𝙖𝙧 𝘼𝙡𝙞 𝙎𝙖𝙣𝙞 𝙨𝙮𝙚𝙙 𝙨𝙝𝙖𝙝 𝙬𝙖𝙟𝙞𝙝𝙪𝙙𝙙𝙞𝙣 𝙖𝙡𝙖𝙫𝙞 𝙃𝙪𝙨𝙨𝙖𝙞𝙣𝙞 𝙍𝙖𝙝𝙢𝙖𝙩𝙪𝙡𝙡𝙖𝙝𝙖𝙡𝙚𝙝 👉𝘼𝙪𝙧 𝙈𝙪𝙡𝙖𝙣𝙖 𝙈𝙪𝙗𝙖𝙧𝙖𝙠 𝘼𝙡𝙞 𝘿𝙖𝙣𝙞𝙨𝙝𝙢𝙖𝙣𝙙 𝙌𝙪𝙙𝙙𝙖𝙨𝙖𝙨𝙞𝙧𝙧𝙖𝙝𝙪 𝙎𝙚 𝙃𝙖𝙨𝙞𝙡 𝙁𝙖𝙧𝙢𝙖𝙞

𝘼𝙖𝙥 𝙠𝙤 𝙏𝙖𝙢𝙖𝙢 𝙐𝙡𝙤𝙤𝙢 𝙈𝙚𝙞𝙣 𝙆𝙖𝙢𝙖𝙡 𝙃𝙖𝙨𝙞𝙡 𝙏𝙝𝙖 𝘼𝙪𝙧 𝙒𝙖𝙡𝙞𝙙 𝙆𝙞 𝙉𝙞𝙜𝙖𝙝 𝙚 𝙠𝙖𝙧𝙖𝙢 𝘼𝙖𝙥 𝙋𝙖𝙧 𝙃𝙖𝙢𝙚𝙨𝙝𝙖 𝙍𝙖𝙝𝙩𝙞 𝙏𝙝𝙞 𝘼𝙖𝙥 970/𝙃𝙞𝙟𝙧𝙞 𝙨𝙚 (𝙎𝙖𝙧𝙠𝙖𝙧 𝙂𝙝𝙤𝙪𝙨 𝙂𝙬𝙖𝙡𝙞𝙤𝙧 𝙦𝙪𝙙𝙖𝙨𝙖𝙨𝙞𝙧𝙧𝙖𝙝𝙪 𝘼𝙡𝙖𝙯𝙞𝙯 𝙠𝙞 𝙬𝙖𝙛𝙖𝙩 𝙠𝙚 𝙗𝙖𝙖𝙙 𝙎𝙚) 1021/ 𝙃𝙞𝙟𝙧𝙞 𝙩𝙖𝙠 𝙈𝙖𝙨𝙣𝙖𝙙 𝙚 𝙆𝙝𝙞𝙡𝙖𝙛𝙖𝙩 𝙋𝙖𝙧 𝙍𝙖𝙝𝙚 𝘼𝙪𝙧

𝘼𝙠𝙗𝙖𝙧 (𝙠𝙞𝙣𝙜 𝙤𝙛 𝙄𝙣𝙙𝙞𝙖) 𝙆𝙖 𝙋𝙪𝙧𝙖 𝙆𝙝𝙖𝙣𝘿𝙖𝙣 𝙥𝙖𝙧𝙙𝙖𝙙𝙖 𝙎𝙚 𝙇𝙚𝙠𝙖𝙧 𝙃𝙖𝙧 𝙃𝙖𝙧 𝙁𝙖𝙧𝙙 𝙃𝙖𝙯𝙧𝙖𝙩 𝙂𝙝𝙤𝙪𝙨 𝙂𝙬𝙖𝙡𝙞𝙤𝙧 𝙨𝙚 𝘽𝙪𝙝𝙖𝙩 𝘼𝙖𝙦𝙞𝙙𝙖𝙩 𝙍𝙖𝙠𝙝𝙩𝙖 𝙏𝙝𝙖 𝙗𝙖𝙨𝙨 𝘼𝙖𝙥 𝙆𝙚 𝙁𝙖𝙧𝙯𝙖𝙣𝙙 𝘼𝙗𝙙𝙪𝙡𝙡𝙖𝙝 𝙎𝙝𝙖𝙝 𝙠𝙖 𝘽𝙝𝙞 𝙈𝙖𝙦𝙖𝙢 𝙆𝙤𝙞 𝘼𝙖𝙢 𝙉𝙖𝙩𝙝𝙖 𝙃𝙖𝙧 𝙆𝙤𝙞 𝘼𝙖𝙥 𝙎𝙚 𝘼𝙙𝙖𝙗 𝙎𝙚 𝙋𝙚𝙖𝙝 𝘼𝙖𝙩𝙖 𝙅𝙞𝙨 𝙆𝙞 𝙬𝙖𝙟𝙖 𝙎𝙚 𝘼𝙠𝙗𝙖𝙧 𝙆𝙚 𝘿𝙖𝙧𝙗𝙖𝙧𝙞 𝙅𝙞𝙣 𝙈𝙚𝙞𝙣 𝘼𝙗𝙪𝙡 𝙁𝙖𝙯𝙖𝙡 𝘽𝙝𝙞 𝙏𝙝𝙖 𝙀𝙠 𝙍𝙤𝙯 𝙆𝙝𝙣𝙚 𝙇𝙖𝙜𝙖 𝙆𝙚 𝙅𝙖𝙝𝙖𝙣𝙜𝙚𝙚𝙧 𝙆𝙞 𝘽𝙞𝙢𝙖𝙧𝙞 𝙠𝙖 𝙎𝙖𝙗𝙖𝙗 𝘼𝙖𝙥 𝙠𝙚 𝙈𝙪𝙧𝙨𝙝𝙞𝙙 𝘽𝙖𝙗𝙖 𝙂𝙝𝙤𝙪𝙨 𝙠𝙚 𝙁𝙖𝙧𝙯𝙖𝙣𝙙 𝘼𝙗𝙙𝙪𝙡𝙡𝙖𝙝 𝙃𝙖𝙞 𝙟𝙖𝙗 𝘼𝙖𝙥 𝙠𝙤 𝙔𝙚 𝙆𝙝𝙖𝙗𝙖𝙧 𝙋𝙤𝙝𝙖𝙣𝙘𝙝𝙞 𝘼𝙥𝙖 𝙉𝙚 𝙎𝙤𝙠𝙤𝙤𝙩 𝙙𝙖𝙧𝙢𝙖𝙮𝙖 𝘼𝙪𝙧 𝙅𝙖𝙗 𝘼𝙖𝙥 𝙠𝙤 𝙅𝙖𝙝𝙖𝙣𝙜𝙚𝙚𝙧 𝙆𝙞 𝘽𝙞𝙨𝙢𝙞𝙡𝙡𝙖𝙝 𝙆𝙝𝙖𝙬𝙖𝙣𝙞 𝙆𝙚 𝙒𝙖𝙦𝙖𝙩 𝘿𝙖𝙬𝙖𝙩 𝘿𝙞 𝙜𝙖𝙞 𝘼𝙪𝙧 𝙎𝙝𝙖𝙝𝙞 𝙁𝙖𝙧𝙢𝙖𝙣 𝙇𝙞𝙠𝙝 𝙆𝙖𝙧 500 𝙂𝙪𝙙𝙝 𝙎𝙖𝙬𝙖𝙧 ( 🐎🐴 𝙋𝙖𝙧 𝙨𝙖𝙬𝙖𝙧) 𝘼𝙛𝙧𝙖𝙙 𝙆𝙚 𝙎𝙖𝙩𝙝 𝘽𝙤𝙡𝙖𝙬𝙖 𝘽𝙝𝙚𝙟𝙖 𝙂𝙖𝙮𝙖 𝘼𝙖𝙥 𝙏𝙨𝙝𝙧𝙚𝙚𝙛 𝙇𝙖𝙮𝙚 𝘼𝙪𝙧 𝘿𝙖𝙧𝙗𝙖𝙧 𝘼𝙠𝙗𝙖𝙧𝙞 𝙈𝙚𝙞𝙣 𝙆𝙝𝙖𝙝𝙖 “𝙅𝙖𝙝𝙖𝙣𝙜𝙚𝙚𝙧 𝙆𝙚 𝘽𝙞𝙢𝙖𝙧𝙞 𝙠𝙚 𝙋𝙚𝙘𝙝𝙚 𝙃𝙖𝙧𝙖 𝙠𝙤𝙞 𝙃𝙖𝙩𝙝 𝙉𝙖𝙝𝙞 𝙃𝙖𝙞 𝘼𝙪𝙧 𝘼𝙜𝙖𝙧 𝙃𝙤𝙩𝙖 𝙏𝙤 𝘼𝙡𝙝𝙖𝙢𝙙𝙪𝙡𝙞𝙡𝙡𝙖𝙝 𝘼𝙡𝙡𝙡𝙖𝙝 𝙉𝙚 𝙀𝙮𝙨𝙚 𝙄𝙠𝙝𝙩𝙞𝙮𝙖𝙧𝙖𝙖𝙩 𝘿𝙞𝙮𝙚 𝙆𝙚 𝘼𝙗𝙩𝙖𝙠 𝙒𝙤𝙝 𝘽𝙖𝙦𝙞 𝙉𝙖𝙝𝙤𝙩𝙖 𝘼𝙪𝙧 𝙃𝙞𝙣𝙙 𝙆𝙖 𝙠𝙤𝙞 𝘼𝙖𝙢𝙞𝙡 𝙃𝙖𝙢𝙖𝙧𝙞 𝘿𝙤𝙬𝙖 𝙠𝙤 𝙆𝙖𝙖𝙩 𝙉𝙖𝙨𝙖𝙠𝙩𝙖” 𝙄𝙩𝙣𝙖 𝙆𝙖𝙝𝙣𝙖 𝙏𝙝𝙖 ?
[05/09, 1:09 PM] http://www.aalequtub.com: 𝙆𝙞 𝙃𝙖𝙧𝙖𝙢 𝙎𝙚 𝘼𝙬𝙖𝙯𝙚𝙣 𝙎𝙝𝙤𝙧𝙤 𝙃𝙤𝙜𝙖𝙞 𝙆𝙚 𝙎𝙝𝙯𝙖𝙙𝙖 𝙅𝙖𝙝𝙖𝙣𝙜𝙚𝙚𝙧 𝘽𝙚𝙝𝙤𝙨𝙝 𝙃𝙤𝙜𝙖𝙮𝙚 𝘼𝙪𝙧 𝙈𝙖𝙧𝙜𝙝 𝙆𝙚 𝙌𝙖𝙧𝙚𝙚𝙗 𝙃𝙖𝙞 𝙃𝙖𝙞𝙣 𝙎𝙖𝙗 𝙃𝙖𝙯𝙞𝙧𝙚𝙚𝙣 𝙋𝙖𝙧𝙚𝙨𝙝𝙖𝙣 𝙃𝙤𝙠𝙖𝙧 𝙉𝙖𝙙𝙞𝙢 𝙃𝙤𝙮𝙚 𝘼𝙠𝙗𝙖𝙧 𝘼𝙖𝙥 𝙎𝙚 𝙈𝙖𝙛𝙞 𝙈𝙖𝙣𝙜𝙣𝙚 𝙇𝙖𝙜𝙖 𝘼𝙪𝙧 𝘼𝙥𝙣𝙞 𝙜𝙖𝙡𝙩𝙞 𝙋𝙖𝙧 𝙉𝙖𝙙𝙞𝙢 𝙃𝙤𝙬𝙖.. 𝙋𝙝𝙞𝙧 𝙎𝙝𝙖𝙮𝙠𝙝 𝘼𝙗𝙙𝙪𝙡𝙡𝙖𝙝 𝙉𝙚 𝙁𝙖𝙧𝙢𝙖𝙮𝙖 𝙁𝙖𝙯𝙪𝙡𝙡𝙖𝙝 𝙆𝙤𝙞 𝘽𝙖𝙙𝙞 𝙎𝙝𝙞𝙯 𝙈𝙖𝙣𝙜𝙬𝙖𝙤 𝙔𝙚 𝘽𝙖𝙖𝙩 𝘼𝙠𝙗𝙖𝙧 𝙆𝙤 𝘽𝙖𝙩𝙖𝙞 𝙂𝙖𝙞 𝙋𝙝𝙞𝙧 𝙆𝙗𝙖𝙧 𝙣𝙚 2 𝙚𝙡𝙞𝙥𝙝𝙖𝙣𝙙 (𝙃𝙖𝙩𝙝𝙞) 𝙈𝙖𝙣𝙜𝙖𝙮𝙚 𝘼𝙪𝙧 𝙃𝙖𝙯𝙩𝙖𝙩 𝙉𝙚 𝙅𝙖𝙗 𝙐𝙣𝙥𝙖𝙧 𝙉𝙖𝙯𝙖𝙧 𝘿𝙖𝙡𝙞 𝘿𝙤𝙣𝙤 𝙂𝙞𝙧 𝙆𝙖𝙧 𝙈𝙖𝙧𝙜𝙖𝙮𝙚 𝘼𝙪𝙧 𝙄𝙙𝙝𝙖𝙧 𝙎𝙝𝙖𝙝𝙯𝙖𝙙𝙖 𝙏𝙝𝙞𝙠 𝙃𝙤𝙜𝙖𝙮𝙖

हज़रत-ए-मूसा अलैहिस्सलाम और एक चरवाहा

हज़रत-ए-मूसा अलैहिस्सलाम और एक चरवाहा
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हज़रत-ए-मूसा अलैहिस्सलाम एक दिन जंगल जा रहे थे कि उन्होंने एक चरवाहे की आवाज़ सुनी, वो ऊँची ऊँची आवाज़ से कह रहा था: “ऐ मेरे जान से प्यारे ख़ुदा! तू कहाँ है? मेरे पास आ, मैं तेरे सर में कंघी करूँ, जुएँ चुनूँ, तेरा लिबास मैला हो गया है तो धोऊँ, तेरे मोज़े फट गए हों तो वो भी सीऊँ, तुझे ताज़ा-ताज़ा दूध पिलाऊँ, तू बीमार हो जाये तो तेरी तीमारदारी करूँ, अगर मुझे मालूम हो कि तेरा घर कहाँ है तो तुम्हारे लिए रोज़ घी और दूध लाया करूँ, मेरी सब बकरियाँ तुम पर क़ुर्बान! अब तो आ जा…” “हज़रत-ए-मूसा अलैहिस्सलाम उसके क़रीब गए, और कहने लगे, “अरे अहमक़! तू ये बातें किस से कर रहा है? “चरवाहे ने जवाब दिया” उससे कर रहा हूँ जिसने तुझे और मुझे पैदा किया और ये ज़मीन आसमान बनाए।”

ये सुन हज़रत-ए-मूसा अलैहिस्सलाम ने ग़ज़बनाक होकर कहा: “अरे बद-बख़्त! तू इस बेहूदा बकवास से कहीं का ना रहा! बजाय मोमिन के तू तो काफ़िर हो गया। ख़बरदार ऐसी बेमानी और फ़ुज़ूल बकवास बंद कर, तेरे इस कुफ़्र की बदबू सारी दुनिया में फैल गई, अरे बेवक़ूफ़! ये दूध लस्सी हम मख़लूक़ के लिए है कपड़ों के मोहताज हम हैं हक़ तआला इन हाजतों से बेनयाज़ है। ना वो बीमार पड़ता है ना उसे तीमारदारी की ज़रूरत है। ना उसका कोई रिश्तेदार है। तौबा कर और उससे डर, ”

हज़रत-ए-मूसा अलैहिस-सलाम के ग़ैज़-ओ-ग़ज़ब में भरे हुए ये अलफ़ाज़ सुनकर चरवाहे के औसान ख़ता हो गए और वो ख़ौफ़ से थर-थर काँपने लगा, चेहरा ज़र्द पड़ गया और बोला: “ऐ ख़ुदा के जलील-उल-क़द्र नबी! तू ने ऐसी बात कही कि मेरा मुँह हमेशा के लिए बंद हो गया और मारे नेदामत के मेरी जान हलाकत में पड़ गई। “ये कहते ही चरवाहे ने सर्द आह खींची अपना गिरेबान तार-तार किया और दीवानों की तरह अपने सर पर ख़ाक उड़ाता हुआ ग़ायब हो गया।

हज़रत-ए-मूसा अलैहिस-सलाम हक़ तआला से हमकलाम होने के लिए कोह-ए-तूर पर गए तो ख़ुदा ने फ़रमाया: “ऎ मूसा! तू ने हमारे बंदे को हमसे जुदा क्यों किया? तू दुनिया में जुदाई के लिए आया है या मिलाप के लिए? ख़बरदार! इस काम में एहतियात रख हमने अपनी मख़लूक़ में हर शख़्स की फ़ित्रत अलग बनाई है। और हर फ़र्द को दूसरों से जुदा अक़ल बख़शी है। जो बात एक के हक़ में अच्छी है, वो दूसरे के लिए बुरी है, एक के हक़ में तिरयाक़ का असर रखती है, वही दूसरे के लिए ज़हर है। एक के हक़ में नूर और दूसरे के हक़ में नार, हमारी ज़ात पाकी-ओ-नापाकी से मुबर्रा है।

ऎ मूसा! ये मख़लूक़ मैंने इसलिए पैदा नहीं फ़रमाई कि उससे मेरी ज़ात को कोई फ़ायदा पहुंचे, उसे पैदा करने का मक़सद ये है कि उस पर मैं अपने कमालात की बारिश करूँ, जो शख़्स जिस ज़बान में भी मेरी हम्द-ओ-सना करता है उससे मेरी ज़ात में कोई कमी बेशी वाक़्य नहीं होती, मिद्दाह करने वाला ख़ुद ही पाक साफ़ होता है। मैं किसी के क़ौल और ज़ाहिर पर निगाह नहीं रखता, मैं तो बातिन और हाल देखता हूँ।

ऎ मूसा! ख़िर्द-मंदों के आदाब और हैं दिल-जलों और जान हारों के आदाब और “हज़रत-ए-मूसा ने जब ख़ुदा का ये इताब आमेज़ ख़िताब सुना तो सख़्त पशेमान हुए और बारगाह-ए-इलाही में निहायत नेदामत और शर्मसारी से माफ़ी मांगी, फिर उसी इज़तिराब और बेचैनी में उस चरवाहे को ढ़ूढ़ने जंगल में गए। सहरा-ओ-ब्याबान की ख़ाक छान मारी पर चरवाहे का कहीं पता ना चला, इस क़दर चले कि पैरों में छाले पड़ गए, लेकिन तलाश जारी रखी आख़िर आप उसे पा लेने में कामयाब हुए। चरवाहे ने उन्हें देखकर कहा: “ऎ मूसा! अब मुझसे क्या ख़ता हुई है कि यहाँ भी आ पहुंचे?

“हज़रत-ए-मूसा ने जवाब दिया: “ऎ चरवाहे! मैं तुझे मुबारक देने आया हूँ। तुझे हक़ तआला ने अपना बंदा फ़रमाया और इजाज़त अता की कि जो तेरे जी में आए बिला-तकल्लुफ़ कहा कर, तुझे किसी अदब-ओ-आदाब क़ाएदे ज़ाबते की ज़रूरत नहीं, तेरा कुफ़्र असल दीन है, और दीन नूर-ए-जाँ, तुझे सब कुछ माफ़ है, बल्कि तेरे सदक़े में तमाम दुनिया की हिफ़ाज़त होती है, “चरवाहे ने आँखों में आँसू भर कर कहा: “ऐ पैग़ंबर-ए-ख़ुदा! अब मैं इन बातों के काबिल ही कहाँ रहा हूँ कि कुछ कहूँ, मेरे दिल का ख़ून हो चुका है, अब मेरी मंज़िल बहुत आगे है, तू ने ऐसी ज़र्ब लगाई कि हज़ारों लाखों साल की राह तै कर चुका हूँ, मेरा हाल बयान के काबिल नहीं और ये जो कुछ मैं कह रहा हूँ इसे भी मेरा अहवाल मत जान…।

“मौलाना रूमी इस हिकायत से हासिल ये निकालते हैं कि “ऐ शख़्स! जो तू हक़ तआला की हमद-ओ-सना बयान करता है, क्या समझता है? तू तो इब्तिदा से इंतिहा तक नाक़िस और तेरा हाल-ओ-क़ाल भी नाक़िस, ये महज़ उस परवरदिगार रहमान-ओ-करीम का करम है कि वो तेरे नाक़िस और हक़ीर तोहफ़े को क़बूल फ़रमाता है…।