Delivered when allegiance was sworn to him at Medina

Delivered when allegiance was sworn to him at Medina

The responsibility for what I say is guaranteed and I am answerable for it. He to whom experiences have clearly shown the past exemplary punishments (given by Allah to people) is prevented by piety from falling into doubts. You should know that the same troubles have returned to you which existed when the Prophet was first sent.

By Allah who sent the Prophet with faith and truth you will be severely subverted, bitterly shaken as in sieving and fully mixed as by spooning in a cooking pot till your low persons become high and high ones become low, those who were behind would attain forward positions and those who were forward would become backward. By Allah, I have not concealed a single word or spoken any lie and I had been informed of this event and of this time.

Beware that sins are like unruly horses on whom their riders have been placed and their reins have been let loose so that they would jump with them in Hell. Beware that piety is like trained horses on which the riders have been placed with the reins in their hands, so that they would take the riders to Heaven. There is right and wrong and there are followers for each. If wrong dominates, it has (always) in the past been so, and if truth goes down that too has often occurred. It seldom happens that a thing that lags behind comes forward.

Ash-Sharif ar-Radi says: In this small speech there is more beauty than can be appreciated, and the quantity of amazement aroused by it is more than the appreciation accorded to it. Despite what we have stated it has so many aspects of eloquence that cannot be expressed nor can anyone reach its depth, and no one can understand what I am saying unless one has attained this art and knows its details.

. . . No one appreciates it except those who know (Qur’an, 29:43)

From the same Sermon

He who has heaven and hell in his view has no other aim. He, who attempts and acts quickly, succeeds, while the seeker who is slow may also entertain hope, and he who falls short of action faces destruction in Hell. On right and left there are misleading paths. Only the middle way is the (right) path which is the Everlasting Book and the traditions of the Prophet. From it the Sunnah has spread out and towards it is the eventual return.

He who claims (otherwise) is ruined and he who concocts falsehood is disappointed. He who opposes (1) right with his face gets destruction. It is enough ignorance for a man not to know himself. He who is strong rooted (2) in piety does not get destruction, and the plantation of a people based on piety never remains without water. Hide yourselves in your houses and reform yourselves. Repentance is at your back. One should praise only Allah and condemn only his own self.

(1). In some versions after the words “man abda safhatahu lilhaqqi halaka:” the words “`inda jahalati’n-nas” also occur. In that case the meaning of this sentence would be that he who stands in face of right dies in the estimation of the ignorant.

(2). Piety is the name of heart and mind being affected and impressed by the Divine Greatness and Glory, as an effect of which the spirit of man becomes full of fear of Allah, and its inevitable result is that engrossment in worship and prayer increases. It is impossible that heart may be full of Divine fear and there be no manifestation of it in actions and deeds. And since worship and submission reform the heart and nurture the spirit, purity of heart increases with the increase of worship.

That is why in the Qur’an “taqwa” (piety) has been applied sometimes to fear, sometimes to worship and devotion and sometimes to purity of heart and spirit. Thus in the verse “wa iyyaya fattaqun” (and Me you fear [16:2]) taqwa implies fear, in the verse, “ittaqu’l-laha haqqa tuqatihi” (worship Allah as He ought to be worshipped [3:102]), taqwa implies worship and devotion and in the verse “wa yakhsha’l-laha wa yattaqhi faulaika humu’l-faizun” (24:52) taqwa implies purity of spirit and cleanliness of heart.

In the traditions taqwa has been assigned three degrees. The first degree is that a man should follow the injunctions and keep aloof from prohibitions. The second degree is that recommended matters should also be followed and disliked things should be avoided. The third degree is that for fear of falling into doubts one may abstain from the permissible as well. The first degree is for the common men, the second for the nobles and the third for high dignitaries. Allah has referred to these three degrees in the following verse:

On those who believe and do good, is no blame for what they ate, (before) when they did guard themselves and did believe, and did good, still (furthermore) they guard themselves and do good; and Allah loveth the doers of good. (Qur’an, 5:93)

Amir al-mu’minin says that only action based on piety is lasting, and only that action will blossom and bear fruit which is watered by piety because worship is only that wherein the feeling of submission exists. Thus, Allah says:

Is he therefore better who hath laid his foundation on fear of Allah and (His) goodwill or he who layeth his foundation on the brink of a crumbling hollowed bank so it crumbled down with him into the fire of Hell… (Qur’an, 9:109)

Consequently, every such belief as is not based on knowledge and conviction is like the edifice, erected without foundation, wherein there is no stability or firmness while every action that is without piety is like the plantation which withers for lack of watering.


हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) के कथन (115- 128)

हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) के कथन (115- 128)


हज़रत अली (अ.स.) से सवाल किया गया कि आप का क्या हाल है तो आप ने फ़रमायाः उस का क्या हाल होगा जिस की ज़िन्दगी उस को मौत की तरफ़ ले जा रही हो और जिस का स्वास्थ्य बीमारी से पहले की हालत हो और जिस को उस के शरण स्थल से ही पकड़ लिया जाए गा।


कितने ही लोग ऐसे हैं जिन को उपहार दे कर पकड़ में ले लिया जाता है। कितने ही लोग ऐसे हैं जो अल्लाह की पर्दापोशी से धोका खाए हुए हैं और अपने बारे में अच्छी बातें सुन कर धोका खा जाते हैं और अल्लाह ने मोहलत से बढ़ कर परीक्षा का कोई ज़रिया क़रार नहीं दिया।


मेरे बारे में दो तरह के लोग तबाह व बरबाद होंगेः एक वो चाहने वाला जो हद से आगे बढ़ जाए और एक वो दुश्मन जो मुझ से अदावत रखता हो।


अवसर को हाथ से जाने देना दुख व क्षोभ का कारण होता है।


दुनिया की मिसाल साँप की सी है जो छूने में बहुत नर्म मालूम होता है मगर उस के अन्दर घातक विष भरा होता है। धोका खाया हुवा जाहिल इंसान उस की तरफ़ आकर्षित हो जाता है और बुद्धिमान व समझदार उस से बच कर रहता है।


हज़रत अली (अ.स.) से क़ुरैश के बारे में पूछा गया तो आपने फ़रमाया, “बनी मख़ज़ूम का क़बीला क़ुरैश का महकता हुवा फूल हैं। उन के मर्दों से बात चीत और उन की औरतों से शादी पसंदीदा है। और बनी अब्दे शम्स बहुत दूर तक सोचने वाले और अपने पीछे की बातों की रोक थाम करने वाले हैं। लेकिन हम बनी हाशिम अपने हाथ की दौलत के लुटाने और मौत के मैदान में जान देने वाले होते हैं। वो लोग गिनती में अधिक, धोके बाज़ और कुरूप होते हैं और हम अच्छी बातें करने वाले, दूसरों के शुभचिन्तक और रौशन चेहरों वाले होते हैं।


उन दो प्रकार के कर्मों में कितना अन्तर है, एक वो कि जिस का स्वाद मिट जाए किन्तु कष्ट बाक़ी रहे और एक वो कि जिस का कष्ट ख़त्म हो जाए किन्तु पुण्य व पुरस्कार बाक़ी रहे।


हज़रत अली (अ.स.) एक जनाज़े के पीछे जा रहे थे कि आप ने एक व्यक्ति के हँसने की आवाज़ सुनी जिस पर आप ने फ़रमायाः

ऐसा लगता है जैसे दुनिया में मौत हमारे अलावा केवल दूसरों के लिए लिखी गई है और जैसे यह मौत केवल दूसरों को ही आए गी। और ऐसा लगता है कि हम जिन मरने वालों को देखते हैं वो यात्री हैं जो जल्दी ही हमारी तरफ़ पलट कर आ जाएँगे (जब कि वास्तविकता यह है कि) इधर हम उन को क़ब्रों में उतारते हैं और इधर उन का तर्का खाने लगते हैं जैसे हम हमेशा रहने वाले हैं। फिर यह कि हम ने हर उपदेश देने वाले को भुला दिया है और आफ़त का निशाना बन गए हैं।


वो व्यक्ति ख़ुशक़िसमत है जिस ने स्वयं को छोटा व ज़लील समझा, जिस की कमाई साफ़ सुथरी, जिस की नियत नेक और जिस की आदत अच्छी रही। जिसने अपने बचे हुए माल को अल्लाह की राह में ख़र्च किया, जिस ने अपनी ज़बान को ज़्यादा बात करने से रोके रखा, जिस ने अपने आप को लोगों को कष्ट देने से बचाए रखा, सुन्नत उस को बुरी न लगी और वो बिदअत (नई बात) के साथ जुड़ा नहीं।

सैय्यद रज़ी कहते हैं कि यह कलाम और इस से पहले वाला कलाम हज़रत मौहम्मद (स.) का है।


औरत का स्वाभिमान करना कुफ़्र और मर्द का स्वाभिमान करना ईमान है।


मैं इसलाम की ऐसी परिभाषा बयान करता हूँ कि जैसी परिभाषा मुझ से पहले किसी ने नहीं बयान की। इसलाम का अर्थ अपने आप को समर्पित कर देना है और समर्पित करने का अर्थ विश्वास है और विश्वास का अर्थ पुष्टि करना है और पुष्टि करने का अर्थ स्वीकार करना है और स्वीकार करने का अर्थ कर्तव्य का पालन करना है और कर्तव्य का पालन करना नेक काम अंजाम देना है।


मुझे आश्चर्य होता है कंजूस पर कि जिस निर्धनता से वह भागना चाहता है वही उस की तरफ़ तेज़ी से बढ़ती है और वो ख़ुशहाली जिस का वह इच्छुक होता है वही उस के हाथ से निकल जाती है। वह इस दुनिया में फ़क़ीरों जैसी ज़िन्दगी गुज़ारता है और उसे उस दुनिया में अमीरों जैसा हिसाब देना पड़ता है। और मुझे अहंकारी पर आश्चर्य होता है क्यूँकि कल वह नुतफ़ा (वीर्य) था और कल मुरदार हो जाएगा। और मुझे उस इंसान पर आश्चर्य होता है कि जो अल्लाह के होने में शक करता है जबकि वह उस के बनाए हुए संसार को देखता है। और मुझे उस व्यक्ति पर आश्चर्य होता है जो मृत्यु को भूले हुए है जबकि वह मरने वालों को देखता है। और मुझे उस पर आश्चर्य होता है कि जो पहली पैदाइश को देखता है मगर दोबारा उठाए जाने से इंकार करता है। और मुझे आश्चर्य होता है उस पर जो इस नश्वर सराय को आबाद करता है और अपने उस घर को भूल जाता है जहाँ उस को हमेशा रहना है।


जो कर्म में कोताही करता है वह दुख में घिरा रहता है और जिस के माल व जान में अल्लाह का कुछ हिस्सा न हो, अल्लाह को ऐसे व्यक्ति की कोई ज़रूरत नहीं है।


शुरू सर्दी में सर्दी से एहतियात करो और आख़िर में उस का स्वागत करो क्यूँकि सर्दी शरीरों के साथ वही करती है जो वृक्षों के साथ करती है। सर्दी शुरू में वृक्षों को झुलसा देती है और आख़िर में उन को हरा भरा कर देती है।

Allah Ke Quran Main Insaniyat Ke 99 Hukum


अल्लाह के कुरान में इंन्सानियत (मानवता) को 100 के करीब सीधे हुक्म..!

1. बदज़ुबानी से बचो (3: 159)
2. गुस्से को पी जाओ (3: 134)
3. दूसरों के साथ भलाई करो (4:36)
4. घमंड से बचो (7:13)
5. दूसरों की गलतियां माफ करो (7: 199)
6. लोगों से नरमी से बात करो (20:44)
7. अपनी आवाज़ नीची रखों (31:19)
8. दूसरों का मज़ाक न उड़ाओ (49:11)
9. वालदैन का इज़्ज़त और उनकी फरमानबरदारी करो (17:23)
10. वालदैन की बेअदबी से बचो और उनके सामने उफ़ तक न कहो (17:23)
11. इजाज़त के बिना किसी के कमरे मे (निजी कक्ष) में दाखिल न हो (24:58)
12. आपस में क़र्ज़ के मामलात लिख लिया करो (2: 282)
13. किसी की अंधी तक़लीद मत करो (2: 170)
14. अगर कोई तंगी मे है तो उसे कर्ज़ उतारने में राहत दो (2: 280)
15. ब्याज मत खाओ (2: 275)
16. रिश्वत मत खाओ (2: 188)
17. वादों को पूरा करो (2: 177)
18. आपस में भरोसा कायम रखें (2: 283)
19. सच और झूठ को आपस में मिक्स न करो (2:42)
20. लोगों के बीच इंसाफ से फैसला करो (4:58)
21. इंसाफ पर मज़बूती से जम जाओ (4: 135)
22. मरने के बाद हर शख्स की दोलत उसके करीबी रिश्तेदारों में बांट दो (4: 7)
23. औरतों का भी विरासत में हक है (4: 7)
24. यतीमों का माल नाहक मत खाओ (4:10)
25. यतीमों का ख्याल रखो (2: 220)
26. एक दूसरे का माल नाजायज़ तरीक़े से मत खाओ (4:29)
27. किसी के झगड़े के मामले में लोगों के बीच सुलह कराओ (49: 9)
28. बदगुमानी से बचो (49:12)
29. गवाही को मत छुपाओ (2: 283)
30. एक दूसरे के भेद न टटोला करो और किसी की चुगली मत करो (49:12)
31. अपने माल में से खैरात करो (57: 7)
32. मिसकीन गरीबों को खिलाने की तरग़ीब दो (107: 3)
33. जरूरतमंद को तलाश कर उनकी मदद करो (2: 273)
34. कंजूसी और फिज़ूल खर्ची से बचा करो (17:29)
35. अपनी खैरात लोगों को दिखा ने के लिये और एहसान जताकर बर्बाद मत करो (2: 264)
36. मेहमानों की इज़्ज़त करो (51:26)
37. भलाई पर खुद अमल करने के बाद दूसरों को बढ़ावा दो (2:44)
38. ज़मीन पर फसाद मत करो (2:60)
39. लोगों को मस्जिदों में अल्लाह के ज़िक्र से मत रोको (2: 114)
40. सिर्फ उन से लड़ो जो तम से लड़ें (2: 190)
41. जंग के आदाब का ख्याल रखना (2: 191)
42. जंग के दौरान पीठ मत फेरना (8:15)
43. दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं (2: 256)
44. सभी पैगम्बरों पर इमान लाओ (2: 285)
45. हालत माहवारी में औरतों के साथ संभोग न करो (2: 222)
46. ​​मां बच्चों को दो साल तक दूध पिलाएँ (2: 233)
47. खबर दार ज़िना के पास किसी सूरत में नहीं जाना (17:32)
48. हुक्मरानो को खूबीे देखकर चुना करो (2: 247)
49. किसी पर उसकी ताकत से ज़्यादा बोझ मत डालो (2: 286)
50. आपस में फूट मत डालो (3: 103)

51. दुनिया की तखलीक चमत्कार पर गहरी चिन्ता करो (3: 191)
52. मर्दों और औरतों को आमाल का सिला बराबर मिलेगा (3: 195)
53. खून के रिश्तों में शादी मत करो (4:23)
54. मर्द परिवार का हुक्म मरान है (4:34)
55. हसद और कंजूसी मत करो (4:37)
56. हसद मत करो (4:54)
57. एक दूसरे का कत्ल मत करो (4:92)
58. खयानत करने वालों के हिमायती मत बनो (4: 105)
59. गुनाह और ज़ुल्म व ज़यादती में मदद मत करो (5: 2)
60. नेकी और भलाई में सहयोग करो (5: 2)
61. अक्सरियत मे होना सच्चाई सबूत नहीं (6: 116)
62. इंसाफ पर कायम रहो (5: 8)
63.जुर्म की सज़ा मिशाली तौर में दो (5:38)
64. गुनाह और बुराई आमालियों के खिलाफ भरपूर जद्दो जहद करो (5:63)
65. मुर्दा जानवर, खून, सूअर का मांस निषेध हैं (5: 3)
66. शराब और नशीली दवाओं से खबरदार (5:90)
67. जुआ मत खेलो (5:90)
68. दूसरों के देवताओं को बुरा मत कहो (6: 108)
69. लोगों को धोखा देने के लिये नाप तौल में कमी मत करो (6: 152)
70. खूब खाओ पियो लेकिन हद पार न करो (7:31)
71. मस्जिदों में इबादत के वक्त अच्छे कपड़े पहनें (7:31)
72. जो तुमसे मदद और हिफाज़त और पनाह के तलबगार हो उसकी मदद और हिफ़ाज़त करो (9: 6)
73. पाक़ी चुना करो (9: 108)
74. अल्लाह की रहमत से कभी निराश मत होना (12:87)
75. अज्ञानता और जिहालत के कारण किए गए बुरे काम और गुनाह अल्लाह माफ कर देगा (16: 119)
76. लोगों को अल्लाह की तरफ हिकमत और नसीहत के साथ बुलाओ (16: 125)
77. कोई किसी दूसरे के गुनाहों का बोझ नहीं उठाएगा (17:15)
78. मिसकीनी और गरीबी के डर से बच्चों की हत्या मत करो (17:31)
79. जिस बात का इल्म न हो उसके पीछे मत पड़ो। (17:36)
80. निराधार और अनजाने कामों से परहेज़ करो (23: 3)
81. दूसरों के घरों में बिला इजाज़त मत दाखिल हो (24:27)
82. जो अल्लाह में यकीन रखते हैं, अल्लाह उनकी हिफाज़त करेगा (24:55)
83. ज़मीन पर आराम और सुकून से चलो (25:63)
84. अपनी दुनियावी ज़िन्दगी को अनदेखा मत करो (28:77)
85. अल्लाह के साथ किसी और को मत पुकारो (28:88)
86. समलैंगिकता से बचा करो (29:29)
87. अच्छे कामों की नसीहत और बुरे कामों की ममानत करो (31:17)
88. ज़मीन पर शेखी और अहंकार से इतरा कर मत चलो (31:18)
89. औरतें अपने बनाओ सिनघार तकब्बुर न करें (33:33)
90. अल्लाह सभी गुनाहों को माफ कर देगा सिवाय शिर्क के (39:53)
91. अल्लाह की रहमत से मायूस मत हो (39:53)
92. बुराई भलाई से दफा करो (41:34)
93. सलाह से अपने काम अंजाम दो (42:38)
94. तुम से ज़्यादा इज़्ज़त वाला वो है जिसने सच्चाई और भलाई इख्तियार की हो (49:13)
95. दीन मे रहबानियत मौजूद नहीं (57:27)
96. अल्लाह के यहां इल्म वालों के दरजात बुलंद हैं (58:11)
97. ग़ैर मुसलमानों के साथ उचित व्यवहार और दयालुता और अच्छा व्यवहार करो (60: 8)
98. अपने आप को नफ़्स की हर्ष पाक रखो (64:16)
99. अल्लाह से माफी मांगो वो माफ करने और रहम करनेवाला है (73:20).

Bad Nigahi Ka Azab | Hadees Sharif


Bad Nigahi Ka Azab | Hadees Sharif | Islamic Message In Hindi, Urdu:

Aur Musalmaan Auraton Ko Hukm Do Apni Nigaahen Kuchh Nichi Rakkhe Aur Apni Paarsaai Ki Hifaazat Kare Aur Apne Banaao Na Dikhaae Magar Jitna Khud Hi Zaahir Hai Aur Dupatte Apne Garebaanon Par Daale Rahe Aur Apna Singaar Zahir Na Karen.
[Surah Noor(24): 31]

Tajdare Madeena Huzur Sallallahu Alaihi Wasallam Ka Farmaan E Ibrat Nishaan Hai. Jo Musalman Kisi Aurat Ki Khubiyon Ki Taraf Paheli Bar Nazar Kare (Yani Bila Kasd) Fir Apni Aankh Nichi Karle Allah Taala Use Aisi Ibadat Ata Farmayega Jiski Woh Lazzat Payega.
[Al Masanduli Imam Ahmad Bin Hambal Jild:8 Safa:299 Hadees:22341]

Hadees E Paak:
Nazar Iblees Ke Teeron Me Se Ek Jahar Me Buzaa Hua Teer Hai Jo Sakhs Mere Khawf Se Use Tark Kar De To Me Use Esa Iman Ata Karunga Jiski Mithaas Woh Apne Dil Me Payega.
[Al Muajamul Kabir Jild:10 Safa:173 Hadees:10362]

Jo Aurat Khushbu Laga Kar Gairo Ke Paas Se Guzri Take Log Uski Khushbu Mehsus Kare To Aisi Aurat Badkarah Zaniya Hain!
[Masnad Imam Ahmad]

Jo Aurat Gair Mard Par Apni Zinat Zaahir Karne Ke Liye Daman Ghasite Hue Chalegi Qayamat Ke Din Wo Noor Se Mehrum&Andhere Me Hogi
[Tirmizi Jild: 2, Safa: 1175]

Sarkare Madina Sallalahu Alayhi Wasallam Ne Irshad Farmaya, Aurat, Aurat Hain Yani Chupaneki Chiz Hain. Jab Wo Nikalti He To Use Shaitan Zak Kar Dekhta Hain. Yani Use Dekhna Shaitani Kaam Hain.
[Tirmizi Sharif,Jild 1,Bab 796,Hadees 1173,Safa 600]

Jab Ek Gair Mard Aur Gair Aurat Ek Dusre Ko Dekhte Hain To Dono Ki Aankhen Zina Karti Hain!
[ Kashful-Mahjoo B: 568]

Sarkare Madina Sallalahu Alayhi Wasallam Ne Irshad Farmaya, Jis Gair Aurat Ko Jan Buz Kar Dekha Jaye Aur Jo Aurat Apne Ko Jan Buz Kar Gair Mardo Ko Dikhlaye Us Mard Aur Aurat Par Allah Ki Laanat.
[Mishkat Sharif Jild 2,Hadees 2991,Safa 77]

Nabi-e-Kareem Sallallahu Alaihi Wasallam Ne Irshad Farmaya, “ALLAH Ki Lanat Bad-Nigahi Karnewale Par Aur Jiski Taraf Bad-Nigahi Ki Jaye.”
[Bayhaqi Sharif, Mishkat Sharif, Jild:2, Safa:77]

Hazrat Allama Ibne Jooji Rahmatullahalaihi Nakl Karte Hai, Jisne Naa Mehram Se Aankh Ki Hifazat Na Ki Us Ki Ankh Me Baroze Qayamat Aag Ki Salaai Feri Jayegi.
[Bahrudadumua Dafa:171]

Sarkare Madina Sallalahu Alayhi Wasallam Ne Irshad Farmaya Jab Gair Mard Aur Gair Aurat Tanhai Me Kisi Jagah Sath Hote He To Unme Tisra Shaitan Hota Hain
[Tirmizi Sharif Jild 1, Bab 794, Hadees 1171, Safa 599]

Sarkare Madina Sallalahu Alayhi Wasallam Ne Irshad Farmaya Tanha Gair Aurat Ke Pas Jane Se Parhez Karo. Ek Sahabi Ne Sawal Kiya Ya Rasoolallah Dewar Ke Bare Me Kya Irshad He? Aaqa Ne Farmaya, Dewar To Maut Hain.
[Bukhari Sharif Jild 3, Bab 141, Hadees 216, Safa 108,Tirmizi Sharif Jild 1, Bab 794, Hadees 1171 Safa 599, Mishkat Sharif Jild 2, Hadees 2968,Safa 73]

Huzoor Alaihissalam Farmate Hain Duniya Or Aurat Se Bacho Kyuki Bani Israil Me Sabse Pehla, Fitna Aurat Ki Wajah se Utha Tha
[Sahi Muslim Page: 1465 Hadees: 2742]

Aalahazrat Imam E Ahlesunnat, Hami E Sunnat, Mujaddid E Deen O Millat Farmate Hain, Pahele Nazar Bahekti Hai Fir Dil Bahekta Hai Fir Satr Bahekta Hai.
[Anware Raza, Safa : 391]

Hazrat Ula Bin Jitad Rahmatulla Alaihi Farmate Hain, Apni Nazar Ko Aurat Ki Chadar Par Bhi Na Dalo Kyun Ke Nazar Dil Me Sehwat Ka Beej Boti Hai.
[Ahya Ul Uloom Jild:3 Safa:131]

Shohar Ka Biwi Ke Sath Husn e Sulook Kesa Hona Chahiye


Ahliya/Biwi/Wife/Spouse ke Sath Shohar(Husband) Ka Rawayya aur Bartao Kesa Hona Chahiye (husband wife relationship in islam) ?

Jab Aap Nikah kar ke kisi Ladki ko apne Ghar laate hain to wo Aap ki khatir apne Maa, Baap aur Bhai ko chod Aati hai. Ab aap ka Farz banta hai ke aap apni Ahliya ko Maa, Baap, aur Bhaiyyon ki kami kabhi Mahsoos na hone den.
Aap ka hamesha Apni Ahliya (Wife) ke sath bartao aur Mua’mla:
✔ Baap ki tarah Shafqat o Maherbani wala
✔ Maa ki tarah Hamdardi, Ghamgusari aur Afu darguzar wala
✔ Aur Bhai ki tarah narm khuyi, karam Nawazi aur Narm dili o bardasht wala Hona Chahiye.Mehboob-E-Khuda Khatamun Nabiyyin Sallallahu Alaihi Wasallam Ne Irshad Farmaya,“Tum Me Woh Behtar Hai Jo Apni Biwi Ke Sath Behtar Hai Aur Me Apni Biwiyo Ke Sath Tum Subse Jyada Behtar Hu”.
(Ibne Maja Jild 1, Safa 551, Hadees No 2047, Tirmizi Sharif Jild 1, Safa 595)