Jung e Siffin

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सिफ़्फ़ीन नाम है उस मक़ाम का जो फ़ुरात के ग़रबी जानिब बरक़ा और बालस के दरमियान वाक़े है।(माजमुल बलदान सफ़ा 370 ) इसी जगह अमीरल मोमेनीन और माविया में ज़बरदस्त जंग हुई थी। इस जगह के मुताअल्लिक़ उलेमा व मुवर्रेख़ीन का बयान है कि बानीए जंगे जमल आयशा की मानिन्द माविया भी लोगों को क़त्ले उस्मान के फ़र्ज़ी अफ़साने के हवाले से हज़रते अली (अ.स.) के खि़लाफ़ भड़काता और उभारता था। जंगे जमल के बाद हज़रते अली (अ.स.) के शाम पर मुक़र्रर किये हुए हाकिम सुहैल इब्ने हनीफ़ ने कूफ़े आ कर हज़रत को ख़बर दी कि माविया ने ऐलाने बग़ावत कर दिया है और उस्मान की कटी हुई ऊँगलियों और ख़ून आलूद कुर्ता लोगों को दिखा कर अपना साथी बना रहा है और यह हालत हो चुकी है कि लोगों ने क़समे खा ली हैं कि ख़ूने उस्मान का बदला लिये बग़ैर न नरम बिस्तर पर सोयगें न ठंडा पानी पियेंगे। उमरे आस वहां पहुँच चुका है जो उसे मदद दे रहा है। हज़रते अली (अ.स.) ने माविया को एक ख़त मदीने से दूसरा कूफ़े से इरसाल कर के दावते बैयत दी लेकिन कोई नतीजा बरामद न हुआ। माविया जो जमए लशकर में मशग़ूलो मसरूफ़ था एक लाख बीस हज़ार (1,20,000) अफ़राद पर मुशतमिल लश्कर ले कर मक़ामे सिफ़्फ़ीन में जा पहुँचा। हज़रते अली (अ.स.) भी शव्वाल 36 हिजरी में (नख़लिया और मदाएन) होते हुये रक़ा में जा पहुँचे। हज़रत के लशकर की तादाद नब्बे हज़ार (90,000) थी। रास्ते में लशकर सख़्त प्यासा हो गया। एक राहिब के इशारे से हज़रत ने ज़मीन से एक ऐसा चश्मा बरामद किया जो नबी और वसी के सिवा किसी के बस का न था।(आसम कूफ़ी सफ़ा 212, रौज़तुल सफ़ा जिल्द 2 सफ़ा 392 ) हज़रत ने अपने लशकर को सात हिस्सों में तक़सीम किया और माविया ने भी सात टुकड़े कर दिये। मक़ामे रका़ से रवाना हो कर आबे फ़रात उबूर किया। हज़रत के मुक़द्देमातुल जैश से माविया के मुक़द्दम ने मज़ाहेमत की और वह शिकस्त खा कर माविया से जा मिला। हज़रत का लशकर जब वारिदे सिफ़्फ़ीन हुआ तो मालूम हुआ की माविया ने घाट पर क़ब्ज़ा कर लिया है और अलवी लशकर को पानी देना नहीं चाहता। हज़रत ने कई पैग़ाम्बर भेजे और बन्दिशे आब को तोड़ने के लिये कहा मगर समाअत न की गई। बिल आखि़र हज़रत की फ़ौज ने ज़बर दस्त हमला कर के घाट छीन लिया। मुवर्रेख़ीन का बयान है कि घाट पर क़ब्ज़ा करने वालों में इमाम हुसैन (अ.स.) और हज़रते अब्बास इब्ने अली (अ.स.) ने कमाल जुरअत का सुबूत दिया था।(जि़करूल अब्बास सफ़ा 26 मोअल्लेफ़ा हकी़र) हज़रत अली (अ.स.) ने घाट पर क़ब्ज़ा करने के बाद ऐलान करा दिया कि पानी किसी के लिये बन्द नहीं है। मतालेबुस सूऊल में है कि हज़रत अली (अ.स.) बार बार माविया को दावते मसालेहत देते रहे लेकिन कोई असर न हुआ आखि़र कार माहे जि़ल्हिज में लड़ाई शुरू हुई और इन्फ़ेरादी तौर पर सारे महीने होती रही। मोहर्रम 37 हिजरी में जंग बन्द रही और यकुम सफ़र से घमासान की जंग शुरू हो गई। एयरविंग लिखता है अली (अ.स.) को अपनी मरज़ी के खि़लाफ़ तलवार ख़ैंचना पड़ी। चार महीने तक छोटी छोटी लड़ाईयां होती रहीं जिन्मे माविया के 45,000(पैंतालिस हज़ार) आदमी काम आये और अली (अ.स.) की फ़ौज ने उससे आधा नुकसान उठाया। जि़करूल अब्बास सफ़ा 27 में है कि अमीरल मोमेनीन अपनी रवायती बहादुरी से दुशमने इस्लाम के छक्के छुड़ा देते थे। अमरू बिन आस और बशर इब्ने अरताता पर जब आपने हमले किये तो यह लोग ज़मीन पर लेट कर बरेहना हो गये। हज़रते अली (अ.स.) ने मुँह फेर लिया , यह उठ कर भाग निकले। माविया ने अमरू आस पर ताना ज़नी करते हुये कहा कि दर पनाह औरत खुद गि़रीख़्ती तूने अपनी शर्मगाह के सदक़े में जान बचा ली। मुवर्रेख़ीन कर बयान है कि यकुम सफ़र से सात शाबान रोज़ जंग जारी रही। लोगों ने माविया को राय दी कि अली (अ.स.) के मुक़ाबले मे ख़ुद निकलें मगर वह न माने। एक दिन जंग के दौरान में अली (अ.स.) ने भी यही फ़रमाया था कि ऐ जिगर ख़्वारा के बेटे क्यों मुसलमानों को कटवा रहा है तू ख़ुद सामने आजा और हम दोनों आपस में फ़ैसला कुन जंग कर लें। बहुत सी तवारीख़ में है कि इस जंग में नब्बे (90) लड़ाईयां वुक़ू में आईं। 110 रोज़ तक फ़रीक़ैन का क़याम सिफ़्फ़ीन में रहा। माविया के 90,000 (नब्बे हज़ार) और हज़रते अली (अ.स.) के 20,000 (बीस हज़ार) सिपाही मारे गये। 13 सफ़र 37 हिजरी को माविया की चाल बाजि़यों और अवाम की बग़ावत के बाएस फ़ैसला हकमैन के हवाले से जंग बन्द हो गई। तवारीख़ में है कि हज़रते अली (अ.स.) ने जंगे सिफ़्फ़ीन में कई बार अपना लिबास बदल कर हमला किया है। तीन मरतबा इब्ने अब्बस का लिबास पहना , एक बार अब्बास इब्ने रबिया का भेस बदला , एक दफ़ा अब्बास इब्ने हारिस का रूप् इख़्तेयार किया और जब क़रीब इब्ने सबा हमीरी मुक़ाबले के लिये निकला तो अपने बेटे हज़रते अब्बास (अ.स.) का लिबास बदला और ज़बरदस्त हमला किया। मुलाहेज़ा हो मुनाकि़बे(एहज़ब ख़वारज़मी सफ़ा 196 क़लमी) लड़ाई निहायत तेज़ी से जारी थी कि अम्मारे यासिर जिनकी उम्र 93 साल थी , मैदान में आ निकले और अट्ठारा शामियों को क़त्ल कर के शहीद हो गये। हज़रत अली (अ.स.) ने आपकी शहादत को बहुत महसूस किया। एयर विंग लिखता है कि अम्मार की शहादत के बाद अली (अ.स.) ने बारह हज़ार सवारों को ले कर पुर ग़ज़ब हमला किया और दुशमनो की सफ़ें उलट दी और मालिके अशतर ने भी ज़बर दस्त बेशुमार हमले किये।

दूसरे दिल सुबह को हज़रत अली (अ.स.) फिर लशकरे माविया को मुखातिब कर के फ़रमाया कि लोगों सुन लो कि अहकामे ख़ुदा मोअत्तल को जा रहे हैं इस लिये मजबूरन लड़ रहा हूं। इस के बाद हमला शुरू कर दिया और कुशतों के पुश्ते लग गये।

लैलतुल हरीर

जंग निहायत तेज़ी के साथ जारी थी मैमना और मैसरा अब्दुल्लाह और मालिके अशतर के क़ब्ज़े में था। जुमे की रात थी , सारी रात जंग जारी रही। बरवायत आसम कूफ़ी 36,000 (छत्तीस हज़ार) सिपाही तरफ़ैन के मारे गये। 900 (नौ सौ) आदमी हज़रत अली (अ.स.) के हाथों क़त्ल हुए। लशकरे माविया से अल ग़यास , अल ग़यास की आवाज़ें बलन्द हो गईं। यहां तक कि सुबह हो गई और दोपहर तक जंग का सिलसिला जारी रहा। मालिके अशतर दुशमन के ख़ेमे तक जा पहुँचे क़रीब था कि , माविया ज़द में आ जाऐ और लशकर भाग खड़ा हो। नागाह उमरो बिन आस ने 500 (पांच सौ) क़ुरआन नैजा़ पर बलन्द कर दिये और आवाज़ दी कि हमारे और तुम्हारे दरमियान क़ुरआन है। वह लोग जो माविया से रिशवत खा चुके थे फ़ौरत ताईद के लिये खड़े हो गये और अशअस बिन क़ैस , मसूद इब्ने नदक़ , ज़ैद इब्ने हसीन ने आवाम को इस दरजा वरग़लाया कि वह लोग वही कुछ करने पर आमादा हो गये जो उस्मान के साथ कर चुके थे मजबूरन मालिके अशतर को बढ़ते हुए क़दम और चलती हुई तलवार रोकना पड़ी। मुवर्रिख़ गिबन लिखता है कि अमीरे शाम भागने का तहय्या कर रहा था लेकिन यक़ीनी फ़तेह , फ़ौज के जोश और नाफ़रमानी की बदौलत अली (अ.स.) के हाथ से छीन ली गई। ज़रजी ज़ैदान लिखता है कि नैजा़ पर क़ुरआन शरीफ़ देख कर हज़रत अली (अ.स.) की फ़ौज के लोग धोखा खा गये। नाचार अली (अ.स.) को जंग मुलतवी करनी पड़ी। बिल आखि़र अवाम ने माविया की तरफ़ उमरो आस और हज़रत की तरफ़ से उनकी मरज़ी के खि़लाफ़ अबू मूसा अशअरी को हकम मुक़र्रर करके माहे रमज़ान में बामक़ाम जोमतुल जन्दल फ़ैसला सुनाने को तय किया।

हकमैन का फ़ैसला

अल ग़रज़ माहे रमज़ान में बमुक़ाम अज़रह चार चार सौ अफ़राद समेत उमरो बिन आस और अबू मूसा अशअरी जमा हुये और अपना वह बाहमी फ़ैसला जिसकी रू से दोनों को खि़लाफ़त से माज़ूल करना था , सुनाने का इन्तेज़ाम किया। जब मिम्बर पर जा कर ऐलान करने का मौक़ा आया तो अबू मूसा ने उमरो बिन आस को कहा कि आप जा कर पहले बयान दें। उन्होंने जवाब दिया , आप बुज़ुर्ग हैं पहले आप फ़रमायें। अबू मूसा मिम्बर पर गये और लोगों को मुख़ातिब कर के कहा कि मैं अली (अ.स.) को खि़लाफ़त से माज़ूल करता हूं। यह कह कर उतर आये। उमरो बिन आस जिससे फ़ैसले के मुताबिक़ अबू मूसा को यह तवक़्क़ो थी कि वह भी माविया की माज़ूली का ऐलान कर देगा लेकिन उस मक्कार ने इसके बर अक्स यह कहा कि मैं अबू मूसा की ताईद करता हूँ और अली (अ.स.) को हुकूमत से हटा कर माविया को ख़लीफ़ा बनाता हूँ। यह सुन कर अबू मूसा अशअरी बहुत ख़फ़ा हुए लेकिन तीर तरकश से निकल चुका था। यह सुन कर मजमे पर सन्नाटा छा गया। अली (अ.स.) ने मुसकुरा कर अपने तरफ़दारों से कहा कि मैं न कहता था कि दुशमन फ़रेब देने की फि़क्र में है

हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) के कथन (366 – 380)

हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) के कथन (366 – 380)

366

ज्ञान कर्म से संबधित है अतः जो जानता है वो कर्म भी करता है। और ज्ञान कर्म को पुकारता है अगर वो उत्तर देता है तो ठीक वर्ना वो भी उस से विदा हो जाता है।

367

ऐ लोगो, दुनिया की दौलत सूखा सड़ा भूसा है जो संक्रामक रोग पैदा करता है। अतः यहां अपना सामान आराम से खोल कर लेट जाने से बेहतर इस चरागाह से दूर रहना और इस से दिल न लगाना है। इस से केवल (अपनी न्यूनतम) आवश्यकताओं के बराबर लेना, धन दौलत इकट्ठा करने से ज़्यादा अच्छा है। जिस ने इस दुनिया से अधिक मात्रा में ले लिया उस के लिए दरिद्रता तय कर दी गई है। और जिस ने अपनी आवश्यकताएँ ख़त्म कर दीं और जिस को दुनिया की आवश्कता न रही उस को राहत मिली। जिस को इस दुनिया की सजधज अच्छी लगती है अन्त में यही चमक दमक उस को अन्धा कर देती है। और जो दुनिया पर फ़िदा हो जाता है दुनिया उस के अन्दर ऐसे शोक भर देती है जो उस के दिल की गहराइयों में उथल पुथल पैदा कर देते हैं इस तरह कि कभी कोई फ़िक्र उस को घेरे रहती है और कभी कोई अंदेशा उस को परेशान किए रहता है। वो इसी हालत में होता है कि उस का गला घोंटा जाने लगता है और वो जंगल बियाबान में डाल दिया जाता है इस आलम में कि उस के दिल की दोनों रगें टूट चुकी होती हैं और अल्लाह के लिए उस का फ़ना करना और उस के भाई बन्दों के लिए उसे क़ब्र में उतारना आसान हो जाता है।

मोमिन दुनिया को उपदेश लेने की दृष्टि से देखता है और उस से उतना ही भोजन ग्रहण करता है जितनी उस को ज़रूरत होती है और वो दुनिया की हर बात को नापसन्दी के तौर पर व दुश्मनी की निगाह से देखता है। अगर किसी के बारे में यह कहा जाता है कि वो मालदार हो गया है तो ये भी सुनने में आता है कि वो निर्धन होगया। अगर उस के होने पर खुशी छा जाती है तो उस के मरने पर शोक भी होता है। यह दुनिया की हालत है। हालाँकि अभी वो दिन नहीं आया है कि जब पूरी मायूसी छा जाएगी।

368

पाक परवरदिगार ने अपनी आज्ञा पालन में पुण्य और अपनी अवज्ञा में दण्ड इस लिए रखा है ताकि अपने बन्दों को नरक के दण्ड से दूर करे और उन को स्वर्ग की ओर ले जाए।

369

आप (अ.स.) ने फ़रमाया कि लोगों पर एक ऐसा दौर आएगा कि जब क़ुरान के केवल चिन्ह और इसलाम के नाम के अतिरिक्त कुछ बाक़ी नहीं बचेगा। उस दौर में मस्जिदें सज्जा की दृष्टि से आबाद और लोगों के मार्गदर्शन की दृष्टि से वीरान होंगी। उन के बनाने वाले और उन में ठहरने वाले ज़मीन के लोगों में सबसे बुरे होंगे। यह लोग उपद्रवों के स्रोत और पापों का केन्द्र होंगे। जो इन फ़ितनों से मुँह मोड़े गा, उन्हें उन्हीं फ़ितनों की तरफ़ पलटाएँगे और जो क़दम पीछे हटाएगा, उन्हें धकेल कर उन की तरफ़ ले जाएँगे। अल्लाहताला फ़रमाता है कि मुझे अपनी क़सम कि मैं उन लोगों पर ऐसा फ़ितना (उपद्रव) भेजूँगा कि जिस में सहनशील व गंभीर को आश्चर्यचकित छोड़ूँगा। अतः वह ऐसा ही करेगा। हम अल्लाह से लापरवाही की ठोकरों से क्षमा के इच्छुक हैं।

370

कहा जाता है कि ऐसा कम ही होता था कि आप (अ.स.) मिम्बर पर ख़ुतबा देने के लिए तशरीफ ले जाते हों और यह वाक्य न फ़रमाते हों।

ऐ लोगो, अल्लाह से डरो क्यूँकि कोई व्यक्ति बेकार पैदा नहीं किया गया कि वो खेल कूद में पड़ जाए और न उस को बेलगाम छोड़ दिया गया है कि बेहूदा बातें करने लगे और यह दुनिया जो उस के सामने खुद को सजा संवार कर पेश करती है उस परलोक का बदल नहीं हो सकती कि जिस को उस की निगाह में बुरी सूरत में पेश किया गया है। वो धोका खाया हुवा व्यक्ति जिस ने अपने उच्च साहस के बल बूते पर दुनिया हासिल करने में सफ़लता प्राप्त की उस व्यक्ति के समान नहीं हो सकता जिस ने परलोक के लिए थोड़ा बहुत जमा कर लिया हो।

371

कोई प्रतिष्ठा इसलाम से बड़ी नहीं है, कोई सम्मान तक़वा (मन व कर्म की पवित्रता) से बड़ा नहीं है, कोई दुर्ग संयम से अधिक दृढ़ नहीं है, कोई सिफ़ारिश करने वाला तौबा से बढ़ कर सफ़ल नहीं है, कोई कोष संतोष से ज़्यादा बेपरवा कर देने वाला नहीं है, जो व्यक्ति केवल अपनी ज़रूरत भर रोज़ी लेता है तो निर्धनता को दूर करने वाली इस से बढ़ कर कोई बात नहीं है, और जो व्यक्ति अपनी रोज़ की रोटी पर बस करता है वो सुख व स्मृद्धि पाता है और संतोष हासिल करता है। दुनिया की मुहब्बत पीड़ा की कुंजी और क्षोभ की सवारी है। लालच, अहंकार और ईर्ष्या पापों में बेधड़क फाँद पड़ने के प्रेरक हैं। दुश्चरित्र तमाम दोषों पर हावी होता है।

372

आप (अ.स.) ने जाबिर इबने अब्दुल्लाह अंसारी से फ़रमायाः

चार प्रकार के लोगों से दीन व दुनिया की स्थापना है। विद्वान जो अपने ज्ञान को काम में लाता है। अज्ञानी जो ज्ञान हासिल करने में शर्म महसूस न करता हो। दानी जो दान करने में कंजूसी न करता हो। ग़रीब व्यक्ति जो लोक के बदले परलोक न बेचता हो। अतः अगर ज्ञानी अपने ज्ञान को बरबाद करेगा तो अज्ञानी उस के सीखने में शर्म करेगा और अगर मालदार व्यक्ति परोपकार व उपकार करने में कंजूसी करेगा तो ग़रीब व्यक्ति अपना परलोक लोक के बदले बेच डाले गा।

ऐ जाबिर, जिस पर अल्लाह की नेमतें अधिक होंगीं लोगों की आवश्यकताएँ भी उसी के दामन से अधिक संबधित होंगीं। अतः जो व्यक्ति उन नेमतों के द्वारा अल्लाह के लिए काम करेगा अल्लाह उन नेमतों को स्थाई बना देगा और जो व्यक्ति इन कर्तव्यों को पूरा करने के लिए उठ खड़ा नहीं होगा वो उन्हें बरबादी के ख़तरे में डाल देगा।

373

इबने जरीरे तबरी ने अपने इतिहास में अबदुररहमान इबने अबी लैला फ़क़ीह से रिवायत की है। अबदुररहमान, इबने अशअस के साथ मिल कर हज्जाज से लड़ने के लिए निकले थे। वह लोगों को हज्जाज के खिलाफ़ युद्ध के लिए तैयार करने के लिए अपने भाषणों में कहा करते थे कि जब हम शाम देश के लोगों के विरुद्घ लड़ने के लिए बढ़े तो हज़रत अली (अ.स.) को कहते सुनाः

ऐ मोमिनीन, अगर कोई व्यक्ति देखे कि अत्याचार किया जा रहा है और बुराई की ओर निमंत्रण दिया जा रहा है और उस ने उस को मन से बुरा समझा तो वो दण्ड से सुरक्षित हो गया और पाप करने से बच गया। और जिस व्यक्ति ने उस को ज़बान से बुरा कहा उसे इनाम मिला और वो उस से बेहतर है जो उस काम को केवल दिल से बुरा समझता है। और जो व्यक्ति तलवार हाथ में ले कर उस बुराई के विरुद्ध खड़ा हो जाए ताकि अल्लाह का बोल बाला हो और अत्याचारियों की बात गिर जाए तो यही वो व्यक्ति है जिस ने मार्गदर्शन को पा लिया और सीधे रास्ते पर चला और उस के दिल में विश्वास ने उजाला फैला दिया।

374

लोगों में से एक वो है जो बुराई को हाथ, ज़बान और दिल से बुरा समझता है। अतः उस ने अच्छी आदतों को पूरे तौर पर हासिल कर लिया। और वो व्यक्ति जो ज़बान और दिल से उस को बुरा समझता है किन्तु अपने हाथ से उस को नहीं मिटाता तो उस ने अच्छी आदतों में से दो से सम्पर्क रखा और एक आदत को नष्ट कर दिया। वो व्यक्ति जो बुराई को दिल से बुरा समझता है और उसे मिटाने के लिए हाथ और ज़बान किसी से काम नहीं लेता, उस ने तीन आदतों में से दो अच्छी आदतों को नष्ट कर दिया और केवल एक से सम्बंधित रहा। एक वो है जो ज़बान से न हाथ से और न दिल से बुराई की रोक थाम करता है वो जीवित लोगों में चलती फिरती हुई लाश है।

तुम को मालूम होना चाहिए कि समस्त नेक काम और अल्लाह की राह में जिहाद, अम्र बिल मारूफ़ और नही अनिल मुनकर (अच्छे काम का आदेश देने और बुरे काम से रोकने) के मुक़ाबले में ऐसे हैं जैसे गहरे दरिया में थोड़ा से थूक। नेकी का आदेश देने और बुराई से रोकने से न मृत्यु समय से पहले आ जाती है और न इंसान की रोज़ी में कमी होती है। और इस सब से बेहतर बात वो है जो किसी अत्याचारी शासक के सामने कही जाए।

375

अबू हुजैफ़ा से रिवायत है कि उन्होंने अमीरुल मोमिनीन अली (अ.स.) को फ़रमाते हुए सुनाः पहली श्रेणी का युद्ध जिस से तुम पराजित हो जाओगे, हाथ का जिहाद है, फिर ज़बान का और फिर दिल का। जिस ने दिल से भलाई को अच्छा और बुराई को बुरा न समझा उस को उलट पलट कर दिया जाएगा इस तरह कि ऊपर का हिस्सा नीचे और नीचे का हिस्सा ऊपर कर दिया जाए गा।

376

सत्य भारी होता है किन्तु भला लगता है। असत्य हलका होता है किन्तु संक्रमण पैदा करने वाला होता है।

377

इस उम्मत के सबसे अच्छे व्यक्ति के बारे में भी अल्लाह के दण्ड के बारे में बिल्कुल निश्चिन्त मत हो जाओ क्यूँकि पाक परवरदिगार फ़रमाता है कि घाटा उठाने वाले लोग ही अल्लाह के दण्ड से निश्चिन्त हो बैठते हैं। और इस उम्मत के सब से बुरे व्यक्ति के बारे में भी अल्लाह की रहमत की ओर से निराश न हो जाओ क्यूँकि अल्लाह की रहमत की ओर से काफ़िरों के अलावा कोई निराश नहीं होता।

378

कंजूसी तमाम बुराईयों का संग्रह है और एक ऐसी नकेल है जिस से हर बुराई की तरफ़ खिंच कर जाया जा सकता है।

379

रोज़ी दो तरह की होती है। एक रोज़ी वो होती है जिस को तुम ढूँढते हो और एक रोज़ी वो होती है जो तुम्हें ढूँढती है और अगर तुम उस तक नहीं पहुँचते हो तो वो तुम तक पहुँच कर रहेगी। अतः अपने एक दिन की चिन्ता पर साल भर की चिन्ताएँ मत लादो क्यूँकि जो रोज़ की रोज़ी है वो तुम्हारे लिए काफ़ी है। अगर तुम्हारी आयु का कोई साल शेष है तो अल्लाह ने जो रोज़ी तुम्हारे लिए निश्चित कर रखी है वो हर नए दिन तुम को देगा। और अगर तुम्हारी आयु का कोई साल शेष नहीं है तो फिर उस चीज़ कि चिन्ता क्यूँ करो जो तुम्हारे लिए नहीं है। और जो रोज़ी तुम्हारे लिए निश्चित कर दी गई है तो कोई भी माँगने वाला तुम्हारी रोज़ी की ओर तुम से आगे नहीं बढ़ सकता और जो चीज़ तुम्हारे लिए निश्चित कर दी गई है तुम्हें उस के मिलने में कभी देर न होगी।

380

आप (अ.स.) ने फ़रमाया कि बहुत से ऐसे लोग हैं जो सुबह को होते हैं और शाम आते आते नहीं रहते। कुछ लोग ऐसे होते हैं कि रात के पहले हिस्से में उन से ईर्ष्या की जाती है और रात के आख़िरी हिस्से में उन पर रोने वालियों का कोहराम बरपा होता है।

Maah e Sha’abaan

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‘Sha’abaan’ lafz ‘Sha’ab’ se bana hai jis ka ma’ana hai phailna, bikharna, alag alag hona.
Arab me aam taur par is maah me rizq ki talaash me aur tijaarat ke liye log alag alag maqaamaat par safar kate the.s

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Maahe Sha’abaan ki fazeelat :
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‘Jab Maah e Sha’abaan aa jaaye to apne jismo ko paakeeza rakho aur is mahine me apni niyyaten achhi rakho aur unhe haseen banaao.’

(Mukaashafat ul quloob)

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Is barkat wa rahmat aur fazeelat waale mahine me Shab e Baraat hai.
15wi Sha’abaan ki mubarak raat me ALLĀH ta’ala ki rahmat ka khaas zahoor hota hai aur ALLĀH ta’ala bando ko Rizq aur Aafiyat aur Maghfirat ata farmaata hai.

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Maahe Sha’abaan ka Chaand dekhkar Surah al-Qaariah padhen :

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
الْقَارِعَةُ
مَا الْقَارِعَةُ
وَمَا أَدْرَاكَ مَا الْقَارِعَةُ
يَوْمَ يَكُونُ النَّاسُ كَالْفَرَاشِ الْمَبْثُوثِ
وَتَكُونُ الْجِبَالُ كَالْعِهْنِ الْمَنْفُوشِ
فَأَمَّا مَنْ ثَقُلَتْ مَوَازِينُهُ
فَهُوَ فِي عِيشَةٍ رَاضِيَةٍ
وَأَمَّا مَنْ خَفَّتْ مَوَازِينُهُ
فَأُمُّهُ هَاوِيَةٌ
وَمَا أَدْرَاكَ مَا هِيَهْ
نَارٌ حَامِيَةٌ

Bismillāh ir-Rahmān ir-Raheem.
Al-qaariyatu.
Ma al- qaariyatu.
Wa maa adrāka ma al-qaariyatu.
Yaum nakoonun naasu kal-faraashul mabṡooṡ.
Wa takoonul jibaalo kal’ihnil manfoosh.
Fa’ammaa man ṡakolat mawaazeenuhū.
Fa’huwa fee eishatir raadiyati.
Wa ammaa ma khaffat mawazeenuhū.
Fa’ummuhū haawiyatu.
Wa maa adrāka maahiyah.
Naarun haamiyat.

Phir ye masnoon dua padhen :

ﺍﻟﻠَّﻬُﻢَّ ﺃَﻫِﻠَّﻪُ ﻋﻠَﻴْﻨَﺎ ﺑِﺎﻷَﻣْﻦِ ﻭﺍﻹِﻳﻤَﺎﻥِ ﻭَﺍﻟﺴَّﻼﻣَﺔِ ﻭﺍﻹِﺳْﻼﻡِ ، ﺭَﺑّﻲ ﻭﺭَﺑُّﻚَ ﺍﻟﻠَّﻪ ، هِلالُ رُشْدٍ وخَيْرٍ
Allāhumma ahillahu alayna bil amni wal eimaani was salaamati wal islaami Rabbi wa Rabbuk-Allāh hilaalu rushdin wa khayrin.

Tarjuma :
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Aye ALLĀH is (mahine) ko hum par amn aur eimaan aur salaamati aur islaam ke saath , Mera Rab aur tera Rab ALLĀH hai ye chaand hidaayat aur khair waala ho.
(Tirmizi, Jild -2, Hadeeṡ -1376 /Hasan)

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Maah e Sha’abaan ke khaas din :
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1 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Mohaddeeṡ e aazam e Pakistan Maulana Mohammad Sardaar Ahmad rahmatullāhi alaihi (Faisalabad / Pakistan);
1 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Allama Abul Hasanaat Muhammad Ashraf Qaadri Sialwi rahmatullāhi alaihi (Lahore / Pakistan);
1 Sha’abaan – Yaum e Urs Hazrat Khwaja Abul Hasan Iraqi urfe Haaji Mangroli Shaah rahmatullāhi alaihi (Veraval, Gujarat);
2 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Uṡmaan bin Maz’oon radiy-Allāhu ta’ala anhu (Madeena munawwara);
2 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Imaame aazam Abu Haneefa Nomaan bin Ṡaabit rahmatullāhi alaihi (Baghdad / Iraq);
2 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Shaah Muhammad Ma’aroof Shahidullāh Faarooqi Qaadri rahmatullāhi alaihi (Tekmal, Telangana);
3 Sha’abaan – Yaum e Wilaadat Imaam Husain radiy-Allāhu ta’ala anhu;
3 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Ummul Mo’mineen Hazrat Hafsa bint Umar Faarooq radiy-Allāhu ta’ala anha (Madeena munawwara);
3 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Shaikh Abul Farah Yousuf al-Tartoosi rahmatullāhi alaihi (Baghdad / Iraq);
4 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Abu Saeed bin Abul Khair rahmatullāhi alaihi (Maihana, Khurasan / Afghanistan);
4 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Shaah Zaahid urfe Michdi Peer (Ahmedabad, Gujarat);
5 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Khwaja Fakhr-ud-deen Chishti rahmatullāhi alaihi (Sarwar, Rajasthan);
5 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Allama Dr. Qamar Raza Khan rahmatullāhi alaihi (Bareillly, Uttar Pradesh);
7 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Sayyeda Umme Kulṡum binte Huzoor Rasool-Allāh [sallallāhu alaihi wa sallam] radiy-Allāhu ta’ala anha (Madeena munawwara);
7 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Shaikh Abu Saeed Mubarak al- Makhzoomi rahmatullāhi alaihi (Baghdad / Iraq);
7 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Abul Ma’ali Muhammad rahmatullāhi alaihi (Damascus / Syria);
7 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Abul Qaasim Naqshbandi Thattawi rahmatullāhi alaihi (Thattha / Pakistan);
7 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Allama Maualna Abdul Ghafoor Hazarwi rahmatullāhi alaihi (Wazirabad / Pakistan);
8 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Sayyed Akmal Husain urfe Baaba Maan rahmatullāhi alaihi (Vadodara, Gujarat);
8 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Khwaja Abdul Ghaffaar Naqshbandi urfe Peer Meetha rahmatullāhi alaihi (Rahmatpur, Sindh / Pakistan);
9 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Sayyed Ibrāheem al-Rasheedi rahmatullāhi alaihi (Makka mukarrama);
9 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Abul Barkaat ibn Anbari rahmatullāhi alaihi (Baghdad / Iraq);
9 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Makhdoom-ul-Aalam Shaikh Mohamamd Noor-ud-deen Suharwardi rahmatullāhi alaihi (Ahmedabad, Gujarat);
10 Sha’abaan – Yaum e wisaal Hazrat Sayyed Shaah Jalaal-ud-deen Chanda Husaini rahmatullāhi alaihi (Gogi, Bijapur, Karnataka);
10 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Khwaja Peer Baadshaah rahmatullāhi alaihi (Mohra / Pakistan);
10 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Bhanvar Shaah rahmatullāhi alaihi (Bassi, Rajasthan);
11 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Bayazeed Bastami rahmatullāhi alaihi (Bastam / Iran);
11 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Allama Mufti Muhammad Saeed Mohaddeeṡ rahmatullāhi alaihi;
12 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Khwaja Shaikh Qutub Jamaal-ud-deen Ahmad Hanswi rahmatullāhi alaihi (Hansi, Haryana);
12 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Khwaja Khaawand Mahmood rahmatullāhi alaihi;
13 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Abdul Ahad Mohaddeeṡ Pilibhiti rahmatullāhi alaihi;
15 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Sayyed Muhammad Khaalid Shaah Chishti rahmatullāhi alaihi (Watville Benoni / South Africa);
17 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Haaji Basheer Baaba rahmatullāhi alaihi (Una, Gujarat);
18 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Sayyed Uṡmaan Marwandi urfe La’al Shaahbaaz Qalandar rahmatullāhi alaihi (Sehwan / Pakistan);
18 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Peer Daulat Shaah Bastami rahmatullāhi alaihi (Una, Gujarat);
18 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Ali Peer Shaah rahmatullāhi alaihi (Porbandar, Gujarat);
20 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Sayyed Shaah Qamar-ud-deen Husain Munemi rahmatullāhi alaihi (Patna, Bihar);
20 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Waali e Sorath Mahmood Shaah Naqshbandi rahmatullāhi alaihi (Junagadh, Gujarat);
22 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Khwaja Muhammad Amkanaki rahmatullāhi alaihi (Amkana, Bukhara / Uzbekistan);
22 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Khwaja Muhammad Uṡmaan Damani rahmatullāhi alaihi (Dera Ismāeel Khan / Pakistan);
22 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Sayyed Shaah Jamaal-ud-deen Qaadri Pathari rahmatullāhi alaihi (Ahmedabad, Gujarat);
23 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Khwaja Shaah Qutb-ud-deen Beena-e-dil rahmatullāhi alaihi (Jaunpur, Uttar Pradesh);
25 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Mahmood miyan Faarooqi rahmatullāhi alaihi (Limbdi, Gujarat);
26 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Sayyed Muhammad Kalpawi rahmatullāhi alaihi (Kalpi, Uttar Pradesh);
27 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Sayyed La’al Shaah Hamadani rahmatullāhi alaihi (Chakwal / Pakistan);
28 Sha’abaan – Yaum e Wisaal Hazrat Shaikh Ali bin Husain Maaliki Makki rahmatullāhi alaihi;
29 Sha’abaan – – Yaum e Urs Hazrat Sayyed Shaah Shams-ud-deen Suharwardi rahmatullāhi alaihi (Una, Gujarat);

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ALLĀH ta’ala is Maah e mubarak me us ke Habeeb sallallāhu alaihi wasallam ke sadqe me aur Ahle bait ke waseele se
Sab ko mukammal ishq e Rasool ata farmae aur Sab ko hidaayat ata farmae aur Sab ke Eimaan ki hifaazat farmae aur Sahi tareeqe se zyada ibaadat karne ki taufiq ata farmae aur Hamare nek amal qubool farmae aur In buzurgaan e deen ko isaal e sawaab karne ki taufiq ata farmae.
Aur Islaam ka bolbala ata farmae.
Aur Sab ko dunya wa aakhirat me kaamyaabi aur izzat ata farmae aur Sab ki nek jaa’iz muraado ko puri farmae aur Sab ko Ilm me, Amal me aur Rizq me barkat ata farmae.
Aur in baato ko yaad rakhkar us par amal karne ki aur dusro ko bataane ki taufiq ata farmae.
Aameen.

Maah e Sha’abaan