हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) के कथन (143 – 156)

हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) के कथन (143 – 156)

143

चिन्ता आधा बुढ़ापा है।

144

सब्र मुसीबत के अनुसार मिलता है और जो व्यक्ति मुसीबत के समय रान पर हाथ मारे उस का कर्म अकारत हो जाता है।

145

बहुत से रोज़ेदार ऐसे होते हैं जिन को अपने रोज़ों से भूख और प्यास के अलावा कुछ हासिल नहीं होता। और बहुत से रात भर इबादत करने वाले ऐसे होते हैं जिन को अपनी इबादत के बदले में रात भर जागने और कष्ट उठाने के अलावा और कुछ नहीं मिलता। समझदार लोगों का सोना और रोज़ा रखना भी सराहनीय होता है।

146

सदक़े (दान) द्वारा अपने ईमान की सुरक्षा करो और ज़कात द्वारा अपने माल की हिफ़ाज़त करो और मुसीबत की लहरों को दुआ के द्वारा दूर करो।

147

कुमैल बिन ज़ियादे नख़अई कहते हैं कि अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) ने उन का हाथ पकड़ा और कब्रिस्तान की ओर ले चले। जब आबादी से निकले तो आप (अ.स.) ने एक लम्बी आह खेंची और फिर फ़रमायाः

यह दिल बर्तनों की तरह हैं और सबसे अच्छे बर्तन वो होते हैं कि जो कुछ उन के अन्दर होता है उस की सुरक्षा करते हैं। अतः जो कुछ तुम को बताता हूँ उस को याद रखो। देखो लोग तीन तरह के होते हैं। एक ज्ञानी लोग जिन को ईश्वर का ज्ञान होता है। दूसरे विद्यार्थी जो निजात प्राप्त करने के रास्ते पर चल रहे होते हैं और तीसरा समाज का वो निचला वर्ग जो इधर उधर भटकता रहता है और हर पुकारने वाले के पीछे हो लेता है और हवा के रुख़ के साथ मुड़ जाता है, न इन्हों ने ज्ञान की रौशनी से फ़ायदा उठाया और न किसी मज़बूत सहारे की पनाह ली।

ऐ कुमैल याद रखो कि ज्ञान माल से बेहतर है क्यूँकि ज्ञान तुम्हारी रक्षा करता है जबकि माल की रक्षा तुम को करनी पड़ती है, माल खर्च करने से कम होता है किन्तु ज्ञान बाँटने से बढ़ता है और माल व दौलत का असर माल के ख़त्म हो जाने से ख़त्म हो जाता है।

ऐ ज़ियाद के बेटे कुमैल, ज्ञान की समझ दीन है जिस का पालन किया जाता है। इसी से इंसान अपने जीवन में दूसरों से अपना आदेश मनवाता है और अपनी मृत्यु के बाद के लिए नेकनामी जमा करता है। याद रखो कि ज्ञान अधिकारी है और माल उस के आधीन है।

ऐ कुमैल, माल जमा करने वाले ज़िन्दा होते हुए भी मुर्दा होते हैं और ज्ञान हासिल करने वाले रहती दुनिया तक बाक़ी रहते हैं। उन के शरीर तो नज़रों से ओझल हो जाते हैं किन्तु उनकी याद लोगों के दिलों में बाक़ी रहती है।

(उस के बाद हज़रत अली ने अपने सीने की ओर इशारा किया और फ़रमाया कि) देखो, यहाँ ज्ञान का बहुत बड़ा भण्डार भरा पड़ा है। काश, मुझे इस बोझ को उठाने वाले मिल जाते। हाँ, मिले तो, और उन में से कुछ होशियार भी थे, लेकिन वो विश्वसनीय नहीं थे। वो दीन (धर्म) का उपयोग दुनिया जमा करने के लिए करने वाले और अल्लाह की नेमतों का उपयोग अल्लाह के बन्दों पर अपनी श्रेष्ठता जताने के लिए करने वाले थे, या जो ज्ञान का इस्तेमाल अल्लाह के दोस्तों पर अपनी बड़ाई जताने के लिए करने वाले थे। उन में से कोई ऐसा था जो ज्ञानियों का अनुयायी तो था किन्तु उस में ज्ञान की बारीक बातों को समझने की सलाहियत नहीं थी और जैसे ही उस के दिल में शंका पैदा होती वो उस शंका के सामने बेबस हो जाता था। अतः जान लो कि इस ज्ञान को प्राप्त करने के योग्य न वो है न ये। या कोई ऐसा था जो स्वादों के पीछे भागता था और स्वादों के चक्कर में पड़ा हुआ था। या ऐसा व्यक्ति था जो माल जमा करने का दीवाना था। इन में से कोई भी व्यक्ति दीन की ज़रा सी भी रक्षा नहीं कर सकता। ये लोग अधिकतर चरने वाले जानवरों की तरह हैं। इस तरह तो ज्ञानियों के मरने से ज्ञान समाप्त हो जाएगा।

किन्तु पृथ्वी कभी ऐसे व्यक्ति से ख़ाली नहीं रहती कि जो पृथ्वी पर ख़ुदा की हुज्जत (आदेश) को बरक़रार रखता है, चाहे वो व्यक्ति आँखों के सामने ज़ाहिर हो और लोग उस को जानते हों या छिपा हुआ हो ताकि ख़ुदा की हुज्जत (आदेश) और निशानियाँ मिट न जाएँ। और ऐसे लोग हैं ही कहाँ और हैं ही कितने ?  ख़ुदा की क़सम ऐसे लोग गिनती में बहुत कम होते हैं लेकिन अल्लाह के नज़दीक ऐसे लोगों का महत्व बहुत ज़्यादा होता है। ख़ुदा इन लोगों के द्वारा अपनी हुज्जत (आदेश) व अपनी निशानियों की सुरक्षा करता है ताकि वो लोग (इस हुज्जत और इन निशानियों को) अपने जैसे लोगों के सुपुर्द कर दें और उन को उन के दिल में बो दें। ज्ञान ने इन को वास्तविकता से अवगत करा दिया है और उन्होंने विश्वास की असलियत को समझ लिया है। और जिस चीज़ (अर्थात दुनिया से दूरी) को आराम में पले लोगों ने मुश्किल समझ रखा था, इन लोगों ने उस को आसान बना लिया। जिन चीज़ों से जाहिल डर कर भाग जाते हैं, इन लोगों ने उस से दिल लगा लिया है। ये लोग अपने शरीर के साथ तो इस दुनिया में रह रहे हैं किन्तु इन की जान (रूह) मलाए आला (सर्वोच्च आकाश) से जुड़ी हुई है। यही लोग ज़मीन पर अल्लाह के प्रतिनिधि हैं और लोगों को अल्लाह के दीन की ओर आमंत्रित करते हैं। मैं ऐसे लोगों को देखने के लिए कितना तरसता हूँ। (फिर आप ने हज़रत कुमैल से फ़रमाया कि) ऐ कुमैल, मुझे जो कुछ कहना था कह चुका अब अगर तुम चाहो तो लौट सकते हो।

नोटः कुमैल इबने ज़ियादे नख़अई, अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स.) के प्रमुख साथियों में से थे। कहा जाता है कि वो हज़रत अली के राज़ों के ख़ज़ानादार थे। वो कुछ समय तक हज़रत अली की ओर से हीत के गवर्नर रहे। वो 103 हिजरी में 90 वर्ष की आयु में हज्जाज इबने यूसुफ़ सक़फ़ी के हाथों शहीद हुए और कूफ़ा शहर के बाहर दफ़न हुए।

148

इंसान अपनी ज़बान के नीचे छिपा हुआ है।

149

जो व्यक्ति अपनी हैसियत नहीं पहचानता, वो नुक़सान उठाता है।

150

एक व्यक्ति ने आप (अ.स.) से उपदेश की प्रार्थना की तो आप (अ.स.) ने फ़रमायाः

तुम को उन लोगों में से न होना चाहिए कि जो बिना कुछ कर्म किए परलोक में अच्छे अंजाम के उम्मीदवार होते हैं और अपनी उम्मीदें बढ़ा कर तौबा करने में देर लगा देते हैं। जो दुनिया के बारे में ऐसे लोगों के समान बातें करते हैं जिन्हों ने दुनिया छोड़ दी है लेकिन उन के कर्म उन लोगों के समान होते हैं जो दुनिया के पीछे भागते हैं। अगर उन को दुनिया दे दी जाती है तो उस से सेर नहीं होते, अगर उन को दुनिया न मिले तो संतोष नहीं करते, जो उन को मिलता है उस के लिए शुक्र नहीं करते, और जो कुछ बच रहता है हमेशा उस में और बढ़ौतरी के इच्छुक होते हैं। वो बुरा काम करने से दूसरों को रोकते हैं और ख़ुद नहीं रुकते, दूसरों को ऐसी बातें करने का आदेश देते हैं जो वह ख़ुद नहीं करते। वो अच्छे लोगों को पसन्द करते हैं मगर उन जैसे कर्म नहीं करते। वो पापियों को बुरा समझते हैं लेकिन ख़ुद भी उन्हीं में से होते हैं। वो अपने पापों की अधिकता की वजह से मौत को बुरा समझते हैं, अगर बीमार होते हैं तो लज्जित रहते हैं और जब स्वस्थ होते हैं तो ऐश में पड़ जाते हैं। जब बीमारी से छुटकारा पाते हैं तो इतराने लगते हैं और जब किसी मुसीबत में फँस जाते हैं तो निराश हो जाते हैं और शिकायत करने लगते हैं। जब कोई परेशानी आती है तो रो रो कर अल्लाह से दुआ माँगते हैं और जब उन की दिली मुराद मिल जाती है तो मग़रूर हो जाते हैं। वो इस दुनिया के स्वादों के पीछे दौड़ते हैं और अपनी इच्छाओं के आधीन होते हैं, वो विश्वास होने के बावजूद अपनी इच्छाओं के सामने बेबस हो जाते हैं। वो दूसरों के लिए तो उन के छोटे छोटे पापों से भी परेशान हो जाते हैं (अर्थात उन को दूसरों के छोटे पाप बड़े नज़र आते हैं) और अपने लिए दूसरों से ज़्यादा पुरस्कार के अभिलाषी रहते हैं। वो अगर मालदार हो जाते हैं तो उन पर नशा चढ़ जाता है और वो ग़लत कामों में पड़ जाते हैं और अगर दरिद्र हो जाते हैं तो निराश और शिथिल हो जाते हैं। जब काम करते हैं तो काम ठीक से नहीं करते और जब माँगते हैं तो बहुत माँगते हैं। जब उन पर वासना छाती है तो पाप करने में जल्दी करते हैं। वो तौबा करने में देर लगाते हैं। जब उन को कोई परेशानी होती है तो धर्म के रास्ते से भटक जाते हैं और अपनी क़ौम का साथ छोड़ देते हैं। यह लोग ऐसी बातें बयान करते हैं जिन से कोई सीख ली जा सकती है मगर यह लोग ख़ुद उस से कोई सीख नहीं लेते। वो दूसरों को उपदेश देने में हद से आगे बढ़ जाते हैं मगर ख़ुद कोई उपदेश नहीं लेते। वो बात करने में बहुत ज़्यादा और कर्म करने में बहुत कम होते हैं। जो चीज़ मिट जाने वाली है (अर्थात माल) उस के लिए ख़ुद को दूसरों से आगे रखते हैं और जो चीज़ बाक़ी रहने वाली है (अर्थात कर्म) उस को आसान समझते हैं। वो लाभ को हानि और हानि को लाभ समझते हैं। वो मौत से डरते हैं मगर फ़ुर्सत का समय हाथ से निकल जाने से पहले अच्छे कर्म करने में जल्दी नहीं करते। दूसरों के ऐसे पाप को बहुत बड़ा समझते हैं जिस से बड़े पाप को वो ख़ुद अपने लिए छोटा समझते हैं। वो अपनी इबादत को ज़्यादा समझते हैं और इतनी ही इबादत को दूसरों के लिए कम समझते हैं। वो दूसरों पर एतराज़ करते हैं और अपनी प्रशंसा करते हैं। उन को पैसे वाले लोगों के साथ तफ़रीह करना ग़रीब लोगों के साथ बैठ कर ख़ुदा को याद करने से ज़्यादा पसंद है। वो अपने हित में दूसरों के खिलाफ़ हुक्म लगाते हैं किन्तु कभी दूसरों के हित में अपने ख़िलाफ़ हुक्म नहीं लगाते। वो दूसरों को उपदेश देते हैं और ख़ुद ग़लत रास्ते पर चलते हैं। वो दूसरों से सेवा लेते हैं और ख़ुद बुरे कामों में लगे रहते हैं। वो अपना हक़ पूरा वसूल करते हैं मगर ख़ुद हक़ अदा नहीं करते। वो अल्लाह की बनाई हुई चीज़ो व प्राणियों से डरते हैं लेकिन अल्लाह से नहीं डरते और वो अल्लाह की बनाई हुई चीज़ों के बारे में अल्लाह से नहीं डरते।

151

हर व्यक्ति का एक अन्त है अब चाहे वो मीठा हो या कड़वा।

152

हर आने वाले के लिए पलटना है और जब पलट गया तो जैसे कभी था ही नहीं।

153

धैर्य रखने वाला सफ़लता से वंचित नहीं रहता चाहे उस में लम्बा समय ही क्यूँ न लग जाए।

154

किसी समूह के किसी कार्य से सहमत होने वाला व्यक्ति ऐसा है जैसे उस कार्य में ख़ुद शामिल हो और ग़लत काम पर राज़ी होने वाले पर दो पाप हैं, एक उस काम को करने का और एक उस से सहमत होने का।

155

ऐसे लोगों के साथ क़रार इक़रार करो कि जो वादा निभाने में चट्टानों की तरह मज़बूत हों।

156

तुम्हारे लिए ऐसे लोगों का अनुसरण अनिवार्य है जिन से अनजान रहने की तुम को आज्ञा नहीं है।

Arabia before proclamation of Prophet Hood

Arabia before proclamation of Prophet Hood

Allah sent Muhammad (p.b.h.) as a Warner (against vice) for all the worlds and as trustee of His revelation, while you people of Arabia were following the worst religion and you resided among rough stones and venomous serpents. You drank dirty water and ate filthy food. You shed blood of each other and cared not for relationship. Idols are fixed among you and sins are clinging to you.
This is part of the same sermon on the attentiveness of the people after the death of the Holy Prophet

I looked and found that there is no supporter for me except family, so I refrained from thrusting them unto death. I kept my eyes closed despite motes in them. I drank despite choking of throat. I exercised patience despite trouble in breathing and despite having to take sour colocynth as food.
This is part of the same sermon on the settlement between Mu`awiyah and `Amr Ibn al-`As

He did not swear allegiance till he got him to agree that he would pay him its price. The hand of this purchaser (of allegiance) may not be successful and the contract of the seller may face disgrace. Now you should take up arms for war and arrange equipment for it. Its flames have grown high and its brightness has increased. Clothe yourself with patience for it is the best to victory.(1)


(1). Amir al-mu’minin had delivered a sermon before setting off for Nahrawan. These are three parts from it. In the first part he has described the condition of Arabia before Proclamation (of Prophet Hood); in the second he has referred to circumstances which forced him to keep quiet and in the third he has described the conversation and settlement between Mu`awiyah and `Amr Ibn al-`As.

The position of this mutual settlement was that when Amir al-mu’minin sent Jarir Ibn `Abdillah al-Bajali to Mu`awiyah to secure his allegiance he detained Jarir under the excuse of giving a reply, and in the meantime he began exploring how far the people of Syria would support him.

When he succeeded in making them his supporters by rousing them to avenge `Uthman’s blood he consulted his brother `Utbah ibn Abi Sufyan.

He suggested, “If in this matter `Amr ibn al-`As was associated he would solve most of the difficulties through his sagacity, but he would not be easily prepared to stabilise your authority unless he got the price he desired for it.

If you are ready for this he would prove the best counsellor and helper.” Mu`awiyah liked this suggestion, sent for `Amr ibn al-`As and discussed with him, and eventually it was settled that he would avenge `Uthman’s blood by holding Amir al-mu’minin liable for it in exchange for the governorship of Egypt, and by whatever means possible would not let Mu`awiyah’s authority in Syria suffer. Consequently, both of them fulfilled the agreement and kept their words fully.

SERMON 25

When Amir al-mu’minin received successive news that Mu`awiyah’s men were occupying cities(1) and his own officers in Yemen namely `Ubaydullah Ibn `Abbas and Sa`id Ibn Nimran came to him retreating after being overpowered by Busr Ibn Abi Artat, he was much disturbed by the slackness of his own men in jihad and their indifference to his opinion. Proceeding on to the pulpit he said:

Nothing (is left to me) but Kufah which I can hold and extend (which is in my hand to play with). (O’ Kufah) if this is your condition those whirlwinds continue blowing through you then Allah may destroy you.
Then he illustrated with the verse of a poet:

Oh’ `Amr! By your good father’s life. I have received only a small bit of fat from this pot, the fat that remains sticking to it after it have been emptied.

Then he continued:

I have been informed that Busr has overpowered Yemen. By Allah, I have begun thinking about these people that they would shortly snatch away the whole country through their unity on their wrong and your disunity (from your own right), and separation, your disobedience of your Imam in matters of right and their obedience to their leader in matters of wrong, their fulfillment of the trust in favor of their master and your betrayal, their good work in their cities and your mischief.

Even if I give you charge of a wooden bowl I fear you would run away with its handle.

Oh’ my Allah they are disgusted of me and I am disgusted of them. They are weary of me and I am weary of them. Replace them for me with better ones and replace me for them with worse one.

Oh’ my Allah melt their hearts as salt melts in water. By Allah I wish I had only a thousand horsemen of Banu Firas Ibn Ghanm (as the poet says):

If you call them, the horsemen, they would come to you like a summer cloud.

(Thereafter Amir al-mu’minin alighted from the pulpit):

As-Sayyid ar-Radi says: In this verse the word “armiyah” is plural of “ramiyy” which means cloud and “hamim” here means summer. The poet has particularized the cloud of summer because it moves swiftly. This is because it is devoid of water while a cloud moves slowly when it is laden with rain. Such clouds generally appear (in Arabia) in winter. By this verse the poet intends to convey that when they are called and referred to for help they approach with rapidity and this is borne by the first line “if you call them they will reach you.”


(1). When after arbitration Mu`awiyah’s position was stabilized he began thinking of taking possession of Amir al-mu’minin’s cities and extend his domain. He sent his armies to different areas in order that they might secure allegiance for Mu`awiyah by force.

In this connection he sent Busr Ibn Abi Artat to Hijaz and he shed blood of thousands of innocent persons from Hijaz up to Yemen, burnt alive tribes after tribes in fire and killed even children, so much so that he butchered two young boys of `Ubaydullah Ibn `Abbas the Governor of Yemen before their mother Juwayriyah bint Khalid Ibn Qaraz al-Kinaniyyah.

When Amir al-mu’minin came to know of his slaughtering and blood shed he thought of sending a contingent to crush him but due to continuous fighting people had become weary and showed heartlessness instead of zeal. When Amir al-mu’minin observed their shirking from war he delivered this sermon wherein he roused them to enthusiasm and self respect, and prompted them to jihad by describing before them the enemy’s wrongfulness and their own short-comings.

At last Jariyah Ibn Qudamah as-Sa`di responded to his call and taking an army of two thousand set off in pursuit of Busr and chased him out of Amir al-mu’minin’s domain.