हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) के कथन (461 – 480)

हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) के कथन (461 – 480)

461

कमज़ोर के बस में बस यही होता है कि वो पीठ पीछे बुराई करता है।

462

बहुत से लोग इस वजह से ग़लत चक्कर में फंस जाते हैं कि उन के बारे में अच्छे विचार व्यक्त किए जाते हैं।

463

दुनिया किसी और जगह के लिए बनाई गई है और ख़ुद अपने लिए नहीं बनाई गई है।

464

बनी उमैय्या के लिए एक समय तक मोहलत है जिस में वो दौड़ लगा रहे हैं। फिर उन में आपस में मतभेद पैदा हो जाएगा जिस के बाद अगर बिज्जू भी उन पर हमला करे तो विजयी होगा।

465

आप (अ.स.) ने अंसार की प्रशंसा करते हुए फ़रमायाः ख़ुदा की क़सम उन्होंने अपनी दौलत से इसलाम की इस तरह देख भाल की जैसे घोड़े के बच्चे को पाला पोसा जाता है, अपने दयालु हाथों और तेज़ ज़बानों के साथ।

466

आंख पीछे के लिए तसमा हैं।

467

और लोगों का एक शासक हुआ जो सीधे रास्ते पर चला और दूसरों को उस राह पर लगाया यहां तक कि दीन ने अपना सीना टेक दिया।

468

आप (अ.स.) ने फ़रमायाः लोगों पर एक ऐसा मुश्किल समय आने वाला है कि जब मालदार अपने माल में कंजूसी करेगा हालांकि उसे ऐसा करने से मना किया गया है। अल्लाह पाक ने कहा है, आपस में एक दूसरे को अपना माल देने को भूलो मत। उस ज़माने में बुरे लोग अधिक हो जाएँगे और अच्छे लोग अपमानित होंगे। और मजबूर व बेबस लोगों के साथ ख़रीद फ़रोख़्त की जाए गी जबकि हज़रत रसूल (स.) ने मजबूर लोगों का माल सस्ते दामों में ख़रीदने को मना किया है।

469

आप (अ.स.) ने फ़रमायाः मेरे बारे में दो लोग तबाह होंगे। एक मेरा चाहने वाला जो मुझ को हद से बढ़ाए और दूसरा वो जो मुझ पर झूट बांधे। यह बात इस तरह भी कही गई है कि मेरे बारे में दो लोग तबाह होंगे। एक वो चाहने वाला जो हद से बढ़ जाए और एक मुझ से द्वेष रखने वाला जो मेरे बारे में बेहूदा बातें करे।

470

आप (अ.स.) से तौहीद और न्याय के बारे में सवाल किया गया तो आप ने फ़रमायाः तौहीद का अर्थ यह है कि उस को अपने भ्रम व कल्पना से परे जानो और न्याय यह है कि उस पर कोई आरोप न लगाओ।

471

जहां बोलना ज़रूरी हो वहां ख़ामोशी अच्छी नहीं है इसी तरह जहां ख़ामोश रहना चाहिए वहां बोलना अच्छा नहीं है।

472

आप (अ.स.) ने एक बार बारिश की दुआ करते हुए फ़रमायाः हमें आज्ञाकारी बादलों के द्वारा तृप्त कर न उन बादलों द्वारा जो सरकश और मुंहज़ोर हों।

473

आप (अ.स.) से कहा गया कि अगर आप सफ़ेद बालों को ख़िज़ाब से काला कर लेते तो बेहतर होता। इस पर आप (अ.स.) ने फ़रमायाः ख़िज़ाब श्रंगार है और हम शोक में हैं।

सैय्यद रज़ी कहते हैं कि हज़रत ने इस से हज़रत रसूल (स.) का देहान्त मुराद ली है।

474

वो योद्धा जो ख़ुदा की राह में जिहाद करते हुए शहीद हो जाए उस व्यक्ति से अधिक पुण्य का पात्र नहीं है जो शक्ति व सामर्थ्य रखते हुए पाप से बचा रहे। और हो सकता है कि पाकदामन व्यक्ति फ़रिश्तों में से एक फ़रिश्ता हो जाए।

475

संतोष ऐसी पूंजी है जो कभी ख़त्म नहीं होती।

476

जब ज़ियाद इबने अबीह को अब्दुल्लाह इबने अब्बास की जगह फ़ारस और उस के आधीन शहरों की हुकूमत दी तो आप ने उस से बात चीत के दौरान उस को पेशगी मालगुज़ारी वसूल करने से रोका। आप (अ.स.) ने फ़रमायाः

न्याय के रास्ते पर चलो और अत्याचार करने व ग़लत तरीक़े अपनाने से बचो। क्यूंकि ग़लत तरीक़े अपनाने की नतीजा यह होगा कि लोगों को अपना घर बार छोड़ना पड़ेगा और अत्याचार उन को तलवार उठाने का निमंत्रण देगा।

477

सबसे बड़ा पाप यह है कि पाप करने वाला उस को हलका समझे।

478

पाक परवरदिगार ने अज्ञानियों से ज्ञान सीखने का वादा उस समय तक नहीं लिया जब तक ज्ञानियों से अज्ञानियों को ज्ञान सिखाने का वादा न ले लिया।

479

सब से बुरा भाई वो है जिस के लिए कष्ट उठाना पड़े।

480

जब कोई मोमिन अपने किसी भाई को क्रोधित करे गा तो ये उस से जुदाई का कारण होगा।

The Prophet ﷺ’s beautiful ‘Light’ supplication…

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→ Arabic: “Allahummaj’al fi qalbi nuran, wa fi lisani nuran, wa fi sam’i nuran, wa fibasari nuran, wa min fawqi nuran, wa min tahti nuran, wa ‘an yamini nuran, wa ‘an shimali nuran, wa min ‘amami nuran, wa min khalfi nuran, waj’alfinafsi nuran, wa ‘a’zim li nuran, wa ‘azzim li nuran, wafal li nuran, waj’alninuran, Allahumma ‘a’tini nuran, waj’al fi ‘asabi nuran, wafi lahmi nuran, wafi dami nuran, wa fi sha’ri nuran, wa fi bashari nuran.” [Bukhari]