Youm e Wisal Ummul Mumineen Hazrat Aisha bint Abu Bakr رضئ اللہ تعالی عنہ

 

19050487_1215050435291094_5216015288801165312_n

hazrat bibi ayesha siddiqa grave, medina munawwara, jannat ul baqi, ummul mu'aminin mazar, prophet muhammad wives, short biography, history

Ummul Mu’aminin Hazrat Sayyeda Aayesha Siddiqa Radiallahu Ta’ala Anhu – Short Biography Hindi, Urdu

Ummul Mominin Hazrat Sayyeda Aaisha Siddiqa رضی اللہ عنہا Amirul Mominin Hazrat Sayyedna Abu Baqr Siddiq رضی اللہ عنہ Ki Sahabzadi He. Inki Walida Ka Naam ‘Umme Rooman’ He . Aapka Nikah Huzur E Aqdas صلی اللہ علیہ و سلم Se Hijrat Se Pehle Makka Mukarrama Me Hua Tha Lekin Kashana E Nubuwwat Me Ye Madina Munavvara Ke Andar Hijri 2 Me Aai . Aap Sarkar E Madina صلی اللہ علیہ و سلم Ki Mehbooba Aur Chahiti Biwi He .
Huzur E Sarvar E Qayenat صلی اللہ علیہ و سلم Ne Ummul Mominin Hazrat Sayyeda Aaisha Siddiqa رضی اللہ عنہا Ke Bare Me Irshad Farmaya Ke “Ae Umme Salma ! (رضی اللہ عنہا ) Mujhe Aaisha (رضی اللہ عنہا ) Ke Bare Me Koi Taklif Na Do . Allah Ki Qasam ! Mujh Par Aaisha (رضی اللہ عنہا ) Ke Siva Tum Me Se Kisi Biwi Ke Lihaaf Me Vahi Nazil Nahi Hui ”
Fiqah Va Hadees Ke Uloom Me Huzur صلی اللہ علیہ و سلم Ki Azvaaj Ke Darmiyan Sayyedna Aaisha Siddiqa رضی اللہ عنہا Ka Darja Bahot Uncha He . Bade Bade Sahaba E Kiram Aapse Masaail Pucha Karte The . Aapke Fazail O Manaqib Me Bahot Si Hadees e Aayi He .
Aapka Visal E Paak 17 Ramzan Ul Mubarak Ko Madina Munawara Me Hua . Hazrat Sayyedna Abu Huraira رضی اللہ عنہ Ne Aapki Namaz E Janaza Padhayi Aur Aapki Wasiyat Ke Mutabiq Raat Me Logo Ne Aapko Jannat Ul Baqi Sharif Ke Qabrastan Me Dusri Azvaaj E Mutahharat Ke Pehlu Me Dafn Kiya .
[Hawala Kitab – Faizane Aayesha Siddiqa]
Advertisements

फ़ख़रुद्दीन पाशा तुर्की

सहरा के शेर (The Lion Of Desert) के नाम से याद किए जाने वाले फखरुद्दीन पाशा तुर्की तारीख में एक अहम शख्सियत हैं और उनकी तरफ से मदीना का सुरक्षा और दिफ़ा इस तारीख का एक बहुत बड़ा वाकया है तुर्की में फखरुद्दीन पाशा के दिफ़ा और मदीना के बचाव वाले किरदार पर बहुत कुछ काम हो रहा है बहुत सारी किताबें लिखी जा चुकी हैं और उन पर पीएचडी भी की गई है शरीफ मक्का हुसैन बिन अली की बगावत की तैयारियों को देखते हुए 28 मई 1916 ईस्वी के दिन फखरुद्दीन पाशा को मदीना में तैनात किया गया फखरुद्दीन पाशा बगावत शुरू होने से पहले ही मदीना पहुंच गए और अहम सुरक्षा घेरे और बहुत सारे सिक्योरिटी से जुड़े कदम उठाएं 3 जून को शरीफ मक्का ने मदीना के टेली कम्युनिकेशन निजाम रेलवे और टेलीग्राफ लाइनों को तबाह कर दिया अगरचे उसने 5 और 6 जून को मदीना की चेक पोस्ट पर हमला किया लेकिन नाकाम बना दिया गया मदीना के दिफ़ा के दौरान फखरुद्दीन पाशा ने जो अहम कदम उठाया उनमें आशार कदीमा को मदीना शहर में भेजना और चंद किताबें लिखे हुए खोतूत इस्तंबूल रवाना करना शामिल है ताकि वह दुश्मन के हाथ ना लग जाए उनमें से अकसर मख्तूतात उस्मानी इंतजामिया ने ही मदीना के लाइब्रेरियों के लिए भिजवाए थे आज भी तोप कॉपी महल के मदीना लाइब्रेरी में तकरीबन 500 मख्तूतात महफूज रखे गए हैं

मदीना में रहने के दौरान फखरुद्दीन पाशा ने खित्ते के अरबों के साथ अच्छे रिश्ते कायम किए और उन की खिदमात हासिल की ताहम पूर्व गवर्नर ग़ालिब पाशा की नाकामी की वजह से मुकम्मल मक्का बागियों के हाथों में जा चुका था बागियों ने मदीना से बाहर छोटे-छोटे शहरों पर थोड़े वक्त में कब्जा कर लिया फखरुद्दीन पाशा अपने महदूद वसायल गुप्तचरों के और कम साजो-सामान के बावजूद मदीना का बचाव जारी रखा मक्का के नजदीक हिजाज रेलवे मदोरह स्टेशन पर बागियों के कब्जे के बाद मदीना का घेराव कर लिया गया फखरुद्दीन पाशा ने किले का दिफ़ा करना शुरू कर दिया जो सहरा के दरमियान मौजूद था और उसके बाकी तमाम बाहरी कांटेक्ट तोड़ दिए गए थे वह बाहरी मदद हासिल नहीं कर सकते थे इसलिए वहां भूख-प्यास और बीमारियां शुरू हो गई थी इसी सूरत-ए-हाल से फखरुद्दीन पाशा ने 7 जून 1918 को टिड्डियों को खाने का हुक्म जारी किया

एक परिंदे में टिड्डी का क्या फर्क है टिड्डी के पर नहीं होते लेकिन चिड़ियों की तरह पर ना होने के बावजूद टिड्डी उड़ सकती है हरे पौधे और ताजा और साफ चीजें खाती है यह तंबाकू और नींबू दोनों को खाती है टिड्डी आराबियों की खुराक का अहम हिस्सा होती हैं और वह अपनी सेहत और ताकत को शगुफ्तगी को टिड्डियां खाकर हासिल करते हैं फखरुद्दीन पाशा के साथ मौजूद डॉक्टरों और तिब्बी माहरीन ने इस का मुकम्मल मुआयना किया और उसके गोश्त पर बहुत सारे रिसर्च किए फखरुद्दीन पाशा ने मुकम्मल तहकीकात के बाद टिड्डी की तारीफ की इसी दौरान खिलाफत उस्मानिया ने हार तस्लीम कर ली और 30 अक्टूबर 1918 ईस्वी को अमन का मोआहदा कर लिया इस सूरत-ए-हाल में फखरुद्दीन पाशा को मदीना हवाले करने का हुक्म दिया गया लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया उन्होंने मोआहदे के 72 दिन बाद तक मदीना का दिफ़ा किया और हथियार ना डालें इस्तंबूल ने उन्हें माजूल (बर्खास्त) करके उनकी जगह कर्नल अली नजीब को भेजा ताकि हथियार डालने पर बातचीत की जा सके ताहम ब्रतानवी कर्नल ने अब कर्नल फखरुद्दीन पाशा की तरफ से ही हथियार डालने की शर्त रख दी कर्नल अली नजीब फखरुद्दीन पाशा को हवाले करने पर राजी हो गया और अपने वफ़द के हमरा फखरुद्दीन पाशा के पास पहुंचा जिन्होंने अभी तक हथियार नहीं डाले थे और हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ﷺ के रौज़ ए अनवर के करीब मौजूद थे फखरुद्दीन पाशा का ख्याल था कि आने वाला कर्नल उनसे पूछेगा कि ऐसा क्यों और कैसे कर रहे हो लेकिन आने वाले कर्नल ने उनकी आंखों पर राख फेंक कर उन्हे पकड़ कर बांधा और 10 जून 1919 ई को ब्रतानवी लारेंस के हवाले कर दिया फखरुद्दीन पाशा ने कहा कि यह दिन उनकी जिंदगी का तकलीफ भरा दिन था

मुहासारा मदीना तारीख के तवील तरीन मुहासरों में एक था जो जंग के बाद भी जारी रहा यह मुहासरा 2 साल और 7 महीने तक जारी रहा इस मुहासरे के दौरान शरीफ मक्का और उसके हवारियों ने खिलाफत उस्मानिया से गद्दारी करके बर्तानिया का साथ दिया और उस्मानी फौज के खिलाफ जंग लड़ी सहरा का शेर और मुहाफिज मदीना फखरुद्दीन पाशा जिनका पूरा नाम उम्र फखरुद्दीन था 1868 ई में बुलगारिया के शहर “रोज” में पैदा हुए 1891 ईसवी में मिलिट्री की स्कूल में पढ़ाई मुकम्मल करके वह उस्मानी फौज में स्टाफ कप्तान मुकर्रर हुये उन्होंने बलकान की जंग में और जंग ए अजीम खिदमत अव्वल (पहला विश्व युध्द) में उन्होंने जिस बहादुरी से मदीना का दिफा किया उस वजह से उन्हें सहरा का शेर का खिताब दिया गया 27 जून 1919 ई को उन्हें बतौर जंगी कैदी मिस्र ले जाया गया 5 अगस्त 1919 ई को उन्हें माल्टा में देश बदर कर दिया गया जहां वह 2 साल 33 दिन जेल में रहे ब्रतानवी होकूमत के अहकामात के बावजूद उन्होंने खिलाफत उस्मानिया की वर्दी उतारने से इंकार कर दिया उन्होंने कहा मैंने जबसे मिलिट्री स्कूल से पढ़ाई मुकम्मल की है इस वर्दी को नहीं उतारा मुल्क बदर के दौरान उन्हें नमरूद मुस्तफा की अदालत से सजा-ए-मौत सुनाई गई शहर पर हमलावर फौज के हमले के बाद जिस पर अमल ना हो सका 8 अप्रैल 1921 ई में तुर्की की नई हुकूमत की कोशिशों से उन्हें रिहाई मिली चंद दिन रूस में खिदमत सर अंजाम देने के बाद वह वापस अनातोलिया आ गए 9 नवंबर 1921ई को उन्हें अफगानिस्तान के दारुल हुकूमत काबुल में मौजूद तुर्क सफारत खाने में बतौर सफीर तैनात किया गया वह 12 मई 1926 को वतन वापस आए और मिलिट्री अदालत में तैनात कर दिए गए 5 फरवरी 1936 ई को वह मेजर जनरल के पद से रिटायर हुए और 22 नवंबर 1948 ई को दिल का 
दौरा पड़ने से इंतकाल कर गए उन्हें आसियान कब्रिस्तान में दफन किया गया

या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ﷺ मैं आपको कभी नहीं छोडूंगा

मदीने के मुहासरे से पहले उन्हें उस्मानी हुकूमत ने किला छोड़ने का हुक्म दिया लेकिन फखरुद्दीन पाशा ने कहा मैं अपने हाथ से तुर्क झंडे को मदीने के किले से नहीं गिरा सकता अगर आप चाहते हैं कि किला छोड़ा जाए तो फिर किसी और कमांडर को भेज दें मुहासरे के दौरान वह बहुत अधिक मस्जिद-ए-नबवी में नमाज और नफिल की अदायगी करते और कहते उठें उठें प्यारे मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लमﷺ उठें अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे सल्लमﷺ देखें जो आप पर ईमान लाए हैं और आप के नाम पर जंग करते हैं अल्लाह से हमारे लिए मदद ला दें 
अप्रैल 1918 ई को फखरुद्दीन पाशा ने खुतबा देते हुए हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लमﷺ के रोजे ए मुबारक की तरफ इशारा करते हुए कहा या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लमﷺ मैं आपको कभी नहीं छोडूंगा :

==============

Fahreddin Pasha: Ottoman officer who defended the holy lands with all he had

Fahreddin Pasha, who defended Medina during World War I against the British even after the Ottomans surrendered, is one of many heroes who helped the nation stand against the occupying forces
Fahreddin Pasha, nicknamed “The Tiger of the Desert,” is one of the most important figures in the history of Turkish people, and his defense of Medina is one of the most flattering events in this history. Süleyman Beyoğlu wrote an important doctoral dissertation about Fahreddin Pasha based on archival resources. Birol Ülker also elaborated on Fahreddin Pasha’s defense of Medina and his locust-eating story in one of his articles.

Sacred relics

After Sharif of Mecca Hussein bin Ali started preparing for a rebellion, Fahreddin Pasha was deployed to Medina on May 28, 1916. Fahreddin Pasha reached Medina before the rebels and took defensive measures there. Bin Ali destroyed the railway and telegraph lines around Medina on June 3. Although he attacked Medina’s outposts on June 5-6, he was repelled. When Fahreddin Pasha was defending Medina, the first thing he did was send the sacred relics in the city and some manuscripts to Istanbul so that the enemy would not seize them. Most of these manuscripts had already been sent by Ottoman administrators to the libraries in Medina. About 500 manuscripts are currently kept in the Medina Library of Topkapı Palace.

During his stay in Medina, Fahreddin Pasha had close relations with the Arabs in the region and took them into his service. However, Mecca was seized by the rebels as a result of the insurgency that escalated because of the incompetence of the governor, Galib Pasha. Moreover, the rebels occupied cities outside Medina in a short time. Fahreddin Pasha, on the other hand, continued to defend the city despite limited means.

 

 

Fried grasshopper

Medina Castle was besieged after the rebels’ seizure of Mudawwara Station of the Hijaz Railway near Mecca. So, Fahreddin Pasha started to defend the fortress, which was cut off from its surroundings in the middle of the desert. Since they could not receive aid, they started suffering from hunger, thirst and diseases. Following these conditions, Fahreddin Pasha issued a communiqué on June 7, 1918, about eating grasshoppers:

“What is different from a sparrow in a grasshopper? There are no feathers of it, but it has wings like a sparrow and flies like it, feeds on plants, eats clean and fresh things, and it enjoys both tobacco and lemon. The main food of Bedouins is the grasshopper, and they owe their health and fitness to the grasshoppers they eat.”

Fahreddin Pasha, who reportedly had doctors analyze grasshoppers, described grasshopper meals prepared in four different ways after he had praised the creature’s characteristics.

Meanwhile, the Ottoman Empire, which accepted defeat, signed the Armistice of Mudros on Oct. 30, 1918. According to its conditions, Fahreddin Pasha, who was asked to deliver Medina, did not accept it. He defended Medina for 72 more days after Mudros and did not surrender. Then, Istanbul displaced him and replaced him with Colonel Ali Najib who carried out negotiations on surrender. However, the British and Arabs laid Fahreddin Pasha’s surrender as a condition.

Then, Ali Najib agreed with the British to hand over the pasha. Ali Najib and his entourage went to Fahreddin Pasha, who had not surrendered, somewhere near the tomb of the Prophet Muhammad. Fahreddin Pasha thought that they had come to ask him how he was doing, but instead they threw ash on his face, jumped him, tied him up and handed him to the British on Jan. 10, 1919. Fahreddin Pasha said this incident was the most painful day of his life.

Tiger of the Desert in Afghanistan

The defender of Medina, Fahreddin Pasha, whose full name was Ömer Fahreddin, was born in 1868 in Ruse, in modern Bulgaria. After graduating from military school in 1891, he joined the Ottoman army as a staff captain. He served on various fronts during the Balkan Wars and World War I. Due to his brave defense of Medina, he earned the sobriquet “Tiger of the Desert.” On Jan 27, 1919, he was taken to Egypt as a war prisoner. On Aug 5, 1919, he was exiled to Malta and held captive for two years and 33 days.

Despite the British, he refused to take his Ottoman army uniform off, saying: “I have not taken this uniform off since I graduated from military school.” While in exile, he was sentenced to death by the Nemrud Mustafa court, which was set up by the occupying forces. He was freed by the efforts of the newly founded Ankara government on Apr. 8, 1921. After serving in Russia for a while, he then returned to Anatolia.

On Nov. 9, 1921, he was appointed to the Turkish Embassy in Afghanistan and improved Afghan-Turkish friendship during his service. He returned to Turkey on May 12, 1926, and worked at the Court of Military Appeals. On Feb. 5, 1936, he retired as a major general and died of a heart attack on Nov. 22, 1948. He currently rests in Aşiyan Graveyard.

‘Oh Allah’s prophet, I’ll never leave you’

Before the siege of Medina Castle began, the Istanbul government asked Fahreddin Pasha to evacuate the castle, but Fahreddin Pasha said: “I would never bring the Turkish flag down from Medina Castle with my own hands. If you want this castle to be evacuated, better to bring another commander out here.”

During the siege, Fahreddin Pasha is said to have prayed constantly over the tomb of the prophet. He was often heard saying: “Rise, rise Muhammad. Rise, the prophet of Allah! And be seen to those who believe you and fight in your name. Bring Allah’s help to us.”

On Apr. 2, 1918, Fahreddin Pasha gave a Friday sermon wrapped in a Turkish flag and said while pointing to the tomb of Muhammad: “Oh Allah’s prophet, I will never leave you.”

DID ISLAM SPREAD BY THE SWORD?

The Church of the Holy Sepulchre in Jerusalem, which Umar promised to protect when the city came under Muslim control

It’s a common accusation made against Muslims and Islam in general: “The only reason Islam is a world religion is because it spread by the sword.” It’s a favorite remark of Islamophobes who parade as analysts and historians fear-mongering about the threat Islam supposedly poses to the Western World. With it being such a hot topic that causes so much debate, it is appropriate to analyze and study this topic to better understand whether it is valid or not.

Egypt, Syria, Iraq, and Persia – The First Conquests

After the life of Prophet Muhammad (peace and blessings of Allah be upon him), Islamic expansion truly began in the early 630s, AD. Campaigns against the Byzantine and Sassanid (Persian) Empires were initiated which pitted this new religion of Islam, with its desert Arabian warriors against the established and ancient empires centered in Constantinople and Ctesiphon.

Abu Bakr (may Allah be pleased with him), the first caliph of Islam, gave these armies rules which would seem very constricting by today’s standards of warfare:

“Stop, O people, that I may give you ten rules for your guidance in the battlefield. Do not commit treachery or deviate from the right path. You must not mutilate dead bodies. Neither kill a child, nor a woman, nor an aged man. Bring no harm to the trees, nor burn them with fire, especially those which are fruitful. Slay not any of the enemy’s flock, save for your food. You are likely to pass by people who have devoted their lives to monastic services; leave them alone.”

These rules were very unique and innovative for the time. Just before this Muslim expansion, the Persians and Byzantines had fought a decades-long war that left lands from Syria to Iraq in ruins. Abu Bakr (may Allah be pleased with him) made it clear that Muslim armies do not operate by the same principles and restrict their fights to the armies and governments of the enemy, not the general populace. Islamic Shari’ah law, based on the example of Abu Bakr (may Allah be pleased with him), clearly forbids the use of force against anyone except in legitimate cases of war against a clearly defined enemy.*

The purpose of this article is not to delve into the tactics and individual battles of this conquest of Egypt, Syria and Iraq. It is enough for our purposes here to state that Syria was under Muslim control by 638, Egypt by 642, and Iraq/Persia by 644. The Byzantine Empire, having lost its religious base in Syria, as well as its commercial base in Egypt was greatly weakened. The Sassanid Empire, on the other hand, completely ceased to exist after the Muslim conquest. Politically, it was a disaster for these two giant empires. But, going back to the main idea of this article, how did Islam as a religion spread in the conquered areas?

Unequivocally, the general populace was not forced or induced to convert to Islam. If anything, they were encouraged to continue living their lives as they had for centuries before. In the example of the conquest of Jerusalem, the caliph at the time, Umar ibn al-Khattab (may Allah be pleased with him), wrote in the surrender treaty with the patriarchs of city:

He [Umar] has given them an assurance of safety for themselves, for their property, their churches, their crosses, the sick and healthy of the city…Their churches will not be inhabited by Muslims and will not be destroyed…They will not be forcibly converted.

No other empire or state at the time had such ideas about religious tolerance. Umar (may Allah be pleased with him), being a companion of the Prophet (peace and blessings of Allah be upon him), sets a precedent in this treaty about the treatment of conquered peoples in Islamic law. The rest of the conquered lands, in Egypt, Syria, Iraq, and Persia had similar treaties. Whether the citizens of the conquered lands were Christian, Jew, Sabians, or Zoroastrians, they were allowed to keep their religious traditions. There exists not one example of forced conversion in these early conquests.

Proof of the lack of forced conversion in these areas is the remaining Christian communities in these countries. For the first few centuries after the Muslim conquest, the majority of the population of these areas remained Christian. Slowly, they began to take on Islam as their religion and Arabic as their language. Today, large percentages of Christians remain in Egypt (9%), Syria (10%), Lebanon (39%), and Iraq (3%). If those early Muslim conquests (or even later Muslim rulers) forced conversion on anyone, there would be no Christian communities in those countries. Their existence is proof of Islam not spreading by the sword in these areas.

North Africa and Spain

The soldiers and leaders of these early conquests in Egypt, Syria, Iraq, and Persia were from the first generation of Muslims. Many of them were even companions of the Prophet (peace and blessings of Allah be upon him). What would happen as Muslim expansion continued in later generations, as Muslim armies fought the Byzantines further West, in North Africa and later, in Spain?

The majority of the population of the North African coast in the 600s were Berbers. While the Byzantine Empire controlled most of the coast from Egypt to Algeria, the people of those areas were generally not loyal to the Byzantines who had great trouble trying to subdue the region. Political and social upheaval in the century before Islam led to a devastated region, which was probably just a shell of its former glory as a Roman province.

The first Umayyad caliph, Muawiya, appointed a general, Uqba bin Nafi, to conquer the North African coast from the Byzantines in the 660s. Again, without getting into the details of the tactics and battles, within the course of a few decades, Muslim control over North Africa was solidified.

The same pattern we saw in Southwest Asia continued in North Africa. Conversions were not forced on any of the local populations. No accounts, by either Muslim or non-Muslim sources, mention forced conversion of the Berbers. Indeed, many Berbers did convert to Islam quite quickly. That strengthened the Muslim armies, as huge numbers of newly-converted Berbers would join the armies sweeping across the continent. Had these Berbers been forced to convert, they certainly would not have had the zeal and enthusiasm for Islam that would cause them to join the armies and spread Islamic political control even further against the Byzantines.

After the Muslim conquest of North Africa, came a proposal that would prove to change world history forever. In the early 700s, the Iberian Peninsula (present-day Spain and Portugal) was under the control of the Visigothic King Roderic. A nobleman from Iberia sent to the Muslim governor of North Africa, complaining about the oppressive and tyranical rule of Roderic. The nobleman promised to support a Muslim invasion against Roderic with his own troops if they intervened.

After a few preliminary raids to gauge the local populations’ support for such an intervention, the Muslim general Tariq ibn Ziyad (who may possibly have been Berber himself), ferried an army across from Morocco to Iberia in 711. Within months, Tariq’s army had defeated King Roderic and opened up the country to Muslim control. Within 3 years, the entire Iberian Peninsula was under Muslim control. Many cities, hearing of the justice of Muslim rule, voluntarily opened their doors and welcomed Muslim armies, who ended what they saw as the oppressive rule of the Visigoths.

More documentary evidence survives from this conquest proving that the conquest did not mean forced conversion. In April 713, a Muslim governor in the region negotiated a treaty with a Visigothic noble, which included the provision that the local people “will not be killed or taken prisoner. Nor will they be separated from their women and children. They will not be coerced in matters of religion, their churches will not be burned.”

We see again in the example of Muslim Spain (which would later be called al-Andalus) that the locals (mostly Christians, although a sizable Jewish population also existed) were not forced to convert to Islam. In fact, in later centuries, an almost utopian society of religious tolerance existed in al-Andalus, in which Muslims, Jews, and Christians all experienced a golden age of knowledge, culture, and philosophy. This enlightened land of religious tolerance would end centuries later with the Christian Reconquista which effectively ethnically cleansed Muslims and Jews from the entire peninsula.

The Indian Subcontinent

Today, two of the most populous Muslim countries in the world, Pakistan (2rd most Muslims), and India (3rd most Muslims), occupy the Indian subcontinent. Islam has had an incredible and lasting impact on the region in all aspects of life. However, even through centuries of Muslim rule by different empires and dynasties, Hinduism and other religions remain as important aspects of the subcontinent.

The reasons for Muslim invasion into the subcontinent were justified by the time period’s rules of warfare. A ship filled with daughters of Muslim traders who were trading in Sri Lanka was attacked by pirates from Sindh (what is now Pakistan) who captured and enslaved the women. Seeking to liberate the women and punish the pirates, an expedition was sent out in 710, led by Muhammad bin Qasim, an Arab from the city of Ta’if.

Bin Qasim’s military expedition into this distant and remote land was made successful by very important social issues in India. The caste system, which originated from Hindu belief, divided society up into very strictly controlled social classes. Those on top led wealthy, comfortable lives, while those on the bottom (particularly untouchables) were seen as the scourge of society. Added to this were the Buddhists, who were generally oppressed by the Hindu princes throughout the country. With the entrance of Muslim armies, which carried with them the promise of an equal society, many Buddhists and lower castes welcomed the Muslim armies. In fact, the first Muslims of Indian origin were probably from the lower castes, as Islam offered them an escape from the oppressive social system they were accustomed to.

With the conquest of Sindh, Muhammad bin Qasim showed that Islamic law’s protection of religious minorities was not just for Christians and Jews. Buddhists and Hindus in the subcontinent were given religious freedom and were not forced to convert. In one case, a Buddhist community complained to bin Qasim of their fear that the Muslim armies would force Islam upon them and they would have to leave the practices of their ancestors. Bin Qasim held a meeting with the Buddhist and Hindu leaders of the town, and promised them religious freedom and asked them to continue leading their lives as they had previously.

Conclusions

We now come back to the question posed at the beginning of the article: did Islam spread by the sword? While numerous people with political and religious agendas make their case otherwise, it is seen as a clear and indisputable fact that the religion of Islam was not spread through violence, coercion, fear, or bloodshed. There exist no accounts of people being forced to convert to Islam under any circumstances. While the political and military control of Muslim leaders did in fact spread through defensive warfare, Muslim leaders and generals in fact went out of their way to protect the rights of other religious groups. The warfare was always carried out only against the governments and armies that the Muslims were at war with. The local citizens were left alone. Although this article only gives specific examples of a few regions, this trend continued throughout Islamic history, following the precedent of the early Muslims.

It is important to note that these are some of the first examples in history of religious tolerance. While religious tolerance and freedom are first seen in “Western” civilization in the Enlightenment of the 1600s and 1700s, Muslims have practiced religious freedom since the 600s AD. The arguments made by some political and historical “pundits” about Islamic belief spreading violently and through warfare clearly have no historical basis. In fact, Muslim religious toleration has influenced the historical tradition of such ideas in lands as diverse as Europe, the Americans and India. 

मौलाना मजहरुल हक: तन-मन-धन से समर्पित आज़ादी का गुमनाम सिपाही!

https://assets.roar.media/assets/TtyyRsDQyJZL6VoA_Moulana.jpg

भारत को आज़ादी यूहीं नहीं मिल गई. इसके लिए न जाने कितने हिंदोस्तानियों ने जाति व धर्म से ऊपर उठकर देश के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया. तब जाकर हमारा देश ब्रिटिश साम्राज्य की 200 साल गुलामी के बाद आज़ादी की साँस ले सका. ऐसे में हमारा फर्ज बनता है कि हम उन आज़ादी के सिपाहियों को याद करें.

ऐसे में कुछ ऐसे भी स्वतंत्रता सेनानी हैं, जो गुमनामी के अँधेरे में कहीं गुम हो गए. जिनकी वजह से हम आज स्वतंत्र रूप से अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं.

ऐसे ही एक आज़ादी के सिपाही मौलाना मजहरुल हक का नाम भी शामिल है. जिन्होंने आज़ादी के साथ-साथ हिन्दू-मुस्लिम एकता व शिक्षा व्यवस्था पर प्रबल जोर दिया था. यही नहीं मौलाना मजहरुल के घर पर महात्मा गाँधी, सुभाष चंद्र बोस जैसे कई क्रांतिकारी आया करते थे.

उन्होंने आज़ादी के साथ शिक्षा की बेहतरी के लिए कई बड़े दान भी किए. ऐसे में हमारे लिए महान स्वतंत्रता सेनानी व समाजिक कार्यकर्ता मौलाना मजहरुल हक से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में जानना दिलचस्प रहेगा.

तो आइये आज़ादी के इस गुमनाम वीर सिपाही की जिंदगी से रूबरू होते हैं…

पढ़ाई के दौरान ही सामाजिक कार्यों में रही दिलचस्पी

मौलाना मजहरुल हक 22 दिसंबर 1866 को बिहार के पटना जिले में पैदा हुए. इनके पिता शेख़ अहमदुल्लाह एक अमीर इंसान थे. पिता ज़मींदारी की वजह से कई जमीन व जायदाद के मालिक थे. धनी परिवार में जन्मे मजहरुल को बचपन में हर वो ख़ुशी अता हुई जो उनकी ख्वाहिशों की फ़ेहरिस्त हुआ करती थी.

मौलवी सज्जाद हुसैन ने उनके घर पर ही उन्हें प्राथमिक शिक्षा दी. आगे उन्होंने 1886 में पटना कॉलेज से मैट्रिक की तालीम पूरी की. इस दौरान वो सामाजिक कार्यों में रूचि लेने लगे थे.

मजहरुल ने आगे की पढ़ाई के लिए लखनऊ के कैनिंग कॉलेज में दाखिला ले लिया. परन्तु वकालत की पढ़ाई के लिए उन्होंने बीच में ही पढ़ाई छोड़ इंग्लैंड चले गए.

उसी दौरान महात्मा गाँधी भी इंग्लैंड में कानून की पढ़ाई कर रहे थे. यहीं इनकी मुलाकात गाँधी जी से हुई थी. वे दोनों आपस में कई सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर बातचीत किया करते थे.

साल 1891 में इंग्लैंड से वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद वापस पटना चले आये. यहां उन्होंने कानूनी अभ्यास शुरू कर दिया. उस दौरान वो अपने मालिकाना हक से कई सामाजिक कार्यों को अंजाम देने लगे.

साल 1897 में जब बिहार अकाल की त्रासदी से कराह रहा था. वहां के लोग गरीबी के कारण भुखमरी का शिकार होने लगे थे. ऐसी स्थिति में मौलाना मजहरुल हक ने राहत कार्यों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया.   

Maulana Mazharul Haque 

कई स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलनों का हिस्सा बने 

सामाजिक कार्यों के साथ ही मौलाना राजनीतिक व क्रांतिकारी गतिविधियों में भी रूचि लेने लगे. बिहार में जब प्रथम राजनैतिक सम्मेलन हुआ तो ये उसके प्रमुख नेता रहे. उन्होंने इस सम्मेलन के द्वारा बिहार को एक अलग प्रांत बनाने की मांग की. इसी के साथ बिहार की तालीम व्यवस्था की बेहतरी के लिए प्रबल जोर दिया.

आगे मौलाना कांग्रेस पार्टी के सक्रिय सदस्यों में एक रहे. उन्होंने बिहार में कांग्रेस पार्टी के लिए तन मन धन से काम किया. इसके लिए उन्हें 1906 में बिहार कांग्रेस कमेटी का उपाध्यक्ष चुना गया.

मौलाना मजहरुल हक ने बिहार में होमरुल आंदोलन में अहम किरदार निभाया. 1916 में इनके महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए मौलाना को सदर (अध्यक्ष) नियुक्त कर दिया गया. यह वही दौर था जब स्वतंत्रता संग्राम के कई आंदोलन गर्म जोशी के साथ देश के कोने कोने में ब्रिटिशों के दांत खट्टे कर रहे थे.

इसी दौरान चंपारण सत्याग्रह भी अपने परवान पर था. इस आंदोलन में डा0 राजेन्द्र प्रसाद के साथ मौलाना ने भी जोश व खरोश के साथ हिस्सा लिया. इसके लिए उन्हें 3 महीने कारावास की सजा भी सुनाई गई थी.  

देशहित के लिए दान दी कई बीघा जमीन

मौलाना मजहरुल हक आज़ादी की क्रान्ति में लगातार सक्रिय भूमिका निभा रहे थे. उस दौरान देश के कई महान स्वतंत्रता सेनानियों से इनकी लगातार मुलाकात होती रही. इसकी वजह से मौलाना देश को आज़ाद कराने के लिए अपना सब कुछ त्याग करने को तैयार थे.

आगे जब महात्मा गाँधी के द्वारा खिलाफत व असहयोग आंदोलन शुरू किया गया. तो मौलाना मजहरुल हक ने अपनी वकालत व मेम्बर ऑफ इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल का पद त्याग कर पूरी तरह स्वतंत्रता संग्राम में कूद गए.

आंदोलन को सुचारू रूप से चलाने के लिए 1920 में उन्होंने अपनी 16 बीघा जमीन दान कर दी. जहां स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई क्रांतिकारी सिपाहियों द्वारा देश की आज़ादी के लिए रणनीतियां तैयार की जाती थीं. जिनमें महात्मा गाँधी, डा0 राजेंद्र प्रसाद, सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम, सरोजनी व नरीमन जैसे महान सेनानियों का नाम शामिल है.

इसी स्थान पर सदाकत आश्रम व शिक्षा के लिए विद्यापीठ कॉलेज की स्थापना हुई. उसी आश्रम से मौलाना ने 1921 में ‘द मदरलैंड’ नामक साप्ताहिक पत्रिका की भी शुरुआत की.

इस पत्रिका के माध्यम से मौलाना ने अपनी लेखनी के द्वारा आज़ादी का बिगुल फूंका. उन्होंने असहयोग आंदोलन के विचारों को लोगों तक पहुँचाया. आज यह स्थान बिहार कांग्रेस कमेटी का मुख्यालय बना हुआ है.

Mahatma Gandhi 

शिक्षा के साथ हिन्दू-मुस्लिम एकता पर भी दिया जोर

मौलाना मजहरुल हक कई आन्दोलनों के साथ-साथ शिक्षा स्तर को बेहतर बनाने, हिन्दू-मुस्लिम एकता पर जोर देने व महिलाओं के अधिकार के लिए कई सामाजिक कार्यों से लोगों में चेतना जगाई.

जब महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ मुहिम को सशक्त बनाने के लिए महिलाओं को मुख्य धारा में लाने की मांग की तो मौलाना ने उनका समर्थन किया.

उन्होंने पारंपरिक मुस्लिम महिला पोशाक को स्वतंत्र रूप से अपनाने का पैगाम दिया. सामाजिक कार्यों में महिलाओं की भागीदारी के लिए लोगों में चेतना जगाई. इसके लिए उन्हें ‘देश भूषण फ़क़ीर’ के ख़िताब से नवाजा गया.

इसी के साथ ही मौलाना हमेशा से ही गंगा जमुनी तहजीब का समर्थन किया करते थे. उनका कहना था कि “हम हिन्दू हो या मुसलमान, हम एक ही नाव पर सवार हैं. हम उठेगे तो साथ और डूबेंगे भी साथ”.

उन्होंने लंदन में अंजुमन इस्लामिया नामक संगठन की भी स्थापना की थी. इसके माध्यम से उन्होंने विभिन्न धर्म, संप्रदाय व जाति के लोगों को देश हित के लिए एक साथ खड़ा किया.

साल 1926 में मौलाना ने एक ऐसे मदरसे व स्कूल की स्थापना की, जिसमें हिन्दू व मुसलमान के बच्चे एक साथ तालीम हासिल कर सकें. उन्होंने हमेशा से सांप्रदायिक सद्भाव का प्रचार प्रसार किया.

मौलाना मजहरुल अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में मोती लाल नेहरु व मदन मोहन मालवीय जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ अपने घर ‘आशियाना’ में देश की आज़ादी के लिए विचार विमर्श करते रहे.

साल 1930 में सामाजिक व आज़ादी का यह सिपाही इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया. इनकी मौत के बाद इनको न जाने कितनी नम आँखों के बीच सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया. आज इनके नाम से भारत सरकार द्वारा सड़कों के नाम व विश्वविद्यालय की स्थापना की गई.

Maulana Mazharul Haque Arabic And Persian University 

तो ये थी भारत के महान आज़ादी के नायक व सामाजिक कार्यकर्ता  मौलाना मजहरुल हक से जुड़ी कुछ रोचक व दिलचस्प किस्से, जिन्होंने देश हित के लिए तन मन व धन से अपना जीवन कुर्बान कर दिया.

आज भी इनके द्वारा किया गया कार्य व इनका व्यक्तित्व हमारे लिए प्रेरणास्रोत है