The Life of Hazrat Imam Muhammad Al-Jawad (Taqi) a.s

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जंग_ए_आज़ादी का वो दौर जब 30 हज़ार उलेमाओं को तोप से उड़ा दिया गया

जंग_ए_आज़ादी का वो दौर जब 30 हज़ार उलेमाओं को तोप से उड़ा दिया गया

जंग ए आज़ादी का वो दौर जब 30 हज़ार उलेमाओं को तोप से उड़ा कर शहीद कर दिया गया। सिराजुद्दोला और टीपू सुल्तान की शहादत के बाद अँगरेज़ विरोधी आन्दोलन जनता में भड़कने लगा। जिसकी शुरुआत शाह वलीउल्लाह देहलवी के अंग्रेज़ विरोधी विचारों से होती है लेकिन इस आन्दोलन की औपचारिक शुरुआत उस समय होती है जब शाह वलीउल्लाह देहलवी रह० के बेटे शाह अब्दुल अज़ीज़ देहलवी ने सन 1803 में अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद का फ़तवा जारी कर जेहाद फ़र्ज़ कर दिया।

इस फतवे का व्यापक असर हुआ और अवाम के भीतर अंग्रेज़ों विरोधी भावना और भी ज़्यादा भड़क गई।
फ़तवा देने के कुछ साल बाद शाह अब्दुल अज़ीज़ देहलवी ने अपने शागिर्द सय्यद अहमद रायबरेलवी को मराठा यशवंत राव होलकर के मुंह बोले भाई राजपुताना के आमिर खान की सेना में भेज दिया क्यूंकि उस समय मराठा यशवंत राव होलकर और आमिर खान दोनों संयुक्त रूप से अंग्रेज़ों से लोहा लेने का इरादा रखते थे।

लेकिन बाद में इन्होंने अंग्रेजों से सन्धि कर ली तो सैय्यद अहमद ने मराठा सेना छोड़ तहरीके मुजाहिदीन आंदोलन शुरू कर दिया। आंदोलन कई सालों तक चला आख़िरक 1831 में सय्यद अहमद रायबरेलवी और शाह इस्माइल की हार हुई और उन्हें शहीद कर दिया गया। 
सय्यद अहमद रायबरेलवी ने ग्वालियर के राजा हिन्दू राव को लिखे गए अपने ख़त में अंग्रेज़ों के विरोध को खुलकर लिखा है और इस बात का इज़हार किया है की उनकी लड़ाई मुख्यतः अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने की लड़ाई है।

आंदोलन वक़्त के साथ बढ़ता गया और साल 1857 आ गया। लेकिन आंदोलन बढ़ता ही गया फिर अल्लामा फ़ज़ल-ए-हक़ ख़ैराबादी(गीतकार जावेद अख्तर के परदादा) ने दिल्ली की जामा मस्जिद से अंग्रेजों के ख़िलाफ़ फिर से जेहाद का फ़तवा दिया। इस फ़तवे के बाद आपने बहादुर शाह ज़फर के साथ मिलकर अंग्रेजों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला और अज़ीम जंग-ए-आज़ादी लड़ी।

अंग्रेज इतिहासकार लिखते हैं कि इसके बाद अंग्रेजों ने दिल्ली में क़तल ए आम शुरू कर दिया। और 30 हज़ारों उलेमाओं को शहीद कर दिया गया कुछ को फांसी के तख़्ते पर चढ़ा दिया गया। हज़ारो उलेमाओं को तोप से उड़ा कर शहीद कर दिया गया। और बहुतों को काले पानी की सज़ा दे दी गई। सर सैयद अहमद खां का खानदान शहीद हो गया उनकी माँ को जान बचाने के लिए हफ़्तों अस्तबल में छिपे रहना पड़ा।

30 हज़ार तो सिर्फ मोहद्दिस और उलेमा थे इनके साथ ना जाने कितने लाखों आम मुसलमानों को शहीद कर दिया गया।

1857 के जिहादे हुर्रियत के नाकाम होने के बाद का वक़्त हिन्द के मुसलमानों की तारीख का बदतरीन दौर था लाखों उलेमा व अवाम फांसी के फंदे पर लटकाये गए, अकेले दिल्ली में 27 हज़ार मुसलमानों का क़त्ल ब्रिटिश (भारतीय) आर्मी ने किया था, शामली के मैदान के अज़ीम मुजाहिद मौलाना क़सिम नानौतवी रह0 अपने दीगर साथियों के साथ अंडर ग्राउंड हो चुके थे तकरीबन एक साल बाद ब्रिटिश सरकार के आम माफी के ऐलान के बाद मौलाना अपने साथियों समेत बाहर आये, तब तक इन्क़लाब आ चुका था, ईसाई मिशनरियां अपने बोर्डिंग स्कूल क़ायम कर चुकी थीं जिनमें उन्हीं मुजाहिदीन के बच्चों को दाखिले दिलाये जा रहे थे जिन्होंने अंग्रेजों से लड़ते हुए अपनी जाने कुरबान की थी, ईसाई मिशनरियां हमारे बच्चों को मुफ्त तालीम, कपड़े और खाना देकर उन्हें मुर्तद करती जा रही थीं, इन मिशनरियों को पूरी ईसाई दुनिया से फंड भेजे जा रहे थे।

दूसरी तरफ वेटिकन पोप की तरफ से ईसाई राहिब भेजे जा रहे थे जो यहां कच्चे पक्के आलिमो से मुनाज़रे करके उन्हें हराते जा रहे थे क्योंकि पाये के उलेमा या तो शहीद हो चुके थे या मंज़रेआम पर आने से बच रहे थे वैसे भी उस वक़्त ईंजील के जानकार उलेमा कम ही थे, एक पाथ फाइंडर नाम का ईसाई राहिब कलकत्ता पोर्ट से होता हुआ, रास्ते में मुनाज़रे जीतता हुआ दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर आकर बैठ गया और ऐलान कर दिया कि हिन्दुस्तान में जो कोई मुझे मुनाज़रे में हरा सके सामने आए।

इन तशवीशनाक हालात में अल्लाह तआला ने दो अज़ीम शख्सियत से अपने दीन की खिदमात ली, मौलाना क़ासिम नानौतवी और उनके साथियों ने 1866 मे देवबंद में अनार के दरख्त के नीचे एक मदरसे की शुरुआत की जो बाद में जाकर दारुल उलूम देवबंद बन गया, मौलाना ने मिल्लत के नौनिहालों को दावत दी कि आइये हम आपको मुफ्त तालीम देंगे, मुफ्त कपड़े देंगे, मुफ्त खाना देंगे और रहने का इंतज़ाम भी मुफ्त करेंगे, मिशनरियों के कारिंदों ने मौलाना का मज़ाक उड़ाया कि तुम भूखे नंगे लोग इन बच्चों को क्या क्या मुफ्त में दोगे, तुम्हारे पास खुद के खाने के लिए पैसे नहीं इनको कैसे खिलाओगे..?

मौलाना ने कहा कि हम अपनी क़ौम के पास जायेंगे, उनसे चंदा लेंगे इमदाद ज़कात लेंगे लेकिन इन बच्चों को चने की दाल खिलाकर भी मुफ्त तालीम देंगे.. इन्शाल्लाह, इस तरह मौलाना क़ासिम नानौतवी रह0 ने नामुमकिन लगने वाले मिशन को मुमकिन कर दिखाया और क़ौम ने भी उलेमाए दीन का भरपूर साथ दिया.. माशाल्लाह

दूसरी तरफ कैराने की अज़ीम शख्सियत मौलाना रहमतुल्ला कैरानवी मैदान में आये जो इंजील के भी इतने माहिर आलिम थे कि पाथ फाइंडर जैसा मशहूर ईसाई राहिब मौलाना के सामने मुनाज़रे में ढेर हो गया और फौरन ही हिन्दुस्तान छोड़ कर तुर्की भाग गया, मौलाना को खबर मिली कि पाथ फाइंडर अब तुर्की में मुसलमानों को ललकार रहा है तो मौलाना तुर्की के लिए रवाना हो गए, पाथ फाइंडर मौलाना के आने की खबर सुनकर तुर्की से भी भाग लिया, बहरहाल मौलाना रहमतुल्ला कैरानवी ने ईसाइयत के रद्द में बड़ी मशहूर किताब लिखी है जिसका नाम इज़हारुल हक़ है, मौलाना की खिदमात से मुतास्सिर होकर तुर्की खलीफा ने हरम शरीफ के पास एक मदरसा क़ायम करने की पेशकश की जिसका नाम मदरसा सौलतिया है, एक ज़माने तक यह मदरसा वहीं क़ायम रहा, अब से कुछ साल पहले ही हरम शरीफ की तौसीअ की वजह से उसको हटाकर दूसरी जगह बनाया गया है…

कुफ़्र और दीन

हमें किसी को काफ़िर नहीं कहना चाहिए… क्या मालूम ख़ुदा की नज़र में वही मोमिन हो, वो ख़ुदा को बहुत अज़ीज़ हो…  इसी से मुताल्लिक़ एक वाक़िया पेश कर रहे हैं… 

हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) एक दिन जंगल जा रहे थे. वहां उन्होंने एक चरवाहे की आवाज़ सुनी, जो बुलंद आवाज़ से कह रहा था- ऐ मेरे जान से प्यारे ख़ुदा ! तू कहां है? मेरे पास आ, मैं तेरे सिर में कंघी करूं, तेरा लिबास मैला हो गया है, तो धोऊं, तेरे मोज़े फट गए हों, तो वह भी सीऊं, तुझे ताज़ा-ताज़ा दूध पिलाऊं, तू बीमार हो जाए, तो तेरी तीमारदारी करूं, अगर मुझे मालूम हो कि तेरा घर कहां है, तो तेरे लिए रोज़ घी और दूध लाया करूं, मेरी सब बकरियां तुम पर क़ुर्बान ! अब तो आ जा.

हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) उसके क़रीब गए और कहने लगे- अरे अहमक़ ! तू ये बातें किससे कर रहा है?
चरवाहे ने जवाब दिया- उससे कर रहा हूं, जिसने तुझे और मुझे पैदा किया और ये ज़मीन आसमान बनाए.
ये सुन हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने ग़ज़बनाक होकर कहा- अरे बद बख़्त ! तू इस बेहूदा बकवास से कहीं का ना रहा. बजाय मोमिन के तू तो काफ़िर हो गया. ख़बरदार ! ऐसी बेमानी और फ़िज़ूल बकवास बंद कर. तेरे इस कुफ़्र की बदबू सारी दुनिया में फैल गई. अरे बेवक़ूफ़ ! ये दूध लस्सी हम मख़लूक़ के लिए है, कपड़ों के मोहताज हम हैं, हक़ तआला इन हाजतों से बेनयाज़ है. ना वो बीमार पड़ता है, ना उसे तीमारदारी की ज़रूरत है, ना उसका कोई रिश्तेदार है. तौबा कर और उससे डर.
हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के ग़ैज़-ओ-ग़ज़ब में भरे हुए ये अल्फ़ाज़ सुनकर चरवाहे के औसान ख़ता हो गए और वो ख़ौफ़ से थर-थर कांपने लगा. चेहरा ज़र्द पड़ गया. वह  बोला- ऐ ख़ुदा के जलील-उल-क़द्र नबी ! तूने ऐसी बात कही कि मेरा मुंह हमेशा के लिए बंद हो गया और मारे नेदामत के मेरी जान हलाक़त में पड़ गई.
ये कहते ही चरवाहे ने सर्द आह खींची अपना गिरेबान तार-तार किया और दीवानों की तरह अपने सर पर ख़ाक उड़ाता हुआ ग़ायब हो गया.
हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) हक़ तआला से हमकलाम होने के लिए कोहे-तूर पर गए, तो ख़ुदा ने फ़रमाया- ऐ मूसा ! तूने मेरे बंदे को हमसे जुदा क्यों किया? तू दुनिया में जुदाई के लिए आया है या मिलाप के लिए? ख़बरदार ! इस काम में एहतियात रख. मैंने अपनी मख़लूक़ में हर शख़्स की फ़ितरत अलग बनाई है  और हर फ़र्द को दूसरों से जुदा अक़ल बख़्शी है. जो बात एक के हक़ में अच्छी है, वो दूसरे के लिए बुरी है. जो एक के हक़ में तिरयाक़ का असर रखती है, वही दूसरे के लिए ज़हर है. एक के हक़ में नूर और दूसरे के हक़ में नार, हमारी ज़ात पाकी और नापाकी से मुबर्रा है. ऐ मूसा ! ये मख़लूक़ मैंने इसलिए पैदा नहीं फ़रमाई कि उससे मेरी ज़ात को कोई फ़ायदा पहुंचे, उसे पैदा करने का मक़सद ये है कि उस पर मैं अपने कमालात की बारिश करूं. जो शख़्स जिस ज़बान में भी मेरी हम्द-ओ-सना करता है, उससे मेरी ज़ात में कोई कमीबेशी वाक़े नहीं होती, ज़िक्र करने वाला ख़ुद ही पाक साफ़ होता है. मैं किसी के क़ौल और ज़ाहिर पर निगाह नहीं रखता, मैं तो बातिन और हाल देखता हूं. ऐ मूसा ! ख़िर्द-मंदों के आदाब और हैं, दिलजलों और जान हारों के आदाब और हैं.

हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने जब ख़ुदा का ये इताब आमेज़ ख़िताब सुना, तो सख़्त पशेमान हुए और बारगाहे-इलाही में निहायत नेदामत और शर्मसारी से मुआफ़ी मांगी. फिर उसी इज़्तिराब और बेचैनी में उस चरवाहे को ढ़ूढने जंगल में गए.
सहरा-ओ-बियाबान की ख़ाक छान मारी, लेकिन चरवाहे का कहीं पता ना चला. इस क़द्र चले कि पैरों में छाले पड़ गए, लेकिन तलाश जारी रखी. आख़िर आप उसे पा लेने में कामयाब हुए. चरवाहे ने उन्हें देखकर कहा- ऐ मूसा ! अब मुझसे क्या ख़ता हुई है कि यहां भी आ पहुंचे?

हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने जवाब दिया- ऐ चरवाहे ! मैं तुझे मुबारक देने आया हूं. तुझे हक़ तआला ने अपना बंदा फ़रमाया और इजाज़त अता की कि जो तेरे जी में आए बिला-तक़ल्लुफ़ कहा कर.  तुझे किसी अदब-ओ-आदाब क़ायदे-ज़ाबते की ज़रूरत नहीं, तेरा कुफ़्र असल दीन है, और दीन नूर-ए-जां. तुझे सब कुछ माफ़ है, बल्कि तेरे सदक़े में तमाम दुनिया की हिफ़ाज़त होती है.
चरवाहे ने आंखों में आंसू भरकर कहा- ऐ पैग़ंबर-ए-ख़ुदा ! अब मैं इन बातों के क़ाबिल ही कहां रहा हूं कि कुछ कहूं. मेरे दिल का ख़ून हो चुका है, अब मेरी मंज़िल बहुत आगे है, तूने ऐसी ज़र्ब लगाई कि हज़ारों लाखों साल की राह तय कर चुका हूं. मेरा हाल बयान के क़ाबिल नहीं और ये जो कुछ मैं कह रहा हूं इसे भी मेरा अहवाल मत जान.

मौलाना रूमी इस हिकायत से हासिल ये निकालते हैं कि “ऐ शख़्स ! जो तू हक़ तआला की हमद-ओ-सना बयान करता है, क्या समझता है? तू तो इब्तिदा से इंतिहा तक नाक़िस और तेरा हाल-ओ-क़ाल भी नाक़िस, ये महज़ उस परवरदिगार रहमान-ओ-करीम का करम है कि वो तेरे नाक़िस और हक़ीर तोहफ़े को क़बूल फ़रमाता है.

THE HISTORY OF ISLAM IN RUSSIA

 

Official history not only does not disclose for the masses the origin of Rus and the Slavs, but also for a long time tried to hide the influence of other faiths on the formation of the culture of our country. We bring to the attention of readers the material testifying to the acceptance and existence of Islam in Russia.
Islam, first adopted on the territory of our country originally by the inhabitants of Dagestan, probably soon after this spread to the Bulgarian cities. Islam penetrates into the territory of the central regions of the future Russia and through the liberated Volga Bulgaria.
Thus, Ibn Fadlan, who came to introduce Islam to the Bulgars, was forced to note the presence of mosques and schools there as early as the beginning of the tenth century (note that at that time the territory of the future Muscovy was, in all probability, still part of the Bulgarian state). 
There are also grounds to assume that as early as the pre-Mongol period, a certain part of the population of Russian principalities became attached to Islam. This is evidenced by the presence in the orthodox terminology of not only Bulgarian but also Arabic terms.
Church or mosque?
The existence of terms other than Tatar and Arabic, to indicate the attributes of the Islamic faith, also indirectly indicates that. A well-known mention of V.N. Tatischev that the Bulgars built temples in the Vladimir-Suzdal land can be interpreted in this context in a different way: but did they build churches?
The architectural features of some churches of the pre-Mongol period (Church of the Intercession on the Nerl, for example) are very different from Christian standards, even Orthodox ones. Famous “poppy” domes have analogies in the architecture of the Arab world and do not have – in Christian.
At the same time, we note that in some cities there are temples built following the Greek (from plinth and with conical roofs) and Bulgarian (white stone, weak foundation, “makovki”, ornament) samples. The presence of Islamic rituals is evidenced by discovery of some graves committed on Muslim patterns.
Propagation of Islam
Certain successes, apparently, Islamic missionary work has reached among the Finno-Ugric peoples. Traces of the former Muslim rituals were prominently revealed in them at the end of the nineteenth century (Marjani Sh., 1993), and at the beginning of the 20th century there was a mass return (or legalization?) of Finno-Ugrians to Islam.
The most significant stage of Islamization, apparently, occurred during the Golden Horde, the leadership of which recognized Islam soon after the capture of the Khorezm and Bulgarian territories – during the reign of Berke.
Russian supporters of Islam lived in the very ancient cities themselves. So, for example, in describing the rebellion in Yaroslavl (1262), it was noted that an active follower of Islam, the former monk Izosima, “was killed by the mob, who will be rejected from the Christian faith and be a Beserman of evil and welcome from the Tsar ambassador Titjak …” (Tatischev V.N. “The History of the Russia.” Moscow: AN SSSR, vol.5, p.44.).
Prominent Soviet historian A.N. Nassonov pointed out that the uprising in the 60s of the 13th century in Russian cities was directed against the Beserman-Basqaq who collected taxes. He also notes the presence of Russians in the Basqaq detachments (A.N. Nassonov “Mongols and Rus.” Moscow: AN SSSR, 1940. p. 17, 53).
Marriage
In this regard, the question becomes natural: following what rites were marriages in Islamic Sarai concluded between the Horde princesses and numerous Russian prince-pretenders? At the same time, we know from the chronicles that these princesses received Christian names later in Russia (we even admit that, possibly in absentia and posthumously).
So, Uzbek, in whose reign Islamic culture flourished in Eastern Europe, in 1317 married his daughter (niece) Konchak to Yury Danilovich Moskovsky. Later, in baptism, she was named Agafia.
It seems to us quite natural that the son-in-law of a Muslim khan should have been Muslim. In this respect, pictures of Moscow princes with their braids, robes and khansky hats, coins minted in Arabic are noteworthy. Among the founders of their dynasty Moscow princes pointed Tatar princes. There is an obvious orientation towards the eastern cultural world (Izmailov I. Rodina, 1997 №2, p.89).
This is evidenced by the well-known fact that the Moscow boyars blinded their suzerain – the Grand Duke Vasily the Dark, imputing to him the excessive preference for Tatar customs and language. Boyars looked no less Asian in European miniatures. Muscovites look in Tatar-style – in the white felt hats and robes in the works of S. Gerberstein and M. Lytvyn.
These and other facts indicate that Moscow was much oriented in cultural issues toward the Eastern world until the middle of the sixteenth century. The orientation of the Russian nobility to Eastern and Turkic culture, in itself, does not mean the automatic acceptance of Muslim dogmas (especially since a large part of the Tatars who came to Muscovy professed Christianity.) In particular, many “ancient Russian” monasteries of the 13th-15th centuries were founded by Tatars). 
The Muslim Nobility
However, this situation did not prevent, as in later times, the spread of Islam in Russian Zalessye. We have reason to believe that a significant part of Rus’s elite, Red and White, adhered to Islam during the Golden Horde period.
Thus, the famous traveler of the XIV century Athanasius Nikitin used to point out in his work his Muslim name – Khoja Yusuf Khorasani (by the way, tverichi he called “the Russian heads”, and not the Muscovites) (Nikitin “Journey Beyond Three Seas” M.: Soviet Russia, 1980. p. 57). And one of the Russian chroniclers Nestor (who wrote, in particular, the story of the fall of Constantinople) indicated at once two of his names: Nestor and Iskander.
However, even in later times – in the XVI-XVII centuries. – in the list of clerks and military ranks of Muscovy, a significant part of names – were derived from Muslim names, and on the contrary, according to research by Nosovskiy and A. Fomenko, in the lists of Muscovites they found only one Christian name. We believe that the investigated scribe books reflected information about the privileged urban strata.
At the same time, the taxable population was better restrained by Christianity. Probably that is   why Christianization of the Ughro-Finns (then constituted the majority of the population of Russia Zalessye) and the Slavs in the Golden Horde period not only reduced, but also magnified under the domination of Jochids (Vernadsky G.V. “The Mongols and Russia.” Tver. 2000. pp.137.385).
Probably, during this period there was an opposition of the Islamic nobility and the Christian lower class of Muscovy. Apparently, at this time, the contemptuous attitude towards the “black people” was expressed in the form of the term “Christian”, preserved by the Russians to this day.
S. Gerberstein, for example, in the middle of the XVI century already, as an old custom, notes that noble persons and soldiers “in a sign of contempt” used to call the villagers “Christians.” (Heberstein S. Notes on Moscow Affairs, St. Petersburg: 1908. p.85). In Russian documents, this attitude was first manifested in 1391 (Vernadsky, G.V., Ibid.).
Transformation of Orthodoxy
Apparently, Islam had a definite influence on the ritual of the Orthodox Church, as well. Attendants of Constantinople Church (e.g., Maximilian, messenger of Constantinople patriarch), coming to Moscovia, noted that the local service does not comply with the tenets of the Greek and Latin churches, and called the Tzar – schismatic (i.e. heretic) (Gerbershtein C. S., op.. .65).
M.G. Khudyakov in his famous monograph cites the remark of Maxim the Greek about the strong adherence of the Muscovites to the eastern fashion, that, in his opinion, they will soon put on a turban. Indeed, Western contemporaries repeatedly noted such features of the Muscovites, who probably took over the remnants of the Muslim customs, such as the mass refusal of alcohol, and the prosecution of its use and distribution.
In this respect, it is significant that Catholics did not consider the Slavic Orthodox Church as a Christian church and directed the crusades of their orders against it. Western contemporaries testify that in Muscovy “holy Catholics are persecuted with stronger hatred than the Mohammedans themselves”.
G.V. Vernadsky also noted the change in church singing during the Golden Horde period (Vernadsky G.V. ukaz.soch, ibid.).
Russian Muslims
Many contemporaries note a large number of Tatars in medieval Moscow. They formed a significant part of the Moscow and Moscow suburbs of Turkic toponymy. Probably, for some of them, mosques were needed to observe the rites of Islam. In any case, similar precedents were in Muscovy: mosques in Kasimov, Romanov etc…
The largest number of Russian Muslims, of course, should eventually flock to the Kazan Khanate. Thus, in one of the unrecognized sources of “Jagfar Tarihi” it is noted that up to 30,000 “Kara Muslims” lived in Kazan, i.е. “Western Muslims.”
In a sense, this figure is confirmed by information from “Kazan chronicler” (incidentally, he himself, coming from Moscow nobility, converted to Islam and had a successful career in Kazan), who pointed out that Ivan IV’s troops in Kazan freed about 100 000 people from slavery. Given the fact that slavery in Kazan was not even in the form as in Moscow, it can be assumed that most of them lived in the Kazan land freely.
A huge number of captives simply could not be kept in a relatively small (at that time) state without changing the demographic picture substantially. Therefore, the captives, in the main, were deported to the south, leaving, as a rule, in Kazan only those who accepted Islam. Thus, the figure of 100,000 people – family members approximately corresponds to 30,000 masters of Kara Muslims (Western Muslims).
Noteworthy is the fact that, having a real choice, Russia and the Slavs took Islam consciously. On the territory of modern Russia, as is known, Islam was not enforced by force (Fuchs, K. 1996). 
Perhaps, therefore, the author of Kazan history noted that many of them preferred to stay in Kazan and practice Islam even in the conditions of the soon-apparent destruction of the city in the middle of the 16th century. Moreover, the captured Russian (as far as this term is applicable in this case) Muslims refused to report themselves and return to Muscovy (Khudyakov MG 1992).
This fact, along with the presence of significant Tatar units, commanders and the Kazan Khan in the Moscow army, allows us to unequivocally deny the previously imposed and entrenched thesis about the ethnic nature of the contradictions between Moscow and Kazan. The main conclusion that can be drawn from the above material is the conclusion about the indisputable past presence of the Muslim religion in the Proto-Russian and Russian states, as well as the very significant influence that Islam had on the emerging culture of the Russian people and the Orthodox Church

HOW NEEDS OF MILLIONS OF POOR PEOPLE WERE SATISFIED THROUGH GREAT SUFIS IN INDIA

Sufis helping poor

In India the needs of thousands of men used to be satisfied through the Sufi saints; in countless homes the hearths were lighted because of their benevolence; a vast number of people lived in their Khanqahs (spiritual seminaries) as permanent guests enjoying all the reasonable comforts of life. At the dinner-spreads of the Sufi ascetics no distinction was observed between the rich and the poor, the friend and the foe, and the kindred and the stranger.

The dinner-spread of Khwaja Nizamuddin Aulia was proverbial both for its extensiveness and sumptuousness of the meals served on it.

At the Khanqah of Sheikh Saifuddin Sirhindi, a Mujaddidiya divine of the 17th century, 1400 persons used to dine every day and every one of them was served with food of his own choice.1

Another Chishti saint of the late 17th and early 18th century, Syed Mohammad Saeed alias Shah Bheek, it is reported by his biographer that, apart from the 5,000 votaries who lived permanently in his Khanqah, an equal number from among the daily visitors also joined in at the meals with the result that about 10000 persons dined with him regularly.

Once Roshanuddaula, who was a Seh-Hazari (meaning a Mansabdar commanding 3,000 soldiers) feudal lord of the Court of Emperor Farrukh Siyar of Delhi, presented Shah Bheek Rs. 70,000/- for the construction of the Khanqah. Shah advised him to leave the money and go and have little rest and construction work would commence in the afternoon. After Roshanuddaula had retired Shah Bheek sent the entire money to widows and other needy and indigent people of Ambala, Thanesar, Sirhind and Panipat through the ascetics of the Khanqah. When Roshanuddaula returned in the afternoon, Shah Saheb said to him:

“You could never have earned so much Divine reward by the construction of the Khanqah as you have by serving so many poor, helpless persons and hermits. What would an humble ascetic like me do with a palatial building ?”

On another occasion, Emperor Farrukh Siyar, Roshanuddaula and Nawab Abdullah Khan sent him promissory notes worth Rs. 3,00,000 along with their petitions. The divine had all the money distributed in the neighbouring towns and among indigent families of good birth.2

As Maulana Manazir Ahsan Gilani had very appropriately observed:

“The Khanqahs of the Sufi saints served as the connecting link between the rich and the poor. Even reigning monarchs paid tribute to the courts of these august men. Take the case of Sultan-ul-Mashaikh. It has been shown how Khizir Khan, the heir- apparent to the throne of Delhi, was his bondman (meaning a devoted disciple). Sultan Alauddin Khilji used to collect the tribute from all parts of the country, but there was one treasury in which he also had to deposit the submission money………………………………..The Khanqahs were the channels through which the share of the poor and the needy used to reach them throughout the land This is what was implied by the well-known saying that ‘the property of the Sufi is at everybody’s disposal.’ ”

“This confluence of poverty and riches, i.e. the holy Order of the Sufis to which the rich and the poor alike paid homage was the agency by means of which the needs of innumerable destitute Muslim families were satisfied. Indeed, there was no phase in the whole era of Muslim supremacy in India, and no province, in the entire sub-continent, in which the Prophet’s command that ‘it should be taken from those among them that are rich and given to those among them that are poor’ was not dutifully carried into practice by the Sufi saints, especially by those among them who, by some extraordinary circumstance, had come to acquire influence over the rich and privileged sections of the community; the fortunes of the distressed sections would then literally wake up.” 3

1. Nuzhat-ul- Khawatir, Vol. V

2. Manazir Ahsan Gilani: Nizam-i-Talim wa Tarbiyat, Vol. II, pp. 221-222

3. Manazir Ahsan Gilani: Nizam-i-Talim wa Tarbiyat, Vol. II, p. 220