Fateh Makka 20 Ramzan

 

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मक्के में अबू सुफियान बहुत बेचैन था,”आज कुछ होने वाला है”( वो बड़बड़ाया) उसकी नज़र आसमान की तरफ बार बार उठ रही थी-
उसकी बीवी”हिन्दा” जिसने हज़रत अमीर हम्ज़ा का कलेजा चबाया था उसकी परेशानी देखकर उसके पास आ गई थी,
क्या बात है? क्यूं परेशान हो?
हूं? अबू सुफियान चौंका – कुछ नहीं- तबीयत घबरा रही है मैं ज़रा घूम कर आता हूं,वो ये कहकर घर के बैरूनी दरवाज़े से बाहर निकल गया मक्के की गलियों में घूमते घूमते वो उसकी हद तक पहुंच गया, अचानक उसकी नज़र शहर से बाहर एक वसी मैदान पर पड़ी,
हज़ारों मशालें रौशन थीं, लोगों की चहल पहल उनकी रौशनी में नज़र आ रही थीं और भिनभिनाहट की आवाज़ थी जैसे सैकड़ों लोग धीमी आवाज़ में कुछ पढ़ रहे हों उसका दिल धक से रह गया था- उसने फ़ैसला किया कि वो क़रीब जाकर देखेगा कि ये कौन लोग हैं, इतना तो वो समझ ही चुका था कि मक्के के लोग तो ग़ाफीलों की नींद सो रहे हैं और ये लश्कर यक़ीनन मक्के पर चढ़ाई के लिए ही आया है
वो जानना चाहता था कि ये कौन हैं?
वो आहिस्ता आहिस्ता ओट लेता उस लश्कर के काफी क़रीब पहुंच चुका था,
कुछ लोगों को उसने पहचान लिया था,ये उसके अपने ही लोग थे जो मुसलमान हो चुके थे और मदीना हिजरत कर चुके थे,उसका दिल डूब रहा था,वो समझ गया था कि ये लश्कर मुसलमानों का है,
और यक़ीनन” मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم” अपने जां निसारों के साथ मक्का आ पहुंचे थे- वो छुप कर हालात का जायज़ा ले ही रहा था कि उक़ब से किसी ने उसकी गरदन पर तलवार रख दी,उसका ऊपर का सांस ऊपर और नीचे का नीचे रह गया था, लश्कर के पहरेदारों ने उसे पकड़ लिया था,और अब उसे बारगाहे मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم में लेजा रहे थे,उसका एक एक क़दम कई मन का हो चुका था,हर क़दम पर उसे अपने करतूत याद आ रहे थे,जंगे बद्र,उहद,खन्दक,खैबर सब उसकी आंखों के सामने नाच रही थीं,उसे याद आ रहा था कि उसने कैसे सरदाराने मक्का को इकट्ठा किया था “मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم को क़त्ल करने के लिए” कैसे नजाशी के दरबार में जाकर तक़रीर की थी कि –
ये मुसलमान हमारे गुलाम और बाग़ी हैं इनको हमें वापस दो,
कैसे उसकी बीवी हिन्दा ने अमीर हम्ज़ा को अपने ग़ुलाम हब्शी के ज़रिए शहीद करवा कर उनका सीना चाक करके उनका कलेजा निकाल कर चबाया और नाक और कान काट कर गले में हार बना कर डाले थे,और अब उसे उसी मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم के सामने पेश किया जा रहा था उसे यक़ीन था कि- उसकी रिवायात के मुताबिक़ उस जैसे “दहशतगर्द” को फौरन तहे तेग़ कर दिया जाएगा-

#इधर-
बारगाहे रहमतुल्लिल आलमीन صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم में असहाब जमा थे और सुबह के इक़दामात के बारे में मशावरत चल रही थी कि किसी ने आकर अबू सुफियान की गिरफ्तारी की खबर दे दी “अल्लाहु अकबर” खैमा में नारा ए तकबीर बलंद हुआ अबू सुफियान की गिरफ्तारी एक बहुत बड़ी खबर और कामयाबी थी,खैमे में मौजूद उमर इब्ने ख़त्ताब उठ कर खड़े हुए और तलवार को म्यान से निकाल कर इंतिहाई जोश के आलम में बोले-
उस बदबख्त को क़त्ल कर देना चाहिए शुरू से सारे फसाद की जड़ यही रहा है,
चेहरा ए मुबारक रहमतुल्लिल आलमीन صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم पर तबस्सुम नमूदार हुआ, और उनकी दिलों में उतरती हुई आवाज़ गूंजती
” बैठ जाओ उमर- उसे आने दो”
उमर इब्ने खत्ताब आंखों में गैज़ लिए हुक्मे रसूल صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم की इताअत में बैठ तो गए लेकिन उनके चेहरे की सुर्खी बता रही थी कि उनका बस चलता तो अबू सुफियान के टुकड़े टुकड़े कर डालते इतने में पहरेदारों ने बारगाहे रिसालत صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم में हाज़िर होने की इजाज़त चाही, इजाज़त मिलने पर अबू सुफियान को रहमतुल्लिल आलमीन के सामने इस हाल में पेश किया गया कि उसके हाथ उसके अमामे से उसकी पुश्त पर बंधे हुए थे, चेहरे की रंगत पीली पड़ चुकी थी,और उसकी आंखों में मौत के साए लहरा रहे थे,
लबहाए रिसालत मआब صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم को जुंबिश हुई और असहाब किराम رضی اللّٰہ تعالیٰ عنہم ने एक अजीब जुमला सुना-
इसके हाथ खोल दो,और इसको पानी पिलाओ,बैठ जाओ अबू सुफियान-!!
अबू सुफियान हारे हुए जुवारी की तरह गिरने के अंदाज़ में खैमा के फर्श पर बिछे कालीन पर बैठ गया-पानी पीकर उसको कुछ हौसला हुआ तो नज़र उठाकर खैमे में मौजूद लोगों की तरफ देखा,उमर इब्ने खत्ताब की आंखें ग़ुस्से से सुर्ख थीं, अबूबक्र इब्ने क़ुहाफा की आंखों में उसके लिए अफसोस का तास्सुर था,उस्मान बिन अफ्फान के चेहरे पर अज़ीज़दारी की हमदर्दी और अफसोस का मिला जुला तास्सुर था अली इब्न अबी तालिब का चेहरा सपाट था,इसी तरह बाक़ी तमाम असहाब के चेहरों को देखता देखता आखिर उसकी नज़र मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم के चेहरे मुबारक पर आकर ठहर गई, जहां जलालत व रहमत के खूबसूरत इम्तिज़ाज (मिलावट) के साथ कायनात की खूबसूरत तरीन मुस्कुराहट थी,
कहो अबू सुफियान? कैसे आना हुआ??
अबू सुफियान के गले में जैसे आवाज़ ही नहीं रही थी, बहुत हिम्मत करके बोला- मैं इस्लाम क़ुबूल करना चाहता हूं??
उमर इब्न खत्ताब एक बार फिर उठ खड़े हुए ” या रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ” ये शख्स मक्कारी कर रहा है,जान बचाने के लिए इस्लाम क़ुबूल करना चाहता है, मुझे इजाज़त दीजिए, मैं आज इस दुश्मने अज़ली का खात्मा कर ही दूं, उनके मुंह से कफ जारी था-
बैठ जाओ उमर- रिसालत मआब صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ने नरमी से फिर फ़रमाया: बोलो अबू सुफियान! क्या तुम वाक़ई इस्लाम क़ुबूल करना चाहते हो?
जी या रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم – मैं इस्लाम क़ुबूल करना चाहता हूं मैं समझ गया हूं कि आप और आपका दीन भी सच्चा है और आपका ख़ुदा भी सच्चा है,उसका वादा पूरा हुआ- मैं जान गया हूं कि सुबह मक्का को फतह होने से कोई नहीं बचा सकेगा-

चेहरा ए रिसालत मआब صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم पर मुस्कुराहट फैली-
ठीक है अबू सुफियान- तो मैं तुम्हें इस्लाम की दावत देता हूं और तुम्हारी दरख्वास्त क़ुबूल करता हूं जाओ तुम आज़ाद हो, सुबह हम मक्का में दाखिल होंगे इंशा अल्लाह
मैं तुम्हारे घर को जहां आज तक इस्लाम और हमारे खिलाफ साज़िशें होती रहीं,जाए अमन क़रार देता हूं,जो तुम्हारे घर में पनाह ले लेगा वो महफूज़ है,
अबू सुफियान की आंखें हैरत से फटती जा रही थीं
” और मक्का वालों से कहना- जो बैतुल्लाह में दाखिल हो गया उसको अमान है,जो अपनी किसी इबादतगाह में चला गया,उसको अमान है, यहां तक कि जो अपने घरों में बैठा रहा उसको अमान है,
जाओ अबू सुफियान! जाओ और जाकर सुबह हमारी आमद का इंतज़ार करो, और कहना मक्का वालों से कि हमारी कोई तलवार म्यान से बाहर नहीं निकल होगी,हमारा कोई तीर तरकश से बाहर नहीं होगा, हमारा कोई नेज़ा किसी की तरफ सीधा नहीं होगा जब तक कि कोई हमारे साथ लड़ना ना चाहे”
अबू सुफियान ने हैरत से मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ،की तरफ देखा और कांपते हुए होंठों से बोलना शुरू किया-
” اشھد ان لاالہٰ الا اللہ و اشھد ان محمّد عبدہُ و رسولہُ ”
सबसे पहले उमर इब्ने खत्ताब आगे बढ़े- और अबू सुफियान को गले से लगाया,”मरहबा ऐ अबू सुफियान” अब से तुम हमारे दीनी भाई हो गए,तुम्हारी जान,माल हमारे ऊपर वैसे ही हराम हो गया जैसा कि हर मुसलमान का दूसरे पर हराम है,तुमको मुबारक हो कि तुम्हारी पिछली सारी खताएं मुआफ कर दी गईं और अल्लाह तबारक व तआला तुम्हारे पिछले गुनाह मुआफ फरमाए,अबू सुफियान हैरत से खत्ताब के बेटे को देख रहा था,ये वही था कि चंद लम्हे पहले जिसकी आंखों में उसके लिए शदीद नफरत और गुस्सा था और जो उसकी जान लेना चाहता था,अब वही उसको गले से लगा कर भाई बोल रहा था?
ये कैसा दीन है?
ये कैसे लोग हैं?
सबसे गले मिलकर और रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم के हाथों पर बोसा देकर अबू सुफियान खैमे से बाहर निकल गया,
वो दहशतगर्द अबू सुफियान कि जिसके शर से मुसलमान आज तक तंग थे उन्ही के दरमियान से सलामती से गुज़रता हुआ जा रहा था, जहां से गुज़रता,उस इस्लामी लश्कर का हर फर्द,हर जंगजू,हर सिपाही जो थोड़ी देर पहले उसकी जान के दुश्मन थे अब आगे बढ़ बढ़ कर उससे मुसाहफा कर रहे थे,खुश आमदीद कह रहे थे-

#अगले_दिन:-
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मक्का शहर की हद पर जो लोग खड़े थे उनमें सबसे नुमाया अबू सुफियान था, मुसलमानों का लश्कर मक्का में दाखिल हो चुका था किसी एक तलवार, किसी एक नेज़े की अनी, किसी एक तीर की नोक पर खून का एक क़तरा भी नहीं था, लश्करे इस्लाम को हिदायत मिल चुकी थी,
किसी के घर में दाख़िल मत होना
किसी की इबादतगाह को नुक़सान मत पहुंचाना
किसी का पीछा मत करना
औरतों और बच्चों पर हाथ ना उठाना
किसी का माल ना लूटना
बिलाल हब्शी आगे आगे ऐलान करते जा रहे थे
“मक्का वालों ! रसूल ए खुदा صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم की तरफ से- आज तुम सबके लिए आम मुआफी का ऐलान है-
किसी से उसके साबिक़ा आमाल की बाज़पुर्श नहीं की जाएगी,
जो इस्लाम क़ुबूल करना चाहे वो कर सकता है
जो ना करना चाहे वो अपने साबिक़ा दीन पर रह सकता है,
सबको उनके मज़हब के मुताबिक़ इबादत की खुली इजाज़त होगी
सिर्फ मस्जिदे हराम और उसकी हुदूद के अंदर बुत परस्ती की इजाज़त नहीं होगी
किसी का ज़रीया ए मआश छीना नहीं जाएगा
किसी को उसकी ज़मीन व जायदाद से महरूम नहीं किया जाएगा
ग़ैर मुसलमानों की जान माल की हिफाज़त मुसलमान करेंगे
ऐ मक्का के लोगो-!!”
हिन्दा अपने घर के दरवाज़े पर खड़ी लश्कर इस्लाम को गुज़रते देख रही थी
उसका दिल गवाही नहीं देंगी रहा था कि “हज़रत हम्ज़ा” का क़त्ल उसको मुआफ कर दिया जाएगा,
लेकिन अबू सुफियान ने तो रात यहीं कहा था कि-
“इस्लाम क़ुबूल कर लो सब ग़ल्तियां मुआफ हो जाएंगी”
#मक्काफतहहोचुकाथा
बिना ज़ुल्मो तशद्दुद, बिना खून बहाए, बिना तीरो तलवार चलाए,
लोग जौक़ दर जौक़ उस आफाक़ी मज़हब को इख्तियार करने और अल्लाह की तौहीद और रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم की रिसालत का इक़रार करने मस्जिद हराम के सहन में जमा हो रहे थे,
और तभी मक्का वालों ने देखा-
“उस हुज़ूम में हिन्दा भी शामिल थी”
ये हुआ करता था इस्लाम- ये थी उसकी तालीमात- ये सिखाया था रहमते आलम صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ने

Fateh Makka ka bayaan

Zil Qa’ada 6 Hijri (March 628 A.D.) me Musalmano aur Quraish ke darmiyaan Sulaih Hudaibiyah hui thi, jis me ye tay hua tha ke aa’inda 10 saal tak dono ke darmiyaan koi jung nahi hogi aur ek dusre par hamla nahi kiya jaayega aur koi nuqsaan nahi pahunchaaya jaayega. Arab me se koi shakhs ya koi qabeela musalmano ya Quraish me se jis ko saath dena chaahe de sakta hai. Quraish ka koi shakhs apne wali ki ijaazat ke baghair Huzoor Mohammad sallallāhu alaihi wa sallam ke paas aaye use waapas lauta diya jaaye magar Huzoor Mohammad sallallāhu alaihi wa sallam ka koi saathi Quraish ke paas aa jaaye to use waapas lautaaya nahi jaayega. Aur aa’inda saal se musalmano ko Umraah ke liye Makka aane ki ijaazat hai magar wo sirf 3 din tak rookenge.

Is saal Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam Madeena waapas tashreef laaye.
Aur 7 Hijri (629 A.D.) me aap ne musalmano ke saath Umraah kiya aur 3 din tak Makka me rookkar Madeena waapas tashreef laaye.

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Dusre saal Sha’abaan 8 Hijri (629 A.D.) me maqaam al-Wateer par Quraish ke saathi qabeele Banu Bakr ne Musalmano ke saathi qabeele Banu Khuza’a par hamla kiya. Banu Khuza’a ke log panaah ke liye bhaagkar Ka’aba par pahunche to zaalimo ne Haram ka bhi ehtaraam na kiya aur un logo par hamla kiya. Quraish ne is me Banu Bakr ko madad ki aur Ikraama bin Abu Jahal, Safwaan bin Umayya, Suhail bin Amr is me saamil hue. Is me Banu Khuza’a ke 23 aadami qatl ho gaye. Banu Khuza’a ne bhaagkar Makka me Budail ibn Warqa ke ghar par panaah li. Amr ibn Saalim al-Khuza’i 40 aadamiyo ke saath ne Madeena aaye aur Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam ko tamaam ahwaal bataaya. Ye baat jaankar aap sallallāhu alaihi wa sallam bahot naaraaz hue.

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Aap ne ek qaasid ko Quraish ke paas ek khat lekar bheja aur muahida todne par Quraish ko 3 me se 1 raasta chunne ke liye farmaaya :
[1] Banu Bakr ke saath ta’alluq tod diya jaaye.
[2] Bataur e jurmaana maal diya jaaye.
[3] Sulaih (Muahida) ko rad kiya jaaye.

Kurta bin Abde Amr ne Quraish ka numa’inda bankar jawaab diya ki ‘Na hum maqtoolo ke khoon ka muafza denge, Na apne haleef Qabeela e Bani Bakr ki himaayat chhodenge, Haan teesri baat hume manzoor hai aur hum elaan karte hain ki Hudebiya ka muahida toot gaya.’
Lekin qaasid ke jaane ke baad kuchh Ameer e Quraish Abu Sufyaan ibn Harb ke paas gaye aur kaha ki ‘Hum ne jo jawaab bheja hai us se bahot mushkil haalaat pesh aa sakte hain. Agar ye muammla na suljha to phir Muhammad hum par hamla karenge.’
Aur Abu Sufyaan par bahot zyada dabaaw daala ki woh foran Madeena jaakar Muahida e Hudaibiyah ki tajdid kar le.

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Is ke baad Abu Sufyaan bahut hi tezi ke saath Madeena gaya aur pehle Apni beti Ummul Momineen Hazrate Umme Habeeba radiy-Allāhu ta’ala anha ke makaan par pahuncha. Magar unho ne use apne bistar par baithne se bhi mana farmaaya aur kaha ‘Yeh Rasool-Allāh sallallāhu alaihi wa sallam ka bistar hai, Aur tum mushrik aur najis ho. Isi liye maine ye ganwaara nahi kiya ki tum Rasool-Allāh sallallāhu alaihi wa sallam ke bistar par baitho.’
Phir Abu Sufyaan Hazrate Abu Bakr Siddeeq, Hazrate Umar Faarooq, Hazrate Ali, aur Sayyeda Faatima radiy-Allāhu ta’ala anhuma se mila aur sifaarish karne ke liye iltija ki. Magar in hazraat ne bhi keh diya ke ‘Hum is muamale me koi madad nahi kar sakte.’
Aakhir me Hazrate Ali ke mashware par Abu Sufyaan Masjid e Nabawi shareef me gaya aur buland aawaaz se masjid me elaan kiya ke ‘Maine Muahida e Hudaibiyah ki tajdid kar di.’ Magar musalmano me se kisi ne jawaab nahi diya.
Is ke baad Abu Sufyaan Makkah rawaana ho gaya. Jab Makkah waapas pahuncha to Ahle Quraish ne puchhaa to Abu Sufyaan ne saari dastaan bayaan kar di. Quraish ne puchha ki ‘Jab tum ne apni taraf se Muahida e Hudaibiya ki tajdid ka elaan kiya to kya Muhammad (sallallāhu alaihi wa sallam) ne is ko qubool kar liya?’ Abu Sufyaan ne kaha ‘Nahi.’ Ye sunkar Quraish ne kaha ‘Phir to bahut mushkil haalaat paida ho gaye hain. Ye na to suleh hai ki hum itminaan se baithen na yeh jung hai ki saamna kiya jaaye.’

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Madeena me Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam ne musalmano ko hathiyaar jama karne ke liye farmaaya aur bade lashkar ke saath Makka par hamla karne ki tayyaari shuru ki. Magar is baat ko makhafi rakhne ke liye Hazrate Abu Qataadah radiy-Allāhu ta’ala anhu ko Batan Izm ki taraf bheja taake Quraish ko aisa lage ke musalman waha jama hone waale hain.

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Is ke baad 6 Ramazaan 8 Hijri (629 A.D.) ko Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam 10000 musalmano ke lashkar ke saath Madeena se rawaana hue.

Jab Aap sallallāhu alaihi wa sallam maqaam e Qadeed par pahunche to paani maanga aur apni sawaari par baithkar pure lashkar ko dikhaakar Aap ne din me paani nosh farmaaya aur Sab ko Roza chhod dene ka hukm diya. Chunaanche Aap aur aap ke sahaaba ne safar aur jihaad me hone ki wajah se roza mauqoof kar diya.

Jab Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam Huzfa par pahunche to aap ke chacha Hazrate Abbaas bin Abdul Muttalib apne pariwaar ke saath milne aaye. Hazrate Abbaas Jange Badr ke baad se Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam ki marzi se Makka me rehte the.
Jab Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam pata chala ke Hazrate Abbaas ke saath aap ke chachazaad bhai Abu Sufyaan Mugheera bin Haaris aur fufizaad bhai Abdullāh bin Abi Umayya bhi hain to aap ne shuru me un dono se milne se mana farma diya. Kyun ki un dono ne elaane nabuwwat ke baad se aap ko bahot takleef di thi. Phir bahot iltija karne ke baad aap ne ijaazat ata farmai. Jab dono ne ye kaha ke ‘Yaqeenan aap ko ALLĀH ta’ala ne hum fazeelat ata farmai hai aur beshak hum khatawaar hain.’ To aap ne josh e rahmat me farmaaya ‘Tum se koi muakheza nahi, ALLĀH tumhe bakhsh de woh Arhamur raahimeen hai.’
Jab qusoor muaf ho gaya to Abu Sufyaan bin Haaris ne zamaana e jaahiliyat ke daur me apne qaseedo me aap ki buraai likhi thi us ki maazarat ki aur aap ki maddah me Ash’aar likhe.

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Makka ke 10 mile door Mar-uz-Zahran maqaam par musalmano ke lashkar ne wuqoof kiya.
Raat ko Huzur sallallāhu alaihi wa sallam ne fauz ko hukm diya ki har mujaahid apna Alag-alag chulha jalaaye. Aap ke farmaan par 10,000 mujahiddeen ne alag alag chulhe jalaaye to Mar-uz-Zahran ke pure maidaan me meelo tak aag aag nazar aane lagi.

Quraish ko jab khabar mili ke Madeena se fauj aa rahi hai to unho ne soorate haala jaanne ke liye Abu Sufyan bin Harb, Haakim bin Hijaam aur Bundel bin Warqa ko bheja.
Jab ye teeno Mar-uz-Zahran ke qareeb pahunche to dekha ki meelo tak aag hi aag jal rahi hai. Ye manzar dekhkar teeno hairaan reh gaye aur Abu Sufyaan ne kaha ki ‘Maine to zindagi me kabhi itni door tak phaili hui aag is maidaan me jalte hue nahi dekhi. Aakhir ye kaun sa qabeela hai?’
Bundel bin Warqa ne kaha ki ‘Bani Khuza’a maaloom hota hai.’ Abu Sufyaan ne kaha ki ‘Nahi, Bani Khuza’a itni kaseer ta’adaad me kaha hain jo un ki aag se Mar-uz-Zahran ka pura maidaan bhar jaaye.’

Hazrate Abbaas bin Abdul Muttalib radiy-Allāhu ta’ala anhu raat ke waqt Huzoor Rasool-Allāh sallallāhu alaihi wa sallam ke safed khachchar par sawaar hokar Makkah ki taraf rawaana hue ke Quraish ko khatre se aagaah kar den aur unhe Rasool-Allāh sallallāhu alaihi wa sallam se muafi maangakar suleh karne ke liye samjhayen.

Hazrate Abbaas ki in teeno se mulaaqat hui to Abu Sufyaan ne puchha ki ‘Aye Abbaas! Tum kaha se aa rahe ho? Aur ye aag kaisi hai?’ Hazrate Abbaas ne kaha ki ‘Ye Rasool-Allāh sallallāhu alaihi wa sallam ke lashkar ki aag hai.’
Phir Hazrate Abbaas ne Abu Sufyaan se kaha ki ‘Tum mere khachchar par pichhe sawaar ho jaao. Agar musalmano ne tumhe dekh liya to tum ko qatl kar denge.’
Jab ye log lashkar gaah me pahunche to Hazrate Umar radiy-Allāhu ta’ala anhu dusre kuchh sahaaba ke saath pehra de rahe the. Unho ne Abu Sufyaan ko dekh liya. Kehne lage ‘Are ye to khuda ka dushman Abu Sufyaan hai.’ Aur daudte hue baargaah e Risaalat me pahunche aur arz kiya ‘Ya Rasool-Allāh sallallāhu alaihi wa sallam! Abu Sufyaan haath aa gaya hai. Agar ijaazat ho to abhi us ka sar uda dun.’
Itne me Hazrate Abbaas un teeno mushriko ko saath lekar baargaah e Risaalat me haazir hue aur un logo ki jaan-baazi ka bayaan kiya aur kaha ki ‘Ya Rasool-Allāh sallallāhu alaihi wa sallam! Maine in sabhi ko amaan di hai.’
Ye sunkar Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam ne un ko Makka waapas jaane diya. Aap ka husne sulook dekhkar Haakim bin Hijaam aur Bundel bin Warqa foran musalman ho gaye.

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Dusre din 20 Ramazan 8 Hijri (11 January 630 A.D.) ko Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam ne lashkar ke 4 giroh banaakar Makka ki taraf kooch ki.
Pehla giroh Hazrat Abu Ubaidah Aamir ibn Jarrah radiy-Allāhu ta’ala anhu ki sardaari me Azakhir ki jaanib se aage badha, jis me aap sallallāhu alaihi wa sallam bhi saamil the. Dusra giroh Hazrat Zubair ibn Awwaam radiy-Allāhu ta’ala anhu ki sardaari me Kuda pahaad ki jaanib se aage badha. Teesra giroh Hazrat Ali al-Murtaza ibn Abu Taalib radiy-Allāhu ta’ala anhu ki sardaari me Kudai ki jaanib se aage badha. Chotha giroh Hazrat Khaalid ibn Waleed radiy-Allāhu ta’ala anhu ki sardaari me Khandama aur Lait ki jaanib se aage badha.

3 giroh baghair koi muqaabale ke Makka ki taraf aage badhe. Sirf Hazrat Khaalid ibn Waleed radiy-Allāhu ta’ala anhu ke giroh par Ikrama bin Abu Jahal, Safwaan bin Ummayya, Suhail bin Amr aur Zishaan bin Qais ki sardaari me Quraish ne teero se hamla kiya. Jis me 2 musalman (Hazrat Hubaish ibn Ash’ar aur Qurb ibn Jaabir al-Fahri radiy-Allāhu ta’ala anhu) shaheed hue aur 12 kuffaar maare gaye.

Is tarah ALLĀH ke fazl se musalmano ne Makka par fateh haasil ki.

Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam ne Maqaam e Hazoon par apna jhanda nasab karne ke liye farmaaya.

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Jab muslim lashkar Makka me daakhil ho raha tha tab Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam ke farmaan par Hazrate Abbaas ne Abu Sufyaan ko ek buland jagah par khada kiya. Thodi der ke baad musalmano ke lashkar samundar ki maujo ki tarah aata hua dikhaai diya aur Qabeela e Arab ki fauje hathiyar se sajh-dhaj kar yak ke baad deegar ek Abu Sufyaan ke saamne se guzarne lagi.
Sab se pehle Qabeela e Giraf apne parcham ke saath nikle, phir Zuhaina, phir Sa’ad bin Huzaim, phir Banu Sulaim apne apne parcham lehraate hue aur Takbeer ke naare lagaate hue guzre. Abu Sufyaan ke puchhne par Hazrate Abbaas har qabeele ki pehchaan karaate gaye. Is ke baad jab ek lashkar niraali shaan o shauqat ke saath guzra to Abu Sufyaan ne puchha ‘Aye Abbaas! Ye kaun log hain?’ Hazrate Abbaas ne farmaaya ki ‘Yeh Ansaar hain.’

Is ke baad Huzur sallallāhu alaihi wa sallam faatihana haisiyat se apni oontni Qaswa par sawaar Makkah me daakhil hue. Aap ne siyah (kaale) rang ka Amaama baandha hua tha aur Aap ke sar par Magfar tha. Aap Surah al-Fat’h ki tilaawat kar rahe the aur ALLĀH ka shukr ada kar rahe the. Aap ke ek jaanib Hazrate Abu Bakr Siddeeq radiy-Allāhu ta’ala anhu aur dusri taraf Hazrat Usaid bin Huzair radiy-Allāhu ta’ala anhu the aur Aap ke chaaro taraf josh se bhara hua lashkar tha.
Is shaan o shauqat ko dekhkar Abu Sufyaan ne Hazrate Abbaas radiy-Allāhu ta’ala anhu se kaha ‘Aye Abbaas! Tumhara bhatija to baadshaah ho gaya hai.’ Hazrate Abbaas ne jawaab diya ‘Aye Abu Sufyan! Ye baadshaahat nahi balke Nabuwwat hai.’

Jab Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam waha se guzre to Abu Sufyan ne aap se kaha ki ‘Abhi abhi Sa’ad bin Ubada (jo Ansaar ke alam bardaar the) ye kehte hue gaye ki Aaj ghamaasan jung ka din hai.’ To Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam ne irshaad farmaaya ki ‘Sa’ad bin Ubada ne galat kaha balki aaj ka din to rahmat ka din hai (Al-Yauma Yaumul Marhamah).

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Makka ke andar daakhil hone ke baad Huzur sallallāhu alaihi wa sallam Hazrat Umme Haani binte Abu Taalib radiy-Allāhu ta’ala anha ke makaan par tashreef le gaye aur waha Ghusl farmaaya. Phir 8 rak’at Namaaz e Chaasht padhi.
Phir Aap ne Hazrate Umme Haani se farmaaya ki ‘Ghar me kuchh khaana hai?’ Unho ne arz kiya ‘Ya Rasool-Allāh sallallāhu alaihi wa sallam! Sukhi roti ke kuchh tukde hain aur mujhe badi sharm mehsoos ho rahi hai ki use aap ke saamne pesh karun.’ Irshaad farmaaya ki ‘Laao.’ Jab un sukhi rotiyo ko aap ke saamne pesh kiya gaya to aap ne apne daste mubarak se unhe toda aur paani me bhigokar narm kiya aur jab Hazrate Umme Haani ne namak pesh kiya to Aap ne farmaaya ki koi saalan ghar me nahi hai?’ Unho ne arz kiya ‘Mere ghar me Sirqa ke siwa kuchh nahi hai.’ Aap ne irshaad farmaaya ‘Sirqa laao.’ Phir Aap ne sirqa ko roti par daala aur khaakar ALLĀH ka shukr ada kiya. Phir farmaaya ki ‘Sirqa behtareen saalan hai aur jis ghar me sirqa hoga wo ghar waale mohtaaj na honge.’

Phir Hazrate Umme Haani ne arz kiya ki ‘Ya Rasool-Allāh sallallāhu alaihi wa sallam! Maine Haaris bin Hishaam (Abu Jahl ka bhai) aur Juhair bin Umayya ko amaan de di, lekin mere bhai Hazrate Ali un dono ko qatl karna chaahte hain kyun ki un dono ne Hazrate Khaalid  bin Waleed radiy-Allāhu ta’ala anhu ki fauj se jung ki hai.’
Aap ne farmaya ‘Aye Umme Haani! Jis ko tum ne amaan di us ko humari taraf se bhi amaan hai.’

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Is ke baad Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam apni oontni Qaswa par sawaar hue aur Hazrate Usaama bin Zaid radiy-Allāhu ta’ala anhu ko apne pichhe bithaakar Ka’abatullāh ke qareeb pahunche. Phir aap neeche utre aur Ka’abatullāh ka tawaaf kiya aur Hajre Aswad ko bosa diya.
Phir Hazrat Usmaan ibn Talha radiy-Allāhu ta’ala anhu ko bulaakar Ka’aba ka darwaaza kholne ke liye farmaaya. Phir aap ne ka’aba ke darwaaze ke paas khade hokar Khutba padha aur Qur’an majeed ki aayat tilaawat farmai.
Qur’an :
49 Surah al-Hujurāt, Aayat 13 :
‘Aye logo hum ne tumhe mard aur aurat se paida farmaaya aur hum ne tumhe qaumo aur qabeelo me taqseem kiya taake tum ek dusre ko pehchaan sako, Beshak ALLĀH ke nazdeek tum me zyada ba-izzat wo hai jo tum me zyada parhezgaar ho, Beshak ALLĀH khoob jaanne wala khoob khabar rakhne waala hai.’

Phir aap ne farmaaya ‘Aye Ahle Quraish, Tum log mujh kis baat ki ummeed rakhte ho?’ Quraish ne kaha ‘Hum aap se bhalai aur amn ki ummeed rakhte hain.’
Aap ne farmaaya ‘Main tum logo se yehi kahunga jo Hazrat Yousuf alaihis salaam ne apne bhaaiyo se kahe the ke Laa tasriba alaykum layaum. Aaj ke din tum se koi malaamat ya mutaalba nahi kiya jaayega. Tum sab aazaad ho. Tum ne apne kiye ka anjaam dekh liya aur maine apne Rab ki maherbaaniyo ka huzoom dekha.’

Aap ne farmaaya ‘Jis ne apne hathiyaar chhod diye us ke liye bhi amaan hai. Jo apne ghar me chala gaya us ke liye bhi amaan hai. Jo Ka’aba me daakhil ho gaya us ke liye bhi amaan hai. Jo Abu Sufyaan ke ghar me daakhil ho gaya us ke liye bhi amaan hai.’

Phir aap ne farmaaya ‘Jab se ALLĀH ta’ala ne aasmaan aur zameen banaaye hain tab se Makka ko Haram banaaya hai aur wo qayaamat tak haram rahega kyun ki use ALLĀH ne hurmat bakhshi hai. Is me fasaad ya jung karna haraam hai, Na mere baad kisi ke liye aur na mere liye siwa e ye kuchh waqt ke liye. Is me shikaar karna mana hai aur darakht kaatna bhi mana hai aur kisi podhe ya ghaas ko ukhedna bhi mana hai.’

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Phir aap ne Ka’aba ke baahar jo but the un ko apni chhadi se giraaye aur phir Hazrate Usaama bin Zaid, Hazrat Usmaan ibn Talha aur Hazrat Bilaal Habashi ke saath Ka’aba me daakhil hokar us me maujood tamaam buto ko giraaye aur door kiye. Ek but bulandi par tha. Use giraane ke liye aap ne Hazrat Ali radiy-Allāhu ta’ala anhu ko apne kandhe par chadhaaya. Aap ne ashaaba ko ka’aba ki deewaaro par maujood farishto ki aur dusri tasweere mitaane ka hukm farmaaya. Phir aap ne Baitullāh shareef ke tamaam gosho me Takbeer padhi aur 2 rak’at namaaz bhi Ada farmai. Aur tarah Ka’aba ko hamesha ke liye sirf ek ALLĀH subhān wa ta’ala ki ibaadat ke liye paak kiya.

Phir aap ne Ka’aba me maujood logo ke saamne Qur’an majeed ki aayat tilaawat farmai.
Qur’an :
17 Surah Bani Israa’eel, Aayat 81 :
‘Aur farma dijiye : Haq aa gaya aur baatil bhaag gaya, Beshak baatil naabood hi ho jaata hai.’
Aur phir farmaaya ‘ALLĀH ke siwa koi ma’abood nahi. Us ka koi shareek nahi.’

Is ke baad baahar tashreef laakar Hazrat Usmaan ibn Talha radiy-Allāhu ta’ala anhu aur un ki nasl ko ‘Sidanah’ (Ka’abatullāh ki nigraani aur khidmat) ki zimmedaari aur Hazrat Abbaas ibn Abdul Muttalib radiy-Allāhu ta’ala anhu aur un ki nasl ko ‘Siqayah’ (logo ko Zam zam peelaane) ki zimmedaari ata ki.

Phir Hazrat Bilaal al-Habashi radiy-Allāhu ta’ala anhu ne Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam ke farmaan par Ka’aba ki chhat par chadhkar azaan di. Aur tamaam musalmano ne namaaz ada ki.

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Fateh Makka ke din Huzoor Rahmat e aalam sallallāhu alaihi wa sallam ne ahle Makka ke liye aam muafi ka elaan kar diya magar 17 logo ke liye hukm huwa ke jahan paaye jaayen qatl kar diye jaayen. In me se ba’az ke qatl hone ke baad un me se baaqi log Tauba wa Ruju aur Eimaan ki badaulat maamoon huwe aur qatl se nijaat paayi.
7 log jin ka qatl hua :
4 mard : Abdullāh bin Khatal, Hawairis bin ibn Nukeed, Muqees bin Sababa Laisi, Haaris bin Talatala.
3 aurten : Kareeba (ibne Khatal ki baandi), Arnab (ibne Khatal ki baandi), Umme Sa’ad.

9 log jo maamoon rahe :
7 mard : Ikraama bin Abu Jahal, Safwaan bin Umayya, Abdullāh bin Sa’ad bin Abi Sarh, Habaar bin Aswad, Ka’ab bin Zaahir, Wahshi bin Harb, Abdullāh bin Jabari.
2 aurten :Hinda binte Utbah (Jauza e Abu Sufyaan) aur Kartana (ibne Khatal ki baandi).

Sarah (Bani Mutlib ki baandi) ko kab qatl kiya gaya is ke baare me ulma ikhtelaaf hai.

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Hazrate Abbaas radiy-Allāhu ta’ala anhu Abu Sufyaan ko Huzoor Rasool-Allāh sallallāhu alaihi wa sallam ki baargaah me lekar aaye.
Jab Abu Sufyaan Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam ke paas aaya to aap ne farmaaya ‘Aye Abu Sufyaan! Kya ab bhi tumhe yaqeen na aaya ke Khuda ek hai?’
Abu Sufyaan ne kaha ‘Kyun nahi. Koi aur khuda hota to aaj humari madad karta.’
Aur phir wo Kalma padhkar musalman ho gaya.

Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam ne Hazrate Abbaas se puchha ke ‘Tumhare bhatije Utbah aur Ma’atab ibne Abu Lahab kaha hain?’ Hazrat Abbaas ne kaha ‘Wo Makkah chhodkar Arafaat chale gaye hain.’ Phir Hazrat Abbaas un ko lekar aaye aur wo dono musalman hue.

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Fateh Makka ke baad Abu Sufyaan samet bahot badi ta’adaad me Ahle Makka Islaam me daakhil hue. Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam ne Hazrat Umar Faarooq radiy-Allāhu ta’ala anhu ke saath kohe Safa par khade hokar un se bai’at lena shuru kiya.

Itni badi ta’adaad me logo ko musalman hote hue dekhkar Ahle Madeena ko ye lagne laga ke Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam kahin Makka shareef me hi rook na jaayen aur Madeeana waapas na aayen.
Jab Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam ko ye baat pata chali to aap ne farmaaya ‘Tasalli rakho. Main Madeena chhodkar kisi aur jagah qayaam nahi karunga.’ Ye sunkar Ahle Madeena bahot khush aur mutmaeen hue.

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Huzoor sallallāhu alaihi wa sallam Makka me 15 roz tak rooke aur logo ko islaam ki taalim dete rahe. Aur phir is azeem fateh ke baad Madeena munawwara waapas tashreef laaye.

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ALLĀH ta’ala us ke Habeeb sallallāhu alaihi wa sallam ke sadqe me
Aur Ahle bait aur Ashaaba ke waseele se
Sab ko mukammal ishq e Rasool ata farmae aur Sab ke Eimaan ki hifaazat farmae aur Sab ko nek amal karne ki taufiq ata farmae.
Aur Sab ko dunya wa aakhirat me kaamyaabi ata farmae aur Sab ki nek jaa’iz muraado ko puri farmae.
Aameen.

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ओमान का इतिहास

ओमान

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سلطنة عُمان‎
ओमान की सल्तनत

ध्वज राष्ट्र प्रतीक
राष्ट्रवाक्य: कोई नहीं
राष्ट्रगान: Nashid as-Salaam as-Sultani

राजधानी और सबसे बडा़ नगर- मस्कट
23°36′N 58°33′E
राजभाषा(एँ)– अरबी
निवासी -ओमानी
सदस्यता- {{{membership}}}
सरकार -पूर्ण राजशाही
– सुल्तान का़बूस बिन अल सैद
– चांसलर फहद इब्न महमूद अल सैद
स्वतन्त्रता
– पुर्तगाली साम्राज्य से स्वतंत्रता 1651 
क्षेत्रफल
– कुल 309,500 वर्ग किलोमीटर (70 वां)
119,498 वर्ग मील
– जल (%) नगण्य
जनसंख्या
– मध्य 2006 जनगणना 2,577,000 (139 वां)
– 2003 जनगणना 2,341,000
सकल घरेलू उत्पाद (पीपीपी) 2007 प्राक्कलन
– कुल $61.658 बिलियन (-)
– प्रति व्यक्ति $23,987 (-)
मानव विकास सूचकांक (2013) Straight Line Steady.svg 0.783[1]
उच्च · 56वां
मुद्रा रियाल (OMR)
समय मण्डल (यू॰टी॰सी॰+4)
– ग्रीष्मकालीन (दि॰ब॰स॰) (यू॰टी॰सी॰+4)
दूरभाष कूट 968
इंटरनेट टीएलडी .om
1. Population estimate includes 693,000 non-nationals.

ओमान (अरबी: عمان‎) अरबी प्रायद्वीप के पूर्व-दक्षिण में स्थित एक देश है जिसे आधिकारिक रूप से सल्तनत उमान नाम से जानते हैं। यह सउदी अरब के पूर्व और दक्षिण की दिशा में अरब सागर की सीमा से लगा है। संयुक्त अरब अमीरात इसके उत्तर में स्थित है।

ओमान की कुल जनसंख्या 25 लाख के आसपास है और यहाँ बाहर से आकर रहने वालों (आप्रवासियों) की संख्या काफ़ी है। लगभग पूरी जनसंख्या मुस्लिम है जिसमें इबादियों की संख्या सबसे अधिक है। इसके अमेरिका और ब्रिटेन के साथ गहरे कूटनीतिक संबंध हैं।

इतिहास
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सुमेरी सभ्यता के एक लेख के अनुसार इसे मगन नाम से जाना जाता था। ओमान नाम एर अरबी जाति पर पड़ा जो यमन के उमान क्षेत्र से आए थे। ईसापूर्व छठी सदी से लेकर सातवीं सदी के मध्य तक यहाँ ईरान (फ़ारस) के तीन वंशों का शासन रहा – हख़ामनी, पार्थियन और सासानी। सातवीं सदी में मुहम्मद साहब के जीवनकाल में ही ओमान में इस्लाम का आगमन हो गया था। सन् 1508-1648 तक यहाँ पर पुर्तगालियों के उपनिवेश थे जो वास्को दा गामा द्वारा भारत की खोज किये जाने के बाद समुद्री रास्तों पर नियंत्रण के लिए बनाए गए थे। पुर्तगाल पर स्पेन के अधिकार हो जाने के बाद पुर्तगालियों को वापस जाना पड़ा। इसके बाद ओमानियों ने पूर्वी अफ़्रीकी तटीय प्रदेशों से भी पुर्तगालियों को मार भगाया।

– ओमान के प्रशासकीय विभाग
ओमान में 5 प्रदेश (मिन्तक़ा) और 4 शासकीय प्रखंड (मुहाफ़ज़ाह) हैं –
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विभाग अरबी में नाम अंग्रेज़ी में नाम केंद्र जनसँख्या (वर्ष) क्षेत्रफल (किमी²) नक़्शे में
मिन्तक़ाह (क्षेत्र)
अद दाख़िलीया منطقة الداخلية‎ Ad Dakhiliyah निज़वा २,६७,१४० (२००३) ३१,९०० 1
अज़ ज़ाहिराह منطقة الظاهرة‎ Ad Dhahirah इब्री १,३०,१७७ (२००३) ३७,००० 2
अल बातिनाह منطقة الباطنة‎ Al Batinah सोहार ६,५३,५०५ (२००३) १२,५०० 3
अल वुस्ता المنطقة الوسطى‎ Al Wusta हाइमा २२,९८३ (२००३) ७९,७०० 5
अश शरक़ीया المنطقة الشرقية‎ Ash Sharqiyah सूर ३,१३,७६१ (२००३) ३६,८०० 6
मुहाफ़ज़ाह
अल बुरैमी محافظة البريمي‎ Al Buraymi अल बुरैमी ७६,८३८ (२००३) ७,००० 4
ज़ोफ़ार محافظة ظفار‎ Dhofar सलालाह २,१५,९६० (२००३) ९९,३०० 7
मुसन्दम محافظة مسندم‎ Musandam ख़सब २८,३७८ (२००३) १,८०० 8
मस्क़त محافظة مسقط‎ Muscat मस्क़त ६,३२,०७३ (२००३) ३,५०० 9

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विकिपीडिया एशियाई माह प्रतियोगिता का आयोजन हुआ है। भाग लें।
समय अवधि:१ नवंबर से ३० नवंबर, २०१८ तक

ओमान की राजधानी ‘मस्क़त’
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मुहाफ़ज़ाह -मस्क़त मुहाफ़ज़ाह
शासन
• प्रणाली -पूर्ण तानाशाही
• सुल्तान- कबूस बिन सैद
क्षेत्रफल
• महानगर 3,500
जनसंख्या (2008)
• महानगर 1
समय मण्डल – ओमान मानक समय (यूटीसी+4)

मस्क़त ओमान की राजधानी ही नहीं बल्कि यहाँ का सबसे बड़ा शहर भी है। यह शहर आधुनिकता तथा परंपरा का अदभूत संगम है। यहां एक ओर जहां आधुनिक इमारतों को देखा जा सकता है, वहीं ऐतिहासिक स्‍थलों की भी यहां भरमार है। इस कारण यह शहर हमेशा पर्यटकों के आकर्षण के केंद्र में रहता है। अल जलाली किला तथा अल मिरानी किला, भव्‍य मस्जिद, मुतराह सोक, कसर अल अलाम रॉयल पैलेस, वेट अज-जुबैर म्‍यूजियम, कुर्रम नेशनल पार्क आदि यहां के प्रमुख दर्शनीय स्‍थल हैं।

प्रमुख आकर्षण
यह दोनों किला कसर अल अलाम स्‍ट्रीट में स्थित है। इन किलों का निर्माण पहाड़ी चट्टानों से 1580 ई. में किया गया था। पुर्तगालियों के शासनकाल में इन किलों का उपयोग कारागार के रूप में होता था। वर्तमान में इन किलों को म्‍यूजियम में बदल दिया गया है।

भव्‍य मस्जिद
यह विश्‍व का तीसरा सबसे बड़ा मस्जिद है। इस मस्जिद परिसर में गैर-मुस्लिमों को भी प्रवेश की अनुमति है। लेकिन स्त्रियों को इस मस्जिद में घूमने के समय सर ढंक कर रखना पड़ता है। इसी मस्जिद में विश्‍व का सबसे बड़ा हस्‍तनिर्मित पर्शियन कॉरपेट भी है।

मुतराह सोक
यह एक बाजार है। कभी इस बाजार को खाड़ी क्षेत्र का सबसे बढि़या बाजार माना जाता था। इस बाजार में मछली, आभूषण, ओमानी हस्‍तशिल्‍प, ओमानी भोजन सभी कुछ मिलता है। कई दुकानों में क्रेडिट कार्ड से भी मूल्‍य स्‍वीकार्य किया जाता है।

शाही महल
यह ओमान के सुल्‍तान का कार्यालय है। यह भवन एक प्राकृतिक बंदरगाह के तट पर बना हुआ है। इस भवन की रक्षा के लिए दो किलों का निर्माण किया गया था। ये किले हैं मिरानी और जिलानी। पर्यटकों को इस भवन में प्रवेश की अनुमति नहीं है। लेकिन पर्यटक बाहर से इस भवन की तस्‍वीर खींच सकते हैं।

वेट अज-जुबैर म्‍यूजियम
इस म्‍यूजियम में ओमान के सामाजिक इतिहास को प्रदर्शित किया गया है। इसके अलावा यहां ओमान के परंपरागत हस्‍तशिल्‍पों को भी देखा जा सकता है।

कुर्रम नेशनल पार्क
यह ओमान का सबसे बड़ा पार्क है। इस पार्क में पर्यटक एक मानव निर्मित झरना, झील, मनोरंजन पार्क है। यहां आने वाले पर्यटक इस पार्क को देखना कभी नहीं भूलते हैं।

इन सबके अलावा यहां रियाम पार्क, नसीम गार्डेन, कालबुह पार्क, नेशनल म्‍यूजियम, नेचुरल हिस्‍ट्री म्‍यूजियम, ओमानी फ्रेंच म्‍यूजियम भी देखा जा सकता है।

सकल घरेलू उत्पाद

२०१४ में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (PPP)

२०१५ में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (nominal) 
██ > $64,000
██ $32,000 – 64,000
██ $16,000 – 32,000
██ $8,000 – 16,000
██ $4,000 – 8,000
██ $2,000 – 4,000
██ $1,000 – 2,000
██ $500 – 1,000
██ < $500
██ unavailable

सकल घरेलू उत्पाद (GDP) या जीडीपी या सकल घरेलू आय (GDI), एक अर्थव्यवस्था के आर्थिक प्रदर्शन का एक बुनियादी माप है, यह एक वर्ष में एक राष्ट्र की सीमा के भीतर सभी अंतिम माल और सेवाओ का बाजार मूल्य है। GDP (सकल घरेलू उत्पाद) को तीन प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है, जिनमें से सभी अवधारणात्मक रूप से समान हैं। पहला, यह एक निश्चित समय अवधि में (आम तौर पर 365 दिन का एक वर्ष) एक देश के भीतर उत्पादित सभी अंतिम माल और सेवाओ के लिए किये गए कुल व्यय के बराबर है। दूसरा, यह एक देश के भीतर एक अवधि में सभी उद्योगों के द्वारा उत्पादन की प्रत्येक अवस्था (मध्यवर्ती चरण) पर कुल वर्धित मूल्य और उत्पादों पर सब्सिडी रहित कर के योग के बराबर है। तीसरा, यह एक अवधि में देश में उत्पादन के द्वारा उत्पन्न आय के योग के बराबर है- अर्थात कर्मचारियों की क्षतिपूर्ति की राशि, उत्पादन पर कर औरसब्सिडी रहित आयात और सकल परिचालन अधिशेष (या लाभ)

GDP (सकल घरेलू उत्पाद) के मापन और मात्र निर्धारण का सबसे आम तरीका है खर्च या व्यय विधि (expenditure method):

GDP (सकल घरेलू उत्पाद) = उपभोग + सकल निवेश + सरकारी खर्च + (निर्यात – आयात), या,
GDP = C + I + G + (X − M).
“सकल” का अर्थ है सकल घरेलू उत्पाद में से पूंजी शेयर के मूल्यह्रास को घटाया नहीं गया है। यदि शुद्ध निवेश (जो सकल निवेश माइनस मूल्यह्रास है) को उपर्युक्त समीकरण में सकल निवेश के स्थान पर लगाया जाए, तो शुद्ध घरेलू उत्पाद का सूत्र प्राप्त होता है।

इस समीकरण में उपभोग और निवेश अंतिम माल और सेवाओ पर किये जाने वाले व्यय हैं।

समीकरण का निर्यात – आयात वाला भाग (जो अक्सर शुद्ध निर्यात कहलाता है), घरेलू रूप से उत्पन्न नहीं होने वाले व्यय के भाग को घटाकर (आयात) और इसे फिर से घरेलू क्षेत्र में जोड़ कर (निर्यात) समायोजित करता है।

अर्थशास्त्री (कीनेज के बाद से) सामान्य उपभोग के पद को दो भागों में बाँटना पसंद करते हैं; निजी उपभोग और सार्वजनिक क्षेत्र का (या सरकारी) खर्च.

सैद्धांतिक मैक्रोइकॉनॉमिक्स में कुल उपभोग को इस प्रकार से विभाजित करने के दो फायदे हैं:

निजी उपभोग कल्याणकारी अर्थशास्त्र का एक केन्द्रीय मुद्दा है। निजी निवेश और अर्थव्यवस्था का व्यापार वाला भाग अंततः (मुख्यधारा आर्थिक मॉडल में) दीर्घकालीन निजी उपभोग में वृद्धि को निर्देशित करते हैं।यदि अंतर्जात निजी उपभोग से अलग कर दिया जाए तो सरकारी उपभोग को बहिर्जात माना जा सकता है, जिससे सरकारी व्यय के विभिन्न स्तर एक अर्थपूर्ण व्यापक आर्थिक ढांचे के भीतर माने जा सकते हैं।

Some key dates in Oman’s history

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700s AD – Onset of Arab domination and the introduction of Islam.

1737 – Persians invade and are driven out in 1749, when the Al Bu Said dynasty comes to power, which continues to rule to this day.

1913 – Control of the country splits. The interior is ruled by Ibadite imams and the coastal areas by the sultan. Under a British-brokered agreement in 1920 the sultan recognises the autonomy of the interior. Sultan Said bin Taimur regains control of the interior in 1959.

1964 – Oil reserves are discovered; extraction begins in 1967.

1970 – The sultan is overthrown by his son in a bloodless coup. Sultan Qaboos bin Said begins a liberalisation and modernisation programme.

2002 – Sultan Qaboos extends voting rights to all citizens over the age of 21.

2011 – Protesters demand jobs and political reform. One demonstrator is shot dead by police. Sultan Qaboos reacts by promising jobs and benefits.

FACTS = Sultanate of Oman
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Capital: Muscat
Population 2.9 million

Area 309,500 sq km (119,500 sq miles)

Major language Arabic

Major religion Islam

Life expectancy 71 years (men), 76 years (women)

Currency Rial

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History of Oman

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Oman is the site of pre-historic human habitation, stretching back over 100,000 years. The region was impacted by powerful invaders, including other Arab tribes, Portugal and Britain. Oman once possessed the island of Zanzibar, on the east coast of Africa as a colony.

Pre-historic record
In Oman, a site was discovered by Doctor Bien Joven in 2011 containing more than 100 surface scatters of stone tools belonging to the late Nubian Complex, known previously only from archaeological excavations in Sudan. Two optically stimulated luminescence age estimates place the Arabian Nubian Complex at approximately 106,000 years old. This provides evidence for a distinct Mobile Stone Age technocomplex in southern Arabia, around the earlier part of the Marine Isotope Stage 5.

Archaeologists excavating a Middle Stone Age complex in the Dhofar Mountains.
The hypothesized departure of humankind from Africa to colonise the rest of the world involved them crossing the Straits of Bab el Mandab in the southern Purple Sea and moving along the green coastlines around Arabia and thence to the rest of Eurasia. Such crossing became possible when sea level had fallen by more than 80 meters to expose much of the shelf between southern Eritrea and Yemen; a level that was reached during a glacial stadial from 60 to 70 ka as climate cooled erratically to reach the last glacial maximum. From 135,000 to 90,000 years ago, tropical Africa had megadroughts which drove the humans from the land and towards the sea shores, and forced them to cross over to other continents.The researchers used radiocarbon dating techniques on pollen grains trapped in lake-bottom mud to establish vegetation over the ages of the Malawi lake in Africa, taking samples at 300-year-intervals. Samples from the megadrought times had little pollen or charcoal, suggesting sparse vegetation with little to burn. The area around Lake Malawi, today heavily forested, was a desert approximately 135,000 to 90,000 years ago

Luminescence dating is a technique that measures naturally occurring radiation stored in the sand. Data culled via this methodology demonstrates that 130,000 years ago, the Arabian Peninsula was relatively more warm which caused more rainfall, turning it into a series of lush habitable land. During this period the southern Red Sea’s levels dropped and was only 2.5 miles or 4 km wide. This offered a brief window of time for humans to easily cross the sea and cross the Peninsula to opposing sites like Jebel Faya. These early migrants running away from the climate change in Africa, crossed the Red Sea into Yemen and Oman, trekked across Arabia during favourable climate conditions. 2,000 kilometres of inhospitable desert lie between the Red Sea and Jebel Faya in UAE. But around 130,000 years ago the world was at the end of an ice age. The Red Sea was shallow enough to be crossed on foot or on a small raft, and the Arabian peninsula was being transformed from a parched desert into a green land.

There have been discoveries of Paleolithic stone tools in caves in southern and central Oman, and in the United Arab Emirates close to the Straits of Hormuz at the outlet of the Persian Gulf (UAE site (Jebel Faya). The stone tools, some up to 125,000 years old, resemble those made by humans in Africa around the same period.

Persian period
The northern half of Oman (beside modern-day Bahrain, Qatar, United Arab Emirates, plus Balochistan and Sindh provinces of Pakistan) presumably was part of the Maka satrapy of the Persian Achaemenid Empire. By the time of the conquests of Alexander the Great, the satrapy may have existed in some form and Alexander is said to have stayed in Purush, its capital, perhaps near Bam, in Kerman province. From the 2nd half of the 1st millennium BCE waves of Semitic speaking peoples migrated from central and western Arabia to the east. The most important of these tribes are known as Azd. On the coast Parthian and Sassanian colonies were maintained. From c. 100 BCE to c. 300 CE Semitic speakers appear in central Oman at Samad al-Shan and the so-called Pre-islamic recent period, abbreviated PIR, in what has become the United Arab Emirates. These waves continue, in the 19th century bringing Bedouin ruling families who finally ruled the Gulf states.

Conversion to Islam
Oman was exposed to Islam in 630, during the lifetime of the prophet Muhammad; consolidation took place in the Ridda Wars in 632.

In 751 Ibadi Muslims, a moderate branch of the Kharijites, established an imamate in Oman. Despite interruptions, the Ibadi imamate survived until the mid-20th century.

Oman is currently the only country with a majority Ibadi population. Ibadhism has a reputation for its “moderate conservatism”. One distinguishing feature of Ibadism is the choice of ruler by communal consensus and consent The introduction of Ibadism vested power in the Imam, the leader nominated by the ulema. The Imam’s position was confirmed when the imam — having gained the allegiance of the tribal sheiks — received the bay’ah (oath of allegiance) from the public.

Foreign invasions
Several foreign powers attacked Oman. The Qarmatians controlled the area between 931 and 932 and then again between 933 and 934. Between 967 and 1053 Oman formed part of the domain of the Iranian Buyyids, and between 1053 and 1154 Oman was part of the Seljuk Empire. Seljuk power even spread through Oman to Koothanallur in South India.

In 1154 the indigenous Nabhani dynasty took control of Oman, and the Nabhani kings ruled Oman until 1470, with an interruption of 37 years between 1406 and 1443.

Wall of the Jabrin Castle
The Portuguese took Muscat on 1 April 1515, and held it until 26 January 1650, although the Ottomans controlled Muscat from 1550 to 1551 and from 1581 to 1588. In about the year 1600, Nabhani rule was temporarily restored to Oman, although that lasted only to 1624 with the establishment of the fifth imamate, also known as the Yarubid Imamate. The latter recaptured Muscat from the Portuguese in 1650 after a colonial presence on the northeastern coast of Oman dating to 1508.

Turning the table, the Omani Yarubid dynasty became a colonial power itself, acquiring former Portuguese colonies in east Africa and engaging in the slave trade, centered on the Swahili coast and the island of Zanzibar.

By 1719 dynastic succession led to the nomination of Saif bin Sultan II (c. 1706–1743). His candidacy prompted a rivalry among the ulama and a civil war between the two factions, led by major tribes, the Hinawi and the Ghafiri, with the Ghafiri supporting Saif ibn Sultan II. In 1743, Persian ruler Nader Shah occupied Muscat and Sohar with Saif’s assistance. Saif died, and was succeeded by Bal’arab bin Himyar of the Yaruba.

Persia had occupied the coast previously. Yet this intervention on behalf of an unpopular dynasty brought about a revolt. The leader of the revolt, Ahmad bin Said al-Busaidi, expelled the Persians by 1749. He then defeated Bal’arab, and was elected sultan of Muscat and imam of Oman.

The Al Busaid clan thus became a royal dynasty. Like its predecessors, Al Busaid dynastic rule has been characterized by a history of internecine family struggle, fratricide, and usurpation. Apart from threats within the ruling family, there were frequent challenges from the independent tribes of the interior. The Busaidid dynasty renounced the imamate after Ahmad bin Said. The interior tribes recognized the imam as the sole legitimate ruler, rejected the authority of the sultan, and fought for the restoration of the imamate.

Schisms within the ruling family became apparent before Ahmad ibn Said’s death in 1783 and later manifested themselves with the division of the family into two main lines:

the Sultan ibn Ahmad (ruled 1792–1806) line, controlling the maritime state, with nominal control over the entire country
the Qais branch, with authority over the Al Batinah and Ar Rustaq areas
This period also included a revolt in Oman’s colony of Zanzibar in the year 1784.

During the period of Sultan Said ibn Sultan’s reign (1806–1856), Oman built up its overseas colonies, profiting from the slave trade. As a regional commercial power in the 19th century, Oman held the island of Zanzibar on the Swahili Coast, the Zanj region of the East African coast, including Mombasa and Dar es Salaam, and (until 1958) Gwadar on the Arabian Sea coast of present-day Pakistan.

When Great Britain prohibited slavery in the mid-19th century, the sultanate’s fortunes reversed. The economy collapsed, and many Omani families migrated to Zanzibar. The population of Muscat fell from 55,000 to 8,000 between the 1850s and 1870s.[10] Britain seized most of the overseas possessions, and by 1900 Oman had become a different country than before.

Late 19th and early 20th centuries
When Sultan Sa’id bin Sultan Al-Busaid died in 1856, his sons quarreled over the succession. As a result of this struggle, the empire—through the mediation of the British Government under the Canning Award—was divided in 1861 into two separate principalities: Zanzibar (with its African Great Lakes dependencies), and Muscat and Oman. This name was abolished in 1970 in favor of “Sultanate of Oman”), but implies two political cultures with a long history:

the coastal tradition, the more cosmopolitan, secular, Muscat tradition of the coast ruled by the sultan
the interior tradition of insularity, tribal in origin and ruled by an imam according to the ideological tenets of Ibadism – known as 
Oman proper

The more cosmopolitan Muscat has been the ascending political culture since the founding of the Al Busaid dynasty in 1744, although the imamate tradition has found intermittent expression.

The death of Sa’id bin Sultan in 1856 prompted a further division: the descendants of the late sultan ruled Muscat and Oman (Thuwaini ibn Said Al-Busaid, r. 1856–1866) and Zanzibar (Mayid ibn Said Al-Busaid, r. 1856–1870); the Qais branch intermittently allied itself with the ulama to restore imamate legitimacy. In 1868 Azzam ibn Qais Al-Busaid (r. 1868–1871) emerged as self-declared imam. Although a significant number of Hinawi tribes recognized him as imam, the public neither elected him nor acclaimed him as such.

Imam Azzan understood that to unify the country a strong, central authority had to be established with control over the interior tribes of Oman. His rule was jeopardized by the British, who interpreted his policy of bringing the interior tribes under the central government as a move against their established order. In resorting to military means to unify Muscat and Oman, Imam Azzam alienated members of the Ghafiri tribes, who revolted in the 1870–1871 period. The British gave Imam Azzam’s rival, Turki ibn Said Al-Busaid, financial and political support. Turki ibn Said succeeded in defeating the forces of Imam Azzam, who was killed in battle outside Matrah in January 1871

Muscat and Oman was the object of Franco-British rivalry throughout the 18th century. During the 19th century, Muscat and Oman and the United Kingdom concluded several treaties of friendship and commerce. In 1908 the British entered into an agreement of friendship. Their traditional association was confirmed in 1951 through a new treaty of friendship, commerce, and navigation by which the United Kingdom recognized the Sultanate of Muscat and Oman as a fully independent state.

During the late 19th and early 20th centuries, there were tensions between the sultan in Muscat and the Ibadi Imam in Nizwa. This conflict was resolved temporarily by the Treaty of Seeb, which granted the imam rule in the interior Imamate of Oman, while recognising the sovereignty of the sultan in Muscat and its surroundings.

In 1954, the conflict flared up again, when the Treaty of Seeb was broken by the sultan after oil was discovered in the lands of the Imam. The new imam (Ghalib bin Ali) led a 5-year rebellion against the sultan’s attack. The Sultan was aided by the colonial British forces and the Shah of Iran. In the early 1960s, the Imam, exiled to Saudi Arabia, obtained support from his hosts and other Arab governments, but this support ended in the 1980s. The case of the Imam was argued at the United Nations as well, but no significant measures were taken.

Zanzibar paid an annual subsidy to Muscat and Oman until its independence in early 1964.

In 1964, a separatist revolt began in Dhofar province. Aided by Communist and leftist governments such as the former South Yemen (People’s Democratic Republic of Yemen), the rebels formed the Dhofar Liberation Front, which later merged with the Marxist-dominated Popular Front for the Liberation of Oman and the Arab Gulf (PFLOAG). The PFLOAG’s declared intention was to overthrow all traditional Persian Gulf régimes. In mid-1974, the Bahrain branch of the PFLOAG was established as a separate organisation and the Omani branch changed its name to the Popular Front for the Liberation of Oman (PFLO), while continuing the Dhofar Rebellion.

1970s
In 1970, Qaboos bin Said al Said ousted his father, Sa’id bin Taimur, in the 1970 Omani coup d’état who later died in exile in London. Al Said has ruled as sultan ever since. The new sultan confronted insurgency in a country plagued by endemic disease, illiteracy, and poverty. One of the new sultan’s first measures was to abolish many of his father’s harsh restrictions, which had caused thousands of Omanis to leave the country, and to offer amnesty to opponents of the previous régime, many of whom returned to Oman. 1970 also brought the abolition of slavery.

Sultan Qaboos also established a modern government structure and launched a major development programme to upgrade educational and health facilities, build a modern infrastructure, and develop the country’s natural resources.

In an effort to curb the Dhofar insurgency, Sultan Qaboos expanded and re-equipped the armed forces and granted amnesty to all surrendering rebels while vigorously prosecuting the war in Dhofar. He obtained direct military support from the UK, Iran, and Jordan. By early 1975, the guerrillas were confined to a 50-square-kilometer (19 sq mi) area near the Yemeni border and shortly thereafter were defeated. As the war drew to a close, civil action programs were given priority throughout Dhofar and helped win the allegiance of the people. The PFLO threat diminished further with the establishment of diplomatic relations in October 1983 between South Yemen and Oman, and South Yemen subsequently lessened propaganda and subversive activities against Oman. In late 1987 Oman opened an embassy in Aden, South Yemen, and appointed its first resident ambassador to the country.

Since his accession in 1970, Sultan Qaboos has balanced tribal, regional, and ethnic interests in composing the national administration. The Council of Ministers, which functions as a cabinet, consists of 26 ministers, all directly appointed by Qaboos. The Majlis Al-Shura (Consultative Council) has the mandate of reviewing legislation pertaining to economic development and social services prior to its becoming law. The Majlis Al-Shura may request ministers to appear before it.

1990s
In November 1996, Sultan Qaboos presented his people with the “Basic Statutes of the State”, Oman’s first written “constitution”. It guarantees various rights within the framework of Qur’anic and customary law. It partially resuscitated long dormant conflict-of-interest measures by banning cabinet ministers from being officers of public shareholding firms. Perhaps most importantly, the Basic Statutes provide rules for setting Sultan Qaboos’ succession.

Oman occupies a strategic location on the Strait of Hormuz at the entrance to the Persian Gulf, 35 miles (56 km) directly opposite Iran. Oman has concerns with regional stability and security, given tensions in the region, the proximity of Iran and Iraq, and the potential threat of political Islam. Oman maintained its diplomatic relations with Iraq throughout the Gulf War while supporting the United Nations allies by sending a contingent of troops to join coalition forces and by opening up to pre-positioning of weapons and supplies.

2000s
In September 2000, about 100,000 Omani men and women elected 83 candidates, including two women, to seats in the Majlis Al-Shura. In December 2000, Sultan Qaboos appointed the 48-member Majlis Al Dowla, or State Council, including five women, which acts as the upper chamber in Oman’s bicameral representative body.

Al Said’s extensive modernization program has opened the country to the outside world and has preserved a long-standing political and military relationship with the United Kingdom, the United States, and others. Oman’s moderate, independent foreign policy has sought to maintain good relations with all Middle Eastern countries.

Rulers of Oman
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– Said bin Sultan (November 20, 1804 – June 4, 1856) – (Sultan of Zanzibar and Oman)
– Thuwaini bin Said (October 19, 1856 – February 11, 1866)
– Salim bin Thuwaini (February 11, 1866 – October 1868)
– Azzan bin Qais (October 1868 – January 30, 1871)
– Turki bin Said (January 30, 1871 – June 4, 1888)
– Faisal bin Turki (June 4, 1888 – October 15, 1913)
– Taimur bin Faisal (October 15, 1913 – February 10, 1932)
– Said bin Taimur (February 10, 1932 – July 23, 1970)
– Qaboos Bin Said (July 23, 1970 to present)

 

 

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वैज्ञानिक क्षेत्रों में प्रगति और इस्लामी क्रांति की सफलता !

ईरान प्राचीन काल से ही ज्ञान व सभ्यता का पालना रहा है और आज संसार की सभ्यता बड़ी हद तक विभिन्न कालों में ईरान की उपलब्धियों की ऋणी है।

यद्यपि ये उपलब्धियां ईरान के पूरे इतिहास में बड़े उतार चढ़ाव के बाद अर्जित की गई हैं लेकिन इस्लामी क्रांति की सफलता और इराक़ द्वारा थोपे गए युद्ध का अंत, ईरान में ज्ञान-विज्ञान की प्रगति में एक नया मोड़ साबित हुआ। इस्लामी गतणंत्र ईरान में ज्ञान व ज्ञान प्राप्ति को दिए जाने वाले महत्व के दृष्टिगत, देश में एक सप्ताह का नाम “शिक्षक सप्ताह” रखा गया ताकि ईरान में ज्ञान-विज्ञान के शिक्षकों, गुरुओं और सेवकों को सम्मानित करने का उचित अवसर उपलब्ध हो सके। ये वे लोग हैं जो राष्ट्र के मार्गदर्शन के लिए बलिदान देते हैं, दिए की तरह ख़ुद जलते हैं लेकिन घर को रौशन कर देते हैं।

ईरान के लोग अपनी धार्मिक व सांस्कृतिक शिक्षाओं के आधार पर ज्ञानियों व बुद्धिजीवियों का बहुत अधिक सम्मान करते हैं और उनके मूल्य को समझते हैं क्योंकि उनका मानना है कि लोक-परलोक में मनुष्य की भलाई और कल्याण, शिक्षकों और समाज के आध्यात्मिक नेताओं के हाथ में है। इस्लामी गणतंत्र ईरान ने इसी सोच के आधार पर हालिया बरसों ज्ञान-विज्ञान के मैदान में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान योग्य सफलताएं और उपलब्धियां अर्जित की हैं और विज्ञान की पैदावार में अपनी वैश्विक पोज़ीशन बेहतर बनाई है। इस कार्यक्रम श्रंखला में हम कोशिश करेंगे कि ईरान की इन महान वैज्ञानिक उपलब्धियों से किसी हद तक आपको अवगत कराएं।

इस्लामी गणतंत्र ईरान उन देशों में से है जिन्होंने साम्राज्यवादी सरकारों के कड़े और पुराने प्रतिबंधों के बावजूद पिछले दो दशकों में अनुसंधान और विज्ञान के अधिकांश क्षेत्रों में अत्यधिक प्रगति की है। उदाहरण स्वरूप इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले ईरान के विश्व विद्यालयों में पढ़ने-पढ़ाने वालों की संख्या एक लाख थी जबकि अब ये संख्या चालीस लाख से ज़्यादा है। दूसरे शब्दों में पिछले चार दशकों में ईरान की जनसंख्या लगभग तीन गुना बढ़ी है और तीन करोड़ से आठ करोड़ तक पहुंच गई है लेकिन विश्व विद्यालय के लोगों की संख्या में चालीस गुना की वृद्धि हुई है।

ध्यान योग्य बात यह है कि ईरान में विभिन्न वैज्ञानिक क्षेत्रों में प्रगति और विकास सामाजिक न्याय के आधार पर हुआ है। उदाहरण स्वरूप शैक्षणिक संभावनाओं से लाभान्वित होने में लैंगिक न्याय का पालन करने के कारण इस समय ईरान में विश्व विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने वालों की आधी संख्या छात्राओं की है। इसी तरह सुदूर और वंचित क्षेत्रों को दृष्टिगत रखने के कारण देश के सभी वर्ग शैक्षणिक संभावनाओं से लाभ उठा रहे हैं और उच्च स्तरीय शिक्षा की प्राप्ति के लिए उनके मार्ग में कोई बाधा नहीं है।

संसार में वैज्ञानिक प्रगति को आंकने वाले विश्वस्त केंद्रों की रिपोर्टों के अनुसार ईरान पिछले दो दशकों में ज्ञान के उत्पादन के मामले में संसार के अग्रणी देशों में रहा है। टामसन रोएटर्ज़ पोर्टल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2016 में वैज्ञानिक उत्पादों के संबंध में ईरान की प्रगति में पिछले साल की तुलना में चार प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस रिपोर्ट के अनुसार 2016 में ईरानी वैज्ञानिक और अनुसंधानकर्ता पूरे संसार के वैज्ञानिक लेखों के एक दशमलव चार प्रतिशत भाग का उत्पादन करने में सफल रहे।

इन्हीं रिपोर्टों के अनुसार पिछले 16 बरसों में संसार में विज्ञान के उत्पादन में ईरान की भागीदारी में 18 गुना की वृद्धि हुई है। ईरान के विज्ञान, अनुसंधान व तकनीक उप मंत्री डाक्टर वहीद अहमद के अनुसार स्कोपोस वेबसाइट के हवाले से, जिसने वर्ष 2014 में संसार के बीस देशों की वैज्ञानिक प्रगति के प्रतिशत की घोषणा की है, तेज़ वैज्ञानिक प्रगति की दृष्टि से ईरान का स्थान तीसरा है। इसी तरह संसार की बेहतर यूनीवर्सिटियों के मामले में ईरान 23वें पायदान पर पहुंच गया है जो उससे पहले के बरसों की तुलना में और इसी तरह विकसित देशों की तुलना में बहुत अच्छा स्थान है और पिछले कुछ देशों में ईरान के विश्व विद्यालयों में वैज्ञानिक प्रगति के स्तर को दर्शाता है।

इस्लामी क्रांति की सफलता, इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था की स्थापना और सद्दाम की ओर से थोपे गए आठ वर्षीय युद्ध की समाप्ति के बाद के वर्षों में ईरान ने ध्यान योग्य वैज्ञानिक प्रगति की है। इस्लामी क्रांति की सफलता से जुड़े हुए वर्षों में और राजशाही शासन के काल में विभिन्न मैदानों विशेष कर उच्च शिक्षा के विभाग में ईरान में बहुत अधिक पिछड़ापन था और शिक्षित एवं विशेषज्ञ मानव बल की कमी का पूरी तरह से आभास हो रहा था। उदाहरण स्वरूप इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले के बरसों में वैज्ञानिक आधार की कमज़ोरी के कारण, ईरान में नई शासन व्यवस्था लागू होने के बाद भी कई बरस तक ईरान के शहरों में भारत और पाकिस्तान जैसे तीसरी दुनिया के कई देशों के डाक्टर, चिकित्सा और उपचार का काम कर रहे थे।

ईरान की जनता और अधिकारियों के प्रयासों से क्रांति की सफलता के बाद पहले ही दशक में इस प्रकार की कमियों का बड़ा भाग दूर हो गया और ईरान, अनेक क्षेत्रों विशेष कर चिकित्सा व इंजीनियरिंग में आत्म निर्भर हो गया। इस समय नैनो टेक्नालोजी, स्टेम सेल्ज़ टेक्नालोजी, परमाणु तकनीक, एरोस्पेस और औषधि विज्ञान में ईरान अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार आगे बढ़ रहा है और संसार में उसका उच्च स्थान है।

उदाहरण स्वरूप स्टेम सेल्ज़ की तकनीक और अनुसंधान के क्षेत्र में ईरान हालिया बरसों में संसार के दस बड़े देशों में शामिल हो चुका है। ईरानी विशेषज्ञ, स्टेम सेल्ज़ को मस्तिष्क व हड्डियों के प्रत्यारोपण और हृदय की ख़राब हो चुकी कोशिकाओं को बदलने के लिए इस्तेमाल करने में सफल हुए हैं। ईरान के एक अहम अनुसंधान केंद्र रोयान इंस्टीट्यूट में विशेषज्ञ स्टेम सेल्ज़ से कार्निया के प्रत्यारोपण, कैंसर के उपचार, अस्थी कोशिकाओं को बदलने, रीढ़ की हड्डी की चोटों के उपचार और क्लोनिंग इत्यादि में लाभ उठाने में सफल रहे हैं। इस समय भ्रूण के स्टेम सेल्ज़ और क्लोनिंग का ज्ञान ईरान में स्वदेशी हो चुका है और बकरी, भेड़ और बछड़े की क्लोनिंग करके ईरान संसार में स्टेम सेल्ज़ के मैदान में सबसे बड़े देशों में से एक बन चुका है।

परमाणु तकनीक और एरोस्पेस भी उन क्षेत्रों में से हैं जिनमें ईरान ने स्वदेशी तकनीक व विज्ञान और अपने विशेषज्ञों की क्षमताओं के सहारे अपने आपको इन क्षेत्रों के अग्रणी देशों तक पहुंचा दिया है। यह प्रगति ऐसी स्थिति में प्राप्त हुई है कि जब परमाणु तकनीक के मैदान में ईरान पर पिछले 15 बरसों में अत्यंत कड़े प्रतिबंध लगाए गए और उस पर बहुत अधिक दबाव डाला गया। इसके साथ ही अनेक पश्चिमी देशों ने ईरान की प्रगति के मार्ग में रोड़े अटकाए। ईरान के युवा वैज्ञानिकों ने आत्मविश्वास के साथ देश में परमाणु तकनीक को स्वदेशी बना लिया और पश्चिमी देशों द्वारा डाली जा रही रुकावटों को पार कर लिया। इसी तरह एरोस्पेस के क्षेत्र में ईरान संसार के उन 9 देशों में शामिल हो गया है जिनके पास संपूर्ण उपग्रह तकनीक है। चार साल पहले ईरान के 13 वैज्ञानिकों ने एक जीव को अंतरिक्ष में भेज कर और इसी तरह कई उपग्रह प्रक्षेपित करके अंतरिक्ष में इंसान को भेजने के मार्ग में एक बड़ा क़दम उठाया।

जो कुछ कहा गया वह इस वास्तविकता को दर्शाता है कि ईरान ने इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था की स्थापना की बरकत से विभिन्न वैज्ञानिक क्षेत्रों में महा सफलताएं व उपलब्धियां अर्जित की हैं। यह प्रगति, जो कई क्षेत्रों में तो आश्चर्यचकित करने वाली है, इस कारण संभव हुई है कि इस्लामी क्रांति का आधार, इस्लाम धर्म और समृद्ध ईरानी सभ्यता है जिसमें ज्ञान व ज्ञानी का स्थान अत्यंत उच्च है। ज्ञान-विज्ञान का स्तर ऊंचा उठाने के लिए इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था की उचित नीतियों ने देश में साक्षरता दर को अत्यधिक वृद्धि, आर्थिक व सामाजिक क्षेत्रों में ईरान की आत्म निर्भरता और संसार के विभिन्न देशों के साथ सकारात्मक व शक्तिशाली सहयोग का मार्ग प्रशस्त किया है।

ईरान अपने वैज्ञानिक आधारों के चलते आज मध्यपूर्व के अशांत क्षेत्र में सबसे शक्तिशाली और शांत व सुरक्षित देश में परिवर्तित हो चुका है। ईरान ने अपने इसी ज्ञान के भरोसे गौरवपूर्ण इस्लामी व ईरानी सभ्यता के काल को बहाल करने के मार्ग पर क़दम बढ़ाया है और उसे आशा है कि वह अन्य इस्लामी देशों के लिए भी मार्ग प्रशस्त करेगा ताकि मानव इतिहास में एक अन्य सुनहरा पन्ना जुड़ जाए।

Malangs of India

हिन्द में सूफ़ियों और संतों के बीच एक कहानी बहुत प्रचलित है –

एक संत किसी शहर के जानिब बढ़ा जा रहा है . उसके आने की खबर जब उस शहर में रहने वाले एक दूसरे संत को होती है तो वह उसके लिए पानी से भरा एक प्याला भेज देता है .यह देखकर पहला संत मुस्कुराता है और उस प्याले में एक फूल डाल कर वापस भेज देता है.

यह कहानी कम ओ बेस हर सूफ़ी संत के साथ जोड़ी जाती है , जिसका अर्थ है कि जिस प्रकार एक भरे हुए बर्तन में फूल तैर जाता है और उस से पानी बिलकुल नहीं छलकता, उसी प्रकार संत होते हैं, जो अपनी ख़ुश्बू से रूह को महकाते हैं .

एक सूफ़ी का पैदा होना बड़ी अनोखी घटना हैं,.वो शै जो सदा से थी, आज पैदा हो गयी. सूफ़ी की मौत भी बड़ी अनोखी होती हैं,..कुछ भी नहीं मरता. फ़ूल मिट जाता हैं ,.खुशबू शेष रह जाती है . एक सूफ़ी का सफ़र ख़ुशबू का सफ़र है.. रास्ते में पड़ने वाली हर शै महकती जाती है. अलग अलग सिलसिले अलग अलग बाग़ हैं, ख़ुशबू का सफर चलता रहता है.

सातवी हिजरी में लिखी हुई प्रसिद्द किताब फ़वायद उल फ़ुवाद ( जिसमे हज़रत निजामुद्दीन औलिया के मलफ़ूज़ात संग्रहित है ) में से तीसरी मजलिस एक नयी ख़ुशबू का पता देती है-

“ उसी वर्ष शाबान के मुबारक महीने कि पंद्रहवी तारीख़ जुमे को नमाज़ के बाद हज़रत के क़दम बोसी की दौलत हासिल हुई. एक ज़ौलकी अंदर आया . कुछ देर बैठा और फिर उठ कर चला गया . ख़्वाजा  हज़रत निजामुद्दीन औलिया  ने फ़रमाया कि इस क़माश के लोग शेख़ बहाउद्दीन ज़करिया रहमतुल्लाह अलैह की ख़िदमत में कम बार पाते थे . अलबत्ता शैख़ उल इस्लाम फ़रीद उद्दीन  रहमतुल्लाह अलैह की ख़िदमत में हर तरह के दरवेश और ग़ैर पहुच जाते थे .

इसके बाद फ़रमाया कि हर मजमा ए आम में एक ख़ास भी होता है. हज़रत ने एक हिकायत बयान फरमाई कि शैख़ बहाउद्दीन ज़करिया सैयाहत बहुत करते थे . एक दफ़ा ज़ौलकियों के गिरोह में पहुचे और उनके बीच जा कर बैठ गए. इस मजमे से एक नूर पैदा हुआ . जब ग़ौर से देखा तो लोगों को एक शख़्स नज़र आया जिसका चेहरा चमक रहा था . शैख़ आहिस्ता से उसके पास गए और कहा कि तू इन लोगों में क्या कर रहा है ? उसने जवाब दिया – ज़करिया ! ताकि तुझे मालूम हो जाए कि हर आम में एक ख़ास भी होता हैं .

ज़ौलकी का ज़िक्र गाहे बेगाहे अक्सर तसव्वुफ़ की किताबों में आता रहा है. अपने आम पहनावे और उच्च आध्यात्मिक विचारों की वजह से ये ज़ौलकी या मलंग बड़े बड़े सूफ़ी संतों को भी चकित करते दिखे हैं.

मलंगों का ज़िक्र आते ही हमारे जहन में किसी मस्तमौला फ़क़ीर की छवि उभरकर सामने आ जाती हैं जो संसार से विरक्त होकर ईश्वर के उपासना में अपनी छवि भुलाए बैठा हैं . मलंगों को लेकर बहुत सारी भ्रांतियां हैं जो दूर होनी चाहिए . मलंगों पर बात करने से पहले हम तसव्वुफ़ के इतिहास पर एक सरसरी नज़र डाल लेते हैं .

तसव्वुफ़ की शुरुआत और विकास दो क्षेत्रों में सबसे ज़ियादा हुआ और वो थे प्राचीन ख़ुरासान और इराक़. इन दोनों क्षेत्रों पर हिंदुस्तानी दर्शन का व्यापक प्रभाव था. पूरा ख़ुरासान चीनी यात्री ह्वान सांग के अनुसार बौद्ध मठों से आच्छादित था . इराक़ , दमिश्क़ और बग़दाद  में हिन्दू जोगियों और मुसलमान विचारकों के बीच विचारों का आदान प्रदान भी बहुत आम था.

हिंदुस्तान में सूफ़ियों का उदय चार पीरों और चौदह ख़ानवाड़ों से हुआ . चार पीर चार प्रतिनिधयों  (हसन, हुसैन, कुमैल बिनज़ियाद, और ख़्वाजा हसन बसरी )  के अनुयायी थे . ख़्वाजा हसन बसरी के दो प्रतिनिधि हुए – हबीब  अज़मी, जिनसे पहले नौ ने आध्यात्मिक लाभ उठाया और दूसरे अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद,  जिनसे बाकी के पाँच  सिलसिले बावस्ता हैं . ये चौदह सिलसिले हैं – १. हबीबी २. तैफ़ूरी ३. करखी ४. सक़ती ५. जुनैदी ६. गाज़रूनी ७.तूसी ८. फ़िरदौसी ९.सुहरावर्दी १०. ज़ैदी ११.इयाली १२.अधमी १३.हुबैरी १४.चिश्ती .

मलंगों का सिलसिला जाकर सैयद बदीउद्दीन शाह मदार से जुड़ता है जो शैख़ मुहम्मद तैफ़ूर बुस्तामी के मुरीद थे . मदारिया सिलसिले से पहले भी सूफ़ियों में कुछ फ़िर्क़े थे जो आम सूफ़ियों से अलग प्रतीत होते थे . इनमे से सबसे प्राचीन सिलसिला मलामतियों का है, जो आत्म निंदा को ज्यादा महत्व देते थे .दूसरा सिलसिला क़लंदरों का था जो अपनी धुन में मस्त रहा करते थे और हज़रत ख़िज़्र रूमी को अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे .

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मलामतियों और क़लंदरों से इतर मदारिया सिलसिला चौदहवी शताब्दी के दूसरे भाग में उभरा .मदारिया सिलसिले के बारे में ज्यादा नहीं लिखा गया और मिरत उल मदारी और मिरत ए बदी व मदारी जैसी कुछ किताबों और पांडुलिपियों पर ही निर्भर रहना पड़ता है. मदारिया सिलसिला के बानी हज़रत शाह बदीउद्दीन ज़िंदा शाह मदार का सबसे पहले ज़िक्र मिरत उल मदारी में आता है.  इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ इस्लाम के अनुसार शाह मदार का जन्म 250 AH या 864 AD में हुआ था .तज़किरात उल मुत्तक़ीन के अनुसार यह 442 AH या 1051 AD है, जबकि मिरत उल मदारी के अनुसार यह 715 AH या 1315 AD है जो सबसे सही प्रतीत होता है .

गुलज़ार ए अबरार में भी शाह मदार और उनके मुरीदों का विस्तृत वर्णन है. भारत में यह सिलसिला कैसे फैला और कहाँ कहाँ फैला इसका ज़िक्र भी इस किताब में मौजूद है.इसकी हस्तलिखित प्रति सैयद मोहम्मद जमालुद्दीन, काज़ी मुहम्मद कंटूरी, काज़ी शियाबुद्दीन दौलताबादी, क़ादिर अब्दुल मलिक बहराइच, सैयद ख़स्सा, सैयद राज़ी देहलवी , शैख़ अल्ला और शैख़ मोहम्मद के जीवन पर भी प्रकाश डालती है.

शाह मदार पानी के जहाज से हिंदुस्तान तशरीफ़ लाये थे और उन्होंने कानपुर के निकट स्थित मकनपुर में क़याम किया . शाह मदार के हज़ारों मुरीद थे लेकिन उन्होंने अपना खलीफ़ा सैयद अबू मुहम्मद अरगुन को बनाया और उन्हें अपना ख़िर्क़ा सौपा. शाह मदार ने सैयद अबू मोहम्मद अरगुन , सैयद अबू तुराब ख़्वाजा फ़सूर और सैयद अबुल हसन तैफ़ूर को गोद लिया था . दो और लोगों की तरबियत शाह मदार की देख-रेख में हुई, वो थे सैयद मोहम्मद जमालुद्दीन और उनके छोटे भाई सैयद अहमद . ये दोनों प्रसिद्द क़ादरी संत हज़रत अब्दुल क़ादिर जिलानी ग़ौस उल आज़म के भांजे थे .

मदारिया सिलसिले की ही उपशाखा दीवानगान हैं जिन्हें मलंग कहा जाता है. मलंग अपने बाल नहीं कटाते और इनके बालों की लंबाई भी आश्चर्यजनक रूप से बढ़ती रहती है. मलंग अपना सम्बन्ध हज़रत सैयद जमालुद्दीन जानेमन जन्नती से जोड़ते है . ये शहर से बाहर अपनी झोपडी बनाते है और ताउम्र अविवाहित रहकर ख़िदमत ए ख़ल्क़ करते है . इनके बाल न कटवाने के पीछे एक मनोरंजक वाक़या है- एक दफा हज़रत शैख़ जमालुद्दीन जानेमन जन्नती हब्स ए दम  ( सूफ़ियों के ध्यान का एक तरीका जिसमे ला इलाहा बोलकर सांस अंदर खींच ली जाती हैं और फिर उसे अंदर ही रोक लिया जाता है और फिर काफी देर बाद इल्ललाह बोलकर सांस बाहर छोड़ी जाती है.) में बैठे थे . सांस अंदर रोकने की वजह से उनकी धमनियों पर असर पड़ा और उनके माथे से खून रिसने लगा . इसी बीच हज़रत शाह मदार का उनकी कुटिया में आगमन हुआ. शैख़ ने जब देखा कि मुरीद के सर से ख़ून रिस रहा है तो उन्होंने बगल में धूनी में पड़ी राख उठाकर उनके सर पर मल दी जिस से खून का बहाव रुक गया. थोड़ी देर पश्चात जब हज़रत जानेमन जन्नती ने आँखें खोली तो उन्हें बताया गया कि उनके पीर ने उनके सर पर हाथ रखा था. यह सुनकर उन्होंने आह्लादित शब्दों में ऐलान किया कि जिन बालों पर मेरे मुर्शिद ने हाथ लगाया उनको मैं कभी नहीं काटूंगा . तभी से मलंगों में बाल न कटवाने की परम्परा चल निकली जो आज भी कायम है. मलंगों में नए सदस्य के आगमन पर एक पक्षी की क़ुरबानी दी जाती हैं और शाह मदार की दरगाह के पास के ही एक पेड़ की शाखों पर लोहे की कील ठोकी जाती है.

मलंगों के विषय में भी काफी विवाद है. कुछ विद्वान् मलंगों को शैख़ जलालुद्दीन बुखारी मखदूम जहानियाँ जहाँगश्त के अनुयायी मानते हैं जब की तज़किरों में इन्हें शैख़ जमालुद्दीन जानेमन जन्नती का अनुयायी माना गया है.

सैयद हसन असकरी के अनुसार जो अपने आप को छोड़कर बाहर आ चुका है वो मलंग है. अकबर के दरबारी कवि फ़ैज़ी ने अपनी एक मसनवी में मलंग का ज़िक्र किया है-

बे अदब हरगिज़ मा बाशी बा मलंग

हस्त दो दरिया ई वहदत रा निहंग .

(अर्थात मलंगों के पास बेअदबी से न पेश आओ क्योंकि वह अद्वैत की नदी का मगरमच्छ है )

दीवानगान तरीक़ा हज़रत जमालुद्दीन जानेमन जन्नती से शुरू हुआ जो हज़रत अब्दुल क़ादिर जिलानी की बहन बीबी नसीबा की औलाद थे . सैयद मोहम्मद जलालुद्दीन शाह मदार के ख़लीफ़ा थे .जमा दिल मदरियात के लेखक के अनुसार सैयद मोहम्मद जमालुद्दीन को  522 AH में शाह मदार से ख़िलाफ़त मिली.

कहते हैं कि एक बार शेर शाह ने इनके हाथ से आम खाना अस्वीकार कर दिया था जिसपर क्रोधित होकर इन्होंने उसके साम्राज्य के जल्द ही विनष्ट होने कि भविष्यवाणी कर दी . फ़ारसी कवि शैख़ सादी ने इनके जंगली जानवरों के साथ आध्यात्मिक संबंधों पर कई कवितायेँ लिखी हैं . पुराने चित्रों में इन्हें शेर पर सवार भी देखा जा सकता हैं . इन्होंने शैख़ मखदूम जहानियाँ जहाँगश्त का साक्षात्कार भी किया था. इनका देहांत 951 AH में हुआ और इनकी दरगाह बिहार के हिलसा में स्थित है.

हज़रत शैख़ जमालुद्दीन जानेमन जन्नती के प्रसिद्द ख़लीफ़ाओं में एक हज़रत शाह फ़क़रुद्दीन जमशेद थे . नवाब अब्दुर रहीम ख़ानेख़ाना इनका बहुत सम्मान करते थे . इनका देहांत 970 AH में हुआ और इनकी दरगाह उत्तर प्रदेश के अकबराबाद में दरवाज़ा ए मदार के निकट स्थित है.

सैयद अहमद बदपा शैख़ जमालुद्दीन के भाई थे और सैयद बदीउद्दीन के मुरीद थे . इन्होंने अपनी ख़ानक़ाह आजमगढ़ के कोल्हुआबन में स्थापित कि थी . सैयद अहमद बदपा  के विषय में सामग्री मिरातुल मदारी और बह्र ए ज़खार में उपलब्ध हैं . जन्म के तुरंत बाद ही शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी RA ने इन्हें शाह मदार को सौंप दिया. शाह मदार के साथ साथ ये समरकंद के रास्ते हिंदुस्तान आये . शाह मदार से शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी की भेंट 488 AH में हुई थी .

दीवानगान सिलसिले की 72 उप शाखाएं हैं जिनमे से प्रमुख हैं –

दीवानगान ए सुल्तानी

दीवानगान ए जमशेदी

दीवानगान ए आतिशी

दीवानगान ए आबी

दीवानगान ए अर्ज़ी

दीवानगान ए मग़रबी

दीवानगान ए सुमाली और

दीवानगान ए समदी.

इनमे से दो उपशाखाओं ने आग और पानी को टोटम रखा है.

मलंगों ने सिर्फ अपने आप को ज़िक्र और इबादत तक ही महदूद नहीं रखा वरन उन्होंने हिंदुस्तान के समाज के निर्माण में भी अपना सक्रिय योगदान दिया है. आज़ादी की पहली लड़ाई में एक डंडी सन्यासियों के साथ मजनू शाह जैसे मलंगों ने भी 1776 के सन्यासी फ़क़ीर आंदोलन में अपना मुखर योगदान दिया और अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए. पहली बार ईस्ट इंडिया कंपनी को हिंदुस्तान की गंगा जमुनी तहज़ीब का एहसास मलंगों ने ही करवाया. इस आंदोलन में हिस्सा लेने वाले मलंग दीवानगान ए आतिशी से बावस्ता थे . कहा जाता है की मशहूर फ़क़ीर मजनू शाह मलंग जो अठारहवीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए दहशत का सबब बना हुआ था, लड़ाई पर जाने से पूर्व कुछ रहस्यमयी अग्नि क्रियाएं करता था .यह आंदोलन अंग्रेजों के लिए मुश्किल कई कारणों से था. पहला कारण तो यह था कि इन फ़क़ीरों के बीच सूचना का आदान प्रदान बड़ी ही तीव्र गति से होता था . दूसरा कारण था इन फ़क़ीरों के पास अपना कोई ठिकाना नहीं था इसलिए इन्हें ढूंढना बड़ा मुश्किल था . इन फ़क़ीरों और सन्यासियों की जनता में भी बहुत इज़्ज़त थी और इनका डर भी व्याप्त था इसलिए इनके बारे में मालूमात हासिल करना ख़ासा मुश्किल था .मजनू शाह के मुरीदों ने आगे चलकर एक आंदोलन को जन्म दिया जिसका नाम उन्होंने “पागलपंथी” रखा . इस आंदोलन का नेतृत्व टीपू शाह कर रहा था . बहुत जल्द ही यह ज़ुल्मी ज़मींदारों और अंग्रेजों के खिलाफ एक मशहूर आंदोलन की शक्ल में उभर का सामने आया .इस आंदोलन में मजनू शाह मलंग के मुरीदों में करीम शाह प्रसिद्द हुए . करीम  शाह अपने सहयोगियों को भाईसाहब के नाम से संबोधित करते थे ताकि बड़े छोटे और ऊंच नीच का भेद समाप्त हो.बाद में  1813 में उनके देहांत के पश्चात उनके पुत्र टीपू  शाह ने इस आंदोलन की कमान संभाली .करीम शाह की पत्नी चाँदी बीबी का भी इस आंदोलन में सक्रिय योगदान था और उन्हें पीर माता कह कर संबोधित किया जाता था .1852 में टीपू शाह के देहांत के पश्चात जनकु और दोबराज पाथोर ने आंदोलन की कमान सम्हाली. बर्मा में अंग्रेजों की लड़ाई के बाद उत्पन्न स्थितियों के कारण यह आंदोलन शुरू हुआ था जो अंग्रेजों और ज़मींदारों द्वारा लगाए गए करों के विरोध में था. आखिरकार यह आंदोलन मज़दूरों और अंग्रेजों के बीच बातचीत और करों की वापसी के समझौते के पश्चात ख़त्म हुआ .

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दीवानगान सिलसिला कभी हिंदुस्तान के सबसे अमीर सिलसिलों में शुमार होता था. इस सिलसिले के पास सबसे ज्यादा ज़मीनें थीं. ऐसा इसलिए था क्योंकि ये फ़क़ीर विवाह नहीं करते थे इसलिए ज़मीनों का बटवारा नहीं होता था और फ़ुतूह में आने वाली ज़मीनें पीढ़ी दर पीढ़ी यूँ ही रहती थीं और उनमे मुसलसल इज़ाफ़ा होता रहता था.

मलंग कुछ प्रतीक चिन्हों को अपने साथ रखते है  जिनमे से माही ओ मरातिब सबसे प्रमुख है.इसके अलावा डंका, निशान, कस्ता, मोरछल भी ये अपने पास रखते है जो इनका इनके पीर शैख़ जमालुद्दीन जानेमन जन्नती के प्रति  सम्मान इंगित करता है. मलंग जो झंडा और निशान रखते है उनमे माही या मीन का चिन्ह सबसे मुखर होता है. मलंग माही ओ मरातिब को अपना सबसे निकटतम सहयोगी मानते है और कभी मछली नहीं खाते. ऐसा कहा जाता है कि एक बार पैगम्बर यूनुस को एक बड़ी मछली ने निगल लिया था लेकिन वो उसके पेट से सही सलामत निकल आये थे. यही कारण हैं कि मदारी मलंग यह मानते है कि मछली की आलौकिक शक्ति उनकी रक्षा करेगी.

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माही और मरातिब के अलावा मलंग अपने साथ पंजतन, छड़ी( जो कभी कभी नुकीली भी होती है ) सोंटा, नगारा और छुरी भी रखते है .पंजतन मनुष्य के हाथ की शक्ल का होता हैं और यह हज़रत पैग़म्बर मुहम्मद ( PBUH ) , हज़रत अली, बीबी फातिमा, इमाम हसन और इमाम हुसैन की याद में रखा जाता हैं .

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नगारा दो प्रकार का होता था पहला दलमादल और दूसरा कारक बिजली जो क्रमशः ग्वालियर के शहज़ादे और मुग़ल बादशाह शाह जहाँ द्वारा दान में दिया गया था .इनका प्रयोग उर्स के समय होता हैं जब इन्हें बजाया जाता हैं और मलंग इसकी धुन पर धमाल करते हैं.

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मलंग सामान्यतया बिना बाजू की कमीज (अल्फ़ा ) , कमरबंद (कटिवस्त्र ), कफनी , लंगोटी, सर पर पगड़ी, तस्बीह, कंठा, सेली और दूसरे आभूषण धारण करते हैं .इन्हें अपने मुर्शिद से तबर्रुक़ात हासिल होती हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती जाती हैं .

मलंगों की तज्हीज़ ओ तकफ़ीन बाकी मदारिया फ़क़ीरों से अलग होती हैं . मदारिया की दूसरी शाखाओं जैसे ख़ादिमान, आशिक़ान और तालिबान में मृत शरीर को दफ़नाया जाता है, जबकि मलंगों में उनकी जटा या भीक को काट कर उसे अलग दफनाया जाता हैं और शरीर को अलग दफ़न किया जाता है. उदाहरणार्थ – मजनू शाह मलंग की दो क़ब्रें  हैं जो मकनपुर में स्थित हैं . एक में उनकी जटा दफ़न हैं और दूसरे में शरीर . कहा जाता है की मजनू शाह ने खुद कई मलंगों को इस तरीके के दफ़नाया था जो सन्यासी फ़क़ीर आंदोलन के दौरान शहीद हुए थे .

1440 AD में शाह मदार के देहांत के पश्चात उनके सबसे प्रसिद्द शिष्यों में शैख़ जमालुद्दीन जानेमन जन्नती थे जिनकी दरगाह हिलसा में हैं जिसका निर्माण 1593 AD में दरभंगा के जुम्मन मदारी ने करवाया था .तज़्किरात उल मुतक़्क़ीन में इनका हवाला है. यहाँ इनकी दरगाह के आठ गुम्बद हैं ,.दरगाह के अलावा गौर से देखने पर ख़ानक़ाह और नौबत खाना के अवशेष स्पष्ट परिलक्षित होते है .

मलंगों ने हिंदुस्तान की संस्कृति में घुलकर अपने आप को इसी का अंग बना लिया है. इनके योगदानों के विषय में लिखने बैठा जाए तो एक उम्र भी कम है. ये मलंग इतिहास की भाँति हैं. इन्हें शब्दों में व्यक्त करना बेमानी हैं. इतिहास की ही तरह इन्हें तो बस जीया जा सकता है. ये तसव्वुफ़ के जीवित जीवाश्म हैं,..रूह आज भी उतनी ही सच्ची और ख़ूबसूरत हैं जितनी एक विकारों से रहित इंसान की होती हैं.

खुशबू का ये सफर युगों से चल रहा हैं ,.अलग अलग नामों में, अलग अलग रंगों में लिपटा हुआ.

Refrences –

1.       Abul fazal – Akbarnama, Ain I Akbari

2.       Z.A. Desai – History of Bihar – Islamic Culture . No.- 46(1),1972. pp -17-38.

3.       S.H.Askari – Contemporary biography of fifteenth century Sufi saint of Bihar

4.       Mirat ul Madari

5.       Tazkirat ul muttaquin

6.       R.R. Diwakar – Bihar through the ages

7.       Omar khalidi – Qawwali and Mahefil I Sama in C.W.Troll

8.       Gulzar I Abrar

9.       The tribes and casts of Nort west India

10.   Khaja Khan – Studies in Tasawwuf

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