Mountains have roots imbedded underground.

The highest point on Earth is in the Himalayas at Mount Everest 8.8 km high. It turned out that this mountain has roots about 250 km deep.

The larger Asian plate forced the Indian plate deep into the mantle – a process called subduction – sinking it at least 155 miles (250 kilometers) down under the surface, a new study in the May edition of the journal Geology suggests. This plunge is double the depth of previous estimates.
Live Science, Depth of Himalayan Mountain Roots Revealed, 2010

This is correctly portrayed in the Quran by describing mountains as pegs:

[Quran 78.7] And the mountains as pegs

A peg has some parts above ground and other parts below ground. So the Quran correctly claims that mountains have parts below ground.


Sufi Saints

The Muslim epoch in Indian History was in fact, heralded by the Sufi divines, particularly by Khwaja Moinuddin Ajmeri who also laid the foundations here of the Chistiya Order of Islamic mysticism. From the earliest days the rich vied with the poor and the high with the low to do homage to these elevated self-denying men of God till the whole sub-continent was lit with a thick cluster of spiritual luminaries and their religious establishments.

Apart from the more important towns, there was hardly a Muslim hamlet which was left without a moral teacher or a spiritual guide. The enthusiastic devotion of the people to the Sufi saints and their overwhelming responsiveness to religious emotion can well be imagined by the following facts:

The daily average of votaries staying at the Khanqah (Spritual Seminary) of Syed Adam Bannuri (d. 1643) was one thousand. They took their meals at the Khanqah. A great throng of men, including hundreds of theological doctors, followed the saint wherever he went. It is stated in Tazkira-i-Adamiya that 10,000 persons formed his entourage during the visit to Lahore in 1642. Seeing the phenomenal popularity of Syed Bannuri, Emperor Shahjehan became so apprehensive that he thought of a plan to send him out of India. He sent to him a large sum of money and then suggested that as the possession of sufficient money makes the Haj pilgrimage obligatory for a Muslim, therefore Syed Bannuri should not waste any time in proceeding to the Haj to discharge his duty. The saint thereupon migrated from India.

Hazrat Mujaddid’s celebrated son and spiritual deputy, Khwaja Mohammad Masoom(d. 1668) had as many as 9,00,000 disciples who did the Bai’at (here it means the oath taken by a person at the time of becoming disciple the of a saint.) and repentance at his hand. Among the huge number of his disciples, 7000 rose to become his Khalifas(Spiritual Deputies).

It is recorded about Shah Ghulam Ali in Sir Syed Ahmad Khan’s Aasar-us-Sanadeedthat “not less than 500 destitute persons used to live in his Khanqah all of whom were fed and clothed by him.”

Unprecedented scenes of popular enthusiasm were witnessed during the missionary tours of the famous divine and spiritual leader of the 19th century, Syed Ahmad Shaheed, as also during his journey to Calcutta while on the way to Arabia for the Haj. In many of the towns that fell on Syed Shaheed’s route few persons were left who did not offer bai’at and repentance at his hand. At Allahabad, Mirzapur, Varanasi, Ghazipur, Azimabad, (Patna) and Calcutta, specially, his disciples must have run into lakhs. The limit was that at Varanasi the indoor patients of the Sadar Hospital sent to him a petition begging that since they were unable to move out he might condescend to visit them in the hospital so that they could take the bai’at. About a thou­sand persons became his disciples every day during his two months stay at Calcutta. From morning till late at night a stream of men and women would pour in where he was staying. There was hardly any time left for Syed Saheb to attend to his personal needs. When it became impossible to administer the vow to everyone individually, it was arranged for the aspirants to collect in a large house where Syed Saheb went and initiated them into the fold. Seven or eight turbans were unrolled on the ground when he went there and the aspirants were told to hold them at different places, while one end of them was held by Syed Saheb himself. He then taught them the fundamentals of the Faith and read out the oath in a loud voice like Azaan (muslim call to prayer) which they repeated, and thus the ritual was completed. This was done seventeen or eighteen times each day.

फ़क़ीर ने गुलाम से कहा ‘मुझे बगल वाली दुकान से अनार लेकर आ’,,,,’जानिए कौन थे गयासुद्दीन बलबन’

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इब्न ए बतूता ने अपने सफरनामे में लिखा है कि बुखारा के बाजार में एक दिन एक फ़क़ीर का गुजर हुआ, बाजार में एक छोटे कद का बहुत ही बदसूरत गुलाम भी बिकने के लिए खड़ा था। फकी र ने उस गुलाम को देखते ही उसकी बदसूरती पर तुर्कण्ड जैसे लफ्ज से बहुत ही तकलीफदेह तंज की जिसके जवाब में उस गुलाम ने ” हाजिर ऐ खुदावंद” कहा। फकीर को बहुत अच्छा लगा और उन्होंने गुलाम से फिर कहा कि मुझे बगल वाले दुकान से अनार लेकर आ, गुलाम ने फिर उस फकीर की हुक्म बजा लाई और अपने जेब में पड़े कुछ पैसों से अनार लेकर उस फकीर को दे दिया।

फकीर ने खुश होकर दुआ दी की जा इसके एवज में मैंने तुझे हिन्द की हुकूमत दी। गुलाम ने उस फकीर का हाथ चूमा और एक दूसरे से विदा हो गए। बात आई गयी हो गयी की कुछ दिनों के बाद दिल्ली सल्तनत के हुक्मरान शमशुद्दीन अल्तमश ने एक ताजिर को हुक्म दिया की बुखारा जाओ और वहां से सौ गुलामों को खरीद लाओ। ताजिर बुखारा गया और सौ गुलाम खरीद लिए जिसमे एक वो गुलाम भी था जिसने फकीर को अनार खरीद कर दी थी। जब गुलाम दरबार में पहुंचे तो बादशाह ने निन्यानवे गुलामों को अपने पास रख लिया और वो गुलाम जो बदसूरत था उसे अपने पास रखने से मना कर दिया। इतने पर उस गुलाम ने बादशाह से सवाल किया कि आपने इन निन्यानवे गुलामो को किसके लिए खरीदा है? जवाब में बादशाह ने कहा- अपने लिए।
फिर उस गुलाम ने कहा कि जब निन्यानवे को अपने लिए खरीदा है तो मुझे खुदा के लिए रख लो।
बादशाह उसकी बात सुनकर हंसने लगा और उसे भी अपने पास रखकर पानी लाने का काम दे दिया।

इधर दरबार के कुछ नजूमी बादशाह को रोज कहते की एक दिन आपका कोई गुलाम आपके गद्दी पर बैठ जायेगा लेकिन बादशाह उनकी बातों पर गौर नही करता। आखिर बहुत जोर देने पर बादशाह ने उनसे कहा कि क्या तुम उस गुलाम को पहचान सकते हो ? नजूमियों ने हाँ में जवाब दिया तो सारे गुलामों को दरबार में लाया गया। खुशकिस्मती से वो बदसूरत गुलाम एकदम पीछे खड़ा था और उसका नम्बर आते आते जोहर का वक़्त हो गया। नजूमियों ने बादशाह से खाने की फरमाइश करते हुए कहा कि बाजार से ही कोई चीज खाने के लिए मंगा लें। कुछ पैसा देकर उसी गुलाम को बाजार भेज दिया गया। नजदीक के बाजार में कुछ नही मिला तो वो दूसरे बाजार में चला गया जो थोड़ा दूर था । इधर उसके जगह पर दूसरे बच्चे को खड़ा कर दिया गया । जब उस बदसूरत गुलाम का नम्बर आया तो उसके जगह पर दूसरा वाला लड़का गया और इस तरह किसी भी गुलाम की शिनाख्त नही हो पाई।

वक़्त बीतता गया उस गुलाम के होशियारी की वजह से तरक्की होती रही। पहले उसे सारे गुलामों का हेड बना दिया गया फिर फ़ौज में भर्ती हुआ और सरदार के ओहदे तक पहुंच गया। उसकी शादी रजिया सुल्तान के भाई और शमसुद्दीन अल्तमश के बेटे नसीरुद्दीन ने अपने बेटी से करदी। जब नसीरुद्दीन राजा बना तो उसे नायब बना दिया ।20 साल नायब रहने के बाद एक दिन ऐसा भी आया की वो गुलाम जो बुखारा के बाजारों में बिकने के लिए खड़ा था अब नसीरुद्दीन का कत्ल कर दिल्ली का बादशाह गयासुद्दीन बलबन बन गया।

बलबन ने 20 साल हुकूमत की। अपने दौर ए हुकूमत में उसने एक इमारत की तामीर करायी जिसका नाम दारुल अमन रखा जिसकी खाशियत ये थी की अगर उसमे कोई कर्जदार आ जाता तो उसका कर्ज बलबल खुद चूका देता या कोई कातिल और मकतूल आ जाते तो उनके बीच समझौता करवा दिया करता। मरने के बाद बलबन को भी उसी दारुल अमन में दफना दिया गया।



जानिए कौन थे गयासुद्दीन बलबन

इतिहास के कुछ पन्नों को अगर उठाकर देखा जाएं, तो भारत पर कई शासकों द्वारा राज किया गया था। इन शासकों में एक नाम बलबन का भी था। जिनका मकबरा आज खंडरो में तब्दील हो चुका है या यूं कहें इसे आस पास के स्थानीय लोग भूतिया अड्डा कहकर पुकारते है। यह मकबरा भारत और इस्लामिक वास्तुशास्त्र का मिला जुला रुप है। लेकिन वर्तमान स्थिती कुछ और ही बयां करती है।

कौन थे बलबन

बलबन एक तुर्किश विद्वान का बेटा था, लेकिन बचपन में मंगोलों ने उसे बेच दिया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने उसे आजाद कराया। उसने गुलाम वंश के ही शासक नासिरुद्दीन महमूद की बेटी से शादी की। नासिरुद्दीन का कोई बेटा न होने की वजह से उसकी मौत के बाद बलबन ने खुद को गुलाम वंश का शासक घोषित कर दिया। 1266 में गयसुद्दीन की पदवी के साथ उसने भारत की राजगद्दी संभाली और 1287 तक राज किया।

गयासुद्दीन बलबन का बचपन

गयासुद्दीन बलबन जाति से इलबारी तुर्क था, उनके पिता उच्च श्रेणी के सरदार थे। बचपन में ही मंगोलों ने बलबन को पकड़कर बगदाद के बाजार में दास के रुप में बेच दिया था। बलबन की किस्मत का चक्र ऐसा घुमा कि वह भारत पहुंच गया। सुल्तान इलतुत्मिश ने बलबन पर दया कर उसे खरीद लिया। बलबन अपने स्वाभाव और सुल्तान की सेवा करने की वज़ह से लगातार उन्नति करता गया। जिसके बाद सुल्तान ने बलबन को चेहलगन के दल में भी शामिल कर लिया था।

बलबन की मंगोलो पर विजय
बलबन का बचपन मंगोलों द्वारा ही तहस नहस किया गया। मंगोलों ने ही बलबन को बाजार में बेचकर उसे दास बनाकर छोड़ दिया था। लेकिन शायद बलबन की किस्मत में कुछ और ही लिखा गया। दास होने के बावजूद उसे भारत में शासन करने का मौका मिला।

इतिहासकारों के मुताबिक बलबन की उन्नति के साथ ही उन्हें रज़िया के राज्यकाल में अमीरे शिकार पद सौंपा गया था। बहराम ने बलबन को रेवाड़ी और हांसी के कुछ क्षेत्र दिए। कहा जाता है कि सन् 1245 के दौरान बलबन ने मंगोलों से लोहा लेकर अपने सामरिक गुण का भी प्रमाण दिया था।

बलबन जटिल समस्याओं में भी रहे खड़
जिस तहर बलबन उन्नति कर रहे थे उन्हें इस दौरान कई जटिल समस्याओं का भी सामना करना पड़ा था। उन्हें कई अवसर पर अपमानित किया गया लेकिन फिर भी उनमें साहस भरा हुआ था, वह सुनते थे लेकिन रुकते नहीं थे। अपने संकल्प के मुताबिक आगे बढ़ते रहते और इस समय उन्होंने आंतरिक विद्रोहों का सफ़ाया भी किया और साथ ही बाहर के आक्रमणों को असफल करते गए।

नासिरुद्दीन महमूद के बाद मिला सिंहासन
नासिरुद्दीन महमूद की मुत्यु के बाद बलबन ने बिना किसी विरोध के मुकुट धारण कर लिया। एक शासक के तौर पर बलबन ने 20 वर्ष तक राजपाठ संभाला। इस दौरान उन्होंने अपनी बुद्दिमत्ता, कार्यकुशलता और नैतिकता का शानदार परिचय दिया। उनका न्याय पक्षपात रहित और कठोर था। शायद यहीं वज़ह है कि उनके शासन को लोह रक्त व्यवस्था कहकर संबोधित किया जाता है।

वर्तमान स्थिति

महरौली आर्कियोलॉजिकल पार्क स्थित गयासुद्दीन बलबन का मकबरा खंडहर में तब्दील हो चुका है। वह गुलाम वंश का शासक था। गुलाम वंश 1206-1290 तक सक्रिय रहा। दिल्ली सल्तनत पर बलबन ने 1266 से लेकर 1287 तक शासन किया। मकबरे के संरक्षण की जिम्मेदारी आर्कियोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पास है। ऑर्कियोलॉजिकल पार्क, कुतुबमीनार के पास है। गुलाम वंश का पहला शासक कुतुबुद्दीन ऐबक था।