दुनिया का इकलौता हस्तलिखित अखबार।


आज जहां दुनिया भर के अखबारों का काम कंप्यूटर पर होता है, वहीं चेन्नई से प्रकाशित होने वाला उर्दू अखबार ‘द मुसलमान’ दुनिया का इकलौता हस्तलिखित अखबार है जिसकी कीमत महज 75 पैसे है।

यह कीमत पहले प्रकाशन से लेकर अब तक है जिसे नहीं बढ़ाया गया है, और इसके प्रकाशन के 94 वर्ष हो चुके हैं।

मुसलमान अखबार की शुरुआत 1927 में सैयद इज्जतुल्ला ने की थी और आज, 94 साल बाद, उनके पोते सैयद आरिफुल्ला अतीत की याद को ताजा करते हुए हाथ से लिखे हुए अखबार निकलने का एहतमाम करते है !

सैयद इज्जतुल्ला इस अखबार के संस्थापक थे जो 1927 से लगातार प्रकाशित हो रहा है।

शाम को चार पन्नों में प्रकाशित होने वाले इस अखबार के कार्यालय में एक कोने में 800 वर्ग फुट का एक कमरा है, जिसके एक कोने में ख़त्ताती ( हाथ से लिखा जाना ) किया जाता है।

इसमें चार महिलाएं हैं।एक कॉलिग्राफर को तीन घंटे में एक पेज लिखना होता है।

मुसलमान के पास सारी सुविधा नहीं है, दीवार पर सिर्फ दो पंखे, तीन बल्ब और एक ट्यूबलाइट है।

पिछले साल संपादक के कमरे में एक कंप्यूटर और एक प्रिंटर लगाया गया था।

अखबार के प्रबंधन का कहना है कि उनको उर्दू calligraphy पसंद है इसलिए वे इस तरीके को जारी रखे हुए हैं।

इस अखबार में तीन रिपोर्टर हैं। यदि एक कॉलिग्राफर बीमार है, तो दूसरे को डबल शिफ्ट में काम करना होगा।

प्रत्येक कॉलिग्राफर को प्रति पृष्ठ 60 रुपये का भुगतान किया जाता है।

“मुसलमान” के पास लगभग 23,000 सब्सक्राइबर हैं जो10 डॉलर तक साल तक का भुगतान करते हैं।

पेपर की कीमत 75 पैसे है।

अखबार के प्रबंधन का कहना है कि इस डिजिटल युग में हस्तलिखित अखबार चलाना एक बड़ी चुनौती है।

Ghadeer in Ahle Sunnat Books by Maulana Syed Salman Nadwi

🌹 *ग़दीर, अहले सुन्नत की किताबों की रौशनी में* 🌷

18 ज़िलहिज्जा सन 10 हिजरी ग़दीर के मैदान में पेश आने वाली घटना इसलिए भी अहमियत रखती है क्योंकि ग़दीर के बाद की बहुत सारी घटनाएं ऐसी हैं जिनका सीधा संबंध ग़दीर से है, इसीलिए बिना ग़दीर को समझे बाद की किसी घटना को सहीह तरह से समझना आसान नहीं होगा। अहले सुन्नत के बड़े उलमा ने अपनी किताबों में ग़दीर को अनेक तरह से नक़्ल किया है, हम यहां उनमें से कुछ अहम किताबों को उनके द्वारा नक़्ल की गई हदीस के साथ बयान करेंगे। 

*सुनन-ए-तिरमिज़ी*

ज़ैद इब्ने अरक़म ने पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स.अ. से हदीस को इस तरह नक़्ल किया कि आपने फ़रमाया: जिसका मैं मौला हूं उसके यह अली अ.स. मौला हैं। (सुनन-ए-तिरमिज़ी, मोहम्मद इब्ने ईसा, जिल्द 12, पेज 175) 

*मुसन्नफ़े इब्ने अबी शैबा*

इब्ने अबी शैबा कहते हैं कि हम से मुत्तलिब इब्ने ज़ियाद ने उस ने अब्दुल्लाह इब्ने मोहम्मद इब्ने अक़ील से उसने जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अंसारी से नक़्ल किया है कि जाबिर कहते हैं: हम सब जोहफ़ा में ग़दीरे ख़ुम में जमा थे उसी समय पैग़म्बरे अकरम स.अ. ने इमाम अली अ.स. का हाथ अपने हाथ में ले कर इरशाद फ़रमाया: जिसका मैं मौला हूं उसके यह अली अ.स. मौला हैं। (अल-मुसन्नफ़, इब्ने अबी शैबा, जिल्द 7, पेज 495) 

*अल मोजमुल कबीर तबरानी*

अपनी किताब मोजमुल-कबीर में अबू इसहाक़ हमदानी से नक़्ल करते हुए कहते हैं कि उसका बयान है कि मैंने हब्शा इब्ने जुनादह को यह कहते हुए सुना कि मैंने पैग़म्बरे अकरम स.अ को ग़दीरे ख़ुम में कहते हुए सुना कि: ख़ुदाया जिसका मैं मौला हूं उसके यह अली अ.स. मौला हैं, ख़ुदाया तू उस से मोहब्बत करना जो अली अ.स. से मोहब्बत करे, और उस से नफ़रत कर जो अली अ.स. से नफ़रत करे, और उसकी मदद कर जो अली अ.स. की मदद करे, और उसका साथ दे जो अली अ.स. का साथ दे। (मोजमुल-कबीर, तबरानी, जिल्द 4, पेज 4) 

*अबू सऊद और इब्ने आदिल की तफ़सीर* 

इन दोनों तफ़सीर में सूरए मआरिज की पहली आयत की तफ़सीर में लिखा है कि, अज़ाब का सवाल करने वाले का नाम हारिस इब्ने नोमान फ़हरी था, और इस आयत के नाज़िल होने की वजह यह है कि जब हारिस ने पैग़म्बरे अकरम स.अ. के क़ौल कि: “जिसका मैं मौला हूं उसके यह अली अ.स. मौला हैं” इसको सुना वह अपनी ऊंटनी पर सवार हो कर पैग़म्बरे अकरम स.अ. के पास आया और कहने लगा कि, ऐ मोहम्मद (स.अ.) तुम ने हम लोगों से एक ख़ुदा की इबादत के लिए कहा और यह कहा कि मैं अल्लाह का भेजा रसूल हूं, हम लोगों ने मान लिया, दिन में 5 वक़्त की नमाज़ पढ़ने के लिए कहा मान लिया, हमारे माल से ज़कात मांगी हम लोगों ने दे दी, हर साल एक महीने रोज़े रखने के लिए कहा रख लिया, हज करने के लिए कहा मान लिया, लेकिन आप अपने चचेरे भाई को हम से ज़ियादा अहमियत देना चाह रहे हैं यह हम लोग बर्दाश्त नहीं करेंगे, फिर वह पैग़म्बरे अकरम स.अ. से पूछता है कि यह जो कहा अपनी तरफ़ से कहा है या अल्लाह के हुक्म से? पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया: उस ख़ुदा की क़सम! जिसके अलावा कोई दूसरा ख़ुदा नहीं है कि मैंने जो कुछ भी कहा है उसी ख़ुदा के हुक्म से कहा है, इसके बाद हारिस ने कहा ख़ुदाया अगर मोहम्मद (स.अ.) सच कह रहे हैं तो आसमान से मेरे ऊपर अज़ाब नाज़िल कर, ख़ुदा की क़सम! वह यह कह कर अभी अपनी ऊंटनी तक भी नहीं पहुंचा था कि आसमान से एक ऐसा पत्थर नाज़िल हुआ जिसने उसके सर को चीर कर उसे हलाक कर दिया। (तफ़सीरुल-लोबाब, इब्ने आदिल, जिल्द 15, पेज 456) 

*अल-दुर्रुल मनसूर*

इस किताब में जलालुद्दीन सियूती ने अबू हुरैरा से इस तरह हदीस नक़्ल की है कि: जिस समय ग़दीरे ख़ुम की घटना पेश आई उस दिन 18 ज़िल-हिज्जा थी, पैग़म्बरे अकरम स.अ. ने फ़रमाया: जिसका मैं मौला हूं उसके यह अली अ.स. मौला हैं, इसी के बाद अल्लाह ने आयए इकमाल को नाज़िल किया। (अल-दुर्रुल मनसूर, जलालुद्दीन सियूती, जिल्द 3, पेज 323)

आश्चर्य की बात यह है कि इस किताब को लिखने वाले ने इस हदीस को नक़्ल करने के बाद इसको क़ुबूल करने से इंकार कर दिया है, जबकि दूसरी जगह पर इन्होंने इस हदीस को क़ुबूल किया है। 

*तफ़सीरे इब्ने कसीर*

*” یا ایھا الرسول بلغ ما انزل الیک من ربک”*

के नाज़िल होने के पीछे कारण को बताते हुए इब्ने कसीर कहते है कि अबू हारून की तरह से इब्ने मरदूया ने हदीस को अबू सईद ख़ुदरी से नक़्ल करते हुए कहा है कि: यह आयत ग़दीरे ख़ुम में पैग़म्बरे अकरम स.अ. पर नाज़िल हुई, जिसके बाद आप ने फ़रमाया: जिसका मैं मौला हूं उसके यह अली अ.स. मौला हैं, इसके बाद इब्ने कसीर ने अबू हुरैरा से भी हदीस नक़्ल करते हुए यह भी लिखा है कि यह घटना 18 ज़िल-हिज्जा को हज के बाद पेश आई। (तफ़सीरुल क़ुर्आनिल अज़ीम, इब्ने कसीर, जिल्ज 3, पेज 28) 

*तफ़सीरे आलूसी*

आलूसी भी आयते बल्लिग़ के नाज़िल होने की वजह के बारे में इब्ने अब्बास से नक़्ल करते हुए लिखते हैं कि: यह आयत इमाम अली अ.स. के बारे में नाज़िल हुई, जब अल्लाह ने पैग़म्बरे अकरम स.अ. को हुक्म दिया कि वह इमाम अली अ.स. की विलायत का ऐलान करें, लेकिन पैग़म्बर स.अ. लोगों के आरोप के कारण उस समय तक एलान नहीं कर सके थे, फिर यह आयत नाज़िल हुई, और पैग़म्बर स.अ. ने ग़दीरे ख़ुम में इमाम अली अ.स. का हाथ पकड़ कर फ़रमाया: जिसका मैं मौला हूं उसके यह अली अ.स. मौला हैं, ख़ुदाया तू उसे दोस्त रख जो अली अ.स. को दोस्त रखे और उसे दुश्मन रख जो अली अ.स. से दुश्मनी रखे। (रूहुल मआनी, आलूसी, जिल्द 5, पेज 67-68)

*फ़तहुल-क़दीर*

इस किताब में इस तरह से नक़्ल हुआ है कि, पैग़म्बरे अकरम स.अ. ने बुरैदा से कहा क्या मैं मोमिनीन पर ख़ुद उनसे ज़ियादा हक़ नहीं रखता? बुरैदा कहते हैं मैंने कहा: बिल्कुल आप को हक़ है, फिर पैग़म्बरे अकरम स.अ. ने फ़रमाया: जिसका मैं मौला हूं उसके अली अ.स. मौला हैं। (फ़तहुल-क़दीर, जिल्द 6, पेज 20) 

*तफ़सीरे राज़ी*

फ़ख़रुद्दीन राज़ी कहते हैं कि यह आयत इमाम अली अ.स. की शान में नाज़िल हुई है, और इसके नाज़िल होने के बाद रसूले ख़ुदा स.अ. ने इमाम अली अ.स. का हाथ पकड़ के फ़रमाया: जिसका मैं मौला हूं उसके यह अली अ.स. मौला हैं, ख़ुदाया तू उसे दोस्त रख जिसने अली अ.स. से दोस्ती रखी और उस से दुश्मनी रख जिसने अली अ.स. से दुश्मनी रखी, इसके बाद हज़रत उमर ने इमाम अली अ.स. से मुलाक़ात की और मुबारकबाद दे कर कहा कि आप मेरे और सभी मोमिन मर्द और औरतों के मौला हैं। (मफ़ातीहुल-ग़ैब, फ़ख़रुद्दीन राज़ी, जिल्ज 6, पेज 113) 

*इसके अलावा ग़दीर की हदीस को अहले सुन्नत की इन किताबों में भी देखा जा सकता है।* 

अल-इस्तीआब फ़ी मारेफ़तिल असहाब, जिल्द 1, पेज 338 

उस्दुल-ग़ाबा, जिल्द 1, पेज 2-3 

मुरव्वजुज़-ज़हब, जिल्द 1, पेज 346 

मुख़्तसर तारीख़े दमिश्क़ नाम की किताब में 12 अलग अलग रावियों से इस हदीस को नक़्ल किया गया है, जिल्द 2-3-4-5

मिरातुल-जिनान, जिल्द 1, पेज 51 

अल-मुख़तसर फ़ी अख़बारिल बशर, जिल्द 1, पेज 126 

तारीख़ुल ख़ुलफ़ा, जिल्द 1, पेज 69 

तारीख़े बग़दाद, जिल्द 3, पेज 333 

18 ZilHajj Yaum e Eid e Ghadeer kya hai ??

*Eid e Ghadeer Post

👉/ Eid e Ghadeer Ka Mukhtasar Tarruf.
👉/ Kya Eid e Ghadeer Raafzi Log Manaate Hain.???
👉/ Kya Eid e Ghadeer Manana Khulafa e Salasa Ki Khilafat Ka Inkaar Karna Hai.???
👉/ Kya Eid e Ghadeer Khalifa e Sooyem Ke Shahadat Ki Khushi Me Manaayi Jaati Hai.???
👉/ Yaum e Ailaan e Wila e Haidar Ko Eid Ka Din Kehna Kaisa Hai.???

“Hazrat Buraydah RadiyAllahu Ta’ala ‘Anhu Se Riwayat Hai Ki Mein Ne Hazrat Ali (کرم اللہ تعالیٰ وجہہ الکریم) Ke Saath Yaman Ke Ghazwah Me Sheerkat Kee Jis Me Mujhe Aap Se Kuchh Shikwa Huwa. Jab Mein Huzoor Nabiyye Akram (صلى الله عليه وآله وسلم)‎ Kee Khidmat Me Waapas Aaya To Mein Ne Huzoor Nabiyye Akram (صلى الله عليه وآله وسلم)‎ Se Hazrat Ali (کرم اللہ تعالیٰ وجہہ الکریم) Ka Zikr Karte Hu’e Un Ke Baare Me Tanqis Kee.
.
Mein Ne Dekha Ki Aap (صلى الله عليه وآله وسلم)‎ Ka Chehra Mubarak Mutaghayyir Ho Gaya Aur Aap (صلى الله عليه وآله وسلم)‎ Ne Farmaya : “Aye Buraydah! Kya Mein Mominin Kee Jaanon Se Qarib Tar Nahin Hoo’n?” To Mein Ne Arz Kiya : Kyun Nahin, Ya RasoolAllah (صلى الله عليه وآله وسلم)‎! Us Par Aap (صلى الله عليه وآله وسلم)‎ Ne Farmaya : Jis Ka Mein Mawla Hoo’n Us Ka Ali Mawla Hai.”
.
Is Hadith Ko Imam Ahmed Apni Musnad Me, Imam Nasa’i Ne “As-Sunan-ul-Kubra” Me Aur Imam Hakim Aur Ibn Abi Shaybah Ne Riwayat Kiya Hai Aur Imam Hakim Kehte Hain Ki Yeh Hadith Imam Muslim Kee Sharaa’it Par Sahih Hai.
.
Reference :
.
Ahmad Bin Hanba Fi Al-Musnad, 05/347, Al-Hadith Raqam-22995,

Nasa’i Fi As-Sunan-ul-Kubra, 05/130, Al-Hadith Raqam-8465,

Hakim Fi Al-Mustadrak ‘Ala Sahihayn, 03/110, Al-Hadith Raqam-4578,

Ibn Abi Shaybah Fi Al-Musannaf, 12/84, Al-Hadith Raqam-12181,

Kanz-ul-Matalib Fi Manaqibi ‘Ali Ibn Abi Talib KarramAllahu Waj’hahu,/28, 29, Al-Hadith Raqam-26.
.
اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلَی سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَ عَلَی اٰلِ سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَ بَارِکْ وَ س٘لِّمْ

Hazrat Ammar Bin Yasir (Radi-Allahu Anhu) Bayan Karte Hain Ke Maine Huzoor Nabi-E-Akram (Sallallahu Alaihe Wa Aalehi Wasallam) Ko Hazrat Ali Ke Liye Farmate Hue Suna:
“Aey Ali Mubarak Baad Ho Usey Jo Tujhse Muhabbat Karta Hai Aur Teri Tasdiq Karta Hai, Aur Halakat Ho Uske Liye Jo Tujhse Bughz Rakhta Hai Aur Tujhe Jhuthlata Hai.”
(Imaam Hakim,
IrfanusSunnah, Safa; 332).

*18 Zilhajj ko Roza rakhne ki zabardast Fazilat!*

Hazrat Abu Huraira RadiAllahu Anhu se riwayat hai ke jisne 18 Zil Hijja ko Roza rakha uske liye 60 mahino ke rozo ka sawaab likha jaega, aur ye Gadeer-e-Khum ka din tha jab Huzoor Nabi-e-Akram SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ne Hazrat Ali Alaihissalam ka Haath pakadkar farmaya: Kya Mai momino ka Wali nahi hun? Unhone arz kiya: Kyon nahi, Ya RasoolAllah! Aap SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallamne farmaya: Jiska Mai Maula Hun uska Ali Maula Hai. Is par Hazrat Umar ibne Khattab RadiAllahu Anhu ne farmaya: Mubarak ho! Ay Ibne Abi Talib! Aap Mere aur har musalman ke Maula tehre. (Is mauqa par) Allah Ta’ala ne ye Aayat Naazil farmayi:
“Aaj Maine Tumhare Liye Tumhara Deen Mukammal Kardiya.”

Tabrani, Mujam al Awsat, 3/324,
Khatib Baghdadi, Tarikh-e-Baghdad, 8/290
Ibne Asakir, Tarikh e Damishq al Kabir, 45/176, 177
Ibne Kaseer, Bidaya wan Nihaya, 5/464
Raazi, Tafseer Kabir, 11/139
Dr. Tahir-ul-Qadri, Kanzul Mattalib fee Manaqib Ali ibne Abi Talib Alaihi-Mussalam
As Sayful Jali ala munkir-e-Wilayat e Ali Alaihissalam

Allahumma Salle Ala Sayyedina wa Maulana Muhammadi Nin Nabiyyil Ummiyyil Habibil Aalil Qadril Azeemil Jaahi wa Ala Aalihi wa Sahbihi wa Baarik wa Sallim.

Jin logo ne Ghadeer-e-Khum ka Azeem Waqiya logo’n se chupaya wo duniya me ‘andhe’ hokar ya ‘bars’ ki haalat me mar gaye!

Abdur Rehman Bin Abi-Laila R.a.se riwayat hai ke Hazrat Sayyeduna Maula Ali Al-Murtaza Karram Allahu Wajhahaul Kareem ne logon se khitaab kiya aur farmaya:
Mai us Aadmi ko Allah aur Islam ki Qasam deta hun, Jisne Rasool-e-Akram SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ko Gadeer-e-Khum ke din Mera Haath Pakde hue ye farmate suna ho:
“Ay Musalmano! Kya Mai Tumhari Jaano Se Qareebtar Nahi Hu’n?”
Sabne jawab diya: Kyon nahi, Ya RasoolAllah! Aap SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ne farmaya:
“Jiska Mai Maula Hun uska Ali Maula Hai,
Aye Allah! Jo Isey Dost rakhe Tu usey Dost rakh, jo Is (Ali) se adawat rakhe Tu us se adawat rakh, jo Iski madad kare Tu uski madad farma,
jo Iski ruswaayi chahe Tu usey ruswa kar?”
Is par 13 se Zaa’ed Afraad ne khade hokar gawahi di aur JIN LOGO NE YE BAATE’N CHUPAAYI WO DUNIYA ME “ANDHE YA BARS” KI HAALAT ME MAR GAYE.
References;
Hisamuddin Hindi, Kanzul Ummal, 13/131, Hadees 36417
Ibne Asakir, Tarikh e Damishq al Kabeer, 45/158
Kanzul Mattalib fee Manaqib Ali ibne Abi Talib Alaihi-Mussalam, Hadees 57.

Ye Youm e Ghadeer-e-Khum ka Faiz hai ke aaj hum sab Musalman hain.

Kuch log samjhtey hain ke “Man Kuntu Maula Fa Aliyyum Maula” se ummat ko kuch lena dena nahi, ye Hazrat Ali RadiAllahu Anhu ki Fazilat me ek Hadees hai bus aur kuch nahi. Aisa samjhne waale parley darje ke jahil hain aur aiso ko chahiye ke apne aapko musalman kehna chod den. Kyu?
Huzoor Nabi-e-Akram SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ki Aamad Aamad se pehle, puri duniya me insaniyat ko hidayat dene keliye ek ke baad ek Ambiya Alaihi-Mussalam aate they. Jab Aaqa SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam tashreef laaye to Aap Khatamul Mursaleen they yaani Aakhri Nabi! Aap SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam Qayamat tak aur hamesha keliye sabke Nabi, Aapke baad koi naya Nabi nahi aayega. To yw ummat to hazaro, laakho, shayad karodo saal bhi baaki rahegi, to daur badalte jayenge naye naye fitne aayenge, to ummat ko rehnumayi ki zarurat hogi. Magar koi Nabi to ab nahi aayega isliye Allah Ta’ala ne is ummat pe Wilayat ka Darwaza khola.
Aur Aaqa SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ne Apne Wisaal Mubarak se 3 Mahine pehle Hazaron Sahaba ke Majme me Sayyeduna Maula Ali ul Murtaza KarramAllahu Wajhahul Kareem ka Haath Buland karke farmaya: “Jiska Mai Maula aur Wali Hun, Ali bhi uska Maula aur Wali hai!”

Yaani Aaqa SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ne Sayyeduna Ali RadiAllahu Anhu ko “Fatehe Wilayat” yaani Wilayat ka Kholne wala banaya aur Apna Khalifa-e-Baatin banaya. Ye Nizam-e-Roohaniyat hai. Khilafat-e-Zahiri me sabse pehle Khalifa Sayyeduna Abu Bakr Siddiq RadiAllahu Anhu hue. Magar Khilafat e Zahiri sirf 30 saalon keliye thi. Khilafat-e-Batini Qayamat tak rahegi!

Ye Wilayat-e-Uzma hai yaani Badi Wilayat, aur sabse pehle Wali Maula Ali Alaihissalam hue, fir Sayyeda-e-Kainat Salamullahi Alaiha fir Hasnain Kareemain Alaihi-Mussalam, fir ek baad ek total 11 Imam-e-Ahle Bayt hue jo Mamba-e-Wilayat hain. Imam Hasan al Askari Alaihissalam ke baad Ye Khilafat Sarkar Gaus-e-Aazam Shaykh Abdul Qadir Jeelani RadiAllahu Anhu ke paas aayi. Ab Imam Mahdi Alaihissalam ke Zahoor tak Ye Aap faisla karte hain ke kisko Wali banana hai kisko nahi. Baaki duniya me jitne Wali hain un sabko Wilayat-e-Sugra yaani “Choti Wilayat” nasib hoti hai.

Jab Sayyeduna Imam Muhammad Mahdi Alaihissalam Tashreef layenge to Aap bhi Wilayat-e-Uzma pe honge aur Aap pe Wilayat ka Darwaza band hojayega yaani Aapke baad koi Wali nahi ban sakega qki Aapke baad Qayamat aajayegi.


To Ye Auliya ka Roohani Nizaam 18 Zilhaj 10 Hijri se is ummat me shuru hua. Aur dekho duniya Islam sirf Auliya ke zariye faila hai! India me Islam hai wo Sarkar Gareeb Nawaz RadiAllahu Anhu ke Sadqe. Ye Youm-e-Ghadeer e Khum ka Faiz hai jo Aaj tak Ummat me jaari hai. Isliye hum shukr aur khushi manate hain ke kyunke Ye Isi Din ki Barkat hai ke aaj hum Musalman hain.

Hadith (Prophetic Narration) which is narrated_by_146 Sahabah/Taba’een and reported_by_150+ Muhaddith’een in 163 Hadith Books!

قلَ النبی (ﷺ) “مَنْ كُنْتُ مَوْلاَهُ فَعَلِيٌّ مَوْلاَهُ”
Holy Prophet (ﷺ) “One who has Me as his Master has ‘Ali as his Master.”

Narrated_By:
▪️AbdAllah Bin ‘Abbas
▪️Asbagh Bin Nubatah
▪️Aboo Ayyub Ansari
▪️Umar Al-Farooq Bin Khattab
▪️Anas Bin Malik
▪️Bara’ Bin ‘Aazib
▪️Thabit Bin Wadi’ah Ansari
▪️Jabir Bin ‘Abd Allah
▪️Sa‘d Bin Abi Waqqas
▪️Aboo Sa‘iyd Khudri
▪️Habib Bin Budayl
▪️Hudhayfah Bin Usayd Ghaffari
▪️Hasan Bin Haarith
▪️Zirr Bin Hubaysh
▪️Ziyad Bin Abi Ziyad
▪️Ziyad Bin Haarith
▪️AbdAllah Bin ‘Umar
▪️Khuzaymah Bin Saabit
▪️Rafa’ah Bin Iyaas Dabbi
▪️Ali Bin Husayn
▪️Ammar Bin Yaasir
▪️Sufyan Bin ‘Uyaynah
▪️Sahl Bin Hunayf
▪️Talhah Bin Ubaydullah
▪️Amir Bin Sa’d Bin Abi Waqqas
▪️Abd-ur-Rahman Bin Abi Layla
▪️Abd-ur-Rahman Bin Saabit
▪️Abdur Rahman Bin ‘Abdur Rabb Ansari
▪️Abd Allah Bin Saabit
▪️Aboo Fadalah Ansari
▪️Maalik Bin Huwayrith
▪️Muhammad Bin Hanafiyyah
▪️Muhammad Bin ‘Ali
▪️Najiyah Bin Amr
▪️Nu‘man Bin ‘Ajlan Ansari + 111 more Sahabah/Taba’een! (Ridwan’ullahe Ta’ala Alaihim Ajma’een) ❤

#References:-
📚Tirmidhi Fi Al-Jami’ As-Sahih, Abwab Al-Manaqib, 06/79, Raqm-3713,
📚Ahmad Bin Hanbal, 02/569, Raqam959,
📚Ibn Hajar ‘Asqalani Fi Ta’jil-ul-Manfa’ah Bi-Zawa’id Rijal Al-A’immah Al-Arba’ah,/464, Raqm-1222,
📚 Hakim Fi Al-Mustadrak, 03/134, Raqm-4652,
📚 Tabarani Fi Al-Mu’jam-ul-Kabir, 12/78, Raqm-12593,
📚 Ibn Abi ‘Asim Fi As-Sunnah,/603, 604, Raqm-1361, 1363, 1364, 1367, 1370,
📚 Nawawi Fi Tahdhib-ul-Asma’ Wa Al-Lughat, 01/347,
📚 Ibn ‘Asakir Fi Tarikh Dimashq Al-Kabir (Tarikh Ibn Asakir), 45/163,164,
📚 Ibn Athir Fi Usd-ul-Ghabah Fi Ma’rifat-is-Sahabah,06/132,
📚 Ibn Kathir Fi Al-Bidayah Wa An-Nihayah, 05/451,
📚Khatib Al-Baghdadi Fi Tarikh Baghdad, 12/343,
📚 Haythami, Majma-uz-Zawa’id, 09/108,
📚 Ibn Abi ‘Asim Fi As-Sunnah : 602, Raqm-1355,
📚 Ibn Abi Shaybah Fi Al-Musannaf, 06/366, Raqm-32072,
📚 Khasa’is Amir Al-Mu’minin ‘Ali Ibn Abi Talib/88, Raqm-80,
📚 Ibn Abi ‘Asim Fi As-Sunnah,/602, 605, Raqm-1358, 1475,
📚 Maqdisi Fi Al-Ahadith-ul-Mukhtarah Aw Al-Mustakhraj Mina Al-Ahadith Al-Mukhtarah, 03/139, Raqm-937,
📚Hisam-ud-Deen Hindi Fi Kanz-ul-’Ummal, 11/608, Raqm-32946… +145 more Hadith Books!

“(Khud) Hazrat ‘Ali KarramAllahu Ta’ala Waj’hah-ul-Karim Se Riwayat Hai Ki Rasoole Akram SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam Ne Ghadir Khum Ke Din Aise Amaame Se Meri Dastaarbandi Karwaayi Us Ka Shamla Pichhe Latka Diya Phir Farmaya : “Allah Ta’ala Ne Badr-o-Hunayn Me (Jin) Firishto’n Ke Zari’e Meri Madad Kee, Unhone Isi Heybat Ke Amaame Baandh Rakkhe They.” Phir Aap SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam Ne Farmaya : “Be Shak Imamah Kufr Aur Iman Ke Darmiyan Farq Karne Waala Hai.”

1-Tayalisi Fi Al-Musnad,/23, Raqm-154,
2-Bayhaqui Fi As-Sunan-ul-Kubra, 1/14,
3-Hisam-ud-Deen Hindi Fi Kanz-ul-’Ummal, 15/306,
482, Raqm-41141, 41909,
Hisam-ud-Deen Hindi Ne Kaha Hai Ki Is Hadith
Ko Tayalisi Ke Ilaawa Bayhaqi, Tabarani, Ibn Abi
Shaybah Aur Ibn Muni’ Ne BhIi Riwayat Kiya Hai.

Ghadeer ke Din Garmi Bahot Thi! 😁

“Hazrat Maymoon Aboo ‘Abd Allah Bayan Karte Hain Ki Mein Ne Zayd Bin Arqam RadiyAllahu Ta’ala ‘Anhu Ko Yeh Kehte Hu’e Suna : Hum Rasoole Akram SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam Ke Saath Ek Waadi…. Jise Waadi-e-Khum Kaha Jaata Tha…. Me Utre Pas Aap SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam Ne Namaz Ka Hukm Diya Aur Sakht Garmi Me Jama’at Karwaayi. Phir Hamein Khutba Diya Dar Hala’n Ki Rasoole Akram SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam Ko Sooraj Kee Garmi Se Bachaane Ke Li’e Darakht Par Kapda Latka Kar Saaya Kiya Gaya. Aap SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam Ne Farmaya : “Kya Tum Nahin Jaante Ya (Is Baat Kee) Gawaahi Nahin Dete Ki Mein Har Momin Kee Jaan Se Qarib Tar Hoo’n?” Logo’n Ne Kaha : Kyoo’n Nahin! Aap SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam Ne Farmaya : “Pas Jis Ka Mein Mawla Hoo’n Us Ka ‘Ali Mawla Hai, Aye Allah! Too Us Se Adaawat Rakkh Jo Is Se Adaawat Rakkhe Aur Use Dost Rakkh Jo Ise Dost Rakkhe.”

1-Ahmad Bin Hanbal Fi Al-Musnad, 04/372,
2-Bayhaqui Fi As-Sunan-ul-Kubra, 05/131,
3-Tabarani Ne Yeh Hadith “Al-Mu’jam-ul-Kabir (05/195, Raqm-5068)” Me Ek Aur Sanad Se Riwayat Kee Hai.
4-Haythami Fi Majma’-uz-Zawa’id Wa Manba’-ul-Fawa’id, 09/104,
5-Hisam-ud-Deen Hindi Fi Kanz-ul-’Ummal, 13/157, Raqm-36485,
6-Ibn ‘Asakir Fi Tarikh Dimashq Al-Kabir (Tarikh Ibn ‘Asakir), 45/166,
7-Ibn Kathir Ne “Al-Bidayah Wa An-Nihayah
(04/172)” Me Is Riwayat Kee Sanad Ko Jayyad Aur Rijaal Ko Thiqah Qaraar Diya Hain.

Ye saare un Ahadees ke references hain jinme Waqiya Ghadeer-e-Khum ya RasooAllah SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ke Maula Ali Alaihissalam ke liye farmana:
MAN KUNTU MAULA HU FA ALIYYUM MAULA HU
Jiska Mai Maula hun uska Ali Maula hai
Ya farmaya:
“Ali har Momin ka Wali hai”

In Ahadees ko 146 Jalilul Qadr Sahaba-e-Kiraam ne Riwayat kiya hai aur 163 Aaimma-e-Hadees apni Kitaab me darj kiya hai.

REFERENCES:

Tirmidhi, Al-Jami’ As-Sahih, 06/79, Raqam-3713,
Ahmad Bin Hanbal, 02/569, Raqam959,
Mahamli/85,
Ibn Abi Asim, As-Sunnah,/603, 604, Raqam-1361, 1363, 1364, 1367, 1370,
Tabarani, Al-Mu’jam-ul-Kabir, 05/195, 204, Raqam-5071, 5096,
Nawawi, Tehdhib-ul-Asma’, 01/347,
Ibn Asakir, Tarikh Dimishq Al-Kabir, 45/163,164,
Ibn Athir, Asad-ul-Ghabah, 06/132,
Ibn Athir, An-Nihayah, 05/228,
Ibn Kathir, Al-Bidayah wan-Nihayah, 05/463,
Ibn Hajar Asqalani, Ta’jil Al-Munaffa’h,/464, Raqam-1222,

Hakim, Al-Mustadrak, 03/134, Raqam-4652,
Tabarani, Al-Mu’jam-ul-Kabir, 12/78, Raqam-12593,
Khatib Al-Baghdadi, Tarikh Baghdad, 12/343,
Ibn Asakir, Tarikh Dimashq Al-Kabir, 45/77, 144,
Ibn Kathir, Al-Bidayah Wan-Nihayah, 05/451,
Haythami, Majma-uz-Zawa’id, 09/108,
Ibn Abi Asim, As-Sunnah : 602, Raqam-1355,
Ibn Abi Shaybah, Al-Musannaf, 06/366, Raqam-32072,
Ibn Abi Asim, As-Sunnah : 602, Raqam-1354,
Tabarani, Al-Mu’jam-ul-Kabir,04/173, Raqam-4052,
Tabarani Al-Mu’jam-ul-Awsat, 01/229, Raqam-348,
Nasa’i Khasa’is Amir-ul-Mominin Ali Bin Abi Talib KarramAllahu Ta’ala Waj’hahul Kareem,/88, Raqam-80,
Ibn Abi Asim, As-Sunnah,/602, 605, Raqam-1358, 1475,
Ziya’ Maqdisi, Al-AHadees-ul-Mukhtarah, 03/139, Raqam-937,
Ibn Asakir, Tarikh Dimashq Al-Kabir, 20/114,
Abd-ur-Razzaq, Al-Musannaf, 11/225, Raqam-20388,
Tabarani, Al-Mu’jam-us-Saghir, 01/71,
Ibn Asakir, Tarikh Dimashq Al-Kabir, 45/143,
Ibn Asakir Ne “Tarikh Dimashq Al-Kabir (45/143)
Ibn Abi Asim, As-Sunnah,/601, Raqam-1353,
Ibn Asakir, Tarikh Dimashq Al-Kabir, 45/146,
Ibn Kathir, Al-Bidayah Wan-Nihayah, 05/457,
Hisam-ud-Deen, Kanz-ul-Ummal, 11/602, Raqam-32904,
Ibn Abi Asim, As-Sunnah, /602, Raqam-1359,
Hisam-ud-Deen, Kanz-ul-Ummal, 11/608, Raqam-32946,
Tabarani, Al-Mu’jam-ul-Kabir, 19/252, Raqam-646,
Ibn Asakir, Tarikh Dimashq Al-Kabir, 45/177,
Haythami, Majma-uz-Zawa’id, 09/106,
Tabarani Ne Ye Hadees “Al-Mu’jam-ul-Kabir (03/179, Raqam-3049)”
Tirmidhi, Al-Jami’ As-Sahih, 06/78, Raqam-3712,
Nasa’i, Khsa’is Amir-ul-Mominin Ali Bin Abi Talib KarramAllahu Ta’ala Waj’hahul Kareem,/77, 92, Raqam-65, 86,
Nasa’i, As-Sunan-ul-Kubra, 05/132, Raqam-8484,
Ahmad Bin Hanbal Ki “Al-Musnad (04/437, 438)”
Ibn Kathir Ne Imam Ahmad Ki Riwayat “Al-Bidayah Wan-Nihayah (05/458)” Me Naqal Ki Hai.
Ahmad Bin Hanbal, Faza’il As-Sahaba, 02/620, Raqam-1060,
Ibn Abi Shaybah, Al-Musannaf, 12/80, Raqam-12170,
Hakim Ne “Al-Mustadrak (03/110, 111, Raqam-4579)
Ibn Hibban Ne “As-Sahih (15/373, 374, Raqam-6929)”
Abu Ya’la Ne “Al-Musnad (01/293, Raqam-355)”
Tayalisi Ki “Al-Musnad (Shafah/111, Raqam-829,
Abu Nu’aym, Hilyat-ul-Awliya’ Wa Tabqat-ul-Asfiya’, 06/294,
Muhib Tabari, Al-Riyad-un-Nadarah Fi Manaqib-ul-Ashrah, 03/129,
Haythami, Mawarid-uz-Zaman,/543, Raqam-2203,
Hisam-ud-Deen Hindi, Kanz-ul-Ummal, 13/142, Raqam-36444,
Ibn Majjah Ne Ye Sahih Hadees “As-Sunan (01/90, Al-Muqaddimah, Raqam-121)”
Nasa’i Ne Ye Hadees “Khasais-E-Amir-ul-Mominin Ali Bin Abi Talib KarramAllahu Ta’ala Waj’hahul Kareem (Shafah,/32, 33, Raqam-91)”
Ibn Abi Aasim, Kitab-us-Sunnah,/608, Raqam-1386,
Mizzi, Tuhfat-ul-Ashraf Bi-Marifat-il-Atraf, 03/302, Raqam-3901.
Ibn Majah, As-Sunan, 01/88, Al-Muqaddimah, Raqam-112,
Ibn Abi Asim Ne “Kitab-us-Sunnah (Safah-603, Raqam-1362)
Ibn Kathir, Al-Bidayah Wan-Nihayah, 04/168,
Hisam-ud-Deen Hindi, Kanz-ul-Ummal, 11/602, Raqam-32904,
Ibn Asakir, Tarikh Dimishq Al-Kabir, 45/167, 168,
Yah Hadees Sahih Hai.]
Ahmad Bin Hanbal Ne “Al-Musnad (04/281
Ibn Abi Shaybah, Al-Musannaf, 12/87, Raqam-12167,
Muhib Tabari, Zakha’ir-ul-Uqba Fi Manaqib Zawi-ul-Quraba,/125,
Muhib Tabari, Al-Riyad-un-Nadarah Fi Manaqib-ul-Ashrah, 03/126, 127,
Manawi Ne “Fayd-ul-Qadir (06/217)
Hisam-ud-Deen Hindi, Kanz-ul-Ummal, 13/133, 134, Raqam-36420,
Ibn Asakir, Tarikh Dimishq Al-Kabir, 45/167, 168,
Imam Ahmad Bin Hanbal Ne Apni Kitab “Faza’il-us-Sahabah (02/610, Raqam-1042)
Ibn Athir, Usd-ul-Ghabah, 04/103,
Dhahabi Ne Siyar Aalam An-Nubula’ (02/623, 624)
Ibn Kathir, Al-Bidayah Wan-Nihayah, 04/169,
Ibn Kathir, Al-Bidayah Wan-Nihayah, 05/464.
Ahmad Bin Hanbal, Al-Musnad, 05/361,
Ahmad Bin Hanbal, Faza’il-us-Sahaba, 02/563, Raqam-947,
Ibn Abi Aasim, Kitab-us-Sunnah,/601, 603, Raqam-1351, 1366,
Hakim, Al-Mustadrak, 02/131, Raqam-2589,
Ibn Abi Shaybah, Al-Musannaf, 12/57, Raqam-12114,
Tabarani, Al-Mu’ajam-ul-Kabir, 05/166, Raqam-4968,
Tabarani, Al-Mu’ajam-ul-Awsat, 03/100, 101, Raqam-2204,
Haythami, Majama’-uz-Zawa’id, 09/108,
Ibn Asakir, Tarikh Dimishq Al-Kabir, 45/143,
Ibn Asakir Ye Hadees “Tarikh Dimishq Al-Kabir (45/142).
Hisam-ud-Deen Hindi, Kanz-ul-Ummal, 11/602, Raqam-32905,
Kanz-ul-Ummal (15/168, 169, Raqam-36511)
Hakim, Al-Mustadrak, 03/109, Raqam-4576,
Nasa’i, As-Sunan-ul-Kubra, 05/45, 130, Raqam-8148, 8464,
Ibn Abi Aasim Ne “As-Sunnah (Saath,/644, Raqam-1555)” Tabarani, Al-Mu’jam-ul-Kabir, 05/166, Raqam-4969,
Nasa’i Ne “Khsa’is Amir-ul-Mominin Ali Bin Abi Talib KarramAllahu Ta’ala Waj’hahul Kareem (Shafah,/84, 85, Raqam-76)”
Abu Mahasin Ne “Al-Muatasar Min Al-Mukhtasar Min Mushkil-ul-Athar, (02/301)” Me Naqal Ki Hai.]
Hakim, Al-Mustadrak, 03/109, 110, Raqam-4577,
Ibn Kathir, Al-Bidayah Wan-Nihayah, 04/168,
Ibn Asakir, Tarikh Dimishq Al-Kabir, 45/164,
Hisma-ud-Deen Hindi, Kanz-ul-Ummal, 01/381, Raqam-1657.]
Hakim, Al-Mustadrak, 03/533, Raqam-6272,
Tabarani, Al-Mu’jam-ul-Kabir, 05/171, 172, Raqam-4986,
Hisam-ud-Deen Hindi, Kanz-ul-Ummal, 11/602, Raqam-32904,
Nasa’i, Khsa’is Amir-ul-Mominin Ali Bin Abi Talib KarramAllahu Ta’ala Waj’hahul Kareem, 33, 34, 88, Raqam-10, 80,
Shashi Ne “Al-Musnad (01/165, 166, Raqam-106)
Ibn Asakir Ne “Tarikh Dimishq Al-Kabir (45/88)
Hisam-ud-Deen Hindi Ne “Kanz-ul-Ummal (15/163, Raqam-36496)”
Ibn Abi Aasim, Kitab-us-Sunnah,/607, Raqam-1385,
Ahmad Bin Hanbal, Faza’il-us-Sahaba, 02/643, Raqam-1093,
Ziya’ Maqdisi, Al-AHadees-ul-Mukhtarah, 03/151, Raqam-948,
Ibn Asakir Ne “Tarikh Dimishq Al-Kabir (45/89, 91)
Ibn Abi Aasim, Kitab-us-Sunnah,/608, Raqam-1386,
Ibn Abi Shaybah, Al-Musannaf, 12/61, Raqam-12127,
Ziya’ Maqdisi, Al-AHadees-ul-Mukhtarah, 03/207, Raqam-1008,
Ibn Asakir, Tarikh Dimishq Al-Kabir, 45/88, 89,
Hakim, Al-Mustadrak, 03/371, Raqam-5594,
Bayhaqi, Al-I’tiqad,/373,
Ibn Asakir, Tarikh Dimishq Al-Kabir, 27/76,
Haythami Ne “Majma’-uz-Zawa’id (09/107)
Hisam-ud-Deen Hindi, Kanz-ul-Ummal, 11/332, Raqam-31662.]
Ahmad Bin Hanbal, Al-Musnad, 05/347,
Ahmad Bin Hanbal, Faza’il-us-Sahaba, 02/584, 585, Raqam-988,
Nasa’i, As-Sunan-ul-Kubra, 05/130, Raqam-8465,
Nasa’i, Khsa’is Amir-ul-Mominin Ali Bin Abi Talib KarramAllahu Ta’ala Waj’hahul Kareem,/86, Raqam-78,
Hakim, Al-Mustadrak, 03/110, Raqam-4578,
Ibn Abi Shaybah, Al-Musannaf, 12/84, Raqam-12181,
Ibn Abi Aasim, Al-Ahad Wal-Mathani, 04/325, 326,
Shashi, Al-Musnad, 01/127,
Tabarani, Al-Mu’jam-ul-Awsat, 01/229, Raqam-348,
Mubarakpoori, Tohafat-ul-Ahwdhi, 10/147,
Abu Nu’aym, Hilyat-ul-Awliya’ Wa Tabqat-ul-Asfiya’, 04/23,
Ibn Asakir, Tarikh Dimishq Al-Kabir, 45/142, 146, 148,
Muhib Tabari, Al-Riyad-un-Nadarah Fi Manaqib-ul-Ashrah, 03/128,
Ibn Kathir Ne “Al-Bidayah Wan-Nihayah (04/168, 05/457
Hisam-ud-Deen Hindi, Kanz-ul-Ummal, 13/134, Raqam-36422.]
Ahmad Bin Hanbal, Al-Musnad, 04/372,
Bayhaqi, As-Sunan-ul-Kubra, 05/131,
Tabarani Al-Mu’jam-ul-Kabir (05/195, Raqam-5068
Haythami, Majma’-uz-Jaaa’id, 09/104,
Hisam-ud-Deen Hindi, Kanz-ul-Ummal, 13/157, Raqam-36485,
Ibn Asakir, Tarikh Dimishq Al-Kabir, 45/166,
Ibn Kathir Ne “Al-Bidayah Wan-Nihayah (04/172)
Ahmad Bin Hanbal, Al-Musnad, 04/368,
Ahmad Bin Hanbal, Faza’il-us-Sahaba, 02/586, Raqam-992
Nasa’i Safah,/97, Raqam-92)
Tabarani, Al-Mu’jam-ul-Awsat, 05/195, Raqam-5070,
Ibn Asakir, Tarikh Dimishq Al-Kabir, 45/165,
Hisam-ud-Deen Hindi, Kanz-ul-Ummal, 13/105, Raqam-36343,
Hisam-ud-Din Hindi Kanz-ul-Ummal (13/104, 105, Raqam-36342
Ibn Abi Shaybah, Al-Musannaf, 12/59, Raqam-12121,
Ibn Asakir, Tarikh Dimishq Al-Kabir, 45/169, 170, 172,
Dhahabi, Ne “Siyar Aalam-un-Nubula’ (07/570, 571)
Ibn Kathir Al-Bidayah Wan-Nihayah (04/173
Hisam-ud-Deen Hindi, Kanz-ul-Ummal, 13/137, Raqam-32433.]
Ibn Abi Aasim, Kitab-us-Sunnah,/603, Raqam-1360,
Ibn Asakir, Tarikh Dimishq Al-Kabir, 45/161, 162,
Hisam-ud-Deen Hindi Ne Ye Hadees “Kanz-ul-Ummal (13/140, Raqam-36441)
Tabarani, Al-Mu’jam-ul-Kabir, 03/180, 181, Raqam-3052,
Tabarani, Al-Mu’jam-ul-Kabir, 03/67, Raqam-2683,
Tabarani, Al-Mu’jam-ul-Kabir, 05/166, 167, Raqam-4971,
Haythami, Majma’-uz-Zawa’id, 09/164, 165,
Hisam-ud-Deen Hindi, Kanz-ul-Ummal, 01/188, 189, Raqam-957, 958,
Ibn Asakir, Tarikh Dimishq Al-Kabir, 45/166, 167,
Ibn Asakir Tarikh Dimishq Al-Kabir (45/169)

#حدیث_غدیر اور #منابع_اہل_سنت
غدیر خم کے مقام پر رسول اکرم صلی اللہ علیہ وآلہ نے فرمایا : من کنت مولاہ فعلی مولاہ
جس کا میں مولا ہوں اس کے علی مولا ہیں۔
اس حدیث مبارک کو درج ذیل علماءاہل سنت نے اپنی کتب میں ذکر کیا گیا ہے
امام محمد بن اسماعیل بخاری
البخاري – التاريخ الكبير – الجزء : ( 1 ) -صفحہ نمبر : ( 375 )
البخاري – التاريخ الكبير – الجزء : ( 4 ) -صفحہ نمبر : ( 193 )
امام احمد بن حنبل
مسند أحمد – مسند العشرة المبشرين بالجنة – ومن مسند علي بن أبي طالب (ر) – حديث نمبر : ( 606 )
مسند أحمد – مسند العشرة المبشرين بالجنة – ومن مسند علي بن أبي طالب (ر) – حديث نمبر: ( 633 )
مسند أحمد – مسند العشرة المبشرين بالجنة – ومن مسند علي بن أبي طالب (ر) – حديث نمبر: ( 906 )
مسند أحمد – مسند العشرة المبشرين بالجنة – ومن مسند علي بن أبي طالب (ر) – حديث نمبر: ( 915 )
مسند أحمد – مسند العشرة المبشرين بالجنة – ومن مسند علي بن أبي طالب (ر) – حديث نمبر: ( 918 )
مسند أحمد – مسند العشرة المبشرين بالجنة – ومن مسند علي بن أبي طالب (ر) – حديث نمبر: ( 1242 )
مسند أحمد – ومن مسند بني هاشم – باقي المسند السابق – الحديث نمبر: ( 2903 )
مسند أحمد – حديث البراء بن عازب (ر) – أول مسند الكوفيين – حديث نمبر : ( 17749 )
مسند أحمد – حديث زيد بن أرقم (ر) – أول مسند الكوفيين – حديث نمبر: ( 18476 )
مسند أحمد – أول مسند الكوفيين – حديث زيد بن أرقم (ر) – حديث نمبر: ( 18497 )
مسند أحمد – أول مسند الكوفيين – حديث زيد بن أرقم (ر) – حديث نمبر: ( 18519 )
مسند أحمد – أول مسند الكوفيين – حديث زيد بن أرقم (ر) – حديث نمبر: ( 18522 )
مسند أحمد – أول مسند البصريين – حديث عمران بن حصين (ر) – حديث نمبر: ( 19081 )
مسند أحمد – باقي مسند الأنصار – بريدة الأسلمي (ر) -حديث نمبر: ( 21867 )
مسند أحمد – باقي مسند الأنصار – حديث بريدة الأسلمي (ر) – حديث نمبر: ( 21934 )
مسند أحمد – أحاديث رجال من أصحاب النبي (ص) – باقي مسند الأنصار -حديث نمبر: ( 22062 )
مسند أحمد – حديث أبي أيوب الأنصاري (ر) – باقي مسند الأنصار – حديث نمبر: ( 22461 )
أحمد بن حنبل – فضائل الصحابة – فضائل علي (ع) الرقم 915 ،927،935،957،959،960،973،981،982 986، 987، 999، 1006، 1012، 1024، 1058، 1069، 1131، 1138، 1140، 1167
امام حاکم نیشاپوری
مستدرك الحاكم – كتاب قسم الفيئ – والأصل من كتاب الله عز وجل -حديث نمبر: ( 2589 )
مستدرك الحاكم – كتاب معرفة الصحابة (ر) – ومن مناقب أمير المؤمنين علي (ع) – حديث نمبر: ( 4576 )
مستدرك الحاكم – كتاب معرفة الصحابة (ر) – ومن مناقب أمير المؤمنين علي (ع) – حديث نمبر: ( 4576 )
مستدرك الحاكم – كتاب معرفة الصحابة (ر) – ومن مناقب أمير المؤمنين علي (ع) – حديث نمبر: ( 4577 )
مستدرك الحاكم – كتاب معرفة الصحابة (ر) – ومن مناقب أمير المؤمنين علي (ع) – حديث نمبر: ( 4577 )
مستدرك الحاكم – كتاب معرفة الصحابة (ر) – ومن مناقب أمير المؤمنين علي (ع) – حديث نمبر: ( 4579 )
مستدرك الحاكم – كتاب معرفة الصحابة (ر) – كتاب معرفة الصحابة – حديث نمبر: ( 4601 ).. – حديث نمبر: ( 6272 ) – حديث نمبر: ( 5594 ) – حديث نمبر : ( 4655 )
علامہ ناصر الدین البانی
كتب تخريج الحديث النبوي الشريف – الحديث نمبر: ( 94 )- حديث نمبر: ( 118 )
– حديث نمبر: ( 1750 )
امام ترمذی
سنن الترمذي – المناقب عن رسول الله – مناقب علي بن أبي طالب (ر) – حديث نمبر: ( 3645 )
سنن الترمذي – المناقب عن رسول الله – مناقب علي بن أبي طالب (ر) – حديث نمبر: ( 3646 )
امام طحاوی
الطحاوي – مشكل الآثار – باب بيان مشكل 1517، 1518
علامہ ابن حجر
المطالب العالية – كتاب المناقب – باب مناقب علي (ع) حدیث نمبر4028، 4029، 4030، 4043، 4044،
ابن ابی شیبہ
المصنف – كتاب الفضائل – فضائل علي (ع) حدیث نمبر 31446 ،
المصنف – الجزء : ( 7 ) – صفحہ نمبر: ( 495 ) حدیث نمبر31453،
المصنف – الجزء : ( 7 ) – صفحہ نمبر: ( 496 )حدیث نمبر31454
المصنف – الجزء : ( 7 ) -ط نمبر: ( 497 ) حدیث 31474،31475،31501،31504، 31515
ابونعیم اصفہانی
فضائل الخلفاء الراشدين – فضيلة أخرى لأمير المؤمنين علي (ع) حدیث 17,18,19,89
أخبار إصبهان – باب الألف الحدیث نمبر329،415، باب الباء حدیث نمبر 858 ،1174 ،باب العين 1807 ، باب لأم الف
2082 ، باب الزاي2605
دیگر کتب
إبن عساكر – تاريخ مدينة دمشق – الجزء : ( 13 ) -صفحہ نمبر: ( 69 )
الطبراني – المعجم الصغير – الجزء : ( 1 ) – صفحہ نمبر: ( 64 )
الذهبي – تذكرة الحفاظ – الجزء : ( 1 ) – صفحہ نمبر: ( 10 )
الذهبي – تذكرة الحفاظ – الجزء : ( 3 ) – صفحہ نمبر: ( 1043 )
الذهبي – ميزان الإعتدال – الجزء : ( 2 ) – صفحہ نمبر: ( 640 )
الذهبي – سير أعلام النبلاء – الجزء : ( 8 ) – صفحہ نمبر: ( 334 )
إبن كثير – البداية والنهاية – الجزء : ( 5 ) – صفحہ :نمبر ( 228 )
إبن كثير – البداية والنهاية – الجزء : ( 5 ) -صفحہ نمبر: ( 230 )
الخطيب البغدادي – تاريخ بغداد – الجزء : ( 3 ) – صفحہ نمبر: ( 94 )
الخطيب البغدادي – تاريخ بغداد – الجزء : ( 7 ) – صفحہ:نمبر ( 388 )
المناوي – فيض القدير شرح الجامع الصغير – الجزء : ( 4 ) -صفحہ نمبر: ( 470 )
السيوطي – الدر المنثور – سورة المائدة – الجزء : ( 2 ) – صفحہ نمبر: ( 298 )
السيوطي – الجامع الصغير – الجزء : ( 2 ) – صفحہ نمبر: ( 177 )
عبدالله بن عدي – الكامل – الجزء : ( 3 ) -صفحہ نمبر: ( 80 )
الطبري – ذخائر العقبى -الصفحة نمبر: ( 67 )
الموفق الخوارزمي – المناقب – صفحہ نمبر: ( 6 )
الدولابي – الكنى والأسماء – باب الحاء 229
إبن شاهين – شرح مذاهب أهل السنة – فضيلة لعلي (ع)۸۳
المزي – تهذيب الكمال – الجزء : ( 3 ) – صفحہ نمبر: ( 440 )
القندوزي الحنفي – ينابيع المودة – الجزء : ( 1 ) – صفحہ نمبر : ( 97 )
أبي بكر الشافعي – الفوائد الشهير بالغيلانيات – من كنت مولاه فعلي مولاه 109
الزرندي الحنفي – تظم درر السمطين -صفحہ نمبر: ( 93 )
الحاكم الحسكاني – شواهد التنزيل – الجزء : ( 1 ) – صفحہ نمبر : ( 200 / 201 / 202 )
الصالحي الشامي – سبل الهدى والرشاد – الجزء : ( 11 ) – صفحہ نمبر : ( 292 )
إبن أبي الحديد – شرح نهج البلاغة – الجزء : ( 2 ) – صفحہ نمبر : ( 288 )
العجلوني – كشف الخفاء – الجزء : ( 2 ) – صفحہ نمبر: ( 274 )
سنن إبن ماجه – المقدمة – فضل علي بن أبي طالب (ر) – حديث نمبر : ( 113 )
مستدرك الحاكم – كتاب قسم الفيئ – والأصل من كتاب الله عز وجل – حديث نمبر: ( 2589 )
الهيثمي – مجمع الزوائد – أبواب مناقب علي بن أبي طالب (ر) – الجزء : ( 9 ) – صفحہ نمبر ( 119 )
الهيثمي – موارد الظمآن – صفحہ نمبر : ( 543 )
النسائي – السنن الكبرى – الجزء : ( 5 ) – صفحہ نمبر : ( 45 )
النسائي – السنن الكبرى – الجزء : ( 5 ) -صفحہ نمبر : ( 45 )
النسائي – السنن الكبرى – الجزء : ( 5 ) – صفحہ نمبر : ( 45 )
مسند أبي يعلى الموصلي – مسند علي …- مسند علي… – حديث نمبر : ( 567 )
عمرو بن أبي عاصم – كتاب السنة – صفحہ نمبر : ( 590 )

سید طارق علی رضوی نیازی

*”18ذی الحجہ جشــــن اعلان ولایت سیدنا مولا علی ابن ابی طالب کرم اللہ تعالی وجہہ الکریم تمام مومنین مومنات کو بہت بہت مبارک ھو۔“*

*مقدمہ :۔۔ (۔۔غدیر خم۔۔)*

*شیخ الاسلام ڈاکٹر پروفیسر محمد طاہر القادری صاحب مدظلہ العالی۔*

18 ذی الحج کو، جس دن حضور نبی اکرم ﷺ نے حجۃ الوداع سے مدینہ طیّبہ واپسی کے دوران غدیرِ خُم کے مقام پر قیام فرمایا۔ اور صحابہ کرام رضی اللہ عنہم کے ھجوم میں سیدنا مولا علی المرتضیٰ کرم اللہ وجھہ الکریم کا ھاتھ اُٹھا کر اعلان فرمایا :۔
*مَنْ کُنْتُ مَوْلَاهُ فَعَلِيٌّ مَوْلَاهُ.-*
’’جس کا میں مولا ھوں اُس کا علی مولا ھے۔‘‘

یہ اعلانِ ولایتِ امیرالمومنین سیدنا مولا علی علیہ السلام تھا، جسکا اطلاق قیامت تک جملہ اہلِ ایمان پر ھوتا ھے۔ اور جس سے یہ امر قطعی طور پر ثابت ھوتا ھے کہ جو ولایتِ سیدنا مولا علی علیہ السلام کا منکر ھے وہ ولایتِ محمدی ﷺ کا منکر ھے۔
اِس عاجز نے محسوس کیا کہ اس مسئلہ پر بعض لوگ بوجہِ جہالت متردّد رھتے ھیں اور بعض لوگ بوجہِ عناد و تعصّب۔ سو یہ تردّد اور انکار اُمّت میں تفرقہ و انتشار میں اضافہ کا باعث بن رہا ھے۔ اندریں حالات میں نے ضروری سمجھا کہ مسئلۂ وِلایت و اِمامت پر دو رِسالے تالیف کروں :۔ ایک بعنوان ’السَّیفُ الجَلِی عَلٰی مُنکِرِ وِلایۃِ عَلیّ کرم اللہ تعالیٰ وجھہ الکریم‘ اور دوسرا بعنوان ’القولُ المُعتَبَر فِی الامام المُنتَظَر‘۔ پہلے رسالہ کے ذریعے فاتحِ ولایت حضرت سیدنا مولا امام علی علیہ السلام کے مقام کو واضح کروں اور دوسرے کے ذریعے خاتمِ ولایت حضرت سیدنا امام مہدی علیہ السلام کا بیان کروں۔ تاکہ جملہ شبہات کا اِزالہ ھو اور یہ حقیقت خواص و عوام سب تک پہنچ سکے کہ ولایتِ سیدنا مولا علی علیہ السلام اور ولایتِ سیدنا امام مہدی علیہ السلام اہلِ سنت و جماعت کی معتبر کتبِ حدیث میں روایاتِ متواترہ سے ثابت ھے۔ میں نے پہلے رسالہ میں حدیثِ نبوی ﷺ کی اکیاون (51) روایات پوری تحقیق و تخریج کے ساتھ درج کی ھیں۔ اِس عدد کی وجہ یہ ھے۔ کہ میں نے اِمسال اپنی عمر کے باون 52 برس مکمل کئے ھیں، اس لئے حصولِ برکت اور اِکتساب خیر کے لئے عاجزانہ طور پر عددی نسبت کا وسیلہ اختیار کیا ھے۔ تاکہ بارگاہِ سیدنا مولا علی المرتضیٰ کرم اللہ تعالیٰ وجہہ الکریم میں اِس حقیر کا نذرانہ شرفِ قبولیت پاسکے۔ (آمین)
اَب اِس مقدّمہ میں یہ نکتہ واضح کرنا چاھتا ھوں کہ حضور نبی اکرم ﷺ کی ذاتِ مقدّسہ سے تین طرح کی وراثتیں جاری ھوئیں :

*خلافتِ باطنی کی روحانی وراثت,*

خلافتِ ظاھری کی سیاسی وراثت۔

خلافتِ دینی کی عمومی وراثت۔

خلافتِ باطنی کی روحانی وراثت اہلِ بیتِ اطہار علیہم السلام کے نفوس طیّبہ کو عطا ھوئی۔

خلافتِ ظاھری کی سیاسی وراثت خلفاء راشدین کی ذوات مقدّسہ کو عطا ھوئی۔

خلافتِ دینی کی عمومی وراثت بقیہ صحابہ و تابعین کو عطا ھوئی۔

خلافتِ باطنی نیابتِ محمدی ﷺ کا وہ سرچشمہ ھے جس سے نہ صرف دینِ اسلام کے روحانی کمالات اور باطنی فیوضات کی حفاظت ھوئی بلکہ اس سے اُمّت میں ولایت و قطبیت اور مُصلحیت و مجدّدیت کے چشمے پھوٹے اور اُمّت اِسی واسطے سے روحانیتِ محمدی ﷺ سے فیضاب ھوئی۔ خلافتِ ظاھری نیابتِ محمدی ﷺ کا وہ سرچشمہ ھے جس سے غلبۂ دین حق اور نفاذِ اسلام کی عملی صورت وجود میں آئی اور دینِ محمدی ﷺ کے تمکّن اور زمینی اقتدار کا سلسلہ قائم ھوا۔ اِسی واسطے سے تاریخِ اِسلام میں مختلف ریاستیں اور سلطنتیں قائم ھوئیں اور شریعتِ محمدی ﷺ نظامِ عالم کے طور پر دُنیا میں عملاً متعارف ھوئی۔
خلافتِ عمومی نیابتِ محمدی ﷺ کا وہ سرچشمہ ھے۔ جس سے اُمّت میں تعلیماتِ اسلام کا فروغ اور اعمالِ صالحہ کا تحقّق وجود میں آیا۔ اِس واسطے سے افرادِ اُمّت میں نہ صرف علم و تقویٰ کی حفاظت ھوئی بلکہ اخلاقِ اِسلامی کی عمومی ترویج و اشاعت جاری رھی، گویا :
پہلی قسم : خلافتِ ولایت قرارپائی۔
دوسری قسم : خلافتِ سلطنت قرار پائی۔
تیسری قسم : خلافتِ ھدایت قرار پائی۔
اس تقسیمِ وراثتِ محمدی ﷺ کے مضمون کو شاہ ولی اللہ محدث دہلوی رحمۃ اللہ علیہ نے اِن الفاظ کے ساتھ بیان فرمایا ھے:۔
*پس وراث آنحضرت هم بسه قسم منقسم اند فوراثه الذين أخذوا الحکمة والعصمة والقطبية الباطينة، هم أهل بيته و خاصته و وراثه الذين أخذوا الحفظ و التلقين و القطبية الظاهرة الإرشادية، هم أصحابه الکبار کالخلفاء الأربعة و سائر العشرة، و وراثه الذين أخذوا العنايات الجزئية و التقوي و العلم، هم أصحابه الذين لحقوا بإحسان کأنس و أبي هريرة و غيرهم من المتأخرين، فهذه ثلاثة مراتب متفرعة من کمال خاتم الرسل صلی الله عليه وآله وسلم.*
’’حضور نبی اکرم ﷺ کی وراثت کے حاملین تین طرح کے ھیں : ایک وہ جنہوں نے آپ ﷺ سے حکمت و عصمت اور قطبیتِ باطنی کا فیض حاصل کیا، وہ آپ ﷺ کے اہل بیت اور خواص ھیں۔ دوسرا طبقہ وہ ھے جنہوں نے آپ ﷺ سے حفظ و تلقین اور رشد و ھدایت سے متصف قطبیت ظاہری کا فیض حاصل کیا، وہ آپ ﷺ کے کبار صحابۂ کرام رضی اللہ عنہم جیسے خلفائے اربعہ اور عشرہ مبشرہ ھیں۔ تیسرا طبقہ وہ ھے جنہوں نے انفرادی عنایات اور علم و تقویٰ کا فیض حاصل کیا، یہ وہ اصحاب ھیں جو احسان کے وصف سے متصف ھوئے، جیسے حضرت انس رضی اللہ عنہ اور حضرت ابوہریرہ رضی اللہ عنہ اور ان کے علاوہ دیگر متاخرین۔ یہ تینوں مدارج حضور نبی اکرم ﷺ کے کمال ختمِ رسالت سے جاری ھوئے۔‘‘
(📚شاه ولي الله محدث دهلوي،
التفهيمات الالهٰيه، جلد2 : صفحہ8)
واضح رھے کہ یہ تقسیم غلبۂ حال اور خصوصی امتیاز کی نشاندہی کے لئے ھے، ورنہ ہر سہ اقسام میں سے کوئی بھی دوسری قسم کے خواص و کمالات سے کلیتاً خالی نہیں ھے، اُن میں سے ھر ایک کو دوسری قسم کے ساتھ کوئی نہ کوئی نسبت یا اشتراک حاصل ھے :۔

*سلطنت میں حضرت صدّیقِ اکبر رضی اللہ عنہ حضور نبی اکرم ﷺ کے خلیفہ بلا فصل یعنی براہِ راست نائب ھوئے۔*

*ولایت میں سیدنامولا علی مرتضیٰ علیہم السلام حضور نبی اکرم ﷺ کے خلیفہ بلا فصل یعنی براہِ راست نائب ھوئے۔*

*ھدایت میں جملہ صحابۂ کرام رضی اللہ عنہم حضور نبی اکرم ﷺ کے خلفاء بلا فصل یعنی براہِ راست نائب ھوئے۔*

اس کا مطلب یہ ھوا کہ ختمِ نبوتﷺ کے بعد فیضانِ محمدی ﷺ کے دائمی تسلسل کے لئے تین مستقل مطالع قائم ھو گئے :

ایک مطلع سیاسی وراثت کے لئے۔

دوسرا مطلع روحانی وراثت کے لئے۔

تیسرا مطلع علمی و عملی وراثت کے لئے۔

حضور ﷺ کی سیاسی وراثت، خلافتِ راشدہ کے نام سے موسوم ھوئی۔

حضور ﷺ کی روحانی وراثت، ولایت و امامت کے نام سے موسوم ھوئی۔

حضور ﷺ کی علمی و عملی وراثت، ہدایت و دیانت کے نام سے موسوم ھوئی۔

لہٰذا سیاسی وراثت کے فردِ اوّل حضرت ابوبکر صدیق رضی اللہ عنہ ھوئے،
روحانی وراثت کے فردِ اوّل حضرت سیدنا مولا علی المرتضیٰ کرم اللہ تعالیٰ وجہہ الکریم ھوئے اور علمی و عملی وراثت کے اوّلیں حاملین جملہ صحابہ کرام رضی اللہ عنہم ھوئے۔
سو یہ سب وارثین و حاملین اپنے اپنے دائرہ میں بلا فصل خلفاء ھوئے، ایک کا دوسرے کے ساتھ کوئی تضاد یا تعارض نہیں ھے۔
دوسری اھم بات یہ ھے کہ ان مناصب کی حقیقت بھی ایک دوسرے سے کئی اُمور میں مختلف ھے :
1۔ خلافتِ ظاہری دین اسلام کا سیاسی منصب ھے۔
خلافتِ باطنی خالصتاً روحانی منصب ھے۔
2۔ خلافتِ ظاہری انتخابی و شورائی امر ھے۔
خلافتِ باطنی محض وہبی و اجتبائی امر ھے۔
3۔ خلیفۂ ظاہری کا تقرّر عوام کے چناؤ سے عمل میں آتا ھے۔
خلیفۂ باطنی کا تقرّر خدا کے چناؤ سے عمل میں آتا ھے۔
4۔ خلیفۂ ظاہری منتخب ھوتا ھے۔
خلیفۂ باطنی منتجب ھوتا ھے۔
5۔ یہی وجہ ھے کہ پہلے خلیفۂ راشد حضرت ابوبکر صدیقِ رضی اللہ عنہ کا انتخاب حضرت عمر فاروق رضی اللہ عنہ کی تجویز اور رائے عامہ کی اکثریتی تائید سے عمل میں آیا، مگر پہلے امامِ ولایت سیدنا علی المرتضیٰ کرم اللہ تعالیٰ وجہہ الکریم کے انتخاب میں کسی کی تجویز مطلوب ھوئی نہ کسی کی تائید۔
6۔ خلافت میں ’جمہوریت‘ مطلوب تھی، اس لئے حضور ﷺ نے اس کا اعلان نہیں فرمایا۔ ولایت میں ’ماموریت‘ مقصود تھی، اس لئے حضور ﷺ نے وادی غدیر خُم کے مقام پر اس کا اعلان فرما دیا۔
7۔ حضور ﷺ نے اُمّت کے لئے خلیفہ کا انتخاب عوام کی مرضی پر چھوڑ دیا، مگر ولی کا انتخاب اللہ کی مرضی سے خود فرما دیا۔
8۔ خلافت زمینی نظام کے سنوارنے کیلئے قائم ھوتی ھے۔
ولایت اُسے آسمانی نظام کے حسن سے نکھارنے کیلئے قائم ھوتی ھے۔
9۔ خلافت افراد کو عادل بناتی ھے۔
ولایت افراد کو کامل بناتی ھے۔
10۔ خلافت کا دائرہ فرش تک ھے۔
ولایت کا دائرہ عرش تک ھے۔
11۔ خلافت تخت نشینی کے بغیر مؤثر نہیں ھوتی۔
ولایت تخت و سلطنت کے بغیر بھی مؤثر ھے۔
12۔ غالباً یہی وجہ ھے کہ خلافت اُمّت کے سپرد ھوئی۔
ولایت عترت کے سپرد ھوئی۔
لہٰذا اب خلافت سے مَفرّ ھے نہ وِلایت سے، کیونکہ حضرت ابوبکر صدیق رضی اللہ عنہ کی خلافتِ بلافصل اِجماعِ صحابہ کرام رضوان اللہ علیہم اجمعین سے منعقد ھوئی اور تاریخ کی شہادتِ قطعی سے ثابت ھوئی اور حضرت سیدنا مولا علی المرتضیٰ کرم اللہ وجہہ الکریم کی وِلایتِ بلافصل خود فرمانِ مصطفی ﷺ سے منعقد ھوئی اور احادیثِ متواترہ کی شہادتِ قطعی سے ثابت ھوئی۔
خلافت کا ثبوت اِجماعِ صحابہ ھے اور وِلایت کا ثبوت فرمانِ مصطفیٰ ﷺ۔ جو خلافت کا اِنکار کرتا ھے۔ وہ تاریخ اور اِجماع کا اِنکار کرتا ھے اور جو اِمامت و وِلایت کا اِنکار کرتا ھے وہ اِعلانِ مصطفیٰ ﷺ کا انکار کرتا ھے۔ ضرورت اس امر کی ھے کہ دونوں institutions کی حقیقت کو سمجھ کر اُن میں تطبیق پیدا کی جائے نہ کہ تفریق۔
جان لینا چاھیئے کہ جس طرح خلافتِ ظاھری، خلفاء راشدین سے شروع ھوئی اور اِس کا فیض حسبِ حال اُمت کے صالح حکام اور عادل امراء کو منتقل ھوتا چلا گیا، اُسی طرح خلافتِ باطنی بھی سیدنا مولا علی المرتضیٰ کرم اللہ تعالیٰ وجہہ الکریم سے شروع ھوئی اور اس کا فیض حسبِ حال اَئمہ اَطہارِ اہل بیت اور اُمت کے اولیاء کاملین کو منتقل ھوتا چلاگیا۔
حضور فاتح و خاتم ﷺ نے۔ ۔ ۔ مَن کنتُ مولاہُ فہٰذا علیٌّ مولاہُ۔
(جس کا میں مولا ھوں اس کا یہ علی مولا ھے)۔ ۔ ۔ اور۔ ۔ ۔ علیٌّ ولیّکم مِن بَعدِی (میرے بعد تمہارا ولی علی ھے)۔ ۔ ۔ کے اعلانِ عام کے ذریعے حضرت سیدنا مولا امام علی علیہ السلام کو اُمت میں ولایت کا فاتحِ اَوّل قرار دے دیا۔
بابِ وِلایت میں شاہ ولی اللہ محدث دہلوی رحمۃ
اللہ علیہ کے الفاظ ملاحظہ ھوں :۔
1۔ و فاتحِ اوّل ازین اُمت مرحومہ حضرت علی مرتضی است کرم اللہ تعالیٰ وجھہ
(شاہ ولی اللہ محدث دہلوی،
📚التفہیمات الالہٰیہ، جلد1 :صفحہ103)
’’اس اُمتِ میں (فاتح اَوّل) ولایت کا دروازہ سب سے پہلے کھولنے والے فرد حضرت سیدنا مولا علی المرتضی کرم اللہ وجہہ الکریم ھیں۔
2۔ و سرِ حضرت امیر کرم اللہ وجھہ در اولادِ کرام ایشان رضی اللہ عنہم سرایت کرد۔
(شاہ ولی اللہ محدث دہلوی،
📚التفہیمات الالہٰیہ، جلد1 : صفحہ103)
’’حضرت امیر المومنین مولٰی علی علیہ السلام کا رازِ ولایت آپ کی اولاد کرام علیہم السلام میں سرایت کرگیا۔‘‘
3۔ چنانکہ کسی از اولیاء امت نیست الا بخاندانِ حضرت مرتضیٰ علیہم السلام مرتبط است بوجہی از وجوہ۔
( شاہ ولی اللہ محدث دہلوی
، 📚التفہیمات الالہٰیہ، 1 : 104)
’’چنانچہَ اولیائے اُمت میں سے ایک بھی ایسا نہیں ھے جو کسی نہ کسی طور پر حضرت سیدنا مولا امام علی کرم اللہ تعالیٰ وجھہ الکریم کے خاندانِ اِمامت سے (اکستابِ ولایت کے لئے) وابستہ نہ ھو۔‘‘
4۔ و از اُمتِ آنحضرت ﷺ اوّل کسیکہ فاتحِ بابِ جذب شدہ است، و دراں جا قدم نہادہ است حضرت امیر المؤمنین علی کرم اللہ وجھہ، و لہٰذا سلاسلِ طُرُق بداں جانب راجع میشوند۔
(شاہ ولی اللہ محدث دہلوی، ہمعات :60)
’’حضور ﷺ کی اُمت میں پہلا فرد جو ولایت کے (سب سے اعلیٰ و اقویٰ طریق) بابِ جذب کا فاتح بنا اور جس نے اِس مقامِ بلند پر (پہلا ) قدم رکھا وہ امیر المؤمنین سیدنا حضرت علی المرتضی کرم اللہ وجھہ الکریم کی ذات گرامی ھے، اِسی وجہ سے روحانیت و ولایت کے مختلف طریقوں کے سلاسِل آپ ھی کی طرف رجوع کرتے ھیں۔‘‘
5۔ یہی وجہ ھے کہ شاہ ولی اللہ محدث دہلوی رحمۃ اللہ علیہ لکھتے ھیں :
’’اب اُمت میں جسے بھی بارگاہِ رسالت ﷺ سے فیضِ وِلایت نصیب ھوتا ھے وہ یا تو نسبتِ سیدنا مولا علی مرتضیٰ علیہ السلام سے نصیب ھوتا ھے یا نسبتِ غوث الاعظم جیلانی رضی اللہ عنہ سے، اس کے بغیر کوئی شخص مرتبۂ ولایت پر فائز نہیں ھوسکتا۔‘‘
(شاہ ولی اللہ محدث دہلوی
، 📕ہمعات : 62)
واضح رھے کہ نسبتِ غوث الاعظم جیلانی رضی اللہ عنہ بھی نسبتِ علی المرتضیٰ کرم اللہ تعالیٰ وجھہ الکریم ھی کا ایک باب اور اِسی شمع کی ایک کرن ھے۔
6۔ اِس نکتہ کو شاہ اسماعیل دہلوی نے بھی بصراحت یوں لکھا ھے :
’’حضرت علی مرتضیٰ رضی اللہ عنہ کے لئے شیخین رضی اللہ عنہما پر بھی ایک گو نہ فضیلت ثابت ھے اور وہ فضیلت آپ کے فرمانبرداروں کا زیادہ ھونا اور مقاماتِ وِلایت بلکہ قطبیت اور غوثیت اور ابدالیت اور انہی جیسے باقی خدمات ’’آپ کے زمانہ سے لیکر دُنیا کے ختم ھونے تک‘‘ آپ ھی کی وساطت سے ھونا ھے اور بادشاہوں کی بادشاھت اور امیروں کی امارت میں آپ کو وہ دخل ھے۔ جو عالمِ ملکوت کی سیر کرنے والوں پر مخفی نہیں۔ ۔ ۔ ۔ اہلِ وِلایت کے اکثر سلسلے بھی جنابِ سید نار مولا مرتضیٰ کرم اللہ وجہ ھی کی طرف منسوب ھیں، پس قیامت کے دن بہت فرمانبرداروں کی وجہ سے جن میں اکثر بڑی بڑی شانوں والے اور عمدہ مرتبے والے ھونگے، حضرتِ سیدنا علی المرتضیٰ رضی اللہ عنہ کا لشکر اِس رونق اور بزرگی سے دکھائی دے گا کہ اس مقام کا تماشہ دیکھنے والوں کے لئے یہ امر نہایت ھی تعجب کا باعث ھوگا۔‘‘
(شاہ اسماعیل دہلوی،
📘صراطِ مستقیم : 67)
یہ فیضِ وِلایت کہ اُمتِ محمدیﷺ میں جس کے منبع و سرچشمہ سیدنا علی المرتضیٰ کرم اللہ وجہہ مقرر ھوئے اس میں سیدۂ کائنات حضرت فاطمۃ الزہراء سلام اللہ تعالیٰ علیہا اور حضرات حسنین کریمینؓ بھی آپ رضی اللہ عنہ کے ساتھ شریک کئے گئے ہیں، اور پھر اُن کی وساطت سے یہ سلسلۂ وِلایتِ کبریٰ اور غوثیتِ عظمیٰ اُن بارہ اَ ئمۂ اہلِ بیت میں ترتیب سے چلایا گیا۔ جن کے آخری فرد سیدنا امام محمد مہدی علیہ السلام ہیں۔ جس طرح سیدنا مولا علی کرم اللہ تعالیٰوجہہ الکریم اُمتِ محمدی ﷺ میں فاتحِ ولایت کے درجہ پر فائز ھوئے، اُسی طرح سیدنا امام مہدی علیہ السلام اُمتِ محمدی ﷺ میں خاتمِ ولایت کے درجہ پر فائز ھونگے۔
7۔ اس موضوع پر حضرت مجدد الف ثانی شیخ احمد سرہندی رحمۃ اللہ علیہ کی تحقیق ملاحظہ فرمائیں :
*و راہی است کہ بقربِ ولایت تعلق دارد : اقطاب و اوتاد و بدلا و نجباء و عامۂ اولیاء اللہ، بہمین راہ واصل اندراہ سلوک عبارت ازین راہ است بلکہ جذبۂ متعارفہ، نیز داخل ہمین است و توسط و حیلولت درین راہ کائن است و پیشوای، و اصلان این راہ و سرگروہ اینھا و منبع فیض این بزرگواران : حضرت علی مرتضی است کرم اللہ تعالے وجھہ الکریم، و این منصب عظیم الشان بایشان تعلق دارد درینمقام گوئیا ہر دو قدم مبارک آنسرور علیہ و علی آلہ الصلوۃ و السلام برفرق مبارک اوست کرم اللہ تعالی وجھہ حضرت فاطمہ و حضرات حسنین رضی اللہ عنہم درینمقام با ایشان شریکند، انکارم کہ حضرت امیر قبل از نشاء ہ عنصرے نیز ملاذ این مقام بودہ اند، چنانچہ بعد از نشاءہ عنصرے و ہرکرا فیض و ہدایت ازین راہ میر سید بتوسط ایشان میر سید چہ ایشان نزد ن۔ قطہ منتھائے این راہ و مرکز این مقام بایشان تعلق دارد، و چون دورہ حضرت امیر تمام شُد این منصب عظیم القدر بحضرات حسنین ترتیبا مفوض و مسلم گشت، و بعد از ایشان بہریکے از ائمہ اثنا عشر علے الترتیب و التفصیل قرار گرفت و در اعصاراین بزرگواران و ہمچنیں بعد از ارتحال ایشان ہر کرا فیض و ہدایت میرسید بتوسط این بزرگواران بودہ و بحیلولۃ ایشانان ہرچند اقطاب و نجبای وقت بودہ باشند و ملاذ وملجاء ہمہ ایشان بودہ اند چہ اطراف را غیر از لحوق بمرکز چارہ نیست۔*
(امام ربانی مجدّد الف ثانی،
مکتوبات، 3 : 251، 252، مکتوب نمبر : 123)
’’اور ایک راہ وہ ھے جو قربِ وِلایت سے تعلق رکھتی ھے : اقطاب و اوتاد اور بدلا اور نجباء اور عام اولیاء اللہ اِسی راہ سے واصل ھیں، اور راہِ سلوک اِسی راہ سے عبارت ھے، بلکہ متعارف جذبہ بھی اسی میں داخل ھے، اور اس راہ میں توسط ثابت ھے اور اس راہ کے واصلین کے پیشوا اور اُن کے سردار اور اُن کے بزرگوں کے منبعِ فیض حضرت سیدنا مولاعلی المرتضیٰ کرم اللہ تعالیٰ وجہہ الکریم ھیں، اور یہ عظیم الشان منصب اُن سے تعلق رکھتا ھے۔ اس راہ میں گویا رسول اللہ ﷺ کے دونوں قدم مبارک حضرت سیدنا علی کرم اللہ تعالیٰ وجہہ الکریم کے مبارک سر پر ھیں اور حضرت سیدہ فاطمہؓ سلام اللہ تعالیٰ علیہا اور حضرات سیدنااممین حسنین کریمین علیہم السلام اِس مقام میں اُن کے ساتھ شریک ھیں۔ میں یہ سمجھتا ھوں کہ حضرت امیرؓ اپنی جسدی پیدائش سے پہلے بھی اس مقام کے ملجا و ماویٰ تھے، جیسا کہ آپؓ جسدی پیدائش کے بعد ھیں اور جسے بھی فیض و ھدایت اس راہ سے پہنچی ان کے ذریعے سے پہنچی، کیونکہ وہ اس راہ کے آخری نقطہ کے نزدیک ھیں اور اس مقام کا مرکز ان سے تعلق رکھتا ھے، اور جب حضرت امیرؓ کا دور ختم ھوا تو یہ عظیم القدر منصب ترتیب وار حضراتِ سیدنا حسنین کریمین علیہم السلام کو سپرد ھوا اور ان کے بعد وھی منصب ائمہ اثنا عشرہ میں سے ھر ایک کو ترتیب وار اور تفصیل سے تفویض ھوا، اور ان بزرگوں کے زمانہ میں اور اِسی طرح ان کے انتقال کے بعد جس کسی کو بھی فیض اور ھدایت پہنچی ھے انہی بزرگوں کے ذریعہ پہنچی ھے، اگرچہ اقطاب و نجبائے وقت ھی کیوں نہ ھوں اور سب کے ملجا و ماویٰ یہی بزرگ ھیں کیونکہ اطراف کو اپنے مرکز کے ساتھ الحاق کئے بغیرچارہ نہیں ھے۔‘‘
حضرت مجدد الف ثانی رحمۃ اللہ علیہ مذید فرماتے ھیں کہ امام مہدی علیہ السلام بھی کارِ ولایت میں حضرت سیدنا مولا علی مرتضیٰ علیہم السلام کے ساتھ شریک ھوں گے۔
بحوالہ۔۔
(امام ربانی مجدّد الف ثانی،
مکتوبات، 3 : 251، 252، مکتوب نمبر : 123)
خلاصۂِ کلام یہ ھوا کہ مقام غدیرِ خُم پر ولایت علیؓ کے مضمون پر مشتمل اعلانِ محمدی ﷺ نے اس حقیقت کو ابد الآباد تک کیلئے ثابت و ظاہر کردیا۔ کہ ولایتِ سیدنا مولا علی المرتضیٰ علیہ السلام درحقیقت ولایتِ محمدی ﷺ ھی کا جز ھے۔ بعثتِ محمدی ﷺ کے بعد نبوت و رسالت کا باب ھمیشہ ہمیشہ کیلئے بند کردیا گیا، لہٰذا تا قیامت فیضِ نبوتِ محمدی ﷺ کے اجراء و تسلسل کیلئے باری تعالیٰ نے امت میں نئے دروازے اور راستے کھول دیئے۔ جن میں کچھ کو مرتبۂ ظاھر سے نوازا گیا اور کچھ کو مرتبۂ باطن سے۔ مرتبۂ باطن کا حامل راستہ ’ولایت‘ قرار پایا، اور امتِ محمدی میں ولایت عظمیٰ کے حامل سب سے پہلے امامِ برحق۔ ۔ ۔ سیدنا مولا علی المرتضیٰ کرم اللہ تعالیٰ وجہہ الکریم مقرر ھوئے۔ پھر ولایت کا سلسلۃ الذہب حضور ﷺ کی اہلِ بیت اور آلِ اَطہار میں ائمہ اِثنا عشر (بارہ اِماموں) میں جاری کیا گیا۔ ھر چند اِن کے علاوہ بھی ھزارہا نفوسِ قدسیہ ھر زمانہ میں مرتبۂ ولایت سے بہرہ یاب ھوتے رھے، قطبیت و غوثیت کے اعلیٰ و ارفع مقامات پر فائز ھوتے رھے، اہل جہاں کو انوارِ ولایت سے منور کرتے رھے اور کروڑوں انسانوں کو ھر صدی میں ظلمت و ضلالت سے نکال کر نورِ باطن سے ھمکنار کرتے رھے، مگر ان سب کا فیض سیدنا مولا علی المرتضیٰ کرم اللہ تعالیٰ وجہہ الکریم کی بارگاہِ ولایت سے بالواسطہ یا بلاواسطہ ماخوذ و مستفاد تھا۔ ولایتِ سیدنا مولا علی المرتضیٰ کرم اللہ تعالیٰ وجہہ الکریم سے کوئی بھی بے نیاز اور آزاد نہ تھا۔ یہی سلسلہ قیامت تک جاری رھے گا۔ تاآنکہ امتِ محمدی ﷺ میں آخری امامِ برحق اور مرکزِ ولایت کا ظہور ھوگا۔ یہ سیدنا امام محمد مہدی علیہ السلام ھوں گے جو بارہویں امام بھی ھوں گے اور آخری خلیفہ بھی۔ اُن کی ذاتِ اَقدس میں ظاہر و باطن کے دونوں راستے جو پہلے جدا تھے۔ مجتمع کر دیئے جائیں گے۔ یہ حاملِ وِلایت بھی ھوں گے اور وارثِ خلافت بھی، ولایت اور خلافت کے دونوں مرتبے اُن پر ختم کر دیئے جائیں گے۔ سو جو امام مہدی علیہ السلام کا منکر ھو گا وہ دین کی ظاھری اور باطنی دونوں خلافتوں کا منکر ھو گا۔
یہ مظہریتِ محمدی ﷺ کی انتہاء ھو گی، اس لئے اُن کا نام بھی ’محمد‘ ھو گا اور اُن کا ’خلق‘ بھی محمدی ﷺ ھو گا، تاکہ دُنیا کو معلوم ھو جائے کہ یہ ’امام‘ فیضانِ محمدی ﷺ کے ظاہر و باطن دونوں وراثتوں کا امین ھے۔ اس لئے حضور ﷺ نے فرمایا : ’’جو امام مہدی علیہ السلام کی تکذیب کرے گا وہ کافر ھو جائے گا۔‘‘
اُس وقت روئے زمین کے تمام اولیاء کا مرجع آپ علیہ السلام ھوں گے اور اُمتِ محمدیﷺ کا اِمام ھونے کے باعث سیدنا عیسیٰ علیہ السلام بھی آپ علیہ السلام کی اقتداء میں نماز ادا فرمائیں گے۔ اور اس طرح اہلِ جہاں میں آپ علیہ السلام کی اِمامت کا اعلان فرمائیں گے۔
سو ھم سب کو جان لینا چاھیئے کہ حضرت سیدنا امام مولا علی المرتضیٰ کرم اللہ تعالیٰ وجہہ الکریم اور حضرت سیدنا امام مہدی الارض و السماء علیہ السلام۔ ۔ ۔ باپ اور بیٹا دونوں۔ ۔ ۔ اللہ کے ولی اور رسول اللہ ﷺ کے وصی ھیں۔ انہیں تسلیم کرنا ھر صاحب ایمان پر واجب ھے۔
باری تعالیٰ ھمیں اِن عظیم منابعِ وِلایت سے اِکتسابِ فیض کی توفیق مرحمت فرمائے۔
(آمین بجاہ سید المرسلین ﷺ)۔
*______________________*
_بصد شکریہ۔_
*”سنی حسینی مشن۔“*
*”تحریکِ حُرمتِ اولادِ رسُولﷺ،”*
*==================*
*_المُشتہر۔و۔پیشکش:-_*
۔,,,,,,,,,,,,,,,…..*……,,,,,,,,,,,,۔
*انٹرنیشنل تحفظِ ساداتِ فاطمیہ کونسل۔*
*”تحفّظِ ساداتِ فاطمیہ (العالمی)”*
*”دفاعِ سادات کونسل* _انثرنیشنل“_
*”الاتحاد بین السادات-“*
*”سادات کمیونٹی پاکستان“*
*”دفاعِ سادات کونسل آزادکشمیر۔”*
*==================*

Hadith: Ghuroor




*Mafhoom-e-Hadees:*
Abdullah bin Masood (RaziAllahu Anhu) se riwayat hai ki,
Rasool’Allah (Sallallahu Alaihay Wasallam) Ne Farmaya Ke,
“Jis Aadmi Ke Dil Me Jarrey Barabar Bhi Guroor Hoga Wo Jannat Me Nahi Jayega!”.
Ek Aadmi Ne Kaha – ‘Aye Allah Ke Rasool (Sallallahu Alaihay Wasallam)! “Hum Me Har Aadmi Yah Chahta Hai Ki, Uska Libaas Accha Ho, Jutaa Accha Ho Tou Kya Yah Ghuroor Hai ?”
Aapne Farmaya – Allah Ta’ala Khubsurat Hai Aur Khubsurti Ko Pasand Karta Hai,
“Guroor Tou Isko Kehte Hai Ki Aadmi Haq Baat Ko Maan’ne Se Inkar Kare Aur Dusron Ko Haqeer(Chota) Samjhe..”
*(Sahi Muslim, Jild-1, Hadith No-265)*