
Madine ki moti 79



** تعلیمات امیر ( Taleemat e Ameer r.a)
** نواں حصہ ( part-9)
۶۔ سلسلہ ستّہ سلسلہ امیریہ بطریق سلسلہ اویسیہ۔
روح سے فیض حاصل کرنے کو اصطلاح صوفیہ میں اویسی طریقہ کہتے ہیں۔ اس سے یہ مراد نہیں کہ یہ سلسلہ حضرت اویس قرنیؒ سے ملتا ہے بلکہ اویسیہ سے مراد مطلق روح سے فیض حاصل کرنا ہے۔ چونکہ روح سے اخذ فیض اور اجرائے فیض دونوں صورتیں ہوتی ہیں، اس لئے سلسلہ اویسیہ کی یہی دونوں خصوصیات ہیں۔ اس اصطلاح کو حضرت اویس قرنی سے اگر کوئی نسبت ہو سکتی ہے تو شاید اس بناء پر کہ انہوں نے حضور نبی کریم ﷺ کی صحبت میں رہ کر تربیت حاصل نہیں کی تھی۔ بلکہ حضور ﷺ کی روح پر فتوح سے اخذ فیض کیا تھا۔ اس لئے کہا جاسکتا ہے کہ وہ پہلے حضرت اویس قرنی رضی اللہ تعالی عنہ تھے۔
📚 ماخز از کتاب چراغ خضر۔


** تعلیمات امیر ( Taleemat e Ameer r.a)
** اٹھواں حصہ ( part- 8)
۵۔ حضرت مولی علی علیہ السلام کے پانچویں خلیفہ کی حیثیت سے حضرت سلمان فارسی رضی اللہ تعالی عنہ نے خلافت حاصل کیا۔ چنانچہ نقشبندیہ سلسلہ آپ ہی سے وجود میں آیا۔ جیسا کہ فقیر پہلے بھی ذکر کر چکا ہے کہ جو لوگ آپ کی بیت حضرت ابوبکر رضی اللہ تعالی عنہ سے ثابت کرتے ہیں وہ درست نہیں۔ البتہ سلسلہ نقشبند میں جناب ابو بکر رضی اللہ تعالی عنہ کا روحانی فیض جو آپ نے حضرت رسول اکرم صلی اللہ علیہ وسلم و حضرت مولی ال متقیان امام علی علیہ السلام سے اخذ کیا تھا وہ جاری اور ساری ہے۔ جو آپ کے نبیرا حضرت قاسم کے ذریعہ سے اس سلسلہ میں شامل ہوا۔ جنہوں نے حضرت سلمان فارسی رضی اللہ تعالی عنہ سے بیت کی۔ مخفی نہ رہے کہ جناب قاسمؓ حضرت محمدؓ ابن ابو بکر رضی اللہ تعالی عنہ کے فرزند ہیں جن کی پرورش بھی حضرت مولی علی علیہ السلام کے زیر قفالت ہوئی جیسا کہ آپ کے زمن میں ذکر ہو چکا ہے۔ پس حضرت قاسمؓ کے توسل سے نقشبندیہ سلسلہ میں تین جانب سے فیض علیؑ شامل ہے۔ پھر جناب قاسمؓ کی بیت اور خلافت آپ کے نواسے اور ائمہ اہل بیت میں چھٹوے امام حضرت امام جعفر صادق علیہ السلام کو حاصل ہوئی اور اس اعتبار سے چار جانب سے فیضِ روحانی باب مدینۃالعلم مولی المومینین حضرت مولی علی علیہ السلام اس سلسلہ میں شامل ہو گیا جس سبب دوسرے سلسلوں کے بنسبت یہ سلسلہ زیادہ فیض رساں ہے اور اس سلسلہ کے فقرا تکمیل منازل روحانیت جلد کر لیتے ہیں۔
ماخز از کتاب چراغ خضر و منبع الولایت۔


हज़रते मुसअब बिन उमैर भी शहीद
फिर बड़ा गजब ये हुआ कि लश्करे इस्लाम के अलमवरदार हज़रते मुसअब बिन उमैर रदियल्लाहु अन्हु पर इब्ने कमीय्या काफिर झपटा। और उनके दाएँ हाथ पर इस ज़ोर से तलवार चला दी कि इनका दायाँ हाथ कटकर गिर पड़ा। इस जबाज मुहाजिर ने झपटकर इस्लामी झन्डे को बाएँ हाथ से सभाल लिया। मगर इब्ने कमीय्या ने तलवार मारकर उनके बाएँ हाथ को भी शहीद कर दिया। दोनों हाक्थ कट चुके थे मगर हज़रते उमैर रदियल्लाहु अन्हु अपने दोनों कटे हुए बाजुओं से परचमे इस्लाम को अपने सीने से लगाए हुए खड़े रहे। और बुलन्द आवाज़ से ये आयत. पढ़ते रहे कि SPrakrius
अल्लाहु अकबर! इस आवाज़ ने तो ग़ज़ब ही ढा दिया। मुसलमान ये सुनकर बिल्कुल ही सरासीमा और परागंदा दिमाग हो गए और मैदाने जंग छोड़कर भागने लगे। बड़े बड़े बहादुरों के पाँव उखड़ गए। और मुसलमानों में तीन गिरोह हो गए। कुछ लोग भागकर मदीना के करीब पहुंच गए। कुछ लोग सहमकर मुर्दा दिल हो गए। जहाँ थे वहीं रह गए अपनी जान बचाते रहे। या जंग
करते रहे। कुछ लोग जिन की तअदाद तकरीबन बारह थी जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ साबित कदम रहे। इस हलचल और भगदड़ में बहुत से लोगों ने तो बिल्कुल ही हिम्मत हार दी। और जो जाँबाजी के साथ लड़ना चाहते थे। वो भी दुश्मनों के दो तरफा हमलों के नर्गे में फंसकर मजबूर व लाचार हो चुके थे। ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कहाँ हैं? और किस हाल में हैं? किसी को इसकी खबर नहीं थी हज़रते अली शेरे खुदा रदियल्लाहु अन्हु तलवार चलाते और दुश्मनों की सफों को दरहम बरहम करते चले जाते थे। मगर वो हर तरफ़ मुड़ मुड़कर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को देखते थे। मगर जमाले नुबूव्वत नज़र न आने से वो इन्तिहाई इज्तिराब और बे करारी के आलम में थे। हज़रते अनस बिन नज़र रदियल्लाहु अन्हु ने पूछा कि तुम लोग यहाँ बैठे क्या कर रहे हो? लोगों ने जवाब दिया कि अब हम लड़कर क्या करेंगे? जिनके लिए लड़ते थे वो तो शहीद हो गए। हजरते अनस बिन नज़र रदियल्लाहु अन्हु ने फरमाया कि अगर वाकेई रसूले खुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम शहीद हो गए तो फिर हम उनके बाद जिन्दा रहकर कया करेंगे? चलो हम भी इसी मैदान में शहीद होकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास पहुँच जाएँ। ये कहकर आप दुश्मनों के लश्कर में लड़ते हुए घुस गए। और आख़िरी दम तक इन्तिहाई जोशे जिहाद और जाँ बाजी के साथ जंग करते रहे। यहाँ तक कि शहीद हो गए। लड़ाई ख़त्म होने के बाद जब उनकी लाश देखी गई तो अस्सी से ज़्यादा तीर- तलवार और नीज़ों के जख्म उन के बदन पर थे। काफिरों ने उनके बदन को छलनी बना दिय था। और नाक कान वगैरा काटकर उनकी सूरत बिगाड़ दी थी। कोई शख्स उनकी लाश को पहचान न सका। सिर्फ उनकी बहन ने उनकी उंगलियों को देखकर उनको पहचाना।
(बुख़ारी गजवए उहुद जि. २ स.५७९. मुस्लिम जि. २ स.३८)
इसी तरह हजरते साबित बिन वहदाह रदियल्लाहु अन्हु ने मायूस हो जाने वाले अन्सारियों से कहा कि ऐ जमाअते अन्सार अगर बिल फ़र्ज़ रसूले अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम शहीद भी हो गए तो तुम हिम्मत क्यों हार गए? तुम्हारा अल्लाह तो जिन्दा है। लिहाज़ा तुम लोग उठो और अल्लाह के दीन के लिए जिहाद करो। ये कहकर आपने चन्द अन्सारियों को अपने साथ लिया। और लश्करे कुफ्फार पर भूके शेरों की तरह हमला आवर हो गए। और आखिर खालिद बिन वलीद की तलवार से जामे शहादत नोश कर लिया। (उसाबा तर्जमा साबित बिन वहदाह)
जंग जारी थी और जाँ निसाराने इस्लाम जो जहाँ थे वहीं लड़ाई में मसरूफ़ थे। मगर सब की निगाहें इन्तिहाई बेकरारी के साथ जमाले नुबूव्वत को तलाश करती थीं। जैन मायूसी के । आलम में सब से पहले जिसने ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का जमाल देखा वो हज़रते कब बिन मालिक रदियल्लाहु अन्हु की खुश नसीब आँखें हैं। उन्होंने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को पहचानकर मुसलमानों को
पुकारा कि ऐ मुसलमानो! इधर आओ रसूले खुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ये हैं। इस आवाज़ को सुनकर तमाम जाँ निसारों में जान पड़ गई। और हर तरफ़ से दौड़ दौड़कर मुसलमान आने लगे। कुफ्फार ने भी हर तरफ से हमला रोककर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर कातिलाना हमला करने के लिए सारा ज़ोर लगा दिया। लश्करे कुफ्फार का दल बादल हुजूम के साथ उमड़ पड़ा। और बार बार मदनी ताजदार पर यलगार करने लगा। मगर जुल फिकार की बिजली से ये बादल फट फटकर रह जाता था।
ज़ियाद बिन सकन की शुजाअत और शहादत
एक मर्तबा कुफ्फार का हुजूम हमला आवर हुआ तो सरवरे
आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि “कौन है जो मेरे ऊपर अपनी जान कुर्बान करता है? ये सुनते ही हजरते जियाद बिन सकन रदियल्लाहु अन्हु पाँच अन्सारियों को साथ लेकर आगे बढ़े। और हर एक ने लड़ते हुए अपनी जानें फ़िदा कर दी। हज़रते ज़ियाद बिन सकन रदियल्लाहु अन्हु ज़ख्मों से लाचार होकर जमीन पर गिर पड़े थे मगर कुछ कुछ जान बाकी थी। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हुक्म दिया कि उनकी लाश को मेरे पास उठा लाओ। जब लोगों ने उनकी लाश को बारगाहे रिसालत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम में पेश किया। तो हज़रते ज़ियाद बिन सकन रदियल्लाहु अन्हु ने खिसक कर महबूबे खुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के कदमों पर अपना मुँह रख दिया और इसी हालत में उनकी रूह परवाज़ कर गई। अल्लाहु अकबर! हज़रते ज़ियाद बिन सकन रदियल्लाहु अन्हु की इस मौत पर लाखों ज़िन्दगीयाँ कुर्बान । सुब्हानल्लाह!
बच्चा नाज़ रफ़्ता बाशद जि जहाँ नियाज मंदे कि बवक्ते जाँ सिपुर्दन सरश रसीदा बाशी
खजूर खाते खाते जन्नत में
/ इस घमसान की लड़ाई और मार धाड़ के हंगामों में एक बहादुर मुसलमान खड़ा हुआ। निहायत बे परवाई के साथ खजूरें खा रहा था। एक दम आगे बढ़ा और अर्ज किया कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अगर मैं इस वक्त शहीद हो जाऊँ तो मेरा ठिकाना कहाँ होगा। आप ने फरमाया कि तु जन्नत मे जायेगा वो बहादुर इस फरमाने विशारत को सुनकर मस्त व बेखुद हो गया। एक दम कुफ्फार के हुजूम में कूद पड़ा। और ऐसी शुजाअत के साथ लड़ने लगा कि काफिरों के दिल हिल गए। इसी तरह जंग करते करते शहीद हो गया।
(बुख़ारी गजवए उहुद जि.२ सं.५७९)
लंगड़ाते हुए बहिश्त में हजरते अमर बिन जमूह अन्सारी रदियल्लाहु अन्हु लंगड़े थे। ये घर से निकलते वक़्त ये दुआ माँगकर चले थे कि या अल्लाह! मुझको मैदाने जंग से अहल- इयाल में आना नसीब मत कर। उन के चार फ़रज़न्द भी जिहाद में मसरूफ थे। लोगों ने उनको लंगड़ा होने की बिना पर जंग करने से रोक दिया। तो वो सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में गिड़ गिड़ाकर अर्ज करने लगे कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मुझ को जंग में लड़ने की इजाज़त अता फरमाईए। मेरी तमन्ना है कि मैं भी लंगड़ाता हुआ बागे बहिश्त में ख़रामाँ ख़रामाँ चला जाऊँ। उनकी बेकरारी और गिरया वज़ारी से रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का कल्ब मुबारक मुतास्सिर हो गया। और आपने उनको जंग की इजाजत दे दी। ये खुशी से उछल पड़े और अपने एक फरज़नद को साथ लेकर काफिरों के हुजूम में घुस गए । हज़रते अबू तलहा रदियल्लाहु अन्हु का बयान । है कि मैं ने हज़रते अमर बिन जमूह रदियल्लाहु अन्हु को देखा कि वो मैदाने जंग में ये कहते हुए चल रहे थे कि “खुदा की कसम! मैं जन्न्त का मुश्ताक हूँ” उनके साथ साथ उनको सहारा देते हुए उनका लड़का भी इन्तिहाई शुजाअत के साथ लड़ रहा था। यहाँ तक कि ये दोनों शहादत से सरफ़राज़ हो कर बागे बहिश्त में पहुँच गए। लड़ाई ख़त्म हो जाने के बादउनकी बीवी हुन्द ज़ौजए अमर बिन जमूह मैदाने जंग में पहुँची। और उसने एक ऊँट पर उनकी और अपने भाई और बेटे की लाश को लादकर दफ्न के लिए मदीना लाना चाहा तो हज़ारों कोशिशें के बावुजूद किसी तरह भी वो ऊँट एक कदम भी मदीना की तरफ़ नहीं चला। बल्कि वो मैदाने जंग ही की तरफ भाग भागकर जाता रहा। हुन्द ने जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से ये माजरा अर्ज किया तो आपने फरमाया कि ये बताओ क्या अमर बिन जमूह ने घर से
निकलते वक्त कुछ कहा था? हुन्द ने कहा कि जी हाँ! वो ये दुआ करके घर से निकले थे कि “या अल्लाह! मुझको मैदाने जंग से अहल- इयाल में आना नसीब मत कर ।” आप ने इर्शाद फरमाया कि यही वजह है कि ऊँट मदीना की तरफ़ नहीं चल रहा है।
(मदारिज जि.२ स. १२४)
ताजदारे दो आलम
जख्मी इसी सरासीमगी और परेशानी के आलम में जब कि बिखरे हुए मुसलमान अभी रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास जमअ भी नहीं हुए थे कि अब्दुल्लाह बिन कमीय्या जो कुरैश के बहादुरों में बहुत ही नामवर था। उसने नागहाँ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को देख लिया। एक दम बिजली की तरह सफ़ों को चीरता हुआ आया। और ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर कातिलाना हमला कर दिया। ज़ालिम ने पूरी ताकत से आपके चेहरए अनवर पर तलवार मारी जिससे खुद की दो कड़ियाँ रुखे अनवर में चुभ गईं। एक दूसरे काफ़िर ने आपके चेहरए अकदस पर ऐसा पत्थर मारा कि आपके दो दन्दाने मुबारक शहीद, और नीचे का मुकद्दस होंट जख्मी हो गया इसी हालत में उबई बिन खलीफ मलऊन अपने घोडे पर सवार होकर आपको शहीद कर देने की नीय्यत से आगे बढ़ा। हुजूर अक़दंस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने एक जाँ निसार सहाबी हज़रते हारिस बिन सिम्मा रदियल्लाहु अन्हु से एक छोटा सा नेजा लेकर उबई बिन खलफ की गर्दन पर मारा जिससे वो तिलमिला गया। गर्दन पर बहुत मामूली ज़ख्म आया और वो भाग निकला मगर अपने लश्कर में जा कर अपनी गर्दन के जख्म के बारे में लोगों से अपनी तकलीफ और परेशानी जाहिर करने लगा। और बे पनाह ना काबिले बर्दाश्त दर्द की शिकायत करने लगा। इस पर उसके
साथियों ने कहा कि “ये तो मामूली ख़राश है। तुम इस कदर परेशान क्यों हो? उसने कहा कि तुम लोग नहीं जानते एक मर्तबा मुझसे मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) ने कहा था कि मैं तुमको कत्ल करूँगा। इस लिए ये तो बहर हाल जख्म है। मेरा तो ये एअतिकाद है कि अगर वो मेरे ऊपर थूक देते तो भी मैं समझ लेता कि मेरी मौत यकीनी है।
इस का वाकिआ ये है कि उबई ने मक्का में एक घोड़ा पाला था। जिसका नाम उसने “ऊद रखा था। वो रोज़ाना उसको चराता था। और लोगों से कहता था कि मैं इसी घोड़े पर सवार होकर मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) को कत्ल करूँगा। जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इसकी ख़बर हुई। तो आपने फ़रमाया कि इन्शा अल्लाह तआला मैं उबई बिन ख़लफ़ को क़त्ल करूँगा। चुनान्चे उबई बिन ख़लफ़ नेजे के ज़ख्म से बेकरार हो कर रास्ता भर तड़पता और बिलबिलाता रहा। यहाँ तक कि जंगे उहुद से वापस लौटते हुए मकाम “सरिफ़ में मर गयां । (जुरकानी अलल मवाहिबअ जि.२ स.४५)
इसी तरह बिन कमीय्या मलऊन जिसने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के रुखे अनवर पर अपनी तलवार चलादी थी। एक पहाड़ी बकरे को खुदावंदे कहार व जब्बार ने उसपर मुसल्लत फ़रमा दिया। और उसने उसको सींग मार माकर छलनी बना डाला। और पहाड़ की बुलन्दी से नीचे गिरा दिया जिससे उसकी लाश टुकड़े टुकड़े होकर ज़मीन पर बिखर गई।
(जरकानी जि.२ स.३९)
सहाबा का जोशे जाँ निसारी
जब हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जख्मी हो गए। तो चारों तरफ से कुफ्फार ने आप पर तीर- तलवार का वार शुरू कर दिया। और कुफ्फार का बे पनाह हुजूम आपके हर
चहार तरफ से हमला करने लगा जिससे आप कुफ्फार के नर्गे में महसूर होने लगे। ये मंजर देखकर जाँ निसार सहाबा का जोशे जाँ निसारी से
खून
खौलने लगा। और वो अपना सर हथेली पर रखकर आपको बचाने के लिए इस जंग की आग में कूद पड़े । और आपके गिर्द एक हल्का बना लिया। हजरते अबू दुजाना रदियल्लाहु अन्हु झुककर आपके लिए ढाल बन गए। और चारों तरफ से जो तलवारें बरस रही थीं उनको वो अपनी पुश्त पर लेते रहे। और आप तक किसी तलवार या नीजे की मारको पहुँचने ही नहीं देते थे। हज़रते तलहा रदियल्लाहु अन्हु की जाँ निसारी का ये आलम था कि वो कुफ्फार की तलवारों के वार को अपने हाथ पर रोकते थे। यहाँ तक कि उनका एक हाथ कटकर शल हो गया। और उनके बदन पर पैंतीस या संतालीस ज़ख्म लगे। गर्ज जाँ निसार सहाबा ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की हिफाज़त में अपनी जानों की परवाह नहीं की। और ऐसी बहादुरी और जाँ बाजी से जंग करते रहे कि तारीखे आलम में इसकी मिसाल नहीं मिल सकती। हज़रते अबू तलहा रदियल्लाहु अन्हु निशाना बाजी में मशहूर
थे। उन्होंने इस मौकअ पर इस कदर तीर बरसाए कि कई कमाने टूट गईं उन्होंने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अपनी पीठ के पीछे बिठा लिया ताकि दुश्मनों के तीर या तलवचार का काई वार आप पर न आ सके। कभी कभी आप दुश्मनों की फौज को देखने के लिए गर्दन उठाते तो हज़रते अबू तलहा रदियल्लाहु अन्हु अर्ज करते कि या रसूलल्लाह! मेरे माँ बाप आप पर कुर्बान आप गर्दन न उठाएँ। कहीं ऐसा न हो कि दुश्मनों का कोई तीर आप को लग जाए। या रसूलल्लाह! आप मेरी पीठ के पीछे ही रहें मेरा सीना आपके लिए ढाल बना हुआ है।
(बुख़ारी गजवए उहुद स.५८१)
हज़रते कतादह बिन नुअमान अन्सारी रदियल्लाहु अन्हु हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के चेहरए अनवर को बचाने के लिए अपना चेहरा दुश्मनों के सामने किए हुए थे। नागहाँ काफिरों
का एक तीर उनकी आँख में लगा। और आँख बहकर उनके रुख्सार पर आ गई। हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने दस्ते मुबारक से उनकी आँख को उठाकर आँख के हल्के में रख दिया। और यूँ दुआ फ़रमाई कि या अल्लाह कतादह की आँख बचाले जिसने तेरे रसूल के चेहरे को बचाया। मशहूर है कि उनकी वो आँख दूसरी आँख से ज्यादा रौशन और खूबसरत हो गई।
(जरकानी जि.२ स.४२) हजरते सब्द बिन अबी वक्कास रदियल्लाहु अन्हु भी तीरन्दाजी में इन्तिहाई बा कमाल थे। ये भी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की मदाफ़अत में जल्दी जल्दी तीर चला रहे थे। और हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम खुद अपने दस्ते मुबारक से तीर उठा उठा कर उनको देते थे और फरमाते थे कि ऐ सद! तीर बरसाते जाओ। तुम पर मेरे माँ बाप कुरबान।
(बुखारी गजवए उहुद स. ५८०) जालिम कुफ्फार इन्तिहाई बेदर्दी के साथ हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर तीर बरसा रहे थे, मगर उस वक़्त भी ज़बाने मुबारक पर ये दुआ थी
“रब्बिग-फिर कौमि फ़-इन्नहुम ला या लमून। (यानी ऐ अल्लाह! मेरी कौम को बख्श दे वो मुझे जानते नहीं हैं।)
(मुस्लिम गजवए उहुद जि.२ स.९०)
हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम दन्दाने मुबारक के सदमे और चेहरए अनवर के जख्मों से निढाल हो रहे थे इस हालत में आप उन गढ़ों में से एक गढ़े में गिर पड़े जो अबू आमिर फासिक ने जा बजा खोदकर उनको छुपा दिया था। ताकि मुसलमान ला इल्मी में इन गढ़ों के अन्दर गिर पड़ें हजरते अली रदियल्लाहु अन्हु ने आपका दस्ते मुबाकरपकड़ाऔर हजरते तलहा बिन अब्दुल्लाह रदियल्लाहु अन्हु ने आपको उठाया। हज़रते अबू उबैदा बिनुल जर्रह रदियल्लाहु अन्हु ने खूद (लोहे की टोपी) की
कड़ी का एक हल्का जो चेहरए अनवर में चुभ गया था अपने दाँतों से पकड़कर इस जोर के साथ खींचा कि उनका एक दाँत टूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। फिर दूसरा हल्का जो दाँतों से पकड़कर , खींचा तो दूसरा दाँत भी टूट गया। चेहरए अनवर से जो खून बहा उसको हजरते अबू सईद खुदरी रदियल्लाहु अन्हु के वालिद हज़रते मालिक बिन सुनान रदियल्लाहु अन्हु ने ज़ोशे अकीदत से चूस चूसकर पी लिया। और एक कतरा भी ज़मीन पर गिरने नहीं दिया। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमायश कि ऐ मालिक बिन सुनान! क्या तूने मेरा खून पी डाला। अर्ज किया कि जी हाँ । या रसूलल्लाह! इर्शाद फरमाया कि जिसने मेरा खून पी लिया। जहन्नम की क्या मजाल जो उसको छू सके।
(जरकानी जि.२ स.३९) इस हालत में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपने जाँ निसारों के साथ पहाड़ की बुलन्दी पर चढ़ गए। जहाँ कुफ्फार के लिए पहुँचना दुश्वार था। अबू सफ़यान ने देख लिया। और फौज लेकर वो भी पहाड़ पर चढ़ने लगा। लेकिन हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु और दूसरे जाँ निसार सहाबा ने काफ़िरों पर इस ज़ोर से पत्थर बरसाया कि अबू सुफ़यान उसकी ताब न ला सका। और पहाड़ से उतर गया।
हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपने ‘चन्दं सहाबा के साथ पहाड़ की एक घाटी में तशरीफ़ फ़रमा थे। और चेहरए अनवर से खून बह रहा था। हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हु अपनी ढाल में पानी भर भरकर ला रहे थे। और हज़रते फ़ातिमा जुहरा रदियल्लाहु अन्हा अपने हाथों से खून धो रही थीं। मगर खून बंद नहीं होता था। बिल आख़िर खजूर की चटाई का एक टुकड़ा जलाया और उसकी राख ज़ख्म पर रख दी। तो
फौरन ही थम गया। बुख़ारी गजवए उहुद जि.२ स.५८४)