Taleemat e Ameer 59

** تعلیمات امیر (Taleemat e Ameer r.a)
** انسٹھواں حصہ (part-59)

پس علماء نے اس پر اتفاق کیا ہے کہ وہ بادشاہ عادل ہے جس کو حق تعالی جناب فاطمہ زہرا سلام اللہ علیہ کی اولاد سے پیدا کرے گا اس وقت جب کی اس کی مشیت اور اس کو اپنے دین کی مدد کے لیے ظاہر فرمائے گا۔ علماء شیعہ کا خیال ہے کہ امام محمد
مہدی علیہ السلام امام حسن عسکری علیہ السلام کی اولاد ہیں جو دشمنوں کے خوف سے مخفی ہو گئے ہیں۔ ان کی درازی عمر میں حضرت نوح اور حضرت خضر علیہما السلام کی درازی عمر کے طرح کوئی استحالہ نہی ہے (اس قدر طویل عمر نا ممکن نہیں ہے) اس بات سے تمام دوسرے فرقوں کے علماء نے انکار کیا ہے اسی لیے کہ یہ دعوی ایک امر بعید ہے جس کی وجہ یہ ہے کہ اس امت محمدی صلی اللہ علیہ وسلم میں ایسی طویل عمر پانا دستور نہیں رہا ہے بغیر کسی دلیل اور علامت کے۔ اور امام محمد ابن حسن عسکری علیہ السلام کے اس قدر اخفا کے سلسلہ میں کوئی علامت اور دلیل مذکور نہیں ہے اور نبی کریم صلی اللہ علیہ وسلم نے اس کے متعلق کوئی اشارہ بھی نہیں فرمایا ہے۔ اس انکار کی وجہ یہ بھی ہے کہ امام کا اتنے دنوں تک اس طرح پوشیدہ رہنا کہ نام کے سوا کچھ بھی ان کا ذکر مزکور نہیں ایک بعید از قیاس امر ہے اور یہ بھی دلیل ہے کہ اس پوشیدگی کے ہوتے امام کی بعثت بیکار ہو جاتی ہے کیونکہ امامت سے مقصود اقامت شریعت ہے اور ظلم کو دفاع کرنے والے انتظام کا قائم کرنا ہے۔ اسی طرح کے اور امور ہیں اگر اس کو تسلیم کر لیا جائے تو چاہئے تھا کہ ظاہر ہو جاتے ہاں امامت کا دعوی نہ کرتے جیسے تمام ائمہ اہل بیت تھے تاکہ اولیاء اللہ ان سے مدد و غلبہ حاصل کرتے اور سب لوگ نفع اٹھاتے اور یہ بات بھی ہے کہ یہ زمانہ تو ان کے ظہور کے لئے سب سے اچھا تھا کیونکہ یقینی بات ہے کہ آپ کی نیازمندی کے لئے عورتیں بچے اور بڑے چھوٹے بڑی جلدی کریں گے۔ واللہ اعلم۔

(📚 ماخذ از کتاب چراغ خضر)

Karamt e Madar Pak

Hazrat Ghauṡe aazam Abdul Qaadir Jeelaani (QaddasAllahu Sirrahu Al Aziz) ki Bahen Sayyeda Bibi Naseeba (رضي الله عنه‎) ko koi aulaad nahi thi. Unho ne apne bhai se kaha ‘Kaa’inat ki har cheez aap ka faiz o barkat haasil karti hai. Magar main aulaad se mehroom hu. Aap mere liye dua kijiye ke ALLĀH ta’ala mujhe aulaad ata farmae.’
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Ghauṡe aazam (QaddasAllahu Sirrahu Al Aziz) ne farmaaya ‘Tumhare naseeb me aulaad hai, magar wo Hazrat Madaar shah (QaddasAllahu Sirrahu Al Aziz) ki dua se hai. Wo bahot jald Baghdad tashreef laayenge. Jab wo aaye to tum un se ilteja karna. Agar wo tumhare liye dua karen to insha Allāh ALLĀH tumhe ata farmaega.’
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Kuchh dino ke baad Hazrat Madaar Shaah (QaddasAllahu Sirrahu Al Aziz) Baghdad tashreef laaye. Sayyeda Naseeba (رضي الله عنه‎) ne jab ye khabar suni to foran aap ki baargah me haazir hui aur dua ke liye kaha. Aap ne farmaya ‘ALLĀH ta’ala tumhe 2 bete ata farmaega agar tum un me se ek ko Islaam ki isha’at ke liye dene ke liye raazi ho to.’
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Sayyeda Naseeba (رضي الله عنه‎) is ke liye raazi ho gai.
Is ke baad Aap ki dua se Sayyeda (رضي الله عنه‎) ko 2 bete hue. Jin ke naam Sayyed Muhammad aur Sayyed Ahmad rakhe gaye.
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Kuchh arse baad jab Madaar shah (QaddasAllahu Sirrahu Al Aziz) teesri baar Baghdad tashreef laaye aur kuchh din ke liye waha qayaam kiya.
Ek din Sayyed Muhammad ghar ki chhat par khel rahe the ki achanak waha se niche gire aur foran un ka inteqaal ho gaya. Ye dekhkar Sayyeda (رضي الله عنه‎) ki aankho me aansoo aa gaye. Itne me unhe yaad aaya ki maine apne wade ke mutabik is bete ko Madaar shah (QaddasAllahu Sirrahu Al Aziz) ko dene ka tay kiya tha.
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Chunaanche wo Madaar Shaah (QaddasAllahu Sirrahu Al Aziz) ki baargah me apne bete ki laash ko lekar pahunchi aur kaha ‘Aap ki dua se ALLĀH ta’ala ne mujhe 2 bete ata farmae the. Jin me se aik mujhe rakhna hai aur dusra jise aap ko dena tha us ka inteqaal ho gaya hai.’ Aap ne farmaaya ‘Theek hai, wo beta mujhe de do.’ Sayyeda (رضي الله عنه‎) ne kaha ‘Magar jo mar chuka hai use kisi ko nahi de sakti.’
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Ye sunkar Aap (QaddasAllahu Sirrahu Al Aziz) ne laash ke qareeb khade hokar farmaaya ‘Aye Jamaal-ud-deen Jaameman Jannati! ALLĀH ta’ala ke hukm se khade ho jaao.’ Ye kehte hi wo ladka zinda hokar khada ho gaya.
Baad me woh isi naam se mash’hoor hua. Aur us ka laqab ‘Jameel Shaah Daatar’ bhi hai. Aur us ka mazaar Helsa Jatinagar (Bihar) me hai.
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Reference : (Sirat-e-Madar, a book of Silisilye Madariya written by Alhaj Syed Mahzar Ali Jafferi Waqari Madari)
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(عليهم الصلاة والسلام)
اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ سَيِّدِنَا مُحَمَّد

हिजरत का नवाँ साल part 2

फेहरिस्ते चन्दा दहिन्दगान

हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु ने अपना सारा माल और घर का तमाम असासा यहाँ तक कि बदन के कपड़ भी लाकर बारगाहे नुबूव्वत में पेश कर दिए और हज़रते उमर फारूक रदियल्लाहु अनहु ने अपना आधा माल इस चन्दे में दे दिया। मन्कूल है कि हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु जब अपना निस्फ माल लेकर बारगाहे अकदस में चले तो अपने दिल में ये ख़याल करके चले थे कि आज मैं हज़रते. अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु से सबकताले जाऊँगा। क्योंकि उस दिन काशानए फारूक में इत्तिफाक से बहुत ज़्यादा माल था। हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते उमर फारूक रदियल्लाहु अन्हु

आधा माल हाज़िरे ख़िदमत है। और आधा माल अल-ने अयाल के लिए घर में छोड़ दिया है। और जब यही सवाल अपने यारे गार हज़रते सिद्दीके अकबर रदियल्लाहु अन्हु से किया। तो उन्होंने अर्ज़ किया कि – “इद्दा ख़र-तुल्लाह व रसू-लहू” मैं ने अल्लाह और उसके रसूल को अपने घर का जखीरा बना दिया है। आपने इर्शाद फरमाया कि बै-नकुमा मा बैना कलि-मतै-कुमा”

तुम दोनों में इतना ही र्फक है जितना तुम दोनों के कलामों में फर्क है।

हज़रे उस्मान गनी रदियल्लाहु अन्हु ने एक हज़ार ऊँट और सत्तर घोड़े मुजाहिदीन की. सवारी के लिए। और एक हज़ार अशरफी फौज के अख़राजात की मद में अपनी आस्तीन में भरकर लाए। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की आगोशे मुबारक में बिखेर दिया। आपने उनको कुबूल फ़रमाकर ये दुआ फरमाई कि “अल्लाहुम्मरदा अन उस्माना फ-इन्नि अनहु रादिन।” ऐ अल्लाह! तू उसमान से राज़ी हो जा। क्योंकि मैं इससे खुश हो गया हूँ!

हज़रते अब्दुर रहमान बिन औफ़ रदियल्लाहु अन्हु ने चालीस हज़ार दिरहम दिया। और अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) मेरे घर में इस वक्त अस्सी हजार दिरहम थे। आधा बारगहे अकदस में लाया हूँ। और आधा घर पर बाल बच्चों के लिए छोड़ आया हूँ। इर्शाद फरमाया कि अल्लाह तआला इस में भी बरकत दे जो तुम लाए और उसमें भी बरकत अता फ़रमाए जो तुम

ने घर पर रखा। इस दुआए नबवी का ये असर हुआ कि हज़रते अब्दुर रहमान रदियल्लाहु अन्हु बहुत ज़्यादा मालदार हो गए।

इसी तरह तमाम अन्सार व मुहाजिरीन ने हस्बे तौफ़ीक़ इस

चन्दे में हिस्सा लिया। औरतों ने अपने जेवरात उतार उतार कर बारगाहे नुबूव्वत में पेश करने की सआदत हासिल की!

हजरते आसिम बिन अदी रदियल्लाहु अन्हु ने कई मन खजूरें दी और हजरते अबू अकील अन्सारी रदियल्लाहु अन्हु जो बहुत ही मुफलिस थे फकत एक साअ खजूर लेकर हाज़िरे ख़िदमत हुए। और गुजारिश की कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) मैं ने दिन भर पानी भर भर कर मज़दूरी की तो दो साअ खजूरें मुझे मजदूरी में मिली हैं। एक साअ अहल- अयाल को दे दी है। और एक साअ हाज़िरे ख़िदमत है। हुजूर रहमतुल लिल आलमीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का कल्बे नाजुक अपने एक मुफ़लिस जाँ निसार के नज़रानए खुलूस से बेहद मुतास्सिर हुआ और आपने उस खजूर को तमाम मालों के ऊपर रख दिया।

(मदारिजुन्नुबूव्वत जि.२ स. ३४५ ता ३४६)

फौज की तय्यारी

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का अब तक ये तरीका था कि ग़ज़वात के मामले में बहुत ज्यादा राज़दारी के साथ तय्यारी फरमाते थे। यहाँ त कि असाकरे इस्लामिया को जैन वक्त तक ये भी न मालूम होता था कि कहाँ और किस तरफ़ जाना है? मगर जंगे तबूक के मौका पर सब कुछ इन्तिज़ाम अलानिया तौर पर किया और ये भी बता दिया कि तबूक चलना है। और कैसरे रूम की फौजों से जिहाद करना है। ताकि लोग ज़्यादा से ज़्यादा तय्यारी कर लें। हज़रात सहाबए किराम ने जैसा कि लिखा जा चुका दिल खोलकर चन्दा दिया। मगर फिर भी पूरी फौज क लिए सवारियों का इन्तिज़ाम न हो सका चुनान्चे बहुत से जाँबाज़ मुसलमान इसी बिना पर इस जिहाद में शरीक न हो सके कि उपके पास सफर का सामान नहीं था। ये लोग दरबारे रिसालत में सवारी तलब करने के लिए हाज़िर हुए। मगर जब रसूलुल्लाह

सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया किमेरे पास सवारी नहीं है तो ये लोग अपनी बे सरो सामानी पर इस तरह बिलबिला कर रोए कि हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को उनकी आह- जारी और बेकरारी पर रहम आ गया धुनान्चे कुरआन मजीद गवाह है कि –

तर्जमा :- और न उन लोगों को कुछ हर्ज है कि वो जब (ऐ रसूल) आप के पास आए कि हम को सवारी दीजिए और आपने कहा कि मेरे पास कोई चीज़ नहीं जिस पर तुम्हें सवार करूँ। तो वो वापस गए। और उनकी आँखों से आँसू जारी थे कि अफसोस हमारे पास खर्च नहीं है।

तबूक को रवांगी

बहर हाल हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तीस हज़ार का लश्कर साथ लेकर तबूक के लिए रवाना हुए और मदीने का नज़्म- नस्क चलाने के लिए हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हु को अपना खलीफ़ा बनाया। जब हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हु ने निहायत ही हसरत व अफ्सोस के साथ अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) क्या आप मुझे औरतों और बच्चों में छोड़कर खुद जिहाद के लिए तशरीफ लिये जा रहे हैं? तो इर्शाद फरमाया कि

अला तर्दा अन तकूना मिन्नी वि-मन-जि-लति हारूना मिम मूसा इल्ला अन-नहू लैसा नबीय्युम बदी। (बुखारी जि.२ स. ६३३ गजवए तबूक)

तर्जमा :- क्या तुम इस पर राज़ी नहीं हो कि तुम को मुझ से वो निस्बत है जो हज़रते हारून अलैहिस्सलाम को हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम के साथ थी। मगर ये कि मेरे बाद कोई नबी नहीं

यानी जिस तरह हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम कोहे तूर पर जाते वक्त हज़रते हारून अलैहिस्सलाम को अपनी उम्मत बनी इसराईल की देख भाल के लिए अपना ख़लीफ़ा बनाकर गए थे। इस तरह मैं तुम को अपनी उम्मत सौंप कर जिहाद के लिए जा रहा हूँ।

मदीने से चलकर मकाम सनियतुल वदा में आपने कियाम फ़रमाया। और फौज का मुकद्दमा, मैमना, मैसरा वगैरा मुरत्तब फ़रमाया। फिर वहाँ से कूच किया। मुनाफ़िकीन किस्म किस्म के झूटे उज़ और बहाने बनाकर रह गए और मुख्लिस मुसलमानों में से भी चन्द हज़रात रह गए उनमें ये हज़रात थे। कब बिन मालिक, हिलाल बिन उमय्या, मुरारा बिन रबीअ, अबू खैसमा, अबू ज़र गिफारी रदियल्लाहु अन्हुम। इनमें से अबू खैसमा और अबू जर गिफार रदियल्लाहु अन्हुमा तो बाद में जाकर शरीके जिहाद हो गए। लेकिन तीन अव्वलुज़-ज़िक्र नहीं गए।

हज़रते अबू जर गिफारी रदियल्लाहु अन्हु के पीछे रह जाने का सबब ये हुआ कि उनका घोड़ा बहुत ही कमज़ोर और थका हुआ था। उन्होंने उसको चन्द दिनों चारा खिलाया ताकि वो चंगा

हो जाए। जब रवाना हुए तो वो फिर रास्ते में थका गया। मजबूरन वो अपना सामान अपनी पीठ पर लादकर चल पड़े और इस्लामी लश्कर में शामिल हो गए।

(जरकानी जि.२ स.७१) हज़रते अबू जैसमा रदियल्लाहु अन्हु जाने का इरादा नहीं रखते थे। मगर वो एक दिन शदीद गर्मी में कहीं बाहर से आए तो उनकी बीवी ने छप्पर में छिड़काव कर रखा था। थोड़ी देर इस साया दार और ठन्डी जगह बैठे फिर नागहाँ उनके दिल में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का ख़याल आ गया। अपनी बीवी से कहा कि ये कहाँ का इन्साफ है? कि मैं तो अपनी छप्पर में ठन्डक और साये में आराम व चैन से बैठा रहूँ। और खुदा के मुकद्दस रसूल इस धूप की तमाज़त और शदीद लू के थपेड़ों में सफ़ा करते हुए जिहाद के लिए तशरीफ़ ले जा रहे हों। एक दम उनपर ऐसी ईमानी गैरत सवार हो गई कि तोशा के लिए खजूर लेकर एक ऊँट पर सवार हो गए। और तेजी के साथ सफर करते हुए रवाना हो गए। लश्कर वालों ने दूर से एक शुतर सवार को देखा तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि अबू खैसमा होंगे। इस तरह ये भी लश्करे इस्लाम में पहुंच गए।

(जरकानी जि.३ स.७१) रास्ते में कौमे आद व समूद की वो बस्तीयाँ मिलीं। जो कहरे इलाही के अज़ाबों से उलट पलट कर दी गई थीं। आपने हुक्म दिया कि ये वो जगहें हैं जहाँ खुदा का अज़ाब नाज़िल हो चुका है। इस लिए कोई शख़्स यहाँ कियाम न करे। बल्कि निहायत तेजी के साथ सब लोग यहाँ से सफ़र करके इन अज़ाब के वादियों से जल्द बाहर निकल जाएँ। और कोई यहाँ का पानी न पीये। और न किसी काम में लाए।

इस गज़वे में पानी की किल्लत शदीद गर्मी, सवारियों की कमी से मुजाहिदीन ने बेहद तकलीफ उठाई मगर मंज़िले मकसूद पर पहुँचकर ही दम लिया।

रास्ते में चन्द मुज़िज़ात

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते अबू जर गिफारी रदियल्लाहु अन्हु को देखा कि वो सब से अलग अलग चल रहे हैं। तो इर्शाद फरमाया कि ये सब अलग ही चलेंगे। और अलग ही ज़िन्दगी गुजारेंगे। और अलग ही वफ़ात पाएँगे। चुनान्चे ठीक ऐसा ही हुआ कि हज़रते उस्मान रदियल्लाहु अन्हु के दौरे ख़िलाफ़त में उनको हुक्म दे दिया कि आप “रहज़ा” में रहें। आप रहज़ा में अपनी बीवी और गुलाम के साथ रहने लगे। जब वफ़ात का वक्त आया। तो आप ने और कफन पहनाकर रास्ते में रख देना। जब शुतर सवारों का पहला गिरोह मेरे जनाज़े के पास से गुज़रे तो तुम लोग उस से कहना कि ये अबू ज़र गिफारी का जनाज़ा है। इन पर नमाज़ पढ़कर उनको दफन करने में हमारी मदद करो। खुदा की शान कि सब से पहला जो काफिला गुज़रा इस में हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद सहाबी रदियल्लाहु अन्हु थे। आपने जब ये सुना

कि ये हज़रते अबू ज़र गिफारी रदियल्लाहु अन्हु का जनाज़ा है तो उन्होंने

“इन्ना लिल्लाहि व अन्ना इलैहि राजिऊन’ पढ़ा और काफिला को रोक कर उतर पड़े और कहा कि बिल्कुल सच फ़रमाया था रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने कि “ऐ अबू ज़र! तू तन्हा चलेगा। तन्हा मरेगा। तन्हा कब्र से उठेगा।’

फिर हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद रदियल्लाहु अन्हु और काफिला वालों ने उनको पूरे एअज़ाज़ के साथ दफन किया।

(सीरते इब्ने हश्शाम जि.४ स. ५२४ व ज़रकानी जि.३ स. ७२) बअज़ रिवायतों में ये भी आया है कि उनकी बीवी के पास कफ़न के निलए कपड़ा नहीं था। तो आने वाले लोगों में से एक अन्सारी ने कफ़न के लिए कपड़ा दिया। और नमाज़े जनाज़ा पढ़कर दफ़न किया। (वल्लाहु तआला अलम)

हवा उड़ा ले गई

जब इस्लामी लश्कर मकाम “हिजर’ में पहुँचा तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हुक्म दिया कि कोई शख्स अकेला लश्कर के बाहर कहीं दूर न चला जाए। पूरे लश्कर ने उस हुक्मे नबवी की इताअत की। मगर कबीलए बनू साअदा के दो आदमियों ने आपके हुक्म को नहीं माना। एक शख्स अकेला ही रफ़अ हाज के लिए लश्कर से दूर चला गया। वो बैठा ही था कि दफअतन किसी ने उसका गला घोंट दिया। और वो उसी जगह मर गया और दूसरा शख्स अपना ऊँट पकड़ने के लिए अकेला ही लश्कर से कुछ दूर चला गया। तो नागहाँ एक हवा का झोंका आया और उस को उड़ाकर कबीलए “तय्य के दोनों पहाड के दर्मियान फेंक दिया। और वो हलाक हो गया। आपने उन दोनों का अंजाम सुनकर फ़रमाया कि मैं ने तुम लोगों को मना नहीं कर दिया था।

(जरकानी जि.३ स. ७३)

गुमशुदा ऊँटनी कहाँ है?

एक मंज़िल पर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ऊँटनी कहीं चली गई। और लोग उसकी तलाश में सरगिरदाँ फिरने लगे। तो एक मुनाफ़िक जिसका नाम जैद बिन लुसैत था कहने लगा कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) कहते हैं कि मैं अल्लाह का नबी हूँ। और मेरे पास आस्मान की खबरें आती हैं। मगर उनको ये पता ही नहीं है कि उनकी ऊँटनी कहाँ है? हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने असहाब से फ़रमाया कि एक शख्स ऐसा ऐसा कहता है हालाँकि खुदा की कसम! अल्लाह तआला के बता देने से मैं खूब जानता हूँ कि मेरी ऊँटनी कहाँ है? वो फुलाँ घाटी में है और एक दरख्त में उसकी मुहार की रस्सी उलझ गई है। तुम लोग जाओ और उस ऊँटनी को मेरे पास लेकर आ जाओ। जब लोग उस जगह गए

तो ठीक ऐसा ही देखा कि उसी घाटी में वो ऊँटनी खड़ी है। और उसकी मुहार एक दरख्त की शाख में उलझी हुई थी।

(जरकानी जि.३ स. ७५)

तबूक का चश्मा

जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तबूक के करीब पहुंचे तो इर्शाद फ़रमाया कि इन्शा अल्लाह कल तुम लोग तबूक के चश्मे पर पहुँचोगें। और सूरज बुलन्द होने के बाद पहुँचोगे। लेकिन कोई शख़्स वहाँ पहुँचे तो पानी को हाथ न लगाए रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जब वहाँ पहुँचे तो जूते के तसमे के बराबर उस में एक पानी की धार बह रही थी। आपने उस में थोड़ा पानी मंगाकर हाथ मुँह धोया और उस पानी में कुल्ली फ़रमाई फिर हुक्म दिया कि इस पानी को चश्मे में उंडल दो। लोगों ने जब उस पानी को चश्मे में डाला। तो चश्मा से ज़ोर दार पानी की मोटी धार बहने लगी: पौर तीस हज़ार का लश्करऔर तमाम जानवर उस चश्मे से सैराब हो गए। (ज़रकानी जि.३ स. ७६)

रूमी लश्कर डर गया

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने तबूक में पहुँचकर लश्कर को पड़ाव का हुक्म दिया। मगर दूर दूर तक रूमी लश्करों का कोई पता नहीं चला। वाकिआ ये हुआ कि जब रूमियों के जासूसें ने कैसर को ख़बर दी कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तीस हज़ार का लश्कर लेकर तबूक रहे हैं। तो रूमियों पर इस कदर हैबत छा गई कि वो जंग से हिम्मत हार गए। और अपने घरों से बाहर न निकल सके।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बीस दिन तबूक में कियाम फरमाया। और अतराफ व जवानिब में अफवाजे इलाही का जलाल दिखाकर और कुफ्फार के दिलों पर इस्लाम

सीरतुल मुस्तफा अलैहि वसल्लम का रोअब बिठाकर मदीना वापस तशरीफ लाए। और तबूक में

कोई जंग नहीं हुई!

रहे।

इसी सफा में “औला का सरदार जिसका नाम ‘यू-हन्ना” थाबारगाहे रिसालत में हाज़िर हुआ और जज़िया देना कुबूल कर लिया। और एक सफेद खच्चर भी दरबारे रिसालत में नज़ किया। जिसके सिले में ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उस को अपनी चादरे मुबारक इनायत फ़रमाई और उसको एक दस्तावेज़ तहरीर फरमाकर अता फरमाई कि वो अपने गिर्द- पेश के समुन्दर से हर किसम के फ़वाएद हासिल करता

(बुख़ारी जि.१ स. ४४८) इसी तरह ‘जरबा’ और अज़रुह के ईसाईयों ने भी हाज़िरे खिदमत होकर जज़िया देने पर रिजामंदी ज़ाहिर की।

इसके बाद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लमने हज़रते ख़ालिद बिन वलीद रदियल्लाहु अन्हु को एक सौ बीस सवारों के साथ “दूमतुल जन्दल’ के बादशाह ‘उकैदर बिन अब्दुल मलिक की तरफ रवाना फ़रमाया और इर्शाद फ़रमाया के वो रात में नील गाय का शिकार कर रहा होगा। तुम उसके पास पहुंची तो उसको कत्ल मत करना। बल्कि उसको जिन्दा गिरफ्तार करके मेरे पास लाना। चुनान्चे हज़रते ख़ालिद बिन वलीद रदियल्लाहु अन्हु ने चाँदनी रात में उकैदिर और उसके भाई हस्सान को शिकार करते हुए पा लिया। हस्सान ने चूँकि हज़रते ख़ालिद बिन वलीद रदियल्लाहु अन्हु से जंग शुरू कर दी इस लिए आपने उसको कत्ल कर दिया। मगर उकैदिर को गिरफ्तार कर लिया और इस शर्त पर उसको रिहा किया कि वो मदीना बारगाहे अकदस में हाज़िर होकर सुलह करे। चुनान्चे वो मदीना आया। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उसको अमान दी।

(ज़रकानी जि.३ स. ७७ व ७८) इस गज़वे में जो लोग गैर हाज़िर रहे उनमें अकसर मुनाफिकीन थे। जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तबूक से

मदीना वापस लौटे। और मस्जिदे नबवी में नुजूले अजलाल फरमाया। तो मुनाफिकीन कसमें खा खाकर अपना उज़ बयान करने लगे। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने किसी से कोई मुआखज़ा नहीं फरमाया। लेकिन तीन मुख्लिस सहाबियों हज़रते कअब बिन मालिक व हिलाल बिप उमय्या व मुरारह बिन रबीअ रदियल्लाहु अन्हुम को पचास दिनों तक आपने बाएकाट फ़रमा दिया। फिर उन तीनों की तौबा कुबूल हुई और उन लोगों के बारे में कुरआन की आयत नाज़िल हुई।

(बुख़ारी जि.२ स. ६३४ ता स. ६३७ हदीसे कब बिन मालिक) जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मदीना के करीब पहुंचे और उहुद पहाड़ को देखा तो फ़रमाया कि – “हाज़ा उहुदुन ज-बलुन युहिबुना व नुहिबुहू तर्जमा :

ये उहुद है। ये ऐसा पहाड़ है कि ये हम से महब्बत करता है और हम इस से महब्बत करते हैं।

जब आप ने मदीना की सर जमीन में कदम रखा तो औरतें। बच्चे और लोंडी गुलाम सब इस्तिकबाल के लिए निकल पड़े। और इस्तिकबालिया नज़में पढ़ते हुए आपके साथ मसिजदे नबवी तक आए। जब आप मस्जिदे नबवी में दो रक्अत नमाज़ पढ़कर तशरीफ़ फ़रमा हो गए तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के चचा हजरते अब्बास बिन मुत्तलिब रदियल्लाहु अन्हु ने आपकी मदह में एक कसीदा पढ़ा। और अहले मदीना ने बखैर- आफ़ियत इस दुश्वार गुज़ार सफ़र से आपकी तशरीफ आवरी पर इन्तिहाई मुसर्रत व शादमानी का इज़्हार किया और उन मुनाफ़िक़ीन के बारे में जो झूटे बहाने बनाकर इस जिहाद में शरीक नहीं थे। और बारगाहे नुबूव्वत में कसमें खा खा कर उन पेश कर रहे थे कहर- गज़ब में भरी हुई कुरआन मजीद की आयतें. नाज़िल हुई। और उन मुनाफ़िकों के निफाक का पर्दा चाक हो गया।

जुल बिजादीन की कब्र

गजवए तबूक बजुज एक हज़रते जुल बिजादीन के, न किसी सहाबी की शहादत हुई न वफ़ात । हज़रते जुल बिजादीन कौन थे? और उनकी वफ़ात और दफन का कैसा मंज़र था? ये एक बहुत ही ज़ौक आफ़री, और लजीज़ हिकायत है। ये कबीलए मुजय्यना के एक यतीम थे। और अपने चचा की परवरिश में थे। जब ये सन्ने शुऊर को पहुँचे और इस्लाम का चर्चा सुना तो उनके दिल में बुत परस्ती से नफरत और इस्लाम कुबूल करने का जज्बा पैदा हो गया। मगर उनका चचा बहुत ही कट्टर काफ़िर था। उसके खौफ से ये इस्लाम कुबूल नहीं कर सकते थे। लेकिन फतेह मक्का के बाद जब लोग फौज दर फौज इस्लाम में दाखिल होने लगे तो उन्होंने अपने चचा को तरगीब दी कि तुम भी दामने इस्लाम में आ जाओ। क्योंकि मैं कुबूले इस्लाम के लिए बहुत ही बेकरार हूँ। ये सुनकर उनके चचा ने उनको बरहना करके घर से निकाल दिया। ये अपनी वालिदा से एक कम्बल माँगकर उसको दो टुकड़े करके आधे को तहबंद और आधे को चादर बना लिया।

और इसी लिबास में हिजरत करके मदीना पहुँच गए। रात भर मस्जिदे नबवी में ठहरे रहे नमाजे फज्र के वक्त जमाले मुहम्मदी के अनवार से उनकी आँखें मुनव्वर हुईं तो कलिमा पढ़कर मुशर्रफ ब-इस्लाम हो गए। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उनका नाम दर्याफ्त फ़रमाया तो उन्होंने अपना नाम अब्दुल उज्ज़ा बता दिया। आपने फ़रमाया कि आज से तुम्हारा नाम अब्दुल्लाह और लकब जुल बिजादीन (दो कम्बलों वाला) है। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम उन पर बहुत करम फरमाते थे। और ये मस्जिदे नबवी में असहाबे सुफ्फा की जमाअत के साथ रहने लगे। और निहायत बुलन्द आवाज़ से ज़ौक- शौक और इन्तिहाई इश्तियाक के साथ दरख्वास्त की कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) दुआ फरमाइए कि मुझे खुदा की राह में

शहादत नसीब हो जाए। आपने फरमाया कि तुम

किसी दरख्त की छाल लाओ। वो थोड़ी सी बबूल की छाल लाए। आपने उनके बाजू पर वो छाल बाँध दी। और दुआ की कि ऐ अल्लाह! मैं ने इसके खून को

कुफ्फार पर हराम कर दिया। उन्होंने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) मेरा मकसद तो शहादत ही है। इर्शाद फरमाया कि जब तुम जिहाद के लिए | निकले हो तो अगर बुखार में भी मरोगे जब भी तुम शहीद ही होगे। खुदा की शान कि जब हज़रते जुल बिजादीन रदियल्लाहु अन्हु तबूक में पहुँचे तो बुख़ार में मुब्तला हो गए। और इसी बुख़ार में उनकी वफात हो गई।

हज़रते बिलाल दिन हारिस मुज़नी रदियल्लाहु अन्हु का बयान है कि उनके दफन का अजीब मंज़र था कि हज़रते बिलाल मुअज्जिन रदियल्लाहु अन्हु हाथ में चराग लिये उनकी कब्र के पास खड़े थे और खुद ब-नफ़्से नफीस हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम उनकी कब्र में उतरे। और हज़रते अबू बकर सिद्दीक़ व हज़रते उमर फारूक रदियल्लाहु अन्हुमा को हुक्म दिया कि तुम दोनों अपने इस्लामी भाई की लाश उठाओ। फिर आपने उनको अपने दस्ते मुबारक से सुलाया और खुद ही कब्र की कच्ची ईंटों से बंद फ़रमाया। और फिर ये दुआ माँगी कि या अल्लाह! मैं जुल बिजादीन से राज़ी हूँ। तू भी उस से राज़ी हो जा!

हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद रदियल्लाहु अन्हु ने हज़रते जुल बिजादीन के दफ़न का ये मंजर देखा तो बे इख्तियार उनके मुँह से निकला कि काश जुल बिजादीन की जगह ये मेरी मय्येत होती। (मदारिजुन्नुबूव्वा जि. २ स. ३५० व ३५१)

मस्जिदे जरार

मुनाफ़िकों ने इस्लाम की बीख़ कनी और मुसलमानों में फूट डालने के लिए मस्जिदे कुबा के मुकाबले में एक मस्जिद तअमीर

की थी। जो दर हकीकत मुनाफिकीन की साजिशों और उनकी दसीसा कारियों का एक जबरदस्त अड्डा था। अबू आमिर राहिब जो अन्सार में से ईसाई हो गया था जिसका नाम हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अबू आमिर फ़ासिक रखा था। उसने मुनाफिकीन से कहा कि तुम लोग खुफ़िया तरीके पर जंग की तय्यारियाँ करते रहो। मैं कैसरे रूम के पास जाकर वहाँ से फौजें लाता हूँ ताकि इस मुल्क से इस्लाम का नाम- निशान मिटा दूँ। चुनान्चे इसी मस्जिद में बैठ बैठकर इस्लाम के ख़िलाफ़ मुनाफिकीन कमेटीयाँ करते थे। और इस्लाम व बानीए इस्लाम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का खात्मा कर देने की तदबीरें सोचा करते थे।

जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जंगे तबूक लिए रवाना होने लगे तो मक्कार मुनाफ़िकों का एक गिरोह आया। और महज़ मुसलमानों को धोका देने के लिए बारगाहे अकदस में ये दरख्वास्त पेश की कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) हम ने बीमारों और मजूरों के लिए एक मस्जिद बनाई है। आप चलकर एक मर्तबा इस मस्जिद में नमाज़ पढ़ा दें। ताकि हमारी ये मस्जिद खुदा की बारगाह में मकबूल हो जाए। आपने जवाब दिया कि इस वक्त तो मैं जिहाद के लिए घर से निकल चुका हूँ। लिहाजा इस वक्त तो मुझे इतना मौका नहीं है। मुनाफ़िकीन ने बहुत काफ़ी इसरार किया। मगर आप ने उनकी मस्जिद में कदम नहीं रखा। जब आप जंगे तबूक से वापस तशरीफ़ लाए तो मुनाफ़िक़ीन की चाल बाज़ियों और उनकी मक्कारियों, दगा बाज़ियों के बारे में “सूरए तौबा की बहुत सी आयात नाज़िल हो गईं और मुनाफ़िक़ीन के निफाक, और उनकी इस्लाम दुश्मनी के तमाम रमूज़ व इसरार बे नकाब होकर नज़रों के सामने आ गए और उनकी इस मस्जिद के बारे में खुसूसियत के साथ आयतें नाज़िल हुई कि

तर्जमा और वो लोग जिन्होंने एक मस्जिद ज़रर पहुँचाने और कुफ्र करने और मुसलमानों में फूट डालने की गरज़ से बनाई। और इस मकसद से कि जो लोग पहले ही से

खुदा

और जंग कर रहे हैं उन के लिए एक कमीन गाह हाथ आ जाए। और वो जरूर कसमें खाएँगे कि हम ने तो भलाई ही का इरादा किया है और खुदा गवाही देता है कि बेशक ये लोग झूटे हैं। आप कभी भी इस मस्जिद में न खड़े हों वो मस्जिद (मस्जिदे कुबा) जिस की बुनियाद पहले ही दिन से परहेज़गारी पर रखी हुई है। वो इस बात की ज़्यादा हकदार है कि आप उसमें खड़े हों। इसमें ऐसे लोग है जो पाकी को पास्नद करते हैं। और खुदा पाकी रखने वालों को दोस्त रखता है।

इस आयत के नाज़िल होजाने के बाद हुजूरे अकदस

सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते मालिक बिन दुख्शम व हजरते मन बिन अदी रदियल्लाहु तआला अन्हुमा को हुक्म दिया कि उस मस्जिद को मुन्हदम करके उसमें आग लगा दें।

(जरकानी जि. ३ स. ८०)

सिद्दीके अकबर रदियल्लाहु अन्हु अमीरुल हज्ज

ग़ज़वए तबूक से वापसी केबाद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जुल-कदा सन्न ६ हिजरी में तीन सौ मुसलमानों का एक काफ़िला मदीना मुनव्वरा से हज्ज के लिए मक्का मुकर्रमा भेजा और हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु को ‘अमीरुल हज्ज” और हज़रते अली मुर्तज़ा रदियल्लाहु अन्हु को “नकीबे इस्लाम और हज़रते सअद बिन अबी वक़्क़ास व हज़रते जाबिर बिन अब्दुल्लाह व हज़रते अबू हुरैरा रदियल्लाहु अन्हुम को मुअल्लिम बना दिया ओर अपनी तरफ से कुर्बानी के लिए बीस ऊँट भी भेजा।

हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु ने हरमे कबा और अरफ़ात व मिना में खुत्बा पढ़ा। इसके बाद हजरते अली रदियल्लाहु अन्हु खड़े हुए और “सूराए बराअ की चालीस आयतें पढ़कर सुनाईं। और एअलान कर दिया कि अब कोई मुशरिक ख़ानए कबा में दाख़िल न हो सकेगा। न कोई बरहना बदन और नंगा होकर तवाफ़ कर सकेगा। और चार महीने के बाद कुफ्फार व मुशरिकीन के लिए अमान ख़त्म कर दी जाएगी। हज़रते अबू हुरैरा व दूसरे सहाबए किराम रदियल्लाहु अन्हुम ने इस एलान की इस कदर ज़ोर ज़ोर से मुनादी की कि उन लोगों का गला बैठ गया। इस एअलान के बाद कुफ्फार व मुशंरिकीन फौज थी फौज आकर मुसलमान होने लगे।

(तबरी जि. ४ स. १७२१ व ज़रकानी जि.३ स.९० ता स. ९३).