सन्न ११ हिजरी

जैशे उसामा

इस लशकर का दूसरा नाम. “संरिय्या उसामा भी है। ये सब से आखिरी फौज है जिस के रवाना करने का रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हुक्म दिया २६ सफ़र ११ हिजरी दोशंबा के दिन हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने रूमियों से जंग की तय्यारी का हुक्म दिया। और दूसरे दिन हज़रत उसामा बिन जैद रदियल्लाहु अन्हु का बुलाकर फ़रमाया कि मैं ने तुम को इस.फौज का अमीर लशकरे मुकर्रर किया। तुम अपने बाप की शहादत गाह मकाम “उबना” में जाओ। और निहायत तेजी के साथ सफ़र करके उन कुफ्फारों पर अचानक हमला कर दो। ताकि वो लोग जंग की तय्यारी न कर सकें। बावुजूद ये कि मिज़ाजे अकदस नासाज़ था। मगर इसी हालत में आप ने खुद अपने दस्त मुबारक से झन्डा बाँधा। और ये निशाने इस्लाम हज़रत उसामा रदियल्लाहु अन्हु के हाथ में देकर इर्शाद फरमाया कि तर्जमा :- अल्लाह के नाम से और अल्लाह की राह में जिहाद करो और काफिरों के साथ जंग. करो!

हज़रत उसामा रदियल्लाहु अन्हु ने हज़रत बुरीदा बिन

अनहसीब रदियल्लाहु अन्हु को अलम बरदार बनया। और मदीना से निकल कर एक कोस दूर मकाम “जुर्फ में पड़ाव किया। ताकि वहाँ पूरा लशकर जमा हो जाए। हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अनसार व मुहाजिरीन के तमाम मुअज्जज़ीन को भी उस लशकर में शामिल हो जाने का हुक्म दिया बअज लोगों पर ये शाक गुज़रा कि ऐसा लशकर जिस में अनसार व मुहाजिरीन के अकाबिर- अमाएद मौजूद हैं एक नौ उम्र लड़का जिस की उम्र बीस बरस से जाएद नहीं किस तरह अमीर लशकर बना दिया गया? जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इस एअतिराज़ की खबर मिली। तो आप के कल्बे नाजुक पर सदमा गुज़रा । और आप ने अलालत के बावुजूद सर में पट्टी बाँधे हुए एक चादर ओढ़ कर मिम्बर पर एक खुत्बा दिया। जिस में इर्शाद फरमाया कि अगर तुम लोगों ने उसामा की सिपा सालारी पर तना ज़नी की है। तो तुम लोगों ने उस से क़ब्ल उस के बाप के सिपा. सालार होने पर भी तअना ज़नी की थी। हालाँकि खुदा की कसम उस का बाप (जैद बिन हारिसा) सिपा सालार होने के लाएक था और इस के बाद इंस का बेटा (उसामा बिन जैद) भी सिपा सालार होने के काबिल है और ये मेरे नज़दीक मेरे महबूब तरीन सहाबा में से है। जैसा कि इस का बाप मेरे महबूब तरीन अस्हाब में से था लिहाज़ा उसामा रदियल्लाहु अन्हु के बारे में तुम लोग मेरी नेक वसीय्यत को कबूल करो। कि वो तुम्हारे बेहतरीन लोगों में से है।

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ये खुत्बा दे कर मकान में तशरीफ़ ले गए और आप की अलालत में कुछ और भी अज़ाफ़ा हो गया।

हज़रत उसामा रदियल्लाहु अन्हु हुक्म नबवी की तमील करते हुए मकामे जुर्फ में पहुंच गए थे। और वहाँ लशकरे इस्लाम का इज्तिमा होता रहा। यहाँ तक कि एक अज़ीम लशकर तय्यार हो गया। १० रबीऊल अव्वल.११ हिजरी को जिहाद में जाने वाले

ख्वास हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से रुख्सत होने के लिए आए और रुख्सत होकर मकाम जुर्फ में पहुंच गए। इस के दूसरे दिन हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की अलालत ने और ज्यादा शिद्दत इख्तियार कर ली। हज़रत उसामा रदियल्लाहु अन्हु भी आप की मिज़ाज पुर्सी और रुखसत होने के लिए ख़िदमते अकदस में हाज़िर हुए। आप ने हज़रते उसामा रदियल्लाहु अन्हु को देखा। मगर जुअफ की वजह से कुछ बोल न सके। बार बार दस्त मुबारक को आसमान की तरफ़ उठाते थे और उन के बदन पर अपना मुकद्दस हाथ फिराते थे। हजरत उसामा रदियल्लाहु अन्हु का बयान है कि इस से मैं ने ये समझा कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मेरे लिए दुआ फरमा रहे हैं। इस के बाद हज़रत उसामा रदियल्लाहु अन्हु रुख्सत होकर अपनी फौज में तशरीफ ले गए। और १२ रबीऊल अव्वल ११ हिजरी को

कूच करने का एलान भी फ़रमा दिया। अब सवार होने के लिए तय्यारी कर रहे थे कि उन की वालिदा हज़रत उम्मे ऐमन रदियल्लाहु अन्हा का फ़रिस्तदा आदमी पहुँचा कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम नज़अ की हालत में हैं। ये होश रुबा ख़बर सुन कर हज़रत उसामा व हज़रत उमर व हज़रत अबू उबैदा वगैरा वगैरा ल फौरन ही मदीना आए। तो ये देखा कि आप सकरात के आलम में हैं। और इसी दिन दोपहर को या सह पहर के वक्त आप का विसाल हो गया। ये ख़बर सुन कर हज़रत उसामा रदियल्लाहु अन्हु का लशकर मदीना वापस चला आया। मगर जब हज़रत अबू बकर सिद्ददीक रदियल्लाहु अन्हु मस्नदे ख़िलाफ़त पर रौनक अफ्रोज़ हो गए। तो आप ने बअज़ लोगों की मुखालिफ़त के बावुजूद रबीउल आखिर की आखिरी तारीखों में इस लशकर को रवाना फ़रमाया। और हज़रत उसामा रदियल्लाहु अन्हु मकाम उबना” में तशरीफ ले गए। और वहाँ बहुत ही खू रेज़ जंग के बाद लशकर इस्लाम फ़तेहयाब हुआ। और आप ने अपने बाप के कातिल और दूसरे

कुफ्फार

को कत्ल किया। और बे शुमार माले गनीमत लेकर चालीस दिन के बाद मदीना वापस तशरीफ लाए। (मदारिजन्नुबुब्बा जिल्द ३ स. ४९ ता स ४११ व जुरकानी जि. ३ स.१०७ ता स.११३)

वफ़ाते अकदस

हुजूर रहमतुल्लिल आलमीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इस आलम में तशरीफ़ लाना सिर्फ इस लिए था कि आप खुदा के आखिरी और कतई पैगाम, यानी दीने इस्लाम के अहकाम उस के बन्दों तक पहुँचा दें। और खुदा की हुज्जत फ़रमा दें। उस काम को आप ने क्योंकर अंजाम दिया? और इस में आप को कितनी कामयाबी हासिल हुई? इस का इजमाली जवाब ये है कि जब से ये दुनिया आलमे वजूद में आई हज़ारों अंबिया व रुसुल अलैहिमुस्सलाम इस अज़ीमुश्शान काम को अंजाम देने के लिए इस आलम में तशरीफ़ लाए। मगर तमाम अंबिया व मुरसलीन के तब्लीगी कारनामों को अगर जमा कर लिया जाए तो वो हुजूर सरवरे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के तब्लीगी शाहकारों के मुकाबला में ऐसे ही नज़र आएँगे जैसे आफ़्ताबे आलम ताब के मुकाबला में एक चराग़ या एक समुन्दर के मुकाबला में एक कतरा, आप की तब्लीग ने आलम में ऐसा इन्किलाब पैदा कर दिया कि काएनाते हस्ती की हर पस्ती को मेअाजे कमाल की सर बुलन्दी अता फरमा कर ज़िल्लत की ज़मीन को इज्जत का आस्मान बना दिया। और दीने हनीफ़ के उस मुक़द्दस और नूरानी महल को जिस की तश्मीर के लिए हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से लेकर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम तक तमाम अंबिया व रुसुल मेझुमार बना कर भेजे जाते रहे। आप ने ख़ातिमुन्नबीय्यीन की शान से उस कम हिदायत को इस तरह मुकम्मल फ़रमा दिया कि हज़रत हक जल्ला जलालहू ने उस पर

) की मुहर लगा दी।

जब दीने इस्लाम मुकम्मल हो चुका और दुनिया में आप के तशरीफ़ लाने का मक्सद पूरा हो चुका । तो अल्लाह तआला के वअदहु मुहकम के पूरा होने का वक्त आ गया!

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अपनी वफात का इल्म

को अपनी वफात का इल्म हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को बहुत पहले से अपनी वफात का इल्म हासिल हो गया था और आप ने मुख्तलिफ़ मवाकेअ पर लोगों को इसकी खबर भी दे दी थी चुनान्चे हज्जतुल वदाअ के मौके पर आप ने लोगों को ये फ़रमा कर रुख्सत फ़रमाया था कि

‘शायद इस के बाद मैं तुम्हारे साथ हज न कर सकूँगा।

इसी तरह गदीर खुम’ के खुत्बा में इसी अंदाज़ से कुछ इसी किस्म के अल्फाज़ आप की ज़बान अकदस से अदा हुए थे अगरचे इन दोनों खुत्बात में लफ़्ज़ (ल-अल्ला) (शायद) फ़रमा कर ज़रा पर्दा डालते हुए अपनी वफ़ात की खबर दी। मगर हज्जतुल वदाअ से वापस लौट कर आप ने जो खुत्बात इर्शाद फ़रमाए। उस में (ल-अल्ला) (शायद) का लफ्ज़ आप ने नहीं फ़रमाया। बल्कि साफ़ साफ़ और यकीन के साथ अपनी वफात की ख़बर से लोगों को आगाह फ़रमाया दिया। चुनान्चे बुख़ारी शरीफ में हज़रत उक्बा बिन आमिर रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि

एक दिन हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम घर से बाहर तशरीफ़ ले गए। और शुहदाए उहुद की कब्रों पर इस तरह नमाज़ पढ़ी जैसे मय्येत पर नमाज़ पढ़ी जाती है फिर पलट कर मिंबर पर रौनक अफ़ोज़ हुए और इर्शाद फरमाया कि मैं तुम्हारा पेश रू (तुम से पहले वफ़ात पाने वाला हूँ और तुम्हारा गवाह हूँ।

और मैं खुदा की कसम अपने हौज़ को इस वक्त देख रहा हूँ।

(बुखारी किताबुल हौज़ जि. २ स. ९७५) इस हदीस में (

) “इन्नी फ-रतुन लकुम फ़रमाया । यानी मैं अब तुम लोगों से पहले ही वफ़ात पाकर जा रहा हूँ ताकि वहाँ जाकर तुम लोगों के लिए हौजे कौसर वगैरा का इन्तिज़ाम करूँ।

ये किस्सा मरजे वफ़ात शुरू होने से पहले का है। लेकिन इस किस्सा को बयान फरमाने के वक्त आप को इस का यकीनी इल्म हासिल हो चुका था कि मैं कब और किस वक्त दुनिया से जाने वाला हूँ।

और मरजे वफ़ात शुरू होने के बाद तो अपनी साहिबज़ादी हज़रते बीबी फ़ातिमा रदियल्लाहु अन्हा को साफ़ साफ़ लफ़्ज़ों में बिगैर शायद’ का लफ्ज़ फ़रमाए हुए अपनी वफ़ात की ख़बर दे दी। चुनान्चे बुखारी शरीफ़ की रिवायत है कि

अपने मरजे वफ़ात में आप ने हज़रत फ़ातिमा रदियल्लाहु अन्हा को बुलाया और चुपके चुपके कुछ फ़रमाया तो वो हंस पड़ीं।जब ज़वाजे मुतहहरात ने इस के बारे में हज़रत बीबी फ़ातिमा रदियल्लाहु अन्हा से दरयाफ्त किया। तो उन्होंने ने कहा कि हुजूर म ने आहिस्ता आहिस्ता मुझ से ये फरमाया कि मैं इसी बीमारी में वफ़ात पा जाऊँगा तो मैं रो पड़ी। फिर चुपके चुपके मुझ से ये फरमाया कि मेरे बाद मेरे घर वालों में से सबं से पहले तुम वफ़ात पाकर मेरे पीछे आओगी। तो मैं हंस पड़ी।

(बुखारी बाब मरजन्नबी जि. २ स. ६३८) बहर हाल हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अपनी वफात से पहले अपनी वफात का इल्म हासिल हो चुका था। क्यों न हो कि जब दूसरे लोगों की वफात के औकात से सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अल्लाह ने आगाह फरमा दिया था तो अगर खुदावंद अल्लामुल गुयूब के बता देने से हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अपनी वफात के वक्त का

कल्ल अज वक्त इल्म हो गया तो उस में कौन सा इस्तेआद है। अल्लाह तआला ने तो आप को इल्म मा-काना वमा यकून अता फरमाया। यानी जो कुछ हो चुका । और जो कुछ हो रहा है। और जो कुछ होने वाला है सब का इल्म अता फरमा कर आप को दुनिया से उठाया। चुनान्चे इस मज़मून को हम ने अपनी किताब “कुरआनी तकरीरें में मुफस्सल तहरीर कर दिया है।

अलालत की इब्तिदा

मरज़ की इब्तिदा कब हुई? और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कितने दिनों तक अलील रहे। इस में मुअरिखीन का इख़्तिलाफ़ है। बहर हाल २० या २२ सफर ११ हिजरी को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जन्नतुल बकीअ में जो आम मुसलमानों का कब्रिस्तान है आधी रात में तशरीफ ले गए। वहाँ से वापस तशरीफ़ लाए तो मिज़ाजे अकदस नासाज़ हो गया। ये हज़रत मैमूना रदियल्लाहु अन्हा की बारी का दिन था।

(मदाराजुन्नुबूवा जि.२ स.४१७ व ज़रकानी जि.३) दो शंबा के दिन आप की अलालत बहुत शदीद हो गई। आप की ख्वाहिश पर तमाम अज़वाजे मुतहहरात ने इजाज़त दे दी कि आप हज़रत बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा के यहाँ कयाम फरमाएँ। चुनान्चे हज़रते अब्बास व हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हुम ने सहारा दे कर आप को हज़रत बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा के हुजरए मुबारका में पहुंचा दिया। जब तक ताकत रही आप खुद मस्जिद नबवी में नमाजें पढ़ाते रहे। जब कमज़ोरी बहुत ज्यादा बढ़ गई। तो आप ने हुक्म दिया कि हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु मेरे मुसल्ले पर इमामत करें। चुनान्चे सतरह नमाजें हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहुं अन्हु ने पढ़ाई।

एक दिन जुहर की नमाज़ के वक्त मरज़ में कुछ इफाका

महसूस हुआ। तो आप ने हुक्म दिया कि सात पानी की मशकें मेरे ऊपर डाली जाएँ। जब आप गुस्ल फ़रमा चुके तो हजरत अब्बास और हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हुम आप का मुकद्दस बाजू थाम कर आप को मस्जिद में लाए। हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु नमाज़ पढ़ा रहे थे। आहट पाकर पीछे हटने लगे। मगर आप ने इशारा से उन को रोका और उन के पहलू में बैठ कर नमाज़ पढ़ाई। आप को देख कर हज़रत अबू बकर रदियल्लाहु अन्हु और हज़रत अबू बकर रदियल्लाहु अन्हु को देख कर दूसरे मुक्तदी लोग अरकाने नमाज़ अदा करते रहे। नमाज़ के बाद आप ने एक खुत्बा भी दिया। जिस में बहुत सी वसीय्यतें और अहकाम इस्लाम बयान फ़रमा कर अन्सार के फ़ज़ाएल और इन के हुकूक के बारे में कुछ कलिमात इर्शाद फ़रमाए और सूरए वल अम्र और एक आयत भी तिलावत फ़रमाई।

मिदारिजुन्नुबूवा जि.२ स.४२५ व बुखारी जि.२ स.६३९) घर में सात दीनार रखे हुए थे। आप ने हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा से फ़रमाया कि तुम इन दीनारों को लाओ ताकि मैं इन दीनारों को खुदा की राह में खर्च कर दूं चुनान्चे हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हु के ज़रीले आप ने इन दीनारों को तक़्सीम करा दिया। और अपने घर में एक ज़र्रा भर भी सोना या चाँदी नहीं छोड़ा।

मिदारिजुन्नुबुब्वा जि.२ स.४२४) आप के मरज़ में कमी बेशी होती रहती थी। खास वफात के दिन यानी दो शंबा के रोज़ तबीय्यत अच्छी थी। हुजरा मस्जिद से मुत्तसिल ही था। आप ने पर्दा उठा कर देखा। तो लोग नमाजे फ़ज पढ़ रहे थे। ये देखकर खुशी से आप हंस पड़े। लोगों ने समझा कि आप मस्जिद में आना चाहते हैं। मारे खुशी के तमाम लोग बे काबू हो गए मगर आप ने इशारा से रोका। और हुजरे में दाखिल होकर पर्दा डाल दिया। ये सब से आखिरी मौका था कि सहाबए किराम ने जमाले नुबूब्बत की ज़ियारत की। हज़रते अनस रदियल्लाहु अन्हु का बयान है कि आप का रुखे अनवर ऐसा

मालूम होता था कि गोया कुरआन का कोई वरक है। यानी सफेद हो गया था।खुखारी जि.२ स.६४० बाब मरजुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

इस के बाद बार बार गशी का दौरा पड़ने लगा। हज़रते फातिमा ज़हरा रदियल्लाहु अन्हा की ज़बान से शिद्दते गम में ये लफ्ज़ निकल गया – ” हाए रे मेरे बाप की बे चैनी। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि ऐ बीटी! तुम्हारा बाप आज के बाद कुभी बेचैन न होगा।

(बुखारी जि.२ स. २४१ बाब मरजुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

इस के बाद बार बार आप ये फरमाते रहे (taste rin यानी इन लोगों के साथ जिन पर खुदा का इनाम है। और कभी ये फ़रमाते कि ( खुदावंदा! बड़े रफ़ीक में। और ( ) भी पढ़ते थे और फरमाते थे कि बे शक मौत के लिए सख्तियाँ हैं हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा कहती हैं कि तंदरुसती की हालत में आप अकसर फ़रमाया करते थे कि पैगम्बरों को इख्तियार दिया जाता है कि वो ख्वाह वफ़ात को कबूल करें या हयाते दुनिया को। जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ज़बाने मुबारक पर ये कलिमात जारी हुए तो मैं ने समझ लिया कि आप ने आखिरत को कबूल फ़रमा लिया।

(बुखारी जि.२ स. ६४० व बाब मरजुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

वफात से थोड़ी देर पहले हज़रते आइशा रदियल्लाहु अन्हा के भाई हज़रते अब्दुर्रहमान बिन अबू बकर रदियल्लाहु अन्हु ताज़ा मिस्वाक हाथ में लिए हाजिर हुए। आप ने उन की तरफ नज़र जमा कर देखा हज़रत आएशा रदियल्लाहु अन्हा ने समझा कि मिस्वाक की ख्वाहिश है। उन्होंने फौरन ही मिस्वाक लेकर अपने दाँतों से नर्म की और दस्ते अकदस में दे दी। आप ने मिसवाक फ़रमाई। सह पहर का वक्त था कि सीनए अकदस में सांस की घर घराहट महसूस होने लगी।

सल्लल्लाहु तआला इतने में लबे मुबारक हिले तो लोगों ने ये अल्फाज़ सुनें कि नमाज, और लौंडी गुलामों का खयाल रखो।

पास में पानी की एक लगन थी इस में बार बार हाथ डालते। और चेहरए अकदस पर मलते। और कलिमा पढ़ते चादर मुबारक को कभी मुँह पर डालते कभी हटा देते। हज़रत बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा सरे अकदस को अपने सीने से लगाए बैठी हुई थीं। इतने में आप ने हाथ उठा कर उंगली से इशारा फरमाया और तीन मर्तबा फरमाया कि. (अब कोई नहीं) बल्कि वो बड़ा रफीक चाहिए।

यही अल्फाज़ ज़बाने अकदस पर थे कि ना गहाँ मुकद्दस हाथ लटक गए। और आँखें छत की तरफ देखते हुए खुली की खुली रहीं और आप की कुदसी रूह आलमे कुदस में पहुंच गई।

برانی غن

الكسل وسلم وبارك على سيدنا محمد واله واصحابه اجمعينة

(बुखारी जि.२ स. ६४० व स. ६४१ बाब मरजुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

तारीखे वफ़ात में मुअरिंखीन का बड़ा इख़्तिलाफ़ है लेकिन इस पर तमाम ओलमाए सीरत का इत्तिफाक है कि दोशंबा का दिन और रबीउल अव्वल का महीना था। बहर हाल आम तौर पर यही मशहूर है कि १२ रबीउल अव्वल ११ हिजरी दोशंबा के दिन तीसरे पहर आप ने विसाल फ़रमाया। (वल्लाह तआला अलम)

वफात का असर

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की वफ़ात से हज़राते सहाबए किराम और अहले बैते उज़्ज़ाम को कितना बड़ा सदमा पहुँचा? और अले मदीना का क्या हाल हो गया? इस की तस्वीर कशी के लिए हज़ारों सफहात भी काफी नहीं हो सकते। वो शमले नुबूव्वत के परवाने जो चन्द दिनों तक जमाले नुबूब्बत का दीदार न करें तो उन के दिल बेकरार और

उनकी आँखें अश्कबार हो जाती थीं। ज़ाहिर है कि इन आशिकाने रसूल पर जाने आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दाएमी फिराक का कितना रूह फरसा, और किस कदर जान काह सदमए अजीम हुआ होगा? जलीलुल कद्र सहाबए किराम बिला मुबालेगा होश- हवास खो बैठे। उन की अकलें गुम हो गई। आवाजें बन्द हो गईं और वो इस कदर मख्खूतुल हवास हो गए कि उन के लिए ये सोचना भी मुश्किल हो गया कि क्या कहें और क्या करें? हज़रत उस्मान गनी रदियल्लाहु अन्हु पर ऐसा सक्ता तारी हो गया कि वो इधर उधर भागे भागे फिरते थे। मगर किसी से न कुछ कहते थे न किसी की कुछ सुनते थे। हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु रंज- मलाल में निढाल होकर इस तरह बैठ रहे। कि उन में उठने बैठने और चलने फिरने की सकत ही नहीं रही। हज़रत अब्दुल्लाह बिन उनैस रदियल्लाहु अन्हु के कल्ब पर ऐसा धचका लगा कि वो इस सदमे को बर्दाश्त न कर सके। और उन का हार्ट फेल हो गया!

हज़रत उमर रदियल्लाहु अन्हु इस क़दर होश- हवास खो बैठे कि उन्होंने तलवार खींच ली। और नंगी तलवार लेकर मदीना की गलियों में इधर उधर आते जाते थे। और ये कहते फिरते थे कि अगर किसी ने ये कहा कि रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की वफात हो गई तो मैं इसी तलवार से उस की गर्दन उडा दूंगा। हज़रत आइशा रदियल्लाहु अन्हा का बयान है कि वफ़ात के बाद हज़रत उमर व हज़रत मुगीरा बिन शुअबा रदियल्लाहु अन्हुम इजाज़त लेकर मकान में दाखिल हुए। हज़रत उमर रदियल्लाहु अन्हु ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को देख कर कहा कि बहुत ही सख़्त गशी का दौरा पड़ गया है। जब वो वहाँ से चलने लगे तो हज़रते मुगीरा रदियल्लाहु अन्हु ने कहा कि ऐ उमर! तुम्हें कुछ ख़बर भी है? हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का विसाल हो चुका है। ये सुनकर हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु आपे से बाहर हो गए। और तड़प कर बोले कि

ऐ मुगीरा! तुम झूटे हो। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का उस वक्त तक इन्तिकाल नहीं हो सकता, जब तक दुनिया से एक एक मुनाफिक का खात्मा न हो जाए!

मवाहिबे लदुन्निया में तबरी से मन्कूल है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की वफात के वक्त हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु “सुख” में थे जो मस्जिद नबवी से एक मील के फासले पर है। उनकी बीवी हज़रत हबीबिया बिन्ते खारजा रदियल्लाहु अन्हा वहीं रहती थीं। चूंकि दोशंबा की सुबह को मर्ज में कमी नज़र आई और कुछ सुकून मालूम हुआ। इस लिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने खुद हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु को इजाज़त दे दी थी कि तुम सुख चले जाओ। और बीवी बच्चों को दखते आओ।

बुखारी शरीफ़ वगैरा में है कि हजरत अबू बकर रदियल्लाहु अन्हु अपने घोड़े पर सवार होकर “सुख से आए और किसी से कोई बात न कही न सुनी। सीधे हज़रत आइशा रदियल्लाहु अन्हा के हुजरे में चले गए और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के रुखे अनवर से चादर हटा कर आप पर झुके। और आप की दोनों आँखों के दर्मियान निहायत गरमजोशी के साथ एक बोसा दिया। और कहा कि आप अपनी हयात और वफात दोनों हालतों में पाकीज़ा रहे। मेरे माँ बाप आप पर फिदा हों हरगिज़ खुदावंद तआला आप पर दो मौतों को जमझ नहीं फ़रमाएगा। आप की जो मौत लिखी हुई थी आप उस मौत के साथ वफ़ात पा चुके इस के बाद हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु मस्जिद में तशरीफ़ लाए तो उस वक्त हज़रत उमर रदियल्लाहु अन्हु लोगों के सामने तकरीर कर रहे थे आप ने फरमाया कि ऐ उमर! बैठ जाओ। हज़रत उमर रदियल्लाहु अन्हु ने बैठने से इन्कार कर दिया। तो हज़रत अबू बकर रदियल्लाहु अन्हु ने उन्हें छोड़ दिया। और खुद लोगों को मुतव्वजेह करने के लिए खुत्वा देना शुरू कर दिया। कि

अम्मा बअद

— जो शख्स तुम में से मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की इबादत करता था (वो जान लें) कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) का विसाल हो गया। और जो शख्स तुम में से खुदा की परस्तिश करता था। तो खुदा जिन्दा है वो कभी नहीं मरेगा।

फिर उस के बाद हजरते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु ताअला अन्हु ने सूरए आले इमरान कि ये आयत तिलावत फरमाई

तर्जमा :- और मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तो एक रसूल हैं उन से पहले बहुत से रसूल हो चुके तो क्या अगर वो इन्तिकाल फरमा जाएँ या शहीद हो जाएँ तो तुम उलटे पाँव फिर जाओगे? और जो उलटे पाँव फिरेगा। अल्लाह का कुछ नुक्सान न करेगा और अन्करीब अल्लाह शुक्र अदा करने वालों को सवाब देगा।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रदियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि हज़रत अबू बकर रदियल्लहु अन्हु ने ये आयत तिलावत की तो मालूम होता था कि गोया कोई इस आयत को जानता ही न था। इन से सुन कर हर शख्स इसी आयत को पढ़ने लगा।(बुखारी जिप स. १६६ बाब अल दखूल अलल मय्येत इलख व मदारिजुन्नुवा जि. २ स. ४३३)

हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु का बयान है कि मैं ने जब हजरत अबू बकर रदियल्लाहु अन्हु की ज़बान से सूरए आले इमरान की ये आयत सुनी तो मुझे मालूम हो गया कि वाकेई नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का विसाल हो गया। फिर हजरत उमर रदियल्लाहु अन्हु इज्तिराब की हालत में नंगी शमशीर ले कर जो एलान करते फिर थे कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का विसाल नहीं हुआ। इस से रुजूअ किया। और इन के साहिबजादे हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर रदियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि गोया हम पर एक पर्दा पड़ा हुआ था। इस आयत की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं गया। हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु के खुत्बा ने इस पर्दा को उठा दिया।

(मदारिजुन्नुबूबा जि.२ स.४३४)

तजहीज़- तक्फीन

चूँकि हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने वसीय्यत फरमा दी थी कि मेरी तजहीज-तक्फीन मेरे अहले बैत और अहले खानदान करें इस लिए कि ये ख़िदमत आप के खानदान ही के लोगों ने अंजाम दी। चुनान्चे हजरत फ़ज़ल बिन अब्बास व हज़रत कुसम बिन अब्बास व हज़रत अली व हज़रत अब्बास व हज़रत उसामा बिन जैद रदियल्लाहु अन्हुम ने मिल जुल कर आप को गुस्ल दिया और नाफे मुबारक और पलकों पर जो पानी के कतरात और तरी जमअ थी हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु ने जोशे महब्बत और फ़रते अकीदत से इस को ज़बान से चाट कर पी लिया।

(मदारिजुन्नुबूब्वा जि.२ स.४३८व स १३९) गुस्ल के बाद तीन सूती कपड़ों का जो ‘सहूल गाँव के बने थे कफ़न बनाया गया इन में कमीस व अमामा न था।

(बुखारी जि.स.१६९ बाब सयाबुल बैज लिन कफ)

सन्न १० हिजरी

सन्न १० हिजरी

हिज्जतुल विदा

इस साल के तमाम वाकिआत में सब से ज्यादा शानदार और अहम तरीन वाकिआ “हज्जतुल विदाअ है ये आपका आखिरी हज्ज था। और हिजरत के बाद यही आपका पहला हज्ज था। जु कअदा सन्न १० हिजरी में आपने हज्ज के लिए रवानगी का एअलाल फरमाया। ख़बर बिजली की तरह सारे अरब में हर तरफ़ फैल गई। और तमाम अरब शरफे हम रकाबी के लिए उमंड पड़ा।

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम आख़िर जु कअदा में जुमेरात के दिन मदीने में गुस्ल फ़रमाकर तहमद और चादर जेब तन फ़रमाया। और नमाजे जुहर मस्जिदे नबवी में अदा फ़रमाकर मदीनए मुनव्वरा से रवाना हुए। और अपनी तमाम अज़वाजे मुतहहरात को भी साथ चलने का हुक्म दिया। मदीना मुनव्वरा से छ: मील दूर अहले मदीना की मीकात “जुल हुलैफा’ पर पहुँचकर रात भर कियाम फरमाया। फिर एहराम के लिए गुसल फरमाया। और हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा ने अपने हाथ से जिस्मे अतहर पर खुश्बू लगाई। फिर आपने दो रक्अत नमाज अदा फरमाई। और अपनी ऊँटनी “कसवा’ पर सवार होकर एहराम बाँधा। और बुलन्द आवाज़ से “लब्बैक पढ़ा।

और रवाना हो गए। हज़रते जाबिर रदियल्लाहु अन्हु का बयान है कि मैं ने नज़र उठाकर देखा तो आगे, पीछे. दाएँ बाएँ हद्दे निगाह तक आदमियों का जंगल नजर आता था। बैहकी की रिवायत है कि एक लाख चौदह हज़ार और दूसरी रिवायत में है कि एक लाख चौबीस हजार मुसलमान हज्जतुल विदाअ में आपके साथ थे। (जरकानी जि.३ स. १०६ व मदारिज जि.२ स. ३८७)

चौथी जुल हिज्जा को आप मक्का मुकर्रमा में दाखिल हुए। आपके खानदान बनी हाशिम के लड़कों ने तशरीफ आवरी की खबर सुनी तो खुशी से दौड़ पड़े। और आप ने निहायत ही महब्बत व प्यार के साथ किसी को आगे किसी को पीछे अपनी ऊँटनी पर बिठा लिया । (निसाई बाब इस्तिकबाल अल्हाज जि.२ स. २६ मतबूआ रहीमिया)

फ़ज की नमाज़ आपने मकामे “जी तुवा” में अदा फ़रमाई। और गुस्ल फ़रमाया फिर आप मक्का मुकर्रमा में दाखिल हुए। और चाश्त के वक़्त यानी जब आफ़्ताब बुलन्द हो चुका था तो आप मस्जिदे हराम में दाखिल हुए। जब कबए मुअज्जमा पर निगाहे नुडूव्वत पड़ी तो आपने ये दुआ पढ़ी कि –

अल्लाहुम्मा अन्तस्सलामु व मिन्कस्स्लामु हय्यिना रब्बना बिस्सलामि अल्लाहुम्मा. ज़िद हाज़ल बैता तश-रीफ़ व तअजीम व तक-रीम व महा- बतव व ज़िद मन

الشات الكم ومنة السلام کیا کیا باتلام المدينة البيت

شيئا ثناء گونا؛ نقابة بن منی که دائم فریما گلروئن

हज्जहू व-त-म रहू तक-रीमवँ व तशरीफ़र्वं व तङ्जामा।

तर्जमा:- ऐ अल्लाह! तू सलामती देने वाला है। और तेरी ही तरफ से सलामती है। ऐ रब! हमें सलामती के साथ ज़िन्दा रख। ऐ अल्लाह! इस घर की अज़मत व शरफ़ और इज्जत व हैबत को

ज्यादा कर। और जो इस घर का हज्ज और उम्रा करे तू उसकी बुखुगी और शरफ व अजमत को ज्यादा कर।

जब हजरे असवद के समने तशरीफ ले गए तो हज़रते असवद पर हाथ रखकर उसको बोसा दिया। फिर खानए कबा का तवाफ फरमाया। शुरू के तीन फेरों में आपने “रमल किया और बाकी चार चक्करों में मामूली चाल से चले हर चक्कर में जब हजरे असवद के सामने पहुँचते तो अपनी छड़ी से हजरे असवद की तरफ इशारा करके छड़ी को चूम लेते थे, हजरे असवद का इस्तिलाम कभी आपने छड़ी के ज़रीओ से किया। कभी हाथ से छू कर हाथ को चूम लिया। कभी लबे मुबारक को हजरे असवद पर रखकर बोसा दिया। और ये भी साबित है कि कभी कभी रुक्ने यमानी का भी आपने इस्तिलाम किया। (निसाईजि.२ स. ३० व स. ३१)

जब तवाफ से फारिग हुए तो मकामे इब्राहीम के पास तशरीप लाए और वहाँ दो रक्अत नमाज अदा की। नमाज से फारिग होकर फिर हजरे असवद का इस्तिलाम फरमाया। और सामने के दरवाजे से सफा की जानिब रवाना हुए। क्रीब पहुँचे तो इस आयत की तिलावत फरमाई कि इन्नस्-सफा वल-मर-वता मिन शआ इरिल्लाह।

बेशक सफा और मरवा अल्लाह के दीन के निशानों में

إن الشکا کانن 45 من

فائراشه

तर्जमा:

फिर सफा और मरवा की सई फरमाई। और चूँकि आपके साथ कुर्बानी के जानवर थे। इस लिए उम्रा अदा करने के बाद आपने एहराम नहीं उतारा।

आठवीं जुल हिज्जा जुमे रात के दिन आप मिना तशरीफ ले गए। और पाँच नमानें जुहर, अम्र, मगरिब, इशा. फज मिना में अदा फरमाकर नवीं जुल हिज्जा जुमा के दिन आप अरफात तशरीफ

ले गए।

जमानए जाहिलीय्यत में चूँकि कुरैश अपने को सारे अरब में अफ्ज़ल व अअला शुमार करते थे इस लिए वो अरफात की बजाए ‘मुज़दलिफा” में कियाम करते थे। और दूसरे तमाम अरब अरफात में ठहरते थे। लेकिन इस्लामी मसावात ने कुरैश के लिए इस तख्सीस को गवारा नहीं किया और अल्लाह अज्ज व जल्ल ने ये हुक्म दिया कि सुम्मा अफीदू मिन हैसु अफा-दन्नासु तर्जमा ऐ कुरैश! तुम भी वहीं (अरफ़ात) से पलट कर आओ जहाँ से सब लोग पलट कर आते हैं।

जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अरफात पहुँचकर एक कम्बल के ख़ीमे में कियाम फरमाया । जब सूरज ढल गया। तो आपने अपनी ऊँटनी “कसवा पर सवार होकर खुत्बा पढ़ा। इस खुत्बे में आपने बहुत से ज़रूरी अहकामे इस्लाम का एअलान फ़रमाया। और ज़मानए जाहिलीय्यत की तमाम बुराईयों और बेहूदा रस्मों को आपने मिटाते हुए एअलान फरमाया कि अला कुल्लु शैइम्-मिन अप्रिल tittikar जाहिलीय्यहि तहता क-द-मय्या मौदुउन। तर्जमा :- सुन लो! जाहिलीय्यत के तमाम दस्तूर मेरे दोनों कदमों के नीचे पामाल हैं।

इसी तरह ज़मानए जाहिलीय्यत के ख़ानदानी तफाखुर और रंग व नसल की. बरतरी और कौमियत में नीच ऊँच वगैरा तसव्वुराते जाहिलीय्यत के बुतों को पाश पाश करते हुए और मसावाते इस्लाम का अलम बुलन्द फरमाते हुए ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने इस तारीख़ी खुत्बे में

کی قد مرفوع

इर्शाद फरमाया कि –

अय्युहन्नासु अला इन्ना रब्बकुम वाहिदुन व इन्ना अबाकुम वाहिदुन ला फद्ला लि-अरिबियिन अला

अ-ज-मियि वला लिअह-मरा अला

ایتالیا 1 ر ست ابل کاجد وات بالخواجة

تن یك في كل مجيي نوم على اشوو دلاور عن ام لا الگوی رسند امام احمد

अस-वदा वला लि- अस-वदा अला

अहमरा इल्ला बित- तकवा।

(मसनदे इमाम अहमद)

तर्जमा :

ऐ लोगो! बेशक तुम्हारा रब एक है और बेशक तुम्हारा बाप (आदम अलैहिस्सलाम) एक है। सुन लो। किसी अरबी को किसी अजमी पर किसी सुर्ख को किसी काले पर और किसी काले को किसी सुर्ख पर कोई फजीलत नहीं। मगर तकवा के सबब से।

इस तरह तमाम दुनिया में अमन- अमान काएम फ़रमाने के लिए अमन- सलामती के शहंशाह ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने ये खुदाई फरमान जारी फ़रमाया कि

इन्ना देमा-अकुम व अम-वा-लकुम

و مانكم

ولكم

अलैकुम हरामुन क-हुर-मति यौमिकुम हाजा फी शह-रिकुम हाज़ा फी ब-ल

فنا في شي گم خدا في بیگم فدا يوم تلقون

दिकुम हाज़ा यौमा तल-कौना रब्बकुम। (बुखारी व मुस्लिम व अबू दाऊद)

तुम्हारा खून और तुम्हारा माल तुम पर ता कियामत इसी तरह हराम है जिस तरह तुम्हारा ये दिन, तुम्हारा ये महीना. तुम्हारा ये शहर मुहतरम है।

अपना खुत्वा खत्म फरमाते हुए आपने सामेईन से फरमाया

व अन्तुम मस-उलूना अन्नी फमा अन्तुम काइलूना।

وان مولوی کی نت من قائلون

तर्जमा :- तुम से खुदा के यहाँ मेरी निस्बत पूछा जाएगा तो तुम लोग क्या जवाब दोगा?

तमाम सामेईन ने कहा कि हम लोग खुदा से कह देंगे कि आपने खुदा का पैगाम पहुँचा दिया। और रिसालत का हक अदा कर दिया। ये सुनकर आपने आस्मान की तरफ उंगली उठाई और तीन बार फरमाया कि

‘अल्लाहुम्मश-हद’ (ऐ अल्लाह! तू गवाह रहना) (अबू दाऊद जि. १ स. २६३ बाब सफ़ता हज्जन्नबी)

जैन इसी हालत में जबकि खुत्बे में आप अपना फ़र्जे रिसालत अदा फ़रमा रहे थे ये आयत नाज़िल हुई कि – अल-यौमा अक मन्तु लकुम दी-नकुम RNER व अत-मम्तु अलैकुम नेअमती व FREET दीतु ल-कुमुल इस्लामा दीना। तर्जमा :- आज मैं ने तुम्हारे लिए तुम्हारे दीन को मुकम्मल कर

दिया और अपनी नेअमत तमाम कर दी और तुम्हारे लिए दीने | इस्लाम को पसन्द कर लिया।

शहंशाहे कौनैन का तख्ते शाही

ये हैरत अंगेज़ व इबरत खेज़ वाकिआ भी याद रखने के काबिल है कि जिस वक्त शहंशाहे कौनैन खुदा के नाएबे अकरम और ख़लीफ़ए अअजम होने की हैसियत से फरमाने रब्बानी का एअलान फ़रमा रहे थे। आपके तख्ते शहंशाही यानी ऊँटनी का कजावा और अर्क गीर शायद दस रुपये से ज्यादा कीमत का न था। न उस ऊँटनी पर कोई शानदार कजावा था। न कोई हौदज, न कोई महमिल न कोई चतर न कोई ताज।

है

क्या तारीखे आलम में किसी और बादशाह ने भी ऐसी सादगी का नुमूना पेश किया है? इसका जवाब यही और फ़क़त यही है कि नहीं

ये वो ज़ाहिदाना शहंशाही है जो सिर्फ शहंशाहे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शहंशाहियत का तुर्रए इम्तियाज है!

खुत्वे के बाद आपने जुहर व अस्र एक अज़ान और दो इकामतों से अद फरमाई। फिर “मौकफ में तशरीफ ले गए और जबले रहमत के नीचे गुरूबे आफ्ताब तक दुआओं में मसरूफ रहे। गुरूबे आफ्ताब के बाद अरफ़ात से एक लाख से जाएद हुज्जाज के इजदहाम में ‘मुज़दलिफा” पहुंचे। यहाँ पहले मगरिब, फिर इशा एक अज़ान और दो इकामतों से अदा फरमाई। मशअरे हराम के पास रात भर उम्मत के लिए दुआएँ माँगते रहे। और सूरज निकलने से पहले मुज़दलिफा से मिना के लिए रवाना हो गए। और वादीए मुहस्सर के रास्ते से मिना में आप ‘जमरह” के पास तशरीफ लाए। और कंकरियाँ मारी। फिर आप ने ब-आवाज़े बुलन्द फ़रमाया कि

ادوا من بنگلز كولن

دینی تكن )

सि-क-कुम

लितअ-खुजू मना फ-इन्नी ला अदरी ल-अल्ली ला

بند جي هذه

अहुज्जु बदा हज्जती हाजिही

तर्जमा :

हज्ज के मसाएल सीख लो। मैं नहीं जानता कि शायद इसके बाद मैं दूसरा हज्ज न करूँगा।

(मुस्लिम जि.१ स. ४१९ बाब रमजी जमरतुल उकबा) मिना में भी आपने एक तवील खुत्बा दिया। जिसमें अरफ़ात के खुत्बे की तरह बहुत से मसाएल व अहकाम का एलान फरमाया। फिर कुर्बानगाह में तशरीफ़ ले गए। आपके साथ कुर्बानी के एक सौ ऊँट थे कुछ को तो आपने अपने दस्ते मुबारक

जिबह फरमाया। और बाकी हजरते अली रदियल्लाहु अनहु को सौंप दिया और गोश्त, पोस्त, झोल, नकेल सब को खैरात कर देने का हुक्म दिया। और फ़रमाया कि कस्साब की मजदूरी भी इस में से न दी जाए बल्कि अलग से दी जाए।

मुए मुबारक

कुर्बानी के बाद हज़रते मअमर बिन अब्दुल्लाह रदियल्लाहु से आपने सर के बाल उतरवाए। और कुछ हिस्सा हज़रते अबू तलहा अन्सारी रदियल्लाहु अन्हु को अता फरमाया। और बाकी मुए मुबारक को मुसलमानों में तक़सीम कर देने का हुक्म सादिर फरमाया। (मुस्लिम जि.१ स. ४२१ बाब बयान इनुल सुन्नत यौमुल ख़रा) इसके बाद आप मक्का तशरीफ़ लाए और तवाफे ज़ियारत फ़रमाया।

साकीए कौसर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम चाहे ज़मज़म पर

फिर चाहे ज़मज़म के पास तशरीफ लाए ख़ानदाने अब्दुल मुत्तलिब के लोग हाजियों को ज़मज़म पिलारहे थे। आपने इर्शाद फ़रमाया कि मुझे ये ख़ौफ़ न होता कि मुझ को ऐसा करते देखकर दूसरे लोग भी तुम्हारे हाथ से डोल छीनकर खुद अपने हाथ से पानी भरकर पीने लगें तो मैं खुद अपने हाथ से पानी भर कर पीता। हज़रते अब्बास रदियल्लाहु अन्हु ने ज़मज़म शरीफ पेश किया। और आपने किबलारुम्ख खड़े खड़े ज़मज़म शरीफ नोश फरमाया। फिर मिना वापस तशरीफ ले गए। और बारह जुल हिज्जा मंगल के दिन आप सूरज ढलने के बाद मिना से रवाना होकर “मुहस्सब में रात भर कियाम फरमाया। और सुबह को नमाजे फज कबा की मस्जिद में अदा फरमाई। और तवाफे वदा करके अन्सार व मुहाजिरीन के साथ मदीना मुनव्वरा के लिए रवाना हो गए।

गदीरे खुम का खुत्बा

रास्ते में मकामे “गदीरे खुम” पर जो एक तालाब है। यहाँ तमाम हमराहियों को जमअ फ़रमाकर एक खुत्बा इर्शाद फरमाया। जिसका तर्जमा ये है :

हम्द- सना के बाद ऐ लोगो! मैं भी एक आदमी हूँ मुमकिन है कि खुदा का फ़रिश्ता (मलकुल मौत) जल्द आ जाए और मुझे उस का पैगाम कुबूल करना पड़े। मैं तुम्हारे दर्मियान दो भारी चीजें छोड़ता हूँ एक खुदा की किताब जिसमें हिदायत और रौशनी है और दूसरी चीज़ मेरे अहले बैत हैं। मैं अपने अहले बैत के बारे में तुम्हें खुदा की याद दिलाता हूँ|(मुस्लिम जि. १ स. २७६ बाब मिन फ़ज़ाएले अली

आदि मन आदाहु तर्जमा :- जिस का मैं मौला हूँ। अली भी उसके मौला । खुदावंदा! जो अली से महब्बत रखे उस से तू भी महब्बत रख। और जो अली से अदावत रखे उस से तू भी अदावत रख।