Gyarwein Shareef Mubarak

🌹पीरे ला सानी महबूबे सुब्ह़ानी सय्यदना शैख अब्दुल क़ादिर जीलानी बग़दादी रदीयल्लाहु तआला अन्हु🌹
नाम- अब्दुल क़ादिर
लक़ब- मोहिउद्दीन (दीन को ज़िंदा करने वाला)
वालिद- अबु सालेह मूसा (जंगी दोस्त)
वालिदा- उम्मुल खैर फातिमा
विलादत- 1/9/470 हिजरी,जीलान
विसाल- 11/4/561 हिजरी,बग़दाद
बीवियां- 4
औलाद- 49
महज़ब- हम्बली
आप पैदाईशी वली हैं,आप हसनी हुसैनी सय्यद हैं,आपकी विलादत के वक़्त आप की वालिदा की उम्र 60 साल थी,आप बचपन में माहे रमज़ान मुबारक में दिन भर दूध नहीं पीते थे,आपकी तक़रीर में 60000 – 70000 का मजमा हो जाता था,आपके बदन पर कभी मक्खी नहीं बैठी,आपने 1 ही वक़्त में 70 लोगों के यहां अफ्तार किया,तमाम उम्मत का इज्माअ है कि आप ग़ौसे आज़म हैं,आप फरमाते हैं कि मेरी नज़र हमेशा लौहे महफूज़ पर लगी रहती है,आप फरमाते हैं कि मुरीद को हर हाल में अपने पीर की तरफ ही रुजू करना चाहिये अगर चे वो करामत से खाली भी हुआ तो क्या हुआ मैं तो खाली नहीं हूं उसके तवस्सुल से मैं उसे अता करूंगा,आपसे बेशुमार करामते ज़ाहिर है
📕 तारीखुल औलिया,सफह 24-54
📕 अलमलफूज़,हिस्सा 3,सफह 56
📕 फतावा रज़वियह,जिल्द 9,पेज 129
बचपन की कुछ करामतें
जब आप मां के पेट में ही थे तो एक साइल ने आकर सदा लगाई उस बदबख्त ने जब देखा कि औरत अकेली है तो अंदर घुसा चला आया,उसी वक़्त ग़ैब से एक शेर नमूदार हुआ और उस खबीस को चीर-फाड़ कर गायब हो गया
📕 महफिले औलिया,सफह 211
जिस साल आप पैदा हुए तो पूरे जीलान में 1100 बच्चे पैदा हुए और सब लड़के ही थे और सब के सब अल्लाह के वली हुए
📕 हमारे ग़ौसे आज़म,सफह 59
जब आपकी दूध पीने की उम्र थी तो अक्सर आप दाई की गोद से गायब हो जाते और फिर कुछ देर बाद आ भी जाया करते,जब आप कुछ बड़े हुए तो एक दिन आपकी दाई ने पूछा कि बेटा अब्दुल क़ादिर ये बताओ जब तुम छोटे थे तो अक्सर मेरी गोद से गायब हो जाते थे आखिर तुम जाते कहां थे,तो हुज़ूर ग़ौसे पाक रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि दाई मां मैं आपसे खेलने की गर्ज़ से सूरज के पीछे छिप जाता था जब आप मुझे ढूंढती और ना पातीं तो फिर मैं खुद ही आ जाया करता,तो वो फरमातीं हैं कि क्या अब भी आपका वही हाल है तब हुज़ूर ग़ौसे पाक रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि नहीं नहीं वो तो मेरे बचपन और कमज़ोरी का आलम था अब तो हाल ये है कि उस जैसे हज़ारों सूरज अगर मुझमे समा जायें तो कोई ढूंढ़ने वाला उन्हें ढूंढ़ नहीं सकता कि कहां खो गये
📕 हमारे ग़ौसे आज़म,सफह 211
जब आप 4 साल के हुए तो आपकी वालिदा माजिदा ने बिस्मिल्लाह ख्वानी के लिए आपको मक़तब में भेजा जहां आपके उस्ताद ने फरमाया कि बेटा पढ़ो बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम तो आपने बिस्मिल्लाह से जो पढ़ना शुरू किया तो पूरे 18 पारा पढ़कर सुना दिये,उस्ताद ने हैरत से पूछा कि बेटा ये आपने कब और कहां से सीखा तो हुज़ूर ग़ौसे पाक रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि मेरी मां 18 पारों की हाफिज़ा हैं जिसे वो अक्सर विर्द किया करती हैं तो मैंने उनके पेट में रहते हुए सब सुनकर याद कर लिए
📕 शाने ग़ौसे आज़म,सफह 15
“और ये बात हक़ीक़त है कि बच्चा जब मां के पेट में 4 महीने का होता है तो उसके अंदर रूह फूंक दी जाती है और बिला शुबह वो अपने मां-बाप की हरकतों से ही तरबियत पाता है,अगर आज बच्चे बेहया और नालायक़ पैदा हो रहे हैं तो कहीं ना कहीं उसकी वजह उसके मां-बाप ही हैं,लिहाज़ा मुसलमान अगर चाहता है कि उसकी औलाद उसकी फरमा बरदारी करे तो सबसे पहले उसे अपने आपको बदलना होगा जब उसके घर का माहौल इस्लामी होगा तो यक़ीनन उसकी औलाद भी नेक और सालेह पैदा होगी”
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Aaj Jinke Milad ka Din hai wo RasoolAllah SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ke Azeem Bete, Ahle Bayt Sayyeduna Imam Hasan al Askari Alaihissalam, Aap Alaihissalam ne Apna Khirqa Mubarak Huzoor Gaus-e-Aazam ko Aapki Wiladat se 200 saal pehle he ata farma diya tha jo Hazrat Junaid Baghdadi RadiAllahu Anhu se hota hua Huzoor Gaus-e-Aazam Shaykh Abdul Qadir Jeelani RadiAllahu Anhu tak Aaya

Sahib e Qaaba Qausayne Aw Adna Ke Janasheen Sultan ul Awliya Meeraa’n Paak Muhaiyyuddin Sayyidus Sanad Hazrat Peeraan e Peer Dastgeer Maula Abdul Qadir Fatimi Hasnyani Muhammadi Murtazvi Gilani (QaddasAllahu Sirrahu Al Aziz) Farmate Hain :

Allah Rabbul izzat Ne Mujhse irshaad Farmaya : ” Aye Ghaus e Azam !!! Ahle Qurb Faryaad Karte Hain Qurbat Ke Sabab Jis tarah Ahle Hijr Faryaad Karte Hain Duuri Ke Sabab
Phir Farmaya Aye Ghaus e Azam !!! Mere Baaz Bande Jo Na Nabi Hain Na Rasool Hain Wo Aise Hain Ke Unke Ehwaal Se Koi Bhi Waaqif Nahin !
Na Ahle Dunya Se , Na Ahle Jannat Se , Na Ahle Dozakh Se , Na Ahle Mehshar Se , Na Maalik , Na Rizwaan , Na Jin Na Malak , Na Insan !

Aur Maine Unko Na Jannat Ke Liye Paida Kiya Na Dozakh Ke Liye Paida Kiya , Na Sawaab Ke Liye , Na Azaab Ke Liye , Na Hoor o Qusoor o Ghilmaan Ke Liye !
To Khush-Khabri Hai Uske Liye Jo in Par Imaan Laye Halaanke Wo Inhey Nahi Pehchaanta !

Phir Farmaya … Aye Ghaus e Azam !!! Tum Unhi Mein so Ho !!!
Aur Unki Alamat Dunya Mein Ye Hai Ke Unke Jism Kam Khane Peene Ki Wajah Se Jalte Hain Aur Unke Nufoos Khwaahishaat Ke Parhez Se Jalte Hain Aur Unke Quloob Khatraat Ke Ehteraaz Se Jalte Hain Aur Unki Arwaah Lehzaat Se Jalti Hain Aur Wo As’haab e Baqa Hain Jo Noor e Baqa Se Jalte Hain !!!! Subhan Allah 💙
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Sarwari Dilbari Haidari Safdari
Jadh e Ghaus e Jali Ya Ali۴ Ya Ali۴
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Ye Shaan Hai Unke Aulado Ki
Toh Jadh Ka Aalam Kya Honga
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اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلَی سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَ عَلَی اٰلِ سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَ بَارِکْ وَ س٘لِّمْ

Huzoor Sayyed e Aalam ﷺ ne Hazrat Umar Farooque e Aazam رضي الله عنه aur Hazrat Maula Ali كرم الله تعالٰی وجهه الكريم ko Hazrat e Owais Qarni رضي الله عنه ke paas jaane ki wasiyat farmayi aur farmaya ki tum dono Owais Qarni ko mera salaam kehna, aur mera jubba dekar kehna ki woh meri ummat ki bakhshish ke liye dua kare.
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Jab Hazrat e Umar رضي الله عنه aur Hazrat Ali e Murtuza كرم الله تعالٰی وجهه الكريم Hazrat e Owais Qarni رضي الله عنه ke paas gaye aur Sarkar e Do Aalam ﷺ ka farmaan sunaya to Hazrate Owais Qarni رضي الله عنه ne sajde me apna sar rakh kar ummat e Muhammadiya ke liye dua maangni shuru ki.
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Ussi waqt nida (aawaz) aayi ke sajde se apna sar utha le kyuki teri dua e shafa’at se apne Mehboob (ﷺ) ki aadhi ummat ko bakhsh diya aur aadhi ummat ko apne Mehboob e Aazam ke ladle farzand Gaus e Aazam Abdul Qadir (رضي الله عنه) jo mera bhi Mehboob hai uski shafa’at se bakhshunga jo tere baad paida hoga.
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Hazrat e Owais Qarni رضي الله عنه ne arz ki aye Parwardigar tera woh Mehboob banda kaun hai aur kaha hai ke Maiñ uski ziyarat karu to nida aayi ke jisska tarjama- “Sach ki Majlis me azeem qudrat wale badshah ke huzoor yaani Allah ﷻ ki bargah me hazir hai”
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Woh mera mehboob hai aur mere Mehboob e Aazam Muhammadur Rasool ullah ﷺ ka bhi mehboob hai aur Sahaba e Kiram aur Aaeemma e Izaam ke ilawa tamam agle pichle Auliya ki gardano par uska qadam hoga aur jo usse qabool karega maiñ usko dost rakhunga.
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Hazrate Owais Qarni رضي الله عنه ne yeh sun kar apni gardan jhuka di aur arz ki aye Parwardigar maiñ bhi usse qabool karta hu.
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Reference:
*(Tafreeh ul Khatir)
*(Manazil ul Awliya fee Fazaeelul Asfiya)
*(Hamare Gaus e Aazam رضي الله عنه)
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اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ سَيِّدِنَا مُحَمَّد

फातिहा का सुबूत

क़ुर्आन

कंज़ुल ईमान
और जो खर्च करते हैं उसे अल्लाह की नजदीकियों और रसूल से दुआयें लेने का ज़रिया समझें

📕 पारा 11,सूरह तौबा,आयत 99

तफसीर खज़ायेनुल इरफान में है कि यही फातिहा की अस्ल है कि सदक़ा देने के साथ खुदा से मग़फिरत की उम्मीद करें,अब क़ुर्आन की ये तीन आयतें देखिये

कंज़ुल ईमान
और हम क़ुर्आन में उतारते हैं वो चीज़ जो ईमान वालों के लिए शिफा और रहमत है

📕 पारा 15,सूरह बनी इस्राईल,आयत 82

कंज़ुल ईमान
ऐ ईमान वालों खाओ हमारी दी हुई सुथरी चीज़ें

📕 पारा 2,सूरह बक़र,आयत 172

कंज़ुल ईमान
ऐ हमारे रब हमें बख्श दे और हमारे उन भाईयों को भी जो हमसे पहले ईमान ला चुके

📕 पारा 28,सूरह हश्र,आयत 10

मतलब क़ुर्आन पढ़ना जायज़ हर हलाल खाना जायज़ दुआये मग़फिरत करना जायज़ और इन सबको एक साथ कर लिया जो कि फातिहा में होता है तो हराम और शिर्क,वाह रे बद अक़ीदों का दीन

हदीस

हदीस
सहाबिये रसूल हज़रत सअद की मां का इंतेक़ाल हो गया तो आप नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में पहुंचे और पूछा कि या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मेरी मां मर गई तो कौन सा सदक़ा उनके लिए अफज़ल है तो हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि पानी,इस पर हज़रते सअद ने एक कुंआ खुदवाया और कहा कि ये उम्मे सअद के लिए है

📕 अबु दाऊद,जिल्द 1,सफह 266

हदीस
हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का गुज़र दो क़ब्रो पर हुआ तो आपने फरमाया कि इन दोनों पर अज़ाब हो रहा है और किसी बड़े गुनाह की वजह से नहीं बल्कि मामूली गुनाह की वजह से,एक तो पेशाब की छींटों से नहीं बचता था और दूसरा चुगली करता था,फिर आपने एक तर शाख तोड़ी और आधी आधी करके दोनो क़ब्रों पर रख दी और फरमाया कि जब तक ये शाखें तर रहेगी तस्बीह करती रहेगी जिससे कि मय्यत के अज़ाब में कमी होगी

📕 बुखारी,जिल्द 1,सफह 34

इससे कई बातें साबित हुई पहली तो ये कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ग़ैब दां हैं जब ही तो क़ब्र के अन्दर का अज़ाब देख लिया और दूसरी ये कि जब शाख क़ब्र पर रखी जा सकती है तो फूल भी उसी किस्म से है लिहाज़ा कब्र पर फूल डालना भी साबित हुआ और तीसरी ये कि जब तर शाख की तस्बीह से अज़ाब में कमी हो सकती है तो फिर मुसलमान अगर अपने मरहूम के ईसाले सवाब के लिए क़ुर्आन पढ़कर बख्शे तो क्योंकर मुर्दों पर से अज़ाब ना हटेगा और चौथी ये भी कि चुगली करना और पेशाब की छींटों से ना बचना अज़ाबे क़ब्र का बाईस बन सकता है लिहाज़ा इनसे बचें

हदीस
एक शख्श नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में हाज़िर हुआ और कहा कि या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मेरी मां का इंतेक़ाल हो गया है और उसने कुछ वसीयत ना की अगर मैं उसकी तरफ से कुछ सदक़ा करूं तो क्या उसे सवाब पहुंचेगा फरमाया कि हां

📕 बुखारी,किताबुल विसाया,हदीस नं0 2756

हदीस
हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हर साल दो बकरे क़ुर्बानी किया करते जो कि चितकबरे और खस्सी हुआ करते थे एक अपने नाम से और एक अपनी उम्मत के नाम से

📕 बहारे शरियत,हिस्सा 15,सफह 130

अब इस रिवायत से क्या क्या मसले हल हुए ये भी समझ लीजिये पहला ये कि अगर सवाब नहीं पहुंचता तो नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम क्यों अपनी उम्मत के नाम से बकरा ज़बह कर रहे हैं दूसरा ये कि जो लोग ग्यारहवीं शरीफ के जानवर को हराम कहते हैं कि ग़ैर की तरफ मंसूब हो गया तो फिर क़ुर्बानी भी ना करनी चाहिये कि वहां भी हर आदमी अपने या अपने अज़ीज़ों के नाम से ही क़ुर्बानी करता है और तीसरा ये भी कि क़ुर्बानी के लिए नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जिन बकरों को काटा वो खस्सी थे ये भी याद रखें

हदीस
जंगे तबूक के मौके पर जब खाना कम पड़ गया तो हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जिसके पास जो था सब मंगवाकर अपने सामने रखा और दुआ फरमाई तो खाने में खूब बरकत हुई

📕 मिश्कात,जिल्द 1,सफह 538

वहां कुंआ भी सामने ही मौजूद था और यहां खाना भी और दोनों जगह दुआ की गई मगर ना तो कुंअे का पानी ही हराम हुआ और ना ही खाना

फिक़ह

रिवायत
हज़रते इमाम याफई रज़ियल्लाहु तआला अन्हु अपनी किताब क़ुर्रतुल नाज़िर में लिखते हैं कि एक मर्तबा सरकारे ग़ौसे आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने 11 तारीख को हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में नज़्र पेश की,जिसको बारगाहे नब्वी से क़ुबूलियत की सनद मिल गई फिर तो सरकारे ग़ौसे आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु हर महीने की 11 तारीख को हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में नज़राना पेश करने लगे,चुंकि आपका नज़्रों नियाज़ का मामूल हमेशा का था सो मुसलमानो ने इसे आपकी तरफ़ ही मंसूब कर दिया जिसे ग्यारहवीं शरीफ कहा जाने लगा,खुद सरकार ग़ौसे आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का फरमान है कि मैंने कितनी ही इबादात और मुजाहिदात किये मगर जो अज्र मैंने भूखों को खाना खिलाने में पाया उतना किसी अमल से ना पाया काश कि मैं सारी ज़िन्दगी सिर्फ लोगों को खाना खिलाने में ही सर्फ कर देता

📕 हमारे ग़ौसे आज़म,सफह 282

क्या ये दलील कम है कि खुद हुज़ूर ग़ौसे पाक रज़ियल्लाहु तआला अन्हु हर महीने हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नज़्र यानि फातिहा ख्वानी का एहतेमाम करते थे,और आपके बाद भी पिछले 800 साल से ज़्यादा के बुज़ुर्गाने दीन और उल्माये किराम का अमल इसी पर रहा है सिवाए मुट्ठी भर बद अक़ीदों को छोड़कर,और ज़रूरत पड़ने पर खुद उनके यहां भी फातिहा होती है जैसा कि अब मैं उनकी किताबों से ही दलील देता हूं

बद अक़ीदों की किताब

इस्माईल देहलवी ने लिखा पस जो इबादत कि मुसलमान से अदा हो और इसका सवाब किसी फौत शुदा की रूह को पहुंचाये तो ये बहुत ही बेहतर और मुस्तहसन तरीक़ा है…..और आमवात की फातिहों और उर्सों और नज़रो नियाज़ से इस काम की खूबी में कोई शक व शुबह नहीं

📕 सिराते मुस्तक़ीम सफह 93

वाह वाह,एक तरफ तो लिख रहे हैं कि फातिहा अच्छी चीज़ है और दूसरी तरफ हराम और शिर्क का फतवा भी,इन बद अक़ीदों की अक़्ल पर पत्थर पड़ गये हैं

क़ासिम नानोतवी ने लिखा हज़रत जुनैद बग़दादी रहमतुल्लाह अलैहि के किसी मुरीद का रंग यकायक बदल गया आपने सबब पूछा तो कहने लगा कि मेरी मां का इंतेक़ाल हो गया है और मैं देखता हूं कि फरिश्ते मेरी मां को जहन्नम की तरफ लिए जा रहे हैं तो हज़रत जुनैद के पास 1 लाख या 75000 कल्मा तय्यबह पढ़ा हुआ था आपने दिल ही दिल में उसकी मां को बख्श दिया फिर क्या देखते हैं कि वो जवान खुश हो गया फिर आपने पूछा कि अब क्या हुआ तो वो कहता है कि अब मैं देखता हूं कि फरिश्ते मेरी मां को जन्नत की तरफ लिए जा रहे हैं तो हज़रत फरमाते हैं कि आज दो बातें साबित हो गई पहली तो इसके मुक़ाशिफा की इस हदीस से और दूसरी इस हदीस की सेहत इसके मुक़ाशिफा से

📕 तहज़ीरुन्नास,सफह 59

ये रिवायत बिलकुल सही व दुरुस्त है मगर सवाल ये है कि ईसाले सवाब की ये रिवायत इन बद अक़ीदों ने अपनी किताब में क्यों लिखी,क्या उनके नज़दीक भी ईसाले सवाब पहुंचता है और अगर पहुंचता है जैसा कि खुद लिखते हैं अभी आगे आता है तो फिर मुसलमानों पर इतना ज़ुल्म क्यों,क्यों जब कोई सुन्नी फातिहा ख्वानी का एहतेमाम करता है तो उस पर हराम और शिर्क का फतवा लगाया जाता है

रशीद अहमद गंगोही ने लिखा
एक बार इरशाद फरमाया कि इक रोज़ मैंने शेख अब्दुल क़ुद्दूस के ईसाले सवाब के लिए खाना पकवाया था

📕 तज़किरातुर रशीद,जिल्द 2,सफह 417

दूसरी जगह रशीद अहमद गंगोही लिखते हैं
खाना तारीखे मुअय्यन पर खिलाना बिदअत है मगर सवाब पहुंचेगा

📕 फतावा रशीदिया,जिल्द 1,सफह 88

वाह वाह,बहुत खूब,खुद खाना पकवाकर सवाब बख्शा तो शिर्क नहीं हुआ और हम करें तो हराम बिदअत शिर्क,इन बद अक़ीदों के नज़दीक हर बिदअत गुमराही है और जहन्नम में ले जाने वाली है मगर फिर भी बिदअत पर सवाब पहुंचवा रहे हैं,इन बद अक़ीदों के गुरू घंटाल इमामों के ईमान का जनाज़ा तो पहले ही उठ चुका है मगर जो बद अक़ीदह अभी जिंदा हैं उनके लिए तौबा का दरवाज़ा खुला है लिहाज़ा बद अक़ीदा ऐसी दोगली पालिसी से तौबा करो और अहले सुन्नत व जमात के सच्चे मज़हब पर कायम हो जाओ इसी में ईमान की आफियतो भलाई है
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खत्म——–
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सैयद मोहम्मद सादुल्लाह

जंग ए आज़ादी से लेकर संविधान निर्माण तक में अदा किया अहम रोल मगर इतिहास नाम देखकर इंसाफ न कर सका।

बंटवारे का विरोध किया आज देश मे ही गुमनाम हो गये। सर सैयद मोहम्मद सादुल्लाह

संविधान निर्माताओं में से एक सर सैयद मोहम्मद सादुल्लाह


26 नवंबर हमारे देश का संविधान दिवस है संविधान सभा की ड्राफ्ट कमेटी के अध्यक्ष डाक्टर भीमराव अम्बेडकर ने 26 नवंबर 1949 को संविधान तैयार कर उसे राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद को सौंप दिया था इस अवसर पर प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू , ग्रह मंत्री सरदार पटेल और शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद भी उपस्थित थे
संविधान तैयार करने वाली सात सदस्यीय समिति में एक सर सैयद मोहम्मद सादुल्लाह साहब भी थे जिन्होंने संविधान तैयार कराने में बड़ी मेहनत की विशेष रूप से अनुसूचित जनजाति आरक्षण के मामले में
कुछ आदिवासी जातियों को अंग्रेज क्रिमिनल ट्राइब कहते थे और उन्हें बहुत सी सुविधाओं से वंचित कर रखा था आजादी के बाद संविधान बनाते समय भी कुछ नेता इन्हें वंचित ही रखना चाहते थे यहां तक कि उन्हें वोट देने का अधिकार भी देने के पक्ष में नहीं थे उन नेताओं में डाक्टर अम्बेडकर और नेहरू जी भी थे ऐसे समय में जयपाल मुंडा ने उनके विरुद्ध जम कर आवाज़ बुलंद की और उनका साथ देने वालों में सर सैयद मोहम्मद सादुल्लाह साहब सबसे आगे थे
सर सैयद मोहम्मद सादुल्लाह साहब कौन थे
*/
सर सैयद मोहम्मद सादुल्लाह साहब को देश ने भुला दिया और अफसोस हम मुसलमान भी उनका जिक्र नहीं करते हमें सरकार से शिकायत है कि मुस्लिम नेताओं को याद नहीं करती जबकि हम खुद भी वही कर रहे हैं

सर सैयद मोहम्मद सादुल्लाह साहब का जन्म 21 मई 1885 को गोहाटी में हुआ था उन्होंने सोनाराम हाई स्कूल गोहाटी से इंटर की परीक्षा पास की और उच्च शिक्षा के लिए प्रेसिडेंसी कालेज कलकत्ता में प्रवेश किया , 1906 में वहां से केमिस्ट्री में मास्टर डिग्री हासिल की 1907 में काटन कालेज गोहाटी में अस्सिटेंट लेक्चरर मुकर्रर हुए 1909 में लेक्चरर का पद छोड़ कर वकालत शुरू की 1909 से 1919 तक गोहाटी बार काउंसिल के सदस्य रहे उसके बाद कलकत्ता हाईकोर्ट चले गए और 1924 तक वहां वकालत की
फिर राजनीति में आए और 1923 में असम के विधायक चुने गए जीतने के बाद इन्हें 1924 में इन्हें असम का शिक्षा मंत्री बनाया गया 1929 तक यह शिक्षा मंत्री रहे उसके बाद इन्होंने विभिन्न आयोगों की अध्यक्षता की 1938 में वह असम के प्रधानमंत्री चुने गए 1942 तक यह असम राज्य के प्रधानमंत्री रहे उसके बाद अपने मित्र मोहम्मद अली जिन्ना की अपील पर मुस्लिम लीग में शामिल हो गए और इन्हें असम असेम्बली में मुस्लिम लीग का नेता चुना गया 1946 में इन्हें संविधान सभा में चुना गया यह देश के बंटवारे के हक में नहीं थे इस लिए मुस्लिम लीग से इस्तीफा दे दिया
संविधान सभा में जब डाक्टर अम्बेडकर जी की अध्यक्षता में संविधान निर्माण समिति बनी तो इन्हें भी उसका सदस्य बनाया गया इन्होंने आपना काम बड़ी लगन से किया जिसका सबूत संविधान सभा में की गई इनकी तकरीरें हैं 8 जनवरी 1955 को इन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। इतिहास ऐसी अज़ीम शख्सियत के साथ न्याय नही कर सकी लेकिन हमारा यह दायित्व है की इसे हम नई नस्लो तक पहुचाये और उन्हें जंग ए आज़ादी से लेकर देश के निर्माण में मुसलमानो के योगदान का इतिहास बताने का काम करें।