मदीना में आफ्ताबे रिसालत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम

मदीना में आफ्ताबे रिसालत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम

की तजल्लियाँ “मदीना मुनव्वरा” का पुराना नाम “यसरब’ है। जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस शहर में सुकूनत फरमाई तो इस का नाम “मदीनतुन-नबी” (नबी का शहर) पड़ गया। फिर ये नाम मुख़्तसर हो कर “मदीना मशहूर हो गया। तारीखी हैसियत से ये बहुत पुराना शहर है। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जब एअलाने नुबूब्बत फ़रमाया । तो इस शहर में अरब के दो कबीले “अवस” और “खुज़रज और कुछ “यहूदी आबाद थे। अवस व खुज़रज कुफ्फारे मक्का की तरह “बुत परस्त’ और यहूदी “अहले किताब” थे। अवस व खुज़रज पहले तो बड़े इत्तिफ़ाक व इत्तिहाद के साथ मिल जुल रहते सहते थे, मगर फिर अरबों की फ़ितरत के मुताबिक उन दोनों क़बीलों में लड़ाइयाँ शुरू हो गईं। यहाँ तक कि आख़िरी लड़ाई जो तारीखे अरब में ‘जंगे बुआस’ के नाम से मशहूर है। इस कदर हौलनाक और खून रेज हुई कि इस लड़ाई में अवस व खुज़रज के तकरीबन तमाम नामवर बहादुर लड़ भिड़कर मर गए। और ये दोनों कबीले बे हद कमजोर हो गए। यहूदी अगरचे तअदाद में बहुत कम थे। मगर चूँकि वो तअलीम याफ्ता थे। इस लिए अवस व खुज़रज हमेशा यहूदियों की इल्मी बरतरी से मरऊब और उनके ज़ेरे असर रहते थे।

इस्लाम कबूल करने के बाद रसूले रहमत सल्लल्लाहु तआला

अलैहि वसल्लम की मुकद्दस तअलीम व तर्बीयत की बदौलत अवस व खुज़रज के तमाम इख्तिलाफात खत्म हो गए। और ये दोनों कबीले शीर-ो शकर की तरह मिल जुलकर रहने लगे। और चूँकि इन लोगों ने इस्लाम और मुसलमानों की अपने तन मन धन से बे पनाह इमदाद व नुसरत की। इस लिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उन खुश बख्तों को “अन्सार” के मुअज्जज लकब से सरफ़राज़ फरमा दिया। और कुरआने करीम ने भी इन जाँ निसाराने इस्लाम की नुसरते रसूल व इम्दादे मुस्लिमीन पर उन खुश नसीबों की मिदह व सना का जा बजा खुत्बा पढ़ा और अज़ रुए शरीअत अन्सार की महब्बत और उन की जनाब में हुस्ने अकीदत तमाम उम्मते मुस्लिमा के लिए लाजिमुल ईमान और वाजिबुल अमल करार पाई। (रदियल्लाहु अन्हुम अजमईन)

मदीने में इस्लाम क्योंकर फैला?

अन्सार गो बुत परस्त थे मगर यहूदियों के मेल जोल से इतना जानते थे कि नबी आख़िरुज ज़माँ का ज़हूर होने वाला है। और मदीना के यहूदी अकसर अन्सार के दोनों कबीलों अवस व खुज़रज को धमकियाँ भी दिया करते थे। कि नबी आखिरुज जमाँ के

जहूर के वक्त हम उनके लश्कर में शामिल होकर तुम बुत परस्तों को दुनिया से नीस्त- नाबूद कर डालेंगे इस लिए नबी आख़िरुज़ ज़माँ की तशरीफ़ आवरी का यहूद और अन्सार दोनों को इन्तिजार था।

सन्न ११ नबवी में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मअमूल के मुताबिक हज्ज में आने वाले कबाइल को दअवते इस्लाम देने के लिए मिना के मैदान में तशरीफ ले गए। और कुरआने मजीद की आयतें सुना सुना लोगों के सामने इस्लाम पेश करने लगे। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मिना में अक्बा (घाटी) के पास जहाँ आज “मस्जिदुल अकबा” है तशरीफ

फरमाते थे। कि कबीलए खुज़रज के छे आदमी आप के पास आ गए। आप ने उन लोगों से उन का नाम व नसब पूछो। फिर कुरआन की चन्द आयतें सुनाकर उन लोगों को इस्लाम की दश्वत दी जिस से ये लोग बे हद मुतास्सिर हो गए और एक दूसरे का मुँह देखकर आपस में कहने लगे कि यहूदी जिस नबी आखिरुज ज़माँ की खुशखबरी देते रहे हैं। यकीनन वो नबी यही हैं। लिहाज़ा कहीं ऐसा न हो कि हम से पहले इस्लाम की दअवत कबूल कर लें। ये कहकर सब एक साथ मुसलमान हो गए और मदीना जाकर अपने अहले ख़ानदान और रिश्तेदारों को भी इस्लाम की दवत दी। इन छ: खुश नसीबों के नाम ये हैं। (१) हज़रते अबुल हसैम बिन तैहान (२) हज़रते अबू उमामा असअद बिन जुरारह (३) हज़रते औफ़ बिन हारिस (४) हज़रते राफेअ बिन मालिक (५) हज़रते कुतबा बिन आमिर बिन हदीद (६) हज़रते जाबिर बिन अब्दुल्लाह बिन रियाब (रदियल्लाहु अन्हुम अजमईन)

(मदारिजुन नुबूव्वा जि.२ व ज़रकानी जि.१ स.३१०)

बैअते अकबा ऊला (पहला)

दूसरे साल १२ नबवी में हज्ज के मौक़अ पर मदीना के बारह अश्खास मिना की इसी घाटी में छुपकर मुशर्रफ़ ब-इस्लाम हुए। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से बैअत हुए। तारीखे इस्लाम में इस बैअत का नाम “बैअत अकबा ऊला है।

साथ ही उन लोगों ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से ये दरख्वास्त भी की। कि अहकामे इस्लाम की तअलीम के लिए कोई मुअल्लिम भी उन लोगों के साथ कर दिया जाए। चुनान्चे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते मुसअब बिन उमैर रदियल्लाहु तआला अन्हु को उन लोगों के साथ मदीना मुनव्वरा भेज दिया। वो मदीना में हज़रते असअद बिन जुरारह रदियल्लाहु तआला अन्हु के मकान पर ठहरे और अन्सार

के एक एक घर में जा कर इस्लाम की तब्लीग करने लगे। यहाँ तक कि रफ्ता रफ्ता मदीना से कुबा तक घर घर इस्लाम फैल

गया।

कबीलए अवस के सरदार हज़रते सअद बिन मुआज़ रदियल्लाहु तआला अन्हु बहुत ही बहादुर और बा-असर शख्स थे। हजरते मुसअब बिन उमैर रदियल्लाहु तआला अन्हु ने जब उनके सामने इस्लाम की दअवत पेश की। तो उन्होंने पहले तो इस्लाम से नफरत व बेज़ारी ज़ाहिर की। मगर जब हज़रते मुसअब बिन उमैर रदियल्लाहु तआला अनहु ने उन को कुरआने मजीद पढ़कर सुनाया तो एक दम उन का दिल पसीज गया। और इस कदर मुतास्सिर हुए कि सआदते ईमान से सरफ़राज़ हो गए। उन के मुसलमान होते ही उन का कबीला ‘अवस’ भी दामने इस्लाम में आ गया।

इसी साल बकौले मशहूर माह रजब की सत्ताईसवीं रात को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को बहालते बेदारी “मेअाजे जिस्मानी हुई। और इसी सफ़रे मे रात में पाँच नमाजें फ़र्ज़ हुईं। जिस का तफ़सीली बयान इन्शा अल्लाह तआला मुअजिज़ात के बाब में आएगा।

बैअते अकबा सानिया (दूसरा)

इस के एक साल बाद १३ नबी में हज्ज के मौका पर मदीना के तकरीबन बहत्तर अश्खास ने मिना की उसी घाटी में अपने

बुत परस्त साथियों से छुपकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दस्ते हक परस्त पर बैअत की और ये अहद किया कि हम लोग आप की और इस्लाम की हिफाज़त के लिए अपनी जान कुर्बान कर देंगे। इस मौकअ पर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के चचा हज़रते अब्बास रदियल्लाहु तआला अन्हु भी मौजूद थे। जो अभी तक मुसलमान नहीं हुए थे। उन्होंने मदीना वालों से कहा

कि देखो। मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) अपने खानदान बनी हाशिम में हर तरह मुहतरम और बा इज्जत हैं। हम लोगों ने दुश्मनों के मुकाबले में सीना सिपर हो कर हमेशा इन की हिफाज़त की है अब तुम लोग इन को अपने वतन में ले जाने के ख्वाहिशमंद हो। तो सुन लो अगर मरते दम तक तुम लोग इन का साथ दे सको तो बेहतर है वर्ना अभी से कनारा कश हो जाओ। ये सुनकर बरा बिन आज़िब रदियल्लाहु तआला अन्हु तैश में आ कर कहने लगे कि हम लोग तलवारों की गोद में पले हैं। हजरते बरा बिन आज़िब रदियल्लाहु तआला अन्हु इतना ही कहने पाए थे कि हजरते अबुल हसैम रदियल्लाहु तआला अन्हु ने बात काटते हुए ये कहा, कि या रसूलल्लाह! सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हम लोगों के यहूदियों से पुराने तअल्लुकात हैं। अब जाहिर है कि हमारे मुसलमान हो जाने के बाद ये तअल्लुकात टूट जाएँगे। कहीं ऐसा न हो कि जब अल्लाह तआला आप को गलबा अता फरमाए तो आप हम लोगों को छोड़कर अपने वतन मक्का चले जाएँ। ये सुनकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि तुम लोग इत्मिनान रखो कि ‘तुम्हारा खून मेरा खून है। और यकीन करो कि “मेरा जीना मरना तुम्हारे साथ है। मैं तुम्हारा हूँ। और तुम मेरे हो। तुमहारा दुश्मन मेरा दुश्मन है और तुम्हारा दोस्त मेरा दोस्त है। (जरकानी अलल मदाहिब जि.१ स.३१७ व सीरते इने हश्शाम जि.४ स.४४१ ता ४४२)

जब अन्सार ये बैअत कर रहे थे तो हज़रते असअद बिन जुरारह रदियल्लाहु तआला अन्हु ने या हज़रते अब्बास बिन नज़ला रदियल्लाहु तआला अन्हु ने कहा कि मेरे भाइयो! तुम्हें ये भी खबर है? कि तुम लोग किस चीज़ पर बैअत कर रहे हो? खूब समझ लो कि ये अरब व अजम के साथ एअलाने जंग है, अन्सार ने तैश में आ कर निहायत ही पुर जोश लहजे में कहा कि हाँ। हम लोग इसी पर बैअत कर रहे हैं। बैअत हो जाने के बाद आप ने इस जमाअत में से बारह आदमियों को नकीब (सरदार) मुकर्रर फ़रमाया। इन

में नौ आदमी कबीलए खुज़रज के और तीन अश्खास कबीलए अवस के थे जिन के मुबारक नाम ये हैं :(१) अबू उमामा असअद बिन जुरारह (२) सअद बिन रबीअ (३) अब्दुल्लाह बिन रवाहा (४) राफेअ बिन मालिक (५) बरा बिन मअर (६) अब्दुल्लाह बिन अमर (७) सद बिन उबादा (८) मुन्जर बिन उमर (८) उबादा बिन साबित । ये नौ आदमी कबीलए खजरज के हैं। (१०) उसैद बिन हुजैर (११) सद बिन खैसमा (१२) अबुल हसैम बिन तैहान। ये तीन अख़ास कबीलए अवस के हैं।(रदियल्लाहु तआला अन्हुम अजमईन) (जरकानी अलल मवाहिब जि.१, स.३१७)

इस के बाद ये तमाम हज़रात अपने अपने डेरों पर चले गए। सुबह के वक्त जब कुरैश को इस की इत्तिलाअ पहुँची तो वो आग बगुला हो गए। और उन लोगों ने डाँटकर मदीना वालों से पूछा कि क्या तुम लोगों ने हमारे साथ जंग करने पर मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) से बैअत की है? अन्सार के कुछ साथियों ने जो मुसलमान नहीं हुए थे। अपनी ला इल्मी जाहिर की। ये सुनकर कुरैश वापस चले गए। मगर जब तफतीश व तहकीकात के बाद कुछ अन्सार की बैअत का हाल मालूम हुआ तो कुरैश गैज- गज़ब में आपे से बाहर हो गए। और बैअत करने वालों की गिरफ़्फतारी के लिए तआकुब किया। मगर कुरैश हज़रते सद बिन उबादा रदियल्लाहु तआला अन्हु के सिवा किसी और को नहीं पकड़ सके। कुरैश ने हज़रते सअद बिन उबादा रदियल्लाहु तआला अन्हु को अपने साथ मक्का लाए और उनको कैद कर दिया। मगर जब जुबैर बिन मुतअम, और हारिस बिन हरब बिन उमय्या को पता चला तो उन दोनों ने कुरैश को समझाया कि खुदा के लिए सअद बिन उबादा (रदियल्लाहु तआला अन्हु) को फौरन छोड़ दो। वरना तुम्हारी मुलके शाम की तिजारत खतरे में पड़ जाएगी। ये सुनकर कुरैश ने हज़रते सअद बिन उबादा को कैद से रिहा कर दिया। और वो बखैरियत मदीना पहुँच गए।

(सीरते इन्ने हश्शाम जि.४ सफा ४४६ ता ४५०)

हिजरते मदीना मदीना मुनव्वरा में जब इस्लाम और मुसलमानों को एक पनाह गाह मिल गई तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने सहाबए किराम को आम इजाजत दे दी कि वो मक्का से हिजरत करके मदीना चले जाएँ। चुनान्चे सब से पहले हजरते अबू सलमा रदियल्लाहु तआला अन्हु ने हिजरत की। इसके बाद यके बाद दीगरे दूसरे लोग भी मदीना रवाना होने लगे। जब कुफ्फारे कुरैश को पता चला। तो उन्होंने रोक टोक शुरू कर दी। मगर छुप छुप कर लोगों ने हिजरत का सिलसिला जारी रखा। यहाँ तक कि रफ्ता रफ्ता बहुत से सहाबए किराम मदीना मुनव्वरा चले गए। सिर्फ वही मक्का मुकर्रमा में रह गए। जो या तो काफिरों की कैद में थे या अपनी मुफलिसी की वजह से मजबूर थे।

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को चूंकि अभी तक खुदा की तरफ से हिजरत का हुक्म नहीं मिला था। इस लिए आप मक्का ही में मुकीम रहे। और हज़रते अबू बकर सिद्दीक और हज़रते अली मुर्तज़ा रदियल्लाहु अन्हुमा को भी आप ने रोक लिया था, लिहाज़ा ये दोनों शमओ नुबूब्बत के परवाने भी आप ही के साथ मक्का में ठहरे

हुए

थे।

कुफ्फार कानफ्रेस

जब मक्का के काफिरों ने ये देख लिया कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और मुसलमानों के मददगार मक्का से बाहर मदीना में भी हो गए और मदीना जाने वाले मुसलमानों को अन्सार ने अपनी पनाह में ले लिया है तो कुफ्फारे मक्का को ये खतरा महसूस होने लगा कि कहीं ऐसा न हो कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) भी मदीना चले जाएँ और वहाँ से अपने हामियों की फौज ले कर मक्का पर चढ़ाई न कर दें। चुनान्चे इस खतरा का दरवाजा बन्द करने के लिए कुफ्फारे मक्का ने अपने

दारुल नदवह (पंचायत घर) में एक बहुत बड़ी कानफ्रेंस मुनअकद की। और ये कुफ्फारे मक्का का ऐसा जबरदस्त नुमाइन्दा इज्तिमाअ था कि मक्का का कोई भी ऐसा दानिशवर और बा असर शख्स न था तो इस कानफ्रेंस में शरीक न हुआ हो। खुसूसियत के साथ अबू सुफियान, अबू जहल, उतबा, जुबैर बिन मुतअम, नजर बिन हारिस, अबुल बख्तरी, ज़मआ बिन असवद, हकीम बिन हजाम, उमय्या बिन ख़लफ वगैरा वगैरा तमाम सरदाराने कुरैश इस मजलिस में मौजूद थे। शैताने लईन भी कम्बल ओढ़े एक बुजूर्ग शख्स की सूरत में आ गया। कुरैश के सरदारों ने नाम व नसब पूछा। तो बोला कि मैं “शेने नज्द” हूँ। इस लिए इस कानफ्रेंस में आ गया हूँ कि मैं तुम्हारे मामले में अपनी राय भी पेश कर दूँ। ये सुनकर कुरैश के सरदारों ने इब्लीस को भी अपनी कानफ्रेंस में शरीक कर लिया। और कानफ्रेंस की कार्रवाई शुरू हो गई। जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का मामला पेश हुआ तो अबुल बख़्तरी ने ये राय दी कि उन को किसी कोठरी में बन्द करके उन के हाथ पावँ बाँध दो। और एक सूराख से उन को खाना पानी दे दिया करो। शेखे नज्दी (शैतान) ने कहा कि ये राय अच्छी नहीं है। खुदा की कसम अगर तुम लोगों ने उन को किसी मकान में कैद कर दिया तो यकीनन उन के जाँ निसार अस्हाब को इस की ख़बर लग जाएगी और वो अपनी जान पर खेल कर उनको कैद से छुड़ा लेंगे।

अबुल असवद, रबीआ बिन अमर व आमरी ने ये मश्वरा दिया कि उन को मक्का से निकाल दो ताकि ये दूसरे शहर में जा कर रहें। इस तरह हम को उन के कुरजान पढ़ने और उन की तब्लीगे इस्लाम से नजात मिल जाएगी। ये सुनकर शेखे नज्दी ने बिगड़ कर कहा कि तुम्हारी इस राय पर लअनत । क्या तुम लोगों को मालूम नहीं कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) के कलाम में कितनी मिठास और तासीर व दिलकशी है? खुदा की कसम! अगर तुम लोग उन को शहर बदर करके छोड़ दोगे। तो

ये पूरे मुल्के अरब में लोगों को कुरआन सुना सुना कर तमाम कचाएले अरब को अपना ताबे फरमान बना लेंगे। और फिर अपने साथ एक अजीम लश्कर ले कर तुम पर ऐसी यलगार कर देंगे कि तुम उन के मुकाबले से आजिज़ व लाचार हो जाओगे। और फिर बजुज इस के तुम उन के गुलाम बनकर रहो कुछ बनाए न बनेगी। इसलिए उन को जला वतन करने की तो बात ही मत करो।

अबू जहल बोला कि साहिबो! मेरे जेहन में एक राय है जो अब तक किसी को नहीं सूझी। ये सुनकर सब के कान खड़े हो गए और सब ने बड़े इश्तियाक के साथ पूछा कि कहिए। वो क्या है तो अबू जहल ने कहा कि मेरी रारा ये है कि हर कबीले का एक एक मशहूर बहादुर तलवार ले कर उठ खड़ा हो। और सब यकबारगी हमला कर के मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) को कत्ल कर डालें। इस तदबीर से खून करने का जुर्म तमाम कबीलों के सर पर रहेगा। ज़ाहिर है कि ख़ानदान बनू हाशिम इस खून का बदला लेने के लिए राज़ी हो जाएँगे। और हम लोग मिल जुलकर आसानी के साथ खू बहा (हरजाना) की रकम अदा कर देंगे। अबू जहल की ये खूनी तजवीज़ सुनकर शेने नदी मारे खुशी के उछल पड़ा। और कहा कि बे-शक ये तदबीर बिल्कुल दुरुस्त है। इस के सिवा और कोई तजवीज़ काबिले कबूल नहीं हो सकती। चुनान्चे तमाम शुरका कानफ्रेस ने इत्तिफ़ाक राय से इस तजवीज़ को पास कर दिया और मजलिसे शूरा बरख्वास्त हो गई। और हर शख्स ये खौफनाक अज्म ले कर अपने घर चला। खुदावंदे कुटूस ने कुरआने मजीद की मुन्दर्जा जेल आयत में इस दाकिआ का ज़िक्र फरमाते हुए इर्शाद फरमाया कि –

व इज-यम-कुरु बिकल्लजीना क-क- लिथुस् -बितूका अब-यक-तुलूका अव-युखारिजूका व यम-कुरूना व यम

कुरुल्लाहु वल्लाहु खोरुल मा-किरीना (सूरतुल अन्फाल)

لا والله ئير اما کی نیند

तर्जमा :- (ऐ महबूब, याद कीजिए) जिस वक्त कुफ्फार आप के बारे में खुफिया तदबीर कर रहे थे। कि आप को कैद कर दें या कत्ल कर दें या शहर बदर कर दें। ये लोग खुफिया तदबीर कर रहे थे, और अल्लाह खुफिया तदबीर कर रहा था और अल्लाह की पोशीदा तदीबर सब से बेहतर है।

अल्लाह तआला की खुफिया तदबीर क्या थी? अगले सफ़ह पर इस का जलवा देखिए कि किस तरह उस ने अपने हबीब सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की हिफाजत फरमाई और कुफ्फार की सारी स्कीम को किस तरह उस कादिर- कय्यूम ने तहस नहस फरमा दिया। (इने हश्शाम)

हिजरते रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम

का वाकिआ जब कुफ्फार हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के कत्ल पर इत्तिफ़ाक करके कानफ्रेंस ख़तम कर चुके और अपने अपने घरों को रवाना हो गए तो हज़रते जिबरईले अमीन अलैहिस्सलाम रब्बुल आ-लमीन का हुक्म ले कर नाज़िल हो गए कि “ऐ महबूब! आज रात को आप अपने बिस्तर पर न सोएँ। और हिजरत करके मदीना तशरीफ ले जाएँ। चुनान्चे जैन दोपहर के वक्त हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु के घर तशरीफ ले गए और हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु से फरमाया कि सब घर वालों को हटा दो। कुछ मश्वरा करना है। हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु ने अर्ज किया कि या

रसूलल्लाह! आप पर मेरे माँ बाप कुर्बान। यहाँ पर आप की अहलिया (हजरते आइशा) के सिवा और कोई नहीं है। (उस वक्त हजरते आइशा से हुजूर की शादी हो चुकी थी) हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ऐ अबू बकर! अल्लाह तआला ने मुझे हिजरत की इजाजत फरमा दी है। हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु ने अर्ज किया। कि मेरे माँ बाप आप पर कुर्बान । मुझे भी हमराही का शरफ़ अता फरमाइए। आप ने उन की दरख्वास्त मंजूर फ़रमा ली। हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु ने चार महीने से दो ऊँटनियाँ बबूल की पत्ती खिला खिला कर तय्यार की थीं कि हिजरत के वक्त ये सवारी के काम आएँगी अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह! इन में से एक ऊँटनी आप कबूल फ़रमा लें। आप ने इर्शाद फ़रमाया कि कबूल है। मगर मैं इस की कीमत दूंगा। हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु ने आ-दिले ना ख्वास्ता (न चाहते हुए भी) फ़रमाने रिसालत से मजबूर हो कर इस को कबूल किया। हज़रते आइशा रदियल्लाहु तआला अन्हा उस वक्त बहुत कम उम्र थीं। लेकिन उन की बड़ी बहन हज़रते बीबी असमा रदियल्लाहु तआला अन्हा ने सामाने सफ़र दुरुस्त किया और तोशा दान में खाना रखकर अपनी कमर के पटके को फाड़ कर दो टुकड़े किए। एक से तोशा दान को बाँधा । और दूसरे से मश्क का मुँह बाँधा । ये वो काबिले फख शरफ़ है जिस की बिना पर उन को.’ “esules” “जातुन नताकीन’ (दो पटके वाली) के मुअज्जज लकब से याद किया जाता है।

इस के बाद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एक काफिर को जिस का नाम अब्दुल्लाह बिन उरीकत’ था जो रास्तों का माहिर था। राहनुमाई के लिए उजरत पर नौकर रखा। और उन दोनों ऊँटनियों को उस के सिपुर्द कर के फ़रमाया कि तीन रातों के बाद वो उन दोनों ऊँटनियों को ले कर “गारे सौर के पास

आ जाए। ये सारा इन्तिजाम कर लेने के बाद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपने मकान पर तशरीफ लाए। (बुखारी जि.१ स.५५३ ता ५५४. बाब तिजरतुन नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम)

काशानए नुबूव्वत का मुहासरा

कुफ्फारे मक्का ने अपने प्रोग्राम के मुताबिक काशानए नुबूवत को घेर लिया। और इन्तिज़ार करने लगे कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम सो जाएँ तो उन पर कातिलाना हमला किया जाए। उस वक्त घर में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास सिर्फ अली मुर्तज़ा रदियल्लाहु तआला अन्हु थे। कुफ्फारे मक्का अगरचे रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के बद तरीन दुश्मन थे। मगर इस के बा वुजूद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की अमानत व दियानत पर कुफ्फार को इस कदर एअतिमाद था कि वो अपने कीमती माल व सामान को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास अमानत रखते थे। चुनान्चे उस वक़्त भी बहुत सी अमानतें काशानए नुबूब्बत में थीं। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हजरते अली रदियल्लाहु तआला अन्हु से फरमाया कि तुम

मेरी सब्ज रंग की चादर ओढ़कर मेरे बिस्तर पर सो रहो। और मेरे चले जाने के बाद तुम कुरैश की तमाम अमानतें उन के मालिकों को सौंपकर मदीना चले आना।

ये बड़ा ही खौफनाक और बड़े सख्त खतरा का मौका था। हंजरते अली रदियल्लाहु तआला अन्हु को मालूम था कि कुफ्फारे मक्का हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के कत्ल का इरादा कर चुके हैं। मगर हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के इस फरमान से कि तुम कुरैश की सारी अमानते लौटाकर मदीने चले आना। हज़रते अली रदियल्लाहु तआला अन्हु को यकीने कामिल था कि मैं जिन्दा रहूँगा और मदीना पहुचूँगा।

इस लिए रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का बिस्तर जो आज काँटों का बिछौना था हज़रते अली रदियल्लाहु तआला अन्हु के लिए फूलों की सेज बन गया। और आप बिस्तर पर सुबह तक आराम के साथ मीठी नींद. साते रहे। अपने इसी कारनामे पर फख करते हुए शेरे खुदा ने अपने अश्आर में फ़रमाया कि

व कैतु बि-नफ़्सी खैर मन वतीस-सरा वमन ताफा बिल बैतिल अतीकि व बिल हिज-रि

मैंने अपनी जान को खतरा में डालकर उस जाते गिरामी की हिफाज़त की है जो ज़मीन पर चलने वालों और ख़ानए कबा व हतीम का तवाफ करने वालों में सब से ज्यादा बेहतर और बलन्द मर्तबा हैं।

रसूलु इलाहिन ख़ाफा अय्यम-कुरू बिही फ़नज-जाहु जुत-तौलिल इलाहु मिनल मत्रि रसूले खुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ये अन्देशा था कि कुफ्फारे मक्का उन के साथ खुफ़िया चाल चल जाँएगे मगर खुदावंदे मेहरबान ने उन को काफिरों की खुफ़िया तदबीर से बचा लिया। (ज़रकानी अलल मवाहिब जि. १ स.३२२)

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बिस्तरे नुबूव्वत पर जाने विलायत को सुलाकर एक मुट्ठी ख़ाक हाथ में ले ली। और सूरए यासीन की इब्तिदाई आयतों को तिलावत फरमाते हुए नुबूव्वत खाना से बाहर तशरीफ लाए। और

मुहासरा करने वाले काफिरों के सरों पर ख़ाक डालते हुए मजमअ से साफ़ निकल गए। न किसी को नज़र आए न किसी को कुछ ख़बर हुई।

एक दूसरा शख्स जो इस मजमअ में मौजूद न था। उसने उन लोगों को खबर दी कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) तो यहाँ से निकल गए। और चलते वक्त तुम्हारे सरों पर खाक डाल गए हैं। चुनान्चे उन कोर बख्तों ने अपने सरों पर हाथ फेरा तो वाकिई उन के सरों पर ख़ाक और धूल पड़ी हुई थी।

(मदारिजुन नुबूब्वत जि.२ स.५७) रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपने दौलत खाना से निकल कर मकामे “हजवरह के पास खड़े हो गए और बड़ी हसरत के साथ “क बा” को देखा और फरमाया कि ऐ शहरे मक्का! तू मुझको तमाम दुनिया से ज़्यादा प्यारा है अगर मेरी कौम मुझ को तुझ से न निकालती तो मैं तेरे सिवा किसी और जगह सुकूनत पज़ीर न होता। हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु से पहले ही करारदाद हो चुकी थी। वो भी उसी जगह आगए। और इस ख़याल से कि कुफ्फारे मक्का हमारे कदमों के निशान से हमारा रास्ता पहचान कर हमारा पीछा न करें। फिर ये भी देखा कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पाए नाजुक जख्मी हो गए हैं। हज़रते अबू बकर सिद्दीक़ रदियल्लाहु तआला अन्हु ने आप को अपने कन्धों पर सवार करा लिया। और इस तरह खार दार झाड़ियों और नोक दार पत्थरों वाली पहाड़ियों को रौंदते हुए उसी रात गारे सौर पहुंचे।

(मदारिजुन्नुबूव्वा जि.२ स.५८) हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु पहले खुदगार में दाखिल हुए। और अच्छी तरह गार की सफाई की और अपने बदन के कपड़े फाड़ फाड़ कर गार के तमाम सुराख़ों को बन्द किया। फिर हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम गार के अन्दर तशरीफ ले गए और हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु की गोद में अपना सरे मुबारक रखकर सो गए। हज़तरे अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु ने एक

सूराख को अपनी ऐड़ी से बन्द कर रखा था। सुराख के अन्दर से एक साँप ने बार बार यारे गार के पावँ में काँटा। मगर हजरते सिद्दीक जाँ निसार ने इस खयाल से पावँ नहीं हटाया कि रहमते आलम के ख्वाबे राहत में खलल न पड़ जाए। मगर दर्द की शिद्दत से यारे गार के आँसूओं की धार के चन्द कतरात सरवरे काएनात के रुख्सार पर निसार हो गए। जिस से रहमते आलम बेदार हो गए और अपने यारे गार को रोता देखकर बे करार हो गए। पूछा अबू बकर! क्या हुआ? अर्ज किया या रसूलल्लाह! मुझे साँप ने काट लिया है। ये सुनकर हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जख्म पर अपना लुआबे दहन लगा दिया जिस से फौरन ही सारा दर्द जाता रहा । हुजूरे. अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तीन रात इस गार में रौनक अफ़रोज़ रहे। हजरते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु के जवान फ़रज़न्द हज़रते अब्दुल्लाह रदियल्लाहु तआला अन्हु रोज़ाना रात को गार के मुँह पर सोते। और सुबह सवेरे ही मक्का चले जाते और पता लगाते कि कुरैश क्या तदबीरें कर रहे हैं? जो कुछ ख़बर मिलती शाम को आ कर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से अर्ज कर देते। हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु के गुलाम हजरते आमिर बिन फुहैरा रदियल्लाहु तआला अन्हु कुछ रात गए चरागाह से बकरियाँ ले कर गार के पास आ जाते। और उन बकरियों का दूध दोनों आलम के ताजदार और उन के यारे गार पी लेते थे।

(जरकानी अलल मवाहिब जि.१ स. ३३९) हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तो गारे सौर में तशरीफ फरमा हो गए। उधर काशानएं नुबूव्वत का मुहासरा करने वाले कुफ्फार जब सुबह को मकान में दाखिल हुए तो बिस्तरे नुबूव्वत पर हज़रते अली रदियल्लाहु तआला अन्हु थे। ज़ालिमों ने थोड़ी देर आप से पूछ गछ करके आप को छोड़ दिया। फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की तलाश व जुस्तुजू

में

मक्का और अतराफ- जवानिब का चप्पा चप्पा छान मारा। यहाँ कि तक कि ढूँढते ढूँढते गारे सौर तक पहुँच गए। मगर गार के मुँह पर उस वक्त खुदावंदी हिफाजत का पहरा लगा हुआ था। यानी गार के मुँह पर मकड़ी ने जाला तन दिया था। और किनारे पर कबूतरी ने अन्डे दे रखे थे। ये मंज़र देखकर कुफ्फारे कुरैश आपस में कहने लगे कि अगर इस गार में कोई इन्सान मौजूद होता। तो न मकड़ी जाला तनती। न कबूतरी यहाँ अन्डे देती। कुफ्फार की. आहट पाकर हजरते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु कुछ घबराए। और अर्ज किया कि या रसूलल्लाह अब हमारे दुश्मन इस कदर करीब आ गए हैं कि अगर वो अपने कदमों पर नज़र डालेंगे तो हम को देख लेंगे। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ला तहजन इन्नल्लाहा म-अना यानी मत घबराओ खुदा हमारे साथ है।

इस के बाद अल्लाह तआला ने हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु के कल्ब पर सुकून व इत्मिनान का ऐसा सकीना उतार दिया कि वो बिल्कुल ही बे खौफ हो गए। हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु की यही वो जाँ निसारियाँ हैं जिन को दरबारे नुबूब्बत के मशहूर शाओर हज़रते हस्सान बिन साबित अंसारी रदियल्लाहु तआला अन्हु ने क्या खूब

कहा है कि

व सानियस नैनि फिल गारिल मुनीफि व कद

ताफल अदुब्बु बिही इज़ सा अदल ज-ब-ला और दो में के दूसरे (अबू बकर) जब कि पहाड़ पर चढ़कर बलन्द मर्तबा गार में इस हाल में थे कि दुश्मन उनके गिर्द चक्कर लगा रहा था।

व काना हिल्बा रसूलिल्लाहि कद अलिमू मिनल खलाइकि लम यदिल बिहि ब-द-लन और वो (अबू बकर) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के महबूब थे। तमाम मख्लूक इस बात को जानती है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने किसी को भी उन के बराबर नहीं ठहराया है। (ज़रकानी अलल मवाहिब जि.१ स. ३३७)

बहर हाल चौथे दिन हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम यकुम रबीउल अव्वल दो शंबा के दिन गाारे सौर से बाहर तशरीफ़ लाए। अब्दुल्लाह बिन उरीक़त जिस को राह नुमाई के लिए किराया पर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने नौकर रख लिया था। वो करारदाद के मुताबिक दो ऊँटनियाँ ले कर गारे सौर पर हाज़िर था। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपनी ऊँटनी पर सवार हुए। और एक ऊँटनी पर हज़रते अबू बकर रदियल्लाहु तआला अन्हु और हज़रते आमिर बिन फुहैरा रदियल्लाहु तआला अन्हु बैठे। और अब्दुल्लाह बिन उरीकत आगे आगे पैदल चलने लगा। और आम रास्ता से हटकर साहिले समुन्दर के गैर म[फ़ रासतों से सफ़र शुरू कर दिया।

सौ ऊँट का इनाम

इधर अहले मक्का ने इश्तहार दे दिया था। कि जो शख्स मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) को गिरफ्तार करके लाएगा। उस को एक सौ ऊँट मिलेगा। इस गिराँ कदर इनआम के लालच में

बहुत से लालची लोगों ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की तलाश शुरू कर दी। और कुछ लोग तो मंजिलों दूर तक तआकुब में गए।

उम्मे मअबद की बकरी

दूसरे रोज़ मकाम “कुदीद” में उम्मे मअबद आतका बिन्ते खालिद खुज़ाईया के मकान पर आप का गुजर हुआ। “उम्मे मअबद” एक ज़ईफ़ा औरत थी जो अपने खीमा के सहन में बैठी रहा करती थीं। और मुसाफिरों को खाना पानी दिया करती थी। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उस से कुछ खाना खरीदने का कसद किया। मगर उस के पास कोई चीज़ मौजूद नहीं थी। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने देखा कि उस के ख़ीमे के एक जानिब एक बहुत ही लागर बकरी है। दर्याफ्त फरमाया कि क्या ये दूध देती है? उम्मे मअबद ने कहा कि नहीं। आप ने फ़रमाया कि अगर तुम इजाजत दो तो मैं इस का दूध दुह लूँ। उम्मे मअबद ने इजाज़त दे दी और आपने “बिस्मिल्लाह पढ़कर जो उस के थन को हाथ लगाया तो उस का थन दूध से भर गया। और इतना दूध निकला कि सब लोग सेराब हो गए। और उम्मे मअबद के तमाम बरतन दूध से भर गए। ये मुअजिज़ा देखकर उम्मे मअबद और उनके ख़ाविन्द दोनों मुशर्रफ़ ब इस्लाम हो गए। (जरकानी अलल मवाहिब जि.१ स. ३४६)

सुराका का घोड़ा

जब उम्मे मअबद के घर से हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम आगे रवाना हुए तो मक्का का एक मशहूर शहसवार सुराका बिन मालिक बिन जुअशम तेज़ रफ्तार घोड़े पर सवार हो कर तुआकुब करता नजर आया। करीब पहुँचकर हमला की निय्यत से आगे बढ़ा, तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की दुआ

से पत्थरीली ज़मीन में उस के घोड़े के पावँ घुटनों तक ज़मीन में धंस गया। सुराका ये मुअजिज़ा देखकर ख़ौफ़ व दहशत से काँपने लगा। और अमान अमान पुकारने लगा। रसूले अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का दिल रहम व करम का

समुन्दर था। सुराका की लाचारी और गिरया वजारी पर आप का दरियाए रहमत जोश में आ गया। दुआ फरमा दी तो जमीन ने उस के घोड़े को छोड़ दिया। उस के बाद सुराका ने अर्ज किया कि मुझ को अमन का परवाना लिख दीजिए। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के हुक्म से हज़रते आमिर बिन फुहैरा रदियल्लाहु तआला अन्हु ने सुराका के लिए अमन की तहरीर लिख दी। सुराका ने उस तहरीर को अपने तरकश में रख लिया। और वापस लौट गया। रास्ता में जो शख्स भी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के बारे में दर्याफ्त करता तो सुराका उस को ये कहकर लौटा देते कि मैं ने बड़ी दूर तक बहुत ज़्यादा तलाश किया मगर आँ हज़रत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इस तरफ नहीं हैं। वापस लौटते हुए सुराका ने कुछ सामाने सफ़र भी

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की खिदमत में बतौर नज़राना के पेश किया। मगर आँ हज़रत ने कबूल नहीं फ़रमाया। (बुखारी बाब हिजरतुन नबी जि.१ स.५५४ व ज़रकानी जि.१ स. ३६४ व मदारिहजुन नुबूव्वत जि. २ स.६२)

सुराका उस वक्त तो मुसलमान नहीं हुए। मगर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की अज़मते नुबूब्बत और इस्लाम की सदाक़त का सिक्का उनके दिल पर बैठ गया। जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फतहे मक्का और जंगे ताइफ व हुनैन से फारिग हो कर “जिइर्राना में पड़ाव किया। तो सुराका उसी परवानए अमन को ले कर बारगाहे

नुबूव्वत

में हाज़िर हो गए और अपने कबीले की बहुत बड़ी जमाअत के साथ इस्लाम कबूल कर लिया।

(दलाएलुन्नुबूव्वा जि.२ स.११५ व मदारिजन-नुबूव्वा जि.२ स.६२) वाजेह रहे कि ये वही सुराका बिन मालिक रदियल्लाहु तआला अन्हु हैं जिन के बारे में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने इल्मे गैब से गैब की खबर देते हुए ये इर्शाद फरमाया था कि ऐ सुराका! तेरा क्या हाल होगा जब तुझ को मुल्के

फारस के बादशाह किसरा के दोनों कंगन पहनाए जाएँगे? इस इर्शाद के बरसों बाद जब हजरते उमर फारूक रदियल्लाहु तआला अन्हु के दौरे खिलाफत में ईरान फतह हुआ। और किसरा के कंगन दरबारे खिलाफत में लाए गए। तो अमीरुल मुमिनीन हजरते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु ने ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के फरमान की तस्दीक व तहकीक के लिए वो कंगन हज़रते सुराका रदियल्लाहु तआला अन्हु को पहना दिये। और फ़रमाया कि ऐ सुराका! ये कहो कि अल्लाह ही के लिए हम्द है जिस ने इन कंगनों को बादशाहे फारस किसरा से छीन कर सुराका बदवी को पहना दिया। हज़रते सुराका रदियल्लाहु तआला अन्हु ने २४ हिजरी में वफात पाई जब कि हज़रते उस्मान गनी रदियल्लाहु तआला अन्हु तख्ते ख़िलाफ़ पर रौनक अफ़रोज थे। (ज़रकानी अलल मवाहिब जि.१ स.३४६ व ३४८)

बुरीदा असलमी का झन्डा

जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मदीना के करीब पहुंच गए। तो “बुरीदा असलमी कबीलए बनी सहम के सत्तर सवारों को साथ ले कर इस लालच में आप की गिरफ्तारी के लिए आए कि कुरैश से एक सौ ऊँट इनआम मिल जाएगा। मगर जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के सामने आए। और पूछा कि आप कौन हैं। तो आप ने फरमायश कि मैं मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह हूँ। और खुदा का रसूल हूँ। जमाल व जलाले नुबूव्वत का उन के कल्ब पर ऐसा असर हुआ कि फौरन कलिमए शहादत पढ़कर दामने इस्लाम में आ गए। और कमाले अकीदत से ये दरख्वास्त पेश की कि या रसूलल्लाह! मेरी तमन्ना है कि मदीना में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का दाखिला एक झन्डे के साथ होना चाहिए ये कहा और अपना इमामा सर से उतार कर अपने नेज़े पर बाँध लिया। और हुजूरे

अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के अलमबरदार बन कर मदीना तक आगे आगे चलते रहे। फिर दर्याप्त किया कि या रसूलल्लाह! आप मदीना में कहाँ उतरेंगे? ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इर्शाद फरमाया कि मेरी ऊँटनी

खुदा से मामूर है। ये जहाँ बैठ जाएगी। वही मेरी कियामगाह है। (मदारिजुन्नुबूव्वा जि.२ स.६२)

की तरफ

हज़रते जुबैर के बेश कीमत कपड़े

इस सफ्र में हुस्ने इत्तिफाक से हज़रते जुबैर बिनुल अव्वाम रदियल्लाहु तआला अन्हु से मुलाकात हो गई। जो हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के फूफी हज़रते सफीया रदियल्लाहु तआला अन्हा के बेटे हैं। ये मुल्के शाम से तिजारत का सामान ले कर आ रहे थे। उन्होंने हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु की ख़िदमत में चन्द नफीस कपड़े बतौरे नज़राना के पेश किए। जिन को ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और हज़रते अबू बकर रदियल्लाहु तआला अन्हु ने कबूल फरमा लिए। (मदारिजुन्नुबूव्वा जि.२ स.६२)

शहंशाहे रिसालत मदीने में

हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की आमद आमद की ख़बर चूँकि मदीना में पहले से पहुंच चुकी थी। और औरतों बच्चों तक की ज़बानों पर आप की तशरीफ़ आवरी का चर्चा था। इस लिए अहले मदीना आप के दीदार के लिए इन्तिहाई मुश्ताक व बे करार थे। रोजाना सुबह से निकल निकल कर शहर के बाहर सरापा इन्तिज़ार बनकर इस्तिकबाल के लिए तय्यार रहते थे और जब धूप तेज़ हो जाती तो हसरत व अफ़सोस के साथ अपने घरों को वापस लौट जाते। एक दिन अपने मअमूल के

मुताबिक अहले मदीना आप की राह देखकर वापस जा चुके थे कि नागहाँ एक यहूदी ने अपने किलओ से देखा कि ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सवारी मदीने के करीब आप पहुँची है। उस ने ब-आवाजे बुलन्द पुकारा कि ऐ मदीना वालो! तुम जिस का रोज़ाना इन्तिजार करते थे वो कारवाने रहमत आ गया। ये सुनकर तमाम अन्सार बदन पर हथियार सजा कर और वज्द- शादमानी से बे करार हो कर दोनों आलम के ताजदार का इस्तकबाल करने के लिए अपने घरों से निकल पडे । और नअरए तकबीर की आवाजों से तमाम शहर गूंज उठा। (भदारिजुन्नुबूव्वा जि.२ स.६३ वगैरा)

मदीना मुनव्वरा से तीन मील के फासिले पर जहाँ आज “मस्जिदे कुबा बनी हुई है १२ रबीउल अव्वल को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम रौनक अफ़रोज़ हुए। और कबीलए अमर दिन औफ़ के ख़ानदान में हज़रते कुलसुम बिन हिदम रदियल्लाहु तआला अन्हु के मकान में तशरीफ फरमा हुए। अले खानदान ने इस फन व शरफ पर कि दोनों आलम के मेजबान उनके मेहमान बने अल्लाहु अकबर का पुर जोश ना मारा। चारों तरफ से अन्सार जोशे मसर्रत में आते और बारगाहे रिसालत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम में सलात- सलाम का नजरानए अकीदत पेश करते। अकसर सहाबए किराम जो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से पहले हिजरत करके मदीना मुनव्वरा आए थे वो लोग भी उसी मकान में ठहरे हुए थे। हज़रते अली रदियल्लाहु तआला अन्हु भी हुक्मे नबवी के मुताबिक कुरैश की अमानतें वापस लौटा कर तीसरे दिन मक्का से चल पड़े थे। वो भी मदीना आ गए। और उसी माकन में कयाम फरमाया और हज़रते कुलसुम बिन हिदम रदियल्लाहु तआला अन्हु और उनके खानदान वाले इन तमाम मुकद्दस मेहमानों की मेहमान नवाजी में दिन रात मसरूफ रहने लगे। (मदारिजुन्नुबूव्या जि.१ स.५६०)

अल्लाहु अकबर! अमर बिन औफ के खानदान में हजरते सय्येदुल अंबिया व सय्येदुल औलिया व सालिहीने सहाबा के नूरानी इज्तिमाअ से ऐसा समाँ बंध गया होगा कि गालिबन चाँद सूरज और सितारे हैरत के साथ इस मजम को देखकर जबाने हाल से कहते होंगे कि ये फैसला मुश्किल है कि आज अंजुमने आस्मान ज्यादा रौशन है या हज़रते कुलसुम बिन हिदम का मकान? और शायद खानदाने अमर बिन औफ का बच्चा बच्चा जोशे मसर्रत से मुस्कुरा मुस्कुरा कर ज़बाने हाल से ये नगमा गाता होगा कि

“उनके कदम पे मैं निसार, जिन के कुदूमे नाज ने

उजड़े हुए दयार को रश्के चमन बना दिया” अल्लाहुम्मा सल्लि वसल्लिम व बारिक अला सय्येदिना व मौलाना मुहम्मदिव व-आलिही व सहबिही व बारिक व सल्लिम

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