ومن كلام له (عليه السلام)
[في أمر البيعة]لَمْ تَكُنْ بَيْعَتُكُمْ إِيَّايَ فَلْتَةً ، وَلَيْسَ أَمْرِي وَأَمْرُكُمْ وَاحِداً، إِنِّي أُرِيدُكُمْ للهِِ وَأَنْتُمْ تُرِيدُونَنِي لاَِنْفُسِكُمْ. أَيُّهَا النَّاسُ، أَعِينُوني عَلى أَنْفُسِكُمْ، وَايْمُ اللهِ لاَُنْصِفَنَّ الْمَظْلُومَ، وَلاََقُودَنَّ الظَّالِمَ بِخِزَامَتِهَ حَتَّى أُورِدَهُ مَنْهَلَ الْحَقِّ وَإِنْ كَانَ كَارِهاً.
SERMON 135
About the sincerity of his own intention and support of the oppressed
Your allegiance to me was not without thinking,(1) nor is my and your position the same. I seek you for Allah’s sake but you seek me for your own benefits.
O’ people! support me despite your heart’s desires. By Allah, I will take revenge for the oppressed from the oppressor and will put a string in the nose of the oppressor and drag him to the spring of truthfulness even though he may grudge it.
(1). Here Amir almu’minin points to the view of `Umar ibn al-Khattab which he had on the allegiance of Abu Bakr on the day of Saqifah when he said: ” . . . let me clarify this to you that the allegiance with Abu Bakr was a mistake and without thinking (faltah) but Allah saved us from its evil.
Therefore, whoever (intends to) acts like this you must kill him. . .” (as-Sahih, al-Bukhari, vol. 8, p. 211; as-Sirah an-Nabawiyyah, Ibn Hisham, vol. 4, pp. 308309; at-Tarikh, at-Tabari, vol. l, p. l822; al-Kamil, Ibn al-Athir, vol. 2, p. 327; at-Tarikh, Ibn Kathir, vol. 5, pp. 245246; al-Musnad, Ahmad ibn Hanbal, vol. l, p. 55; as-Sirah al-Halabiyyah, vol. 3, pp. 388, 392; al-Ansab, al-Baladhuri, vol. 5, p. l5; at-Tamhid, al-Baqilani, p. l96; ash-Sharh, Ibn Abi’l-Hadid, vol. 2, p. 23)
Month: August 2020
Jashn e Eid e Ghadir
Hadith Khutbah e Ghadir e Khum





Khutbah e Ghadir e Khum
ibn Wathilah Se Riwayat Ki Unhone Zayd Bin Arqam (RadiAllahu Ta’ala ‘Anhu) Se Suna Ki Rasool-E-Akram (صلى الله عليه وآله وسلم) Ne Makkah Aur Madinah Ke Darmiyan Paanch-05 Bade Ghane Darakhto’n Ke Qareeb Padaaaw Kiya Aur Logo’n Ne Darakhto’n Ke Niche Safaayi Kee Aur Aap (صلى الله عليه وآله وسلم) Ne Kuchh Der Aaraam Farmaya.
Namaz Ada Farmayi, Phir Khitaab Farmane Ke Liye Khade Huwe.
Allah Ta’ala Kee Hamd Wa Thana Bayan Farmayi Aur Wa’z-o-Naseehat Farmayi, Phir Jo Allah Ta’ala Ne Chaaha Aap (صلى الله عليه وآله وسلم) Ne Bayan Kiya.
Aap (صلى الله عليه وآله وسلم) Ne Farmaya :
“Aye Logo’n!
Mein Tumhare Darmiyan Do Chizein Chhod Kar Ja Raha Hoo’n, Jab Tak Tum In Kee Pairwi Karoge Kabhi Ghumraah Nahin Hoge Aur Woh (Do Chizein) Allah Kee Kitab Aur Mere Ahl-E-Bayt / Aulaad Hain.”
Is Ke Baa’d Farmaya :
“Kya Tumhein ilm Nahin Ki Mein Mominin Kee Jaano’n Se Qareeb Tar Hoo’n ?”
Aisa Teen Martaba Farmaya.
Sab Ne Kaha :
Haa’n!
Phir Aap (صلى الله عليه وآله وسلم) Ne Farmaya :
“Jis Ka Mein Mawla Hoo’n Us Ka ‘Ali Mawla Hai.”
– References
1-Hakim Fi Al-Mustadrak, 03/109, 110, Raqam-4577,
2-Ibn Kathir Fi Al-Bidayah Wa An-Nihayah, 04/168,
3-Ibn ‘Asakir Fi Tarikh Dimashq Al-Kabir (Tarikh Ibn ‘Asakir), 45/164,
4-Hisma-ud-Deen Hindi, Kanz-ul-’Ummal, 01/381, Raqam-1657
हजरत ए मौला ए कायनात हजरत अली कर्मअल्लाहु तआला व वजहुल अलैहिस्सलाम की शान का वाक्या




*हजरत ए मौला ए कायनात हजरत अली कर्मअल्लाहु तआला व वजहुल अलैहिस्सलाम की शान का वाक्या गदीर-ए-खुम का जिसको लौग ईद-ए-गदीर के नाम से जानते हैं*
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यह वाक्या है नवी ए करीम सल्लल्लाहो अलैहे व वस्सल्लम की बसीयत का मौला अली मुश्किल कुशा बाबा को मौला के खिताब का
आज 1400 साल पहले 10 हिजरी में हमारे नवी सल्लल्लाहो अलैहे व वस्सल्लम ने ऐलान करबाया
इस मर्तबा जो भी हज करने चले तो मेरे साथ चले इस मर्तबा हम भी आप सब के साथ हज करने चलेंगे
जब लौगो ने सुना इस साल नवी करीम सल्लल्लाहो अलैहे व वस्सल्लम के साथ हज करने का मौका है तो ज्यादतर लौग तैयार हो गये
तमाम लौग अपने अहलोअयाल के साथ तैयार हो गये
तारीख में लिखा है की उस साल हज के लिए एक लाख बीस हजार लौग मक्का मे हज करने के लिए जमा हुये थे
इससे पहले इतनी कसीर तादाद में किसी ने हज नही किया था
जब नवी करीम सल्लल्लाहो अलैहे व वस्सल्लम और तमाम असहाब हज करके मक्का से मदीने रबाना हुये और गदीर ए खुम तक पहुंचे
खुदा ए पाक ने फरमाया ए मेरे महबूब दे दो वो पैगाम जो लाजिम है उम्मत पर
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व वस्सल्लम ने मुखातिब होकर फरमाया ए लौगो रूक जाऔ और जो आगे निकल गये उनको बापस बुलाऔ और जो पीछे हैं उनका इन्तज़ार करो
क्योंकि अल्लाह की मर्जी है कि मै यहाँ एक खुतबा दूं
बादी ए गदीर एक मरकज था जो मक्का से मदीने के बीच मे जो मदीने की तरफ जाने बाले थे चले जाते थे और कुछ गाँव की ओर जाते एक मैदान था
इसीलिए अल्लाह ताआला ने इसी मैदान को इन्तखाब किया
असहाब ने कहा या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व वस्सल्लम आप खुतबा कहाँ से देगें ऐसी सहरा में हम मिम्बर कहाँ से बनायें
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व वस्सल्लम ने फरमाया
अपने ऊँटों से पालान उतारो और पालान से एक मिम्बर बनाऔ क्योंकि आज का पैगाम हक और बातिल की पहचान का है
ऊँटों के पालान से मिम्बर तैयार हुआ
और तमाम असहाब आ पहुंचे फिर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व वस्सल्लम मिम्बर पर जल्वा अफरोज हुये
और फरमाया
ए लोगो मैं वो मुहम्मद हूँ जिसको अल्लाह ने मुन्तखिब किया
ताकि मै तुमको अल्लाह का दीन समझा सकूं और हलाल हराम का फर्क बता सकूँ
और अल्लाह की किताब कुरआन पाक तुम तक पहुंचा सकूँ
लेकिन अनकरीब मैं तुम्हारे साथ नही रहूँगा मेरा पैगाम रहेगा लेकिन तुम मुझे अपनी नजरों से देख न सकोगे
सारे असहाबों मे गम का माहौल हो गया सभी रोने लगे
फिर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व वस्सल्लम ने फरमाया अगर तुम चाहते हो की रोजे महशर मुझसे मिलो तो दो चीजें कभी मत छोड़ना
एक अल्लाह की किताब कुरआन पाक
एक मेरी अहलेबैत
कभी इन से जुदा मत होना अगर जुदा हुए तो गुमराह हो जाऔगे
अगर तुमने कुरआन और अहलेबैत को अपने साथ रखा तो हौज ए कौसर पर मुझसे आकर मिलोगे और मैं मुहम्मद तुम्हारी सफाअत करूँगा
फिर आपने इमाम अली अलैहिस्सलाम को मिम्बर पर बुलाया
और तमाम लोगों से मुताखिब होकर फरमाया आप सल्लल्लाहो अलैहे व वस्सल्लम फरमाने लगे बताऔ मैं किस किस का मौला हूँ
हर कोई अपना हाथ उठाकर कहने लगा
या रसूलुल्लाह आप हमारे मौला हैं
या रसूलुल्लाह आप हमारे मौला हैं
फिर आपने हजरत इमाम अली इब्ने अवुतालिब अलैहिस्सलाम का हाँथ बुलन्द करके फरमाया
*मन कुन्तो मौला व फहाजा अलीयुन मौला*
जिस जिस का मैं मौला हूँ उस उस का इये अली मौला हैं
जैसे ही असहाब ने यह सुना सभी अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर की सदा बुलन्द करने लगे
उसके बाद आप सल्लल्लाहो अलैहे व वस्सल्लम ने दुआ के लिए हाँथ उठाये और फरमाया
या अल्लाह जो अली का दुशमन वो मेरा दुशमन और जो मेरा दुशमन वो अल्लाह का दुशमन
और जो इस अली का दोस्त वो मेरा दोस्त और जो मेरा दोस्त वो अल्लाह का दोस्त
ए अल्लाह उन पर नेमतें और बरकतें और रहमतें नाजिल फरमां जो अली से मौहब्बत करते हैं
तारीख में लिखा है फिर हर कोई इमाम अली अलैहिस्सलाम को मुबारकबाद देने लगा
सब कहने लगे ए मौला ए कायनात मौला अली मुबारक हो
गदीर के मैदान मे सभी आ रहे थे और मौला अली अलैहिस्सलाम को मुबारकबाद दे देकर जा रहे थे
सुब्हानआल्लाह
और इसी दिन को लौग ईद ए गदीर के नाम से याद करते हैं
गदीर ए खुम का वाक्या 18 जिलहिज को पेश आया था
यह दिन उम्मत का खुशी व
मुबारकबाद देने का दिन है
सिया हजरात खूब मनाते हैं पर उनकी गुस्ताखी और गलत यकीदे के बजह से सुन्नीयों में इख्तलाफ हुआ
दुसरी बात 18 जिलहिज को नवी ए करीम सल्लल्लाहो अलैहे व वस्सल्लम के दामाद हजरत उसमान ए गनी रजिअल्लाहु तआला अन्हु की शाहदत हुई
इस बजय से सुन्नी हजरात दोनो बातों का ख्याल रखते हैं
आप सभी से मौहब्बताना गुजारिश है जब भी ईद ए गदीर का दिन आये तो मौला अली मुश्किल कुशा मौला अली अलैहिस्सलाम की मौहब्बत मे अकीदत में नजर औ नियाज जरूर पेश करें सरकार मौला अली अलैहिस्सलाम की बारगाह में
सुब्हानआल्लाह
नाजरीन इकराम यह है मेरे सरकार मौला अली मुश्किल कुशा मौला अली अलैहिस्सलाम की शान
नाजरीन इकराम यह हमेशा याद रखो मौला अली अलैहिस्सलाम और अहलेबैत ए पाक से मौहब्बत करो और कुरआन पाक से मौहब्बत करो
और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व वस्सल्लम के फरमान के खिलाफ भी मत जाऔ
जो आका ने फरमाया है उस पर ईमान रखो
मौला ए कायनात हजरत अली कर्मअल्लाहु तआला व वजहुल करीम अलैहिस्सलाम ताजदारे औलिया है जैसे नवीयों मे हमारे नवी सबसे अफजल इसी तरह वलीयों मे मौला अली ताजदारे औलिया है
यह बात भी याद रखो मौला की शान नाराली सभी आपके गुलाम है
हजरत अबु बकर हजरत उमर हजरत उसमान रजिअल्लाहु तआला अन्हु की शान व मकाम अपनी जगह है यह लौग रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व वस्सल्लम के दमाम व ससुर है
जिसने इनके शान मे गुस्ताखी की समझो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व वस्सल्लम के फरमान को ठुकरा दिया और ईमान से हाथ धो बैठा
या अल्लाह हम सभी को रसूल ए खुदा सल्लल्लाहो अलैहे व वस्सल्लम के सदके से अहलेबैत ए पाक से मौहब्बत करने और असहाब ए रसूल से मौहब्बत करने की तौफीक अता फरमा और अक्ल ए सलीम अता फरमा हसद और बुग्ज से निजात दे
मौहब्बत से रहने की तौफीक अता फरमा
आमीन
*पांच नारे पंजतन के*
*सवा लाख नारा हैदरी*
*या अली मौला अली मुश्किल कुशा मौला अली*
*📚ताजदारे औलिया*
*या हुसैन या वारिस अल मदद*
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निराली शान का मालिक
★__ इस बारे में एक रिवायत में है एक रात हजूर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यहूदियों के बड़े सरदार मालिक बिन सैफ से फरमाया -मैं तुम्हें उस जात की कसम देकर पूछता हूं कि जिसने मूसा अलैहिस्सलाम पर तौरात नाज़िल फरमाई, क्या तौरात में यह बात मौजूद है कि अल्लाह तआला मोटे ताज़े हबर यानी यहूदी राहिब से नफरत करता है क्योंकि तुम भी ऐसे ही मोटे ताजे हो , तुम वह माल खा खा कर मोटे हुए जो तुम्हें यहूदी ला ला कर देते हैं_,”
यह बात सुनकर मालिक बिन सैफ बिगड़ गया और बोल उठा- अल्लाह तआला ने किसी भी इंसान पर कोई चीज नहीं उतारी _,”
★_गोया इस तरह है उसने खुद हजरत मूसा अलैहिस्सलाम पर नाजिल होने वाली किताब तौरात का भी इंकार कर दिया और ऐसा सिर्फ झुंझलाहट की वजह से कहा, दूसरे यहूदी उस पर बिगड़े उन्होंने उससे कहा – यह हमने तुम्हारे बारे में क्या सुना है ? जवाब में उसने कहा- मुहम्मद ने मुझे गुस्सा दिला दिया था बस मैंने गुस्से में यह बात कही थी ।
यहूदियों ने उसकी इस बात को माफ ना किया और उसे सरदारी से हटा दिया उसकी जगह काब बिन अशरफ को सरदार मुकर्रर किया।
★_अब यहूदियों ने हुजूर अकरम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम को तंग करना शुरू कर दिया ऐसे सवालात पूछने की कोशिश करने लगे जिनके जवाबात उनके ख्याल में आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ना दे सकेंगे । मसलन एक रोज उन्होंने पूछा :- एे मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम ) आप हमें बताएं रूह क्या चीज है? आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने इस सवाल के बारे में वही का इंतजार फरमाया, जब वही नाजिल हुई तो आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया :- रूह मेरे रब के हुक्म से बनी है_,”
यानी आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने कुरान ए करीम की यह आयत पढ़ी –
(तर्जुमा )..और यह लोग आपसे रूह के मुताल्लिक पूछते हैं ,आप फरमा कि रूह मेरे रब के हुक्म से बनी है _,” *(सूरह बनी इसराईल -८५)*
निराली शान का मालिक
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★फिर उन्होंने कयामत के बारे में पूछा कि कब आएगी ,आप सल्लल्लाहु अलेह वसल्लम ने जवाब में इरशाद फरमाया :- इसका इल्म मेरे रब के पास है.. उसके वक्त को अल्लाह के सिवा कोई और जाहिर नहीं करेगा _,” *(सूरह अल आराफ )*
इस तरह 2 यहूदी आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के पास आए और पूछा आप बताएं अल्लाह तआला ने मूसा अलैहिस्सलाम की क़ौम को किन बातों की ताकीद फरमाई थी , जवाब में आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया :- यह कि अल्लाह के साथ किसी को शरीक ना ठहरावो, बदकारी ना करो और हक के सिवा (यानी शरई कानून के सिवा ) किसी ऐसे शख्स की जान ना लो जिसको अल्लाह तआला ने तुम पर हराम किया है, चोरी मत करो , सहर और जादू टोना करके किसी को नुकसान ना पहुंचाओ, किसी बादशाह और हाकिम के पास किसी की चुगल खोरी ना करो, सूद का माल ना खाओ, घरों में बैठने वाली( पाक दामन) औरतों पर बोहतान ना बांधों और ऐ यहूदियों तुम पर खास तौर पर यह बात लाज़िम है कि हफ्ते के दिन किसी पर ज्यादती ना करो इसलिए कि यहूदियों का मुतबर्रक दिन है।
यह हिदायत सुनकर दोनों यहूदी बोले हम गवाही देते है कि आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम नबी हैं ।
इस पर आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया तब फिर तुम मुसलमान क्यों नहीं हो जाते?
उन्होंने जवाब दिया- हमें डर है हम अगर मुसलमान हो गए तो यहूदी हमें क़त्ल कर डालेंगे।
: ★_ दो यहूदी आलिम मुल्के शाम में रहते थे उन्हें अभी नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के ज़हूर की खबर नहीं हुई थी । दोनों एक मर्तबा मदीना मुनव्वरा आए मदीना मुनव्वरा को देखकर एक दूसरे से कहने लगे- यह शहर उस नबी के शहर से कितना मिलता-जुलता है जो आखरी ज़माने में ज़ाहिर होने वाले हैं_,” इसके कुछ देर के बाद उन्हें पता चला कि आन हजरत सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम का ज़हूर हो चुका है और आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम मक्का मुअज़्ज़मा से हिजरत करके इस शहरे मदीना में आ चुके हैं । यह खबर मिलने पर दोनों आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम की खिदमत में हाज़िर हो गए। उन्होंने कहा -हम आपसे एक सवाल पूछना चाहते हैं अगर आपने जवाब दे दिया तो हम आप पर ईमान ले आएंगे ।
आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया- पूछो क्या पूछना चाहते हो
★_उन्होंने कहा हमें अल्लाह की किताब में से सबसे बड़ी गवाही और शहादत के मुताल्लिक बताएं, उनके सवाल पर सूरह आले इमरान की आयत 19 नाजि़ल हुई ,वो आप सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम ने उनके सामने तिलावत फरमाई :-
( तर्जुमा)_
अल्लाह ने इसकी गवाही दी है कि सिवाय उसकी जात के कोई माबूद होने के लायक़ नहीं और फरिश्तों ने भी और अहले इल्म ने भी गवाही दी है और वह इस शान के मालिक हैं की एतदाल के साथ इंतजाम को क़ायम रखने वाले हैं ,उनके सिवा कोई माबूद होने के लायक़ नहीं, वह जबरदस्त हैं, हिकमत वाले हैं, बिना शुबा दीने हक़ और मक़बूल अल्लाह तआला के नज़दीक सिर्फ इस्लाम है ।
★_यह आयत सुनकर दोनों यहूदी इस्लाम ले आए। इसी तरह यहूदियों के एक और बहुत बड़े आलिम थे उनका नाम हुसैन बिन सलाम था, यह हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम की औलाद में से थे ,इनका ताल्लुक क़बीला बनी क़ीनका से था । जिस रोज़ आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम हिजरत करके हजरत अबू अयूब अंसारी रजियल्लाहु अन्हु के घर में रिहाइश पज़ीर हुए, यह उसी रोज़ आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम की खिदमत में हाजिर हो गए । जोंही इन्होंने आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम का चेहरा मुबारक देखा फौरन समझ गए कि यह चेहरा किसी झूठे का नहीं हो सकता। फिर जब इन्होंने आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम का कलाम सुना तो फौरन पुकार उठे :- मैं गवाही देता हूं कि आप सच्चे हैं और सच्चाई लेकर आए हैं_,”
★_ फिर इनका इस्लामी नाम आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने अब्दुल्लाह बिन सलाम रखा। इस्लाम कुबूल करने के बाद यह अपने घर गए अपने इस्लाम लाने की तफसील घरवालों को सुनाई तो वो भी इस्लाम ले आए।
: ★_ चंद यहूदियों ने आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम से सवाल पूछा -,आप यह बताएं ,उस वक्त लोग कहां होंगे जब क़यामत के दिन ज़मीन और आसमान की शक्लें तब्दील हो जाएंगी _,”
इस पर आन हजरत सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने जवाब दिया :- “_उस वक्त लोग पुल सिरात के करीब अंधेरे में होंगे_
★_इसी तरह एक मर्तबा यहूदियों ने हुजूर सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम से बादलों की गरज और कड़क के बारे में पूछा । जवाब में आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया :-
“_ यह फरिश्ते की आवाज़ है जो बादल का निगरां है उसके हाथ में आग का एक कोड़ा है इससे वह बादलों को हांकता हुआ उस तरफ ले जाता है जहां पहुंचाने के लिए अल्लाह ताला का हुक्म होता है_,”
★_ उन यहूदियों ही में से एक गिरोह मुनाफिकीन का था ।यह बात ज़रा वजाहत से समझ लें, मदीना मुनव्वरा में जब इस्लाम को उरूज हासिल हुआ तो यहूदियों का इक्तीदार खत्म हो गया , बहुत से यहूदी इस ख्याल से मुसलमान हो गए कि अब उनकी जान खतरे में है सिवाय अपनी जान बचाने के लिए वह झूठ मुठ के मुसलमान हो गए। अब अगरचे कहने का वह मुसलमान थे लेकिन उनकी हमदर्दियां और मोहब्बतें अब भी यहूदियों के साथ थी। ज़ाहिर में मुसलमान थे अंदर से वही यहूदी थे । इन लोगों को अल्लाह और उसके रसूल ने मुनाफिक क़रार दिया है , इनकी तादाद 300 के क़रीब थी ।
इन्ही मुनाफ़िक़ों में अब्दुल्लाह इब्ने उब’ई था, यह मुनाफ़िक़ों का सरदार था , यह मुनाफिक़ीन हमेशा इस ताक में रहते थे कि कब और किस तरह मुसलमानों को नुक़सान पहुंचा सके, मुसलमानों को परेशान करने और नुक़सान पहुंचाने का कोई मौक़ा हाथ से जाने नहीं देते थे।











