SERMON 134

ومن كلام له (عليه السلام)
وقد وقعت مشاجرة بينه وبين عثمان، فقال المغيرة بن الاخنس لعثمان: أنا أكِفيكَه، فقال أميرالمؤمنين صلوات الله عليه للمغيرة

يَابْنَ اللَّعِينِ الاَْبْتَرِ ، وَالشَّجَرَةِ الَّتي لاَ أَصْلَ لَهَا وَلاَ فَرْعَ، أَنْتَ تَكْفِينِي، فَوَاللهِ مَاأَعَزَّ اللهُ مَنْ أَنْتَ نَاصِرُهُ، وَلاَ قَامَ مَنْ أَنْتَ مُنْهِضُه، اخْرُجْ عَنَّا أَبْعَدَ اللهُ نَوَاكَ ، ثُمَّ ابْلُغْ جَهْدَك، فَلاَ أَبْقَى اللهُ عَلَيْكَ إِنْ أَبْقَيْتَ!

 
SERMON 134
There was some exchange of words between `Uthman ibn `Affan and Amir al-mu’minin when al-Mughirah ibn al-Akhnas (1) said to `Uthman that he would deal with Amir al-mu’minin on his behalf whereupon Amir al-mu’minin said to al-Mughirah: 

O’ son of the accursed and issueless, and of a tree which has neither root nor branch. Will you deal with me? By Allah, Allah will not grant victory to him whom you support, nor will he be able to stand up whom you raise. 

Get away from us. Allah may keep you away from your purpose. Then do whatever you like. Allah may not have mercy on you if you have pity on me.
(1). al-Mughirah ibn al-Akhnas ath-Thaqafi was among the wellwishers of `Uthman ibn `Affan and the son of his paternal aunt. His brother Abu’l Hakam ibn al-Akhnas was killed at the hands of Amir al-mu’minin in the battle of Uhud, because of which he bore malice against Amir al-mu’minin. His father was one of those people who accepted Islam at the time of the fall of Mecca but retained heresy and hypocrisy in heart.
 

That is why Amir al-mu’minin called him accursed, and he called him issueless because he who has a son like al-Mughirah deserves to be called issueless.

BUZURGON KI DUA

🌺Ek Haakim Jiska Naam Bin Umru Lais Tha, Bimaar Pad Gaya! Aisa Bimaar Hua Ki Tabib (Doctor) Uske Ilaaj Se Thak Gaye Magar Wo Accha Na Hosaka!
🌺Aakhir Kisine Kaha Ki Dawa Ki To Inteha Hogayi! Ab Kisi Mustajabudh-Dawaat (Jiski Dua Kabul Hoti Ho) Se Dua Karayi Jaye!
🌺Chunanche, Sabne Hazrat Sahal Rehmatullah Alaihi Ka Naam Liya Ki Wo Bade Bujurg Aur *ALLAH* Ke Wali Hain! Unse Dua Ki Darkhwast Ki Jaye!
🌺Chunanche, Aapko Bulaya Gaya! Aap *ALLAH* Ke Farmaan (Aur Ita-at Karo Apne Baadshah Ki) Ke Mutabik Tashrif Legaye! Jab Mariz Ke Paas Baithe, Usse Farmaya Ki Dua Aise Shaks Ke Haq May Kabul Hoti Hain Jo Sacche Dil Se Tauba Karen! Khuda Ki Janib Ruju Kare Aur Aye amr! Tere Qaid-Khane May Bohatse Be-Gunah Qaidi Bhi Hain! Pehle Un Sab Qaidi Ko Riha Ker Aur Tauba Ker! Fir Main Dua Karta Hoon!
🌺Amr Ibne Lais Ne Aisa Hi Kiya! Qaidiyon Ki Rihayi Ka Hukm Diya Aur Tauba Ki! Fir Hazrat Sahal Ne Hath Uthaya Aur Kaha:

🌹 *Aye Khudawandh! Tune Apni Nafarmani Ki Zillat Isko Dikhayi! Isi Tarah Apni Ita-at Ki Izzat Bhi Isko Dikhla De Aur Jis Tarah Ki Tune Iske Baatin Ko Libaas-A-Tauba Pehnaya! Usi Tarah Iske Zaahir Ko Libaas-A-Aafiyat Bhi Pehna De* !🌹

🌺Aap Yeh Dua Ker Hi Rahe The Ki Amr Ibne Lais Bilkul Accha Hogaya! Amr Ibne Lais Ne Aapko Bohatsa Maal Nazar Dene Laga Magar Aapne Inkaar Kerdiya!

(Tazkiratul Auliya, Pg-312)

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☘ *SABAK* ☘
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🌼Jahan Dawa Ki Inteha Ho Wahan Dua Ki Ibtida Hoti Hain!
🌼Yeh Bhi Malum Hua Ki Buzurgon Ki Duaon Se Badal Jati Hain Takdiren!
🌼Yeh Bhi Malum Hua Ki Dua Ki Kabuliyat Keliye Jahan Dua Maangne Wala Mustajabudh-Dawaat Hona Chahiye Wahan Wo Shaks Jiske Liye Dua Ki Jaye Use Bhi Apne Gunahon Se Sacche Dilse Tauba Kerleni Chahiye! Jab Dono Taraf Se Yeh Pakizgi Aur Iffath Payi Jaye To Dua Bohatt Jald Suni Jayegi!
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Hadith 18 Zilhajj ko Roza rakhne ki zabardast Fazilat

18 Zilhajj ko Roza rakhne ki zabardast Fazilat!

Hazrat Abu Huraira RadiAllahu Anhu se riwayat hai ke jisne 18 Zil Hijja ko Roza rakha uske liye 60 mahino ke rozo ka sawaab likha jaega, aur ye Gadeer-e-Khum ka din tha jab Huzoor Nabi-e-Akram SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ne Hazrat Ali Alaihissalam ka Haath pakadkar farmaya: Kya Mai momino ka Wali nahi hun? Unhone arz kiya: Kyon nahi, Ya RasoolAllah! Aap SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallamne farmaya: Jiska Mai Maula Hun uska Ali Maula Hai. Is par Hazrat Umar ibne Khattab RadiAllahu Anhu ne farmaya: Mubarak ho! Ay Ibne Abi Talib! Aap Mere aur har musalman ke Maula tehre. (Is mauqa par) Allah Ta’ala ne ye Aayat Naazil farmayi: “Aaj Maine Tumhare Liye Tumhara Deen Mukammal Kardiya.”

Tabrani, Mujam al Awsat, 3/324, Khatib Baghdadi, Tarikh-e-Baghdad, 8/290 Ibne Asakir, Tarikh e Damishq al Kabir, 45/176, 177 Ibne Kaseer, Bidaya wan Nihaya, 5/464 Raazi, Tafseer Kabir, 11/139 Dr. Tahir-ul-Qadri, Kanzul Mattalib fee Manaqib Ali ibne Abi Talib Alaihi-Mussalam As Sayful Jali ala munkir-e-Wilayat e Ali Alaihissalam Allahumma Salle Ala Sayyedina wa Maulana Muhammadi Nin Nabiyyil Ummiyyil Habibil Aalil Qadril Azeemil Jaahi wa Ala Aalihi wa Sahbihi wa Baarik wa Sallim.

हज़रत जुलैबीब की शादी

हज़रत जुलैबीब की शादी

हज़रत जुलैबीब को शादी कहते है एक मिसाली शादी थी हज़रत जुलैबीब जितना बदसूरत थे और उनकी बीवी मदीना कि सबसे खूबसूरत औरत थी, ये शादी तक्वा और ईमान की बुनियाद पर थी, हमारे समाज को इससे सबक लेना चाहिए, और अल्लाह के रसूल ﷺ के बताए हुए उसूल के तहत की शादियां करनी चाहिए

आज आपको हज़रत जुलैबीब का किस्सा सुनाता जो शक्ल से बदसूरत , कद से नाटे और खानदान का पता नहीं उनका शुमार एक गुलाम से होता था , रंग के सांवले थे, मदीना के लोग अच्छी नजर से ना देखते थे जरिया ए मुआश का भी कोई बंदोबस्त नहीं था, आखिर कौन लड़की इनसे शादी करती और कौन मां बाप आपको अपनी बेटी का हाथ आपको देती,

लेकिन अल्लाह के रसूल ﷺ की मुहब्बत से सरशार थे- भूख की हालत में फटे पुराने कपड़े पहने अल्लाह के रसूल की खिदमत में हाज़िर होते,इल्म सीखते और सोहबत से फैज़याब होते-

एक दिन अल्लाह के रसूल ﷺ ने शफक़त की नज़र से देखा और इरशाद फ़रमाया:
’یَا جُلَیْبِیبُ! أَلَا تَتَزَوَّجُ؟‘

“जुलैबीब तुम शादी नहीं करोगे?”

जुलैबीब رضی اللہ تعالیٰ عنہ ने अर्ज़ किया:

“अल्लाह के रसूल ! मुझ जैसे आदमी से भला कौन शादी करेगा ?”

अल्लाह के रसूल ﷺ ने फिर फ़रमाया:

“जुलैबीब तुम शादी नहीं करोगे?”

और वो जवाबन अर्ज़ गुज़ार हुए कि अल्लाह के रसूल ! भला मुझ से शादी कौन करेगा? ना माल ना जाहो जलाल!!
अल्लाह के रसूल ﷺ ने तीसरी मर्तबा इरशाद फ़रमाया:

“जुलैबीब तुम शादी नहीं करोगे ?”

जवाब में उन्होंने फिर वही कहा:

“अल्लाह के रसूल ! मुझ से शादी कौन करेगा? कोई मनसब नहीं,मेरी शक्ल भी अच्छी नहीं और ना मालो दौलत रखता हूं-”

अल्लाह के रसूल ﷺ को आपकी फिक्र थी,

एक दिन अल्लाह के रसूल ﷺ एक अंसारी के घर गए और उस अंसारी सहाबी से कहा :- क्या तुम अपनी बेटी का हाथ मुझे देना पसंद करोगे ??

अंसारी ने जवाब दिया :- मेरे मां बाप आप पर कुर्बान ! क्यूं नहीं या रसूल अल्लाह, ये तो हमारे लिए बहुत ही इज्जत की बात है,

अल्लाह के रसूल ﷺ ने कहा :- मैं अपने लिए नहीं बल्कि जुलैबीब के लिए हाथ मांग रहा हूं !!

अंसारी सहाबी एक दम चौक गए, और सोच में पड़ गए की अब क्या किया जाए, अंसारी सहाबी ने कहा :- मैं इस बारे ने अपनी अहलिया से मशवरा कर लूं,

अंसारी सहाबी ने अपनी अहलिया को बताया कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने हमारी बेटी का हाथ मांगा है,

उसकी बीवी बहुत खुश हुई लेकिन जब अंसारी सहाबी ने बताया कि वो अपने लिए नहीं बल्कि जुलैबीब के लिए मांग रहे हैं, तो वो कहने लगी :

“ना,ना,ना,ना,…. क़सम अल्लाह की ! मैं अपनी बेटी की शादी ऐसे शख्स से नहीं करूंगी,ना खानदान,ना शोहरत,ना मालो दौलत,”

उनकी नेक सीरत बेटी भी घर में होने वाली गुफ्तगूं सुन रही थी और जान गई थी कि हुक्म किसका है? किसने मशवरा दिया है ? सोचने लगी अगर अल्लाह के रसूल इस रिश्तेदारी पर राज़ी हैं तो इसमें यक़ीनन मेरे लिए भलाई और फायदा है-”

उसने वालिदैन की तरफ देखा और मुखातिब हुई:

’أَتَرُدُّونَ عَلٰی رَسُولِ اللّٰہِﷺ أَمْرَہٗ؟ ادْفَعُونِی إِلٰی رَسُولِ اللّٰہِ’ﷺ فَإِنَّہُ لَنْ یُضَیِّعَنِی‘۔

” क्या आप लोग अल्लाह के रसूल का हुक्म टालने की कोशिश में हैं ? मुझे अल्लाह के रसूल के सुपुर्द कर दें-”
(वो अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ जहां चाहें मेरी शादी कर दें)
क्यूंकि वो हरगिज़ मुझे ज़ाया नहीं होने देंगे-

फिर लड़की ने अल्लाह तआला के इस फरमान की तिलावत की:

“और देखो ! किसी मोमिन मर्द व औरत को अल्लाह और उसके रसूल के फैसले के बाद अपने उमूर में कोई इख्तियार बाक़ी नहीं रहता-”

(الأحزاب33: 36)

लड़की का वालिद अल्लाह के रसूल की खिदमत में हाज़िर
हुआ और अर्ज़ किया:

“अल्लाह के रसूल ! आपका हुक्म सर आंखों पर,आपका मशवरा,आपके हुक्म क़ुबूल, मैं शादी के लिए राज़ी हूं-”

जब रसूले अकरम ﷺ को उस लड़की के पाकीज़ा जवाब की खबर हुई तो आपने उसके हक़ में ये दुआ फरमाई:

’اللَّھُمَّ صُبَّ الخَیْرَ عَلَیْھَا صُبًّا وَلَا تَجْعَلْ عَیْشَھَا کَدًّا۔‘

” ऐ अल्लाह ! इस बच्ची पर खैर और भलाई के दरवाज़े खोल दे और इसकी ज़िंदगी को मशक़्क़त व परेशानी से दूर रख-”

(موارد الظمآن: 2269، و مسند احمد ١١٦٦٦ 6857، ومجمع الزوائد: 370/9وغیرہ)

फिर जुलैबीब के साथ उसकी शादी हो गई महर और घर के ज़रूरी समान का बंदोबस्त हज़रत उस्मान ने किया, मदीना मुनव्वरा में एक और घर आबाद हो गया,जिसकी बुनियाद तक़वा और परहेज़गारी पर थी,जिसकी छत मिस्किनत और मुहताजी थी,जिसकी आराइश व ज़ेबाइश तकबीरो तहलील और तस्बीहो तम्हीद थी- इस मुबारक जोड़े की राहत नमाज़ और दिल का इत्मिनान तपती दोपहर के नफ्ली रोज़ों में था-
रसूलुल्लाह ﷺ की दुआ की बरकत से ये शादी खाना आबादी बड़ी ही बरकत वाली साबित हुई- थोड़े ही अरसे में उनके माली हालात इस क़द्र अच्छे हो गए कि रावी का बयान है:

’فَکَانَتْ مِنْ أَکْثَرِ الأَْنْصَارِ نَفَقَۃً وَّمَالًا‘

“अंसारी घरानों की औरतों में सबसे खर्चीला घराना उसी लड़की का था-

एक जंग में अल्लाह तआला ने मुसलमानों को फतह नसीब फरमाई- रसूल ए अकरम ﷺ ने अपने सहाबा ए किराम से दरयाफ्त

फरमाया:
’ھَلْ تَفْقِدُونَ مِنْ أَحَدٍ؟‘

“देखो ! तुम्हारा कोई साथी बिछड़ तो नहीं गया?”
मतलब ये था कि कौन कौन शहीद हो गया है ?

सहाबा ने अर्ज़ किया:

“हां फलां फलां हज़रात मौजूद नहीं हैं-”

फिर इरशाद हुआ:
’ھَلْ تَفْقِدُونَ مِنْ أَحَدٍ؟‘

“क्या तुम किसी और को कम पाते हो?”
सहाबा ने अर्ज़ किया:- “नहीं-”
आपने फ़रमाया:
’لٰکِنِّي أَفْقِدُ جُلَیْبِیبًا فَاطْلُبُوہُ‘

“लेकिन मुझे जुलैबीब नज़र नहीं आ रहा,उसको तलाश करो-”

चुनांचा उनको मैदाने जंग में तलाश किया गया-

वो मंज़र बड़ा अजीब था- मैदाने जंग में उनके इर्द गिर्द सात काफिरों की लाशें थीं गोया वो इन सातों से लड़ते रहे और फिर सातों को जहन्नम रसीद करके शहीद हुए अल्लाह के रसूल को खबर दी गई- रऊफुर्रहीम पैगम्बर ﷺ तशरीफ लाए- अपने प्यारे साथी की लाश के पास खड़े हुए- मंज़र को देखा-फिर फ़रमाया:

’قَتَلَ سَبْعَۃً ثُمَّ قَتَلُوہُ، ھَذَا مِنِّي وَأَنَا مِنْہُ، ھَذَا مِنِّي وَأَنَا مِنْہُ۔‘

“इस ने सात काफिरों को क़त्ल किया, फिर दुश्मनों ने उसे क़त्ल कर दिया- ये मुझसे है और मैं इससे हूं-”

’فَوَضَعَہُ عَلَی سَاعِدَیْہِ لَیْسَ لَہُ إِلَّا سَاعِدَا النَّبِيَّ ﷺ‘۔

“फिर आपने अपने प्यारे साथी को अपने हाथों में उठाया और शान ये थी कि अकेले ही उसको उठाया हुआ था- सिर्फ आपको दोनों बाज़ूओं का सहारा मयस्सर था-”

जुलैबीब رضی اللہ تعالیٰ عنہ के लिए क़ब्र खोदी गई, फिर नबी ﷺ ने अपने दस्ते मुबारक से उन्हे क़ब्र में रखा…!!!

सही मुस्लिम हदीस 6358

इस वाक्ए से बहुत सी बातें सामने आती है पहली जब लडके के दीनी मामलात अच्छे हो तब उससे निकाह के लिए माल – दौलत , खूबसूरती , जात बिरादरी नहीं देखी जाती, और ये भी नहीं देखा जाता की उसका जरिया ए मूआश है या नहीं,

दूसरी अहम बात ये पता चली कि लड़की की पसंद और रजामंदी से ही शादी करनी चाहिए, लड़की का ये ईमान था कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने ये लड़का उनके लिए चुना है तो वो उसके हक में बेहतर ही होगा।
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*शेअर करके सद्का ऐ जारिया रवां करने में हिस्सेदार बनें*
*दुआओं 🤲🏻 में याद रखियेगा*

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