Muharram bayan

SERMON 141

ومن كلام له (عليه السلام)
[المعروف في غير أهله]

وَلَيْسَ لِوَاضِعِ الْمَعْرُوفِ فِي غَيْرِ حَقِّهِ، وَعِنْدَ غَيْرِ أَهْلِهِ، مِنَ الْحَظِّ فِيَما أَتى إِلاَّ مَحْمَدَةُ اللِّئَامِ، وَثَنَاءُ الاَْشْرَارِ، وَمَقَالَةُ الْجُهَّالِ، مَا دَامَ مُنْعِماً عَلَيْهِمْ، مَا أَجْوَدَ يَدَهُ! وَهُوَ عَنْ ذَاتِ اللهِ بَخِيلٌ!

[مواضع المعروف]

فَمَنْ آتَاهُ اللهُ مَالاً فَلْيَصِلْ بِهِ الْقَرَابَةَ، وَلْيُحْسِنْ مِنْهُ الضِّيَافَةَ، وَلْيَفُكَّ بِهِ الاَْسِيرَ وَالْعَانِيَ، وَلْيُعْطِ مَنْهُ الْفَقِيرَ وَالْغَارِمَ ، وَلْيَصْبِرْ نَفْسَهُ عَلَى الْحُقُوقِ وَالنَّوَائِبِ، ابْتِغَاءَ الثَّوَابِ; فَإِنَّ فَوْزاً بِهذِهِ الْخِصَالِ شَرَفُ مَكَارِمِ الدُّنْيَا، وَدَرْكُ فَضَائِلِ الاْخِرَةِ، إِنْ شَاءَ اللهُ.


Against misplaced generosity
He who shows generosity to those who have no claim to it or who are not fit for it would not earn anything except the praise of the ignoble and appreciation of bad persons, although as long s he continues giving, the ignorant will say how generous his hand is, even though in the affairs of Allah he is a miser.
Therefore, to whosoever Allah gives wealth he should use it in extending good behaviour to his kinsmen, in entertaining, in releasing prisoners and the afflicted; in giving to the poor and to debtors, and he should endure (the troubles arising out of) the fulfilment of rights (of others) and hardships in expectation of reward.
Certainly, the achievement of these qualities is the height of greatness in this world and achievement of the distinctions of the next world; if Allah so wills.

हुसैन की शहादत पर फख़्र करते हैं , मरा मानकर नहीं रोते शहीद ज़िंदा थे , ज़िंदा हैं और हमेशा ज़िंदा रहेंगे । अब सवाल है की रोते क्यों हैं हम ??

: हुसैन की शहादत पर फख़्र करते हैं , मरा मानकर नहीं रोते
शहीद ज़िंदा थे , ज़िंदा हैं और हमेशा ज़िंदा रहेंगे ।
अब सवाल है की रोते क्यों हैं हम ??
तो सुनो …..क़त्ल ए हुसैन से
हम औलाद ए सादात यतीम हुए इसलिए रोते हैं ।
सवारी ए दोश ए रसूल का सर काटा इसलिए रोते हैं ।
असग़र से मासूम के गले में तीर तराज़ू कर दिया इसलिए रोते हैं ।
बिन्त ए अली की चादर छीनकर , बाज़ार ए शाम से निकलवाया इसलिए रोते हैं ।
बिन्त ए हुसैन को सताया इसलिए रोते हैं
मुहम्मद रसूलुल्लाह के घराने को क़ैदी बनाया इसलिए रोते हैं ।
रुबाब , शहरबानो , जै़नब के बेटों को कुर्बान कर दिया , उन माँओं के दर्द को महसूस करके रोते हैं ।
उम्मुल मोमिनीन अम्मा सलमा के आँसुओं को याद करके रोते हैं ।
फातिमा बिन्त ए हुसैन की इंतिजा़री को याद करके रोते हैं ।
अली असग़र की मुस्कुराहट को याद करके रोते हैं ।
क़ासिम बिन हसन की मुहब्बत को याद करके रोते हैं ।
अली अकबर के चेहरे को तसव्वुर करके रोते हैं ।
हुर्र के दिल बदलने की कहानी को याद करके रोते हैं ।
गाजी़ अब्बास की वफा़दारी को याद करके रोते हैं ।
रसूलुल्लाह के नवासे को याद करके रोते हैं
अली फातिमा के दुलारे के जिस्म को पामाल किया इसलिए रोते हैं और हमेशा रोएँगे ।
और फत्वेबाज़ मुल्लों सुनो !
हम अपनी आँखों से रोते हैं , तुम्हारी आँखों से नहीं रोते ।
यजीदियत अपने तक रखो …..
सल्लललाहु अलैहे व आलिही व बारिक वसल्लम
अल्लाहु अकबर कसीरन कसीरा ….तुमने रसूलुल्लाह का खे़मा जलाया इसलिए रोते हैं
कर्बला में रसूलुल्लाह के सिब्त को मारा इसलिए रोते हैं
कर्बला में असग़र का खून बहाया इसलिए रोते हैं
कर्बला में ज़हरा की आल को मारा इसलिए रोते हैं ।
कर्बला में मुबाहला की आयत के हुसैन को मारा इसलिए रोते हैं
कर्बला में ततहीर की आयत की ताहिरा की बेटी की चादर छीनी इसलिए रोते हैं
कर्बला में मवद्दत की आयत बेच डाली इसलिए रोते हैं
कर्बला में जन्नत के सरदार को मारा इसलिए रोते हैं
कर्बला में वसी ए रसूल को मारा इसलिए रोते हैं
कर्बला में विलायत के हक़दार को मारा इसलिए रोते हैं
कर्बला में हैदर के हैदर को मारा इसलिए रोते हैं
कर्बला में फातिमा का गुलशन उजाडा़ इसलिए रोते हैं
कर्बला में मेहराब की जी़नत को छीना इसलिए रोते हैं
कर्बला में मिम्बर की तहजी़ब को मारा इसलिए रोते हैं
कर्बला में काबा के मुहाफि़ज को मारा इसलिए रोते हैं
कर्बला में दीन के मुजा़हिद को मारा इसलिए रोते हैं
कर्बला में खिलाफ़त के हक़दार को मारा इसलिए रोते हैं
कर्बला में वक्त के इमाम को मारा इसलिए रोते हैं
कर्बला में खुदा के हुसैन को मारा इसलिए रोते हैं …..
शहीद ज़िंदा हैं का मतलब ये नहीं होता की शहीदों को दर्द नहीं होता
शहीद ज़िंदा हैं का मतलब ये नहीं होता की उनके बच्चे यतीम नहीं होते
शहीद ज़िंदा हैं का मतलब ये नहीं होता की उनकी जौजा़ का प्यार नहीं उजड़ता
शहीद जिंदा हैं का मतलब ये नहीं होता की उनका घरबार नहीं उजड़ता ।
शहीद ज़िंदा हैं का मतलब ये नहीं होता की किसी दीनदार को बेख़ता मार दो और फिर गधों की तरह दलील दो की क़ुरान में लिखा है शहीद जिंदा हैं यानी किसी ने कोई क़त्ल ही नहीं किया है ।
शहीद ज़िंदा हैं ये हक़ है लेकिन इसका मतलब ये नहीं की दुनिया ने एक इमाम को मारा नहीं ।
अल्लाह हुम्मा सल्ले अला मुहम्मद व आले मुहम्मद ।।
या हुसैन ।।Wakiya e karbala k bad arab me muharram ka chand dekhne ki logo jarurat nahi hoti thi jyo hi muarram ka chand najar aata ahlebait e athar k gharo is tarah jaro katar rone ki aawaze aati k log samajh jate k muharram ka chand najar aa gaya h
Imam jainul abedin se kisi ne pucha aap her waqt hi rote rahte hn is ki kya wajah h to farmate hn yusuf a.s. sirf kho jane per unke walid is tarah roye ki inki aankho ki binai hi chali gai mere to sare yusuf meri ankho k samne saheed kar diye gaye mai kese nahi rouJab imam jainul abedin bajar jate to kasab gost k uper kapada dal dete the taki un ko khoon najar nahi aaye
Imam jainul abedin kasab se puchte se puchte the ki ki kya tune is janwar ko pani pilaya tha katne se pahle to kasab kahta ha mene isko pani pilaya tha aap ne kaha karbala me mere baba ko pani bhi nahi pilaya yo hi saheed kar diya itna kah jao katar rote the.
Hujur s.a.w apne chacha hamja ki shahadat ke gam puri jindagi na bhula sake unka katil jab le aaya tab bhi hujur ne farmaya tum mere samne mat aaya karo tujhe dekh kar mujhe mere chacha ka gam taja ho jata h
Socho agar chacha ka itna gam tha to nawase or unke khandan ki shahadat ka gam kitna bada hua hoga hame bhi chahiye is mahine me khas kar 10 din to apne aap ko gamgeen aise rakhe jese hamare karib tar logo k sath aisa wakiya pesh aaya ho inki mohabbat ka nam hi iman h aisa koi kam na kare jis me gam e Hussain a.s samil na hoBas ya Hussain a.s

HadithTabrani, Mujam al awsat, 2/348 2191

Sahaba ne arz kiya: *”Ya RasoolAllah! Aapki Muhabbat ki Alamat kya hai?” To Huzoor Nabi-e-Akram SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ne Apna Dast-e-Aqdas Hazrat Ali ke Kandhe par maara!*
(Yaani YE Meri Muhabbat ki Alamat hai. Isse Muhabbat hai to samjhlo ke Mujhse bhi Muhabbat hai warna bus jhoota dawa hai!)

SallAllahu Alaihi wa Ala Aalihi wa Sahbihi wa Baarik wa Sallim

*Tabrani, Mujam al* *Awsat, 2/348,* *Hadees 2191*
*Haysami, Majma uz Zawaid, 10/346*

*Ghayat-ul-Ijabah fee Manaqibil Qarabah,/68, 69, Hadees 61*