Hadith Kamil az Ziyarat pg 58

HOLY PROPHET (S.A.W.W.)
Agar Koi Shakhs IMAM HASAN (A.S. ) Aur IMAM HUSAIN (A.S.) Se Nafrat Karta Hai Usse Meri Shafaat Nahi Milegee.
📚(Kamil az Ziyarat pg 58)

SALWAT

Allahummal-A’n Qatalatal H’usayn
Wa Awlaadihee Wa As’H’aabihee

Mein Tumhare Darmiyan Aisi ChizeinHadith

Hazrat Jabir Bin Abdullah RadiyAllahu Ta’ala Anhuma Farmate Hain Ki Mein Ne Suna Huzoor Nabi-E-Akram SallAllahu Ta’ala Alayhi Wa Aalihi Wa Sallam Farma Rahe They :
Aye Logon!
Mein Tumhare Darmiyan Aisi Chizein Chhod Raha Hoo’n Ki Agar Tum Unhein Pakade Rakhonge To Harghiz Gumraah Na Honge.
(Un Me Se Aik) Allah Ta’ala Kee Kitab Aur (Dusari Chiz) Mere Ghar Waale Hain.”
Ise Imam Tirmidhi Ne Riwayat Kiya Aur Hasan Qaraar Diya Hai.

[Tirmidhi Fi As-Sunan, 05/662, Raqam-3786,
Tabarani Fi Al-Mu’jam-ul-Awsat, 05/89, Raqam-4757, &
Tabarani Fi Al-Mu’jam-ul-Kabir, 03/66, Raqam-2680,
Ibn Kathir Fi Tafsir-ul-Qur’an Al-Azim, 04/114,
Ghayat-ul-Ijabah Fi Manaqib-il-Qarabah, /47, Raqam-31.]
SYED FAZLE MOIN CHISHTY GADDI NASHEEN AJMER SHARIF

इमाम हुसैन (Alaihissalam) के क़त्ल में शामिल प्रमुख लोग और उनका हसब नसब

• यज़ीद इब्ने माविया इब्ने अबु सूफियान। मां मैसून इब्ने बहदल सीरिया के कल्ब बद्दू क़बीले से थी और ईसाई थी।(H.U. Rahman, A Chronology Of Islamic History 570-1000 CE (1999), p. 72)। इसका दादा अबू सूफियान नबी सअ ने ख़िलाफ उहद और ख़ंदक की लड़ाई में मुशरिकों का सरदार जिसने फतह मक्का के वक़्त माफी मांगी (Donner, Fred M. (1981). The Early Islamic Conquests )। दादी हिंदा ने उहद की जंग में नबी सअ के चचा हज़रत हमज़ा का कलेजा चबाया (Ibn Ishaq/Guillaume p. 371.), और उनके नाक कान काट कर अपने गले में हार बना कर पहन लिए।(Ibn Ishaq/Guillaume p. 375. — The Life of Muhammad, Oxford University Press, 1955

• मरवान इब्ने हाकम इब्ने अबु अल आस इब्ने उमैया। (Kennedy, Hugh N. (2016). The Prophet and the Age of the Caliphates: The Islamic Near East from the 6th to the 11th Century (Third ed.). Oxford and New York: Routledge.) हज़रत उस्मान रअ के दौरे ख़िलाफत में उनका प्रमुख सलाहकार और मदीना का गवर्नर रहा।(Kennedy 2016, p. 79.) कर्बला के तीन साल बाद यानि 64 हिजरी में उमया वंश का चौथा ख़लीफा बना। हालांकि रसूल अस ने मरवान और हाकम को तड़ीपार किया था। हज़रत उस्मान रअ के ज़माने में माफी मांगकर मदीने वापस लौटा। मदीना से इमाम हुसैन से यज़ीद बैयत लेने के लिए तत्कालीन गवर्नर वलीद इब्ने उत्बा पर दबाव बनाया। (Ibn Qutayba al-Dīnawarī, al-Imāma wa l-sīyāsa, vol. 1, p. 227.)

• वलीद इब्ने उत्बा इब्ने राबिया। इसकी बहन हिंद बिंते उत्बा अबु सूफियान की पत्नी और माविया की मां थी। 61 हिजरी में मदीना में यज़ीद का गवर्नर।(The Encyclopaedia of Islam, New Edition, Volume III: H–Iram. Leiden: E. J. Brill. pp. 607–615.) इमाम हुसैन अस से मदीना में बैयत लेने की ज़िम्मेदारी दी गई लेकिन कामयाब न हो पाया।( The History of al-Ṭabarī, Volume 19: The Caliphate of Yazīd ibn Muʿāwiyah, A.D. 680–683/A.H. 60–64)

• उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद इब्ने अबु सूफियान ( चूकि ज़ियाद इब्ने अबु सूफियान और मरजाना की आधिकारिक शादी नहीं हुई थी इसलिए अक्सर मां के नाम से से यानि उबैदुल्लाह इब्ने मरजाना के तौर पर भी पहचाना जाता है)।(Robinson, C. F. (2000). “ʿUbayd Allāh b. Ziyād”. In Bearman, P. J.; Bianquis, Th.; Bosworth, C. E.; van Donzel, E. & Heinrichs, W. P. (eds.). The Encyclopaedia of Islam, New Edition, Volume X: T–U. Leiden: E. J. Brill. pp. 763–764.)
इब्ने ज़ियाद बसरा, कूफा और ख़ुरासान प्रांत का गवर्नर रहा। कर्बला की जंग के वक़्त कूफा प्रांत का गवर्नर था और यज़ीद के दिशानिर्देश लागू कराने के लिए ज़िम्मेदार था। कूफा में इमाम हुसैन के चचेरे भाई मुस्लिम इब्ने अक़ील और उनके दो बच्चों की हत्या कराई। उमर इब्ने साद को फरमान भेजकर कहा कि हुसैन या उनके बच्चों तक पानी की एक बूंद न पहुंचने पाए (Tarikh-e-Tabari vol. 6, p. 334)

• अम्र या उमर इब्ने साद इब्ने अब्द वक़ास- कर्बला में यजीद की फौज का कमांडर। इमाम हुसैन पर पहला तीर चलाने वाला। कूफे का निवासी और नबी सअ के प्रमुख सहाबी रहे साद इब्ने अब्द वक़ास का बेटा। जनाब साद इब्ने अब्द वक़ास का नाम अशरा मुबश्शेरा के दस लोगों में है। इनकी मां हामना अबू सूफियान की बेटी थीं। (Short Biography of the Prophet & His Ten Companions. Darussalam. 2004. p. 80.)

• शिम्र इब्ने ज़िलजौशन अबु सबीग़ा अज़ ज़बयानी- कर्बला में 4 हज़ार सिपाहियों का सालार। आख़िरी वक़्त में इमाम हुसैन का सिर क़लम किया। ख़ेमों में आग लगाने और लूटपाट करने वालों में प्रमुख। बनु क़ल्ब क़बीले का था। इब्ने ज़ियाद के लश्कर में शामिल होने से पहले ख़ारजी रहा है। हज़रत हुज्र बिन अदी की गिरफ्तारी के बाद उनके ख़िलाफ गवाही देने वालों में था। इसके बाप शूराहबिल बिन आवर बिन अम्र उन लोगों में थे जिन्होंने फतह-मक्का के वक़्त नबी अस के सामने इस्लाम क़बूल किया।
• हुसैन इब्ने नुमैर या हसीन इब्ने नमीर अल सकुनी- किंदा क़बीले का इब्ने नुमैर सिफ्फीन ती जंग में माविया की फौज में लड़ा। कूफे में रहता था और कर्बला में इब्ने ज़ियादा ने 4 हज़ार सिपाहियों की कमान देकर भेजा।(Lammens & Cremonesi, “Al-Ḥuṣayn ibn Numayr”, (1971), pp. 620–621) जनाबे हुर इब्ने नमीर के लश्कर में थे और आशूरा के दिन इमाम हुसैन के साथ आ गए। कर्बला के बाद इब्ने ज़ुबैर की बग़ावत कुचलने के लिए मक्का और मदीना भेजे गए लश्कर में था। (Tarikh-e-Tabari, circa 63 A.H.) ) कमांडर की मौत के बाद लश्कर का सिपाहसालार हुआ। यहां ख़ाना ए काबा में आग लगाने और मस्जिदे नबवी में घोड़ा बंधवाने के अलावा लूटपाट और अस्मतज़नी का भी गुनहगार है((Murooj-uz-Zahab of Masoodi,Vol 2, Pg 70))। सहाबी ए रसूल सअ है और इससे मंसूब कई हदीस सही बुखारी, तिरमिज़ी, सनान अबु दाउद और इब्ने नसाई में शामिल की गई हैं।

• मुहम्मद बिन अशत बिन क़ैस- अशत बिन क़ैस अल किंदी का बेटा और हज़रत अबु बक्र रअ का सगा भांजा। इमाम हसन अस को ज़हर देने वाली उनकी पत्नी जुदा इब्ने अशत का भाई। कर्बला में 4 हज़ार सिपाहियों का प्रमुख। कूफा का निवासी। कई हदीसों का रावी। हज़रत उमर रअ, हज़रत उस्मान रअ, इब्ने मसूद और उम्मुल मौमिनीन आयशा रअ की हदीस इससे मंसूब हैं (Hayatul Haiwan, Vol. 2, Pg. 48)। इसका भाई मुहम्मद बिन अशत इमाम हुसैन अस को ख़त भेजने वालों और हज़रत मुस्लिम इब्ने अक़ील को गिरफ्तार करने वालों में शामिल।

• शबत इब्ने रबी बिन हुसैन अल तिमीमी अल यरबु- हज़रत उस्मान रअ के क़त्ल में शरीक। बाद में ख़ारिजियों के लश्कर में शामिल फिर माविया की फौज में सिपहसालार। कूफे का निवासी और इमाम हुसैन अस को ख़त लिखने वालों में शामिल। हज़रत हुज्र बिन अदी के ख़िलाफ गवाही देने वालों में नाम। सहाबिए रसूल अस। अबु दाउद और इमान नसाई ने इससे मंसूब कई हदीस अपने सनान में शामिल की हैं।

• समरा इब्ने जुंदाब- सहाबिए रसूल सअ, और समरा का गवर्नर रहा और इब्ने ज़ियाद की सिविल पुलिस का प्रभारी ( Abu’l-ʿAbbas Ahmad b. Jabir al-Baladhuri, KITAB FUTUH AL-BULDAN transl. Francis Clark Murgotten (1924)। इब्ने ज़ियाद ने कूफा से लोगों को इमाम हुसैन के ख़िलाफ लड़ने के लिए लोगों को भेजने की ज़िम्मेदारी समरा इब्ने जुंदाब को दी।(Waṣâyâ al-ʿUlamâ’ (Beirut: Dâr Ibn Kathîr, 1985)) कई सही हदीसों का रावी है (Al-Istiab fi marifat al-ashab (Cairo: Maktabah Nahdah, 1960), v.1, 197; )

• काब इब्ने जाबिर इब्ने मलिक। कूफा निवासी। इसके पिता जाबिर इब्ने मलिक नबी सअ के प्रमुख सहाबियों में शुमार। काब माविया इब्ने अबु सूफियान के क़रीबियों में शामिल रहा और कर्बला में उमर इब्ने साद के लश्कर में था। जंग में हज़रत बुरैर इब्ने ख़ुज़ैर का क़ातिल (Tarikh-e-Tabari vol. 6, p. 247-248)।

• मुज़ाहिम इब्ने हारिस। कूफा का निवासी। जंग में नाफे इब्ने हिलाल जमाली का क़ातिल 9 (Tarikh-e-Tabari vol 6, p 229)। हज़रत उस्मान रअ का पूर्व सैनिक।

• अम्र बिन हज्जाज अल ज़ुबैदी- कूफा से इमाम हुसैन को ख़त लिखने वालों में शामिल। उमर इब्ने साद के लश्कर में दाईं कमान का प्रभारी। 7 मुहर्रम को 500 सिपाहियों के साथ फरात पर पहरेदारी के लिए नियुक्त। 10 मुहर्रम को लोगों को इमाम हुसैन के ख़िलाफ लड़ने के लिए बार-बार ललकार रहा था। (Tarikh-e-Tabari vol. 6, p. 249)। सहाबिए रसूल सअ। कर्बला से इमाम हुसैन के सहाबियों का सिर नेज़ों पर ले जाने वालों में शामिल।

तीशाऐ ख़लील

तीशाऐ ख़लील
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〽️हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम जब पैदा हुए तो नमरूद का दौर था और बुत परस्ती का बड़ा ज़ोर था। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम एक दिन उन बुत परस्तों से फरमाने लगे की ये तुम्हारी क्या हरकत है की उन मूर्तियों के आगे झुके रहते हो। ये तो परसतिश के लायक नहीं, परसतिश के लायक़ तो सिर्फ़ एक अल्लाह है।

वो लोग बोले- हमारे तो बाप दादा भी इन्हीं मूर्तियों की पूजा करते चले आए हैं मगर आज तुम एक ऐसे आदमी पैदा हो गए हो जो उनकी पूजा से रोकने लगे हो।

आपने फ़रमाया- तुम और तुम्हारे बाप दादा सब गुमराह हैं। हक़ बात यही है जो मैं कहता हूँ की तुम्हारा और ज़मीन व आसमान सबका रब वो है जिसने उन सब को पैदा फ़रमाया और सुन लो! मैं ख़ुदा की कसम खा कर कहता हूँ कि तुम्हारे इन बुतों को मैं समझ लूंगा।

चुनाँचे एक दिन जब की बुत परस्त अपने सालाना मेले पर बाहर जंगल में गए हुए थे। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम उनके बुतख़ाने में तशरीफ़ ले गए और अपने तीशे से सारे बुत तोड़-फोड़ डाले और जो बड़ा बुत था, उसे ना तोड़ा और अपना तीशा उसके कंधे पर रख दिया, उस ख़याल से की बुत परस्त जब यहाँ आएँ तो अपने बुतों का ये हाल देख कर शायद उस बड़े बुत से पूछे की उन छोटे बुतों को ये कौन तोड़ गया है? और ये तीशा तेरे कंधे पर क्यों रखा है? और उन्हें उनका अज्ज़ ज़ाहिर हो और होश में आएँ की ऐसे आजिज़ खुदा नहीं हो सकते।

चुनाँचे जब वो लोग मेले से वापस आए और अपने बुतख़ाने में पहुँचे तो अपने मअबूदों का ये हाल देखकर की कोई इधर टूटा हुआ पड़ा है, किसी का हाथ नहीं तो किसी की नाक सलामत नहीं। किसी की गर्दन नहीं तो किसी
की टाँगें ही ग़ायब हैं। बड़े हैरान हुए और बोले कि किस ज़ालिम ने हमारे उन मअबूदों का ये हशर किया है?

फिर ये ख़बर नमरूद और उसके अमरआ को पहुंची और सरकारी तौर पर उसकी तहक़ीक़ होने लगी तो लोगों ने बताया की इब्राहीम उन बुतों के ख़िलाफ़ बहुत कुछ कहते रहते हैं, ये उन्ही का काम मालूम होता है।

चुनाँचे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को बुलाया गया और आपसे पूछा गया कि ऐ इब्राहीम! क्या तुम ने हमारे खुदाओं के साथ ये काम किया? आपने फ़रमाया- वो बड़ा बुत, जिसके कंधे पर तीशा है उस सूरत में तो ये क़यास किया जा सकता है की ये उसी का काम है तो फिर मुझ से क्या पूछते हो? उसी से पूछ लो ना कि ये काम किस ने किया। वो बोले मगर वो तो बोल नहीं सकते। उस मौके पर हज़रत इब्राहीम जलाल में आ गए और फ़रमाया जब तुम मानते हो की वो बोल नही सकते तो फिर तुफ़ है तुम बे अक़्लों पर और उन बुतों पर जिन को तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो।

(क़ुरआन करीम, पारा-17, रूकू-5)

🌹सबक़ ~

खुदा को छोड़ कर बुतों को पूजना शिर्क है और क़ुरआन में जहाँ मिन दूनिल्लाही यानी “अल्लाह के सिवा” का लफ़्ज़ आया है, वहाँ यही बुत मुराद हैं ना की अम्बिया व औलिया। इसलिए के हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम उन पर “तुफ़” फ़रमा रहे हैं तो अगर उनसे मुराद अम्बिया व औलिया हों तो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ऐसा क्यों फ़रमाते?

📕»» सच्ची हिकायात ⟨हिस्सा अव्वल⟩, पेज: 77-78, हिकायत नंबर- 62
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गिरजे का पादरी

गिरजे का पादरी✨
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शहीदों के सर मुबारक और असीराने करबला ( करबला के कैदी ) को लेकर जब यजीदी लशकर दमिश्क को जाते हुए रात के वक्त एक मंजिल पर पहुंचा ! तो वहां एक बडा मज़बूत गिरजा ( Girja ) नजर आया !

यजीदियो ने सोचा कि रात का वक्त है ! इस गिरजे में रहना अच्छा रहेगा ! गिरजे में एक बूढा पादरी रहता था ! शिमर ने उस पादरी से कहा कि हम लोग रात तुम्हारे गिरजे में गुजारना चाहते हैं !

पादरी ने पूछा कि तुम कौन हो ! ओंर कहां जाओगे ? शिमर ने बताया कि हम इब्ने ज्याद के सिपाही हैं ! एक बागी ओर उसके साथियों के अहल व अयाल को दमिश्क ले जा रहे हैं !

पादरी ने पूछा कि वह सर जिसे तुम बागी का सर बता रहे हौ कहां है ? शिमर ने दिखाया तो ‘ सर को देखकर पादरी पर एक हेबत तारी हो गयी ! और कहने लगा कि तुम्हारे साथ बहुत से आदमी हैं !

और गिरजे में इतनी जगह नहीं ! इसलिये ‘ तुम इन सरो और कैंदियों को तो गिरजे में रखो और खुद बाहर रहो ! शिमर ने इसे गनीमत समझा ! कि सर और कैदी महफूज रहेंगे !’
चुनांचे इमाम हुसैन रजियल्लाहु अन्हु के सर मुबारक को एक संदूक में बंद करके गिरजे की एक कोठरी में और अहले बैत को गिरजे के एक मकान में रखा गया !

आधी रात के वक्त पादरी को कोठरी के रौशनदानो में से कुछ रौशनी नजर आयी ! पादरी ने उठकर देखा तो कोठरी में चारों तरफ़ रौशनी देखी !

– गिरजे का पादरी

फिर थोडी देर बाद देखा कि छत फटी और हज़रत खदीजा रजियल्लाहु तआला अन्हा दूसरी अजवाजे मुन्तिहरात ( हुजूरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की बीवियों ) के साथ और हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तशरीफ़ लाये हैं !

संदूक खोलकर सरे अनवर को देखने लगे ! फिर थोडी देर बाद आवाजे सुनी कि ऐ बुड्ढे पादरी ! झांकना बंद कर कि खातूने जन्नत तशरीफ़ लाती हैं !

पादरी यह आवाज सुनकर बेहोश हो गया ! और फिर जब होश आया तो आंखों पर पर्दा पडा देखा ! मगर यह सुना कि कोई रोते हुए यूं कह रहा है:

अस्सलामु अलैकुम ऐ मज़लूम ! ग़म न कर में दुशमन से तेरा इंतकाम लूंगी ! और खुदा से तेरा इंसाफ़ चाहूंगी !

पादरी फिर बेहोश हो गया ! और फिर होश में आया तो ‘कुछ न पाया !
बेहद मुश्ताक होकर कोठरी का ताला तोड़ कर अंदर गया ! संदूक का ताला तोडा ! और सरे अनवर को निकाल कर मुश्क व गुलाब से धोकर मुसल्ले पर रखा !

सामने हाथ जोडकर खडे होकर अर्ज किया कि ऐ सरदार ! मुझे मालूम हो गया है ! कि आप उनमें से हैं ! जिनका वस्फ़ (तारीफ खूबी) तौरैत व इंजील में मैंने पढा है ! लीजिये गवाह हो जाइये मैं मुसलमान होता हुँ ! चुनांचे पादरी वहीँ कलिमा पढ़कर मुसलमान हो गया !

( तजकिरा सफा 105 )

सबक : अल्लाह तआला की राह में कुरबान होने वाला अवाम व ख्यास होता है ! यह अल्लाह वाले बजाहिर दुनिया से तशरीफ़ ले जाते है ! लेकिन काम उनका बदस्तूर जारी रहता है !

यह भी मालूम हुआ कि इमाम अली मकाम ने विसाल शरीफ़ के बाद भी ईसाईयों को मुसलमान किया ! फिर ” किस ‘कद्र अफ़सोस का मकाम है ! कि उनके नाम लेवा आज़ खुद ही ईसाईयों की सूरत व सीरत अपनाने लगे हैं