नमाज़ ए इश्क़

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यहां हम सूफ़ी मख्दूम यहया मुनीरी रज़ी. के उन तालीमात का ज़िक्र करेंगे, जो आपने अपने खास मुरीद क़ाज़ी शम्सुद्दीन रज़ी. को खत की शक्ल में अता की। दरअस्ल काजी साहब आपकी खि़दमत में हाजिर नहीं हो सकते थे इसलिए आपसे इस तरह से (यानी खतो किताबत के ज़रिए) तालिम की दरख्वास्त की थी। ये भी बुजूर्गों का एक हिकमत भरा अंदाज़ ही है कि काजी साहब के साथ-साथ हम लोगों को भी तालिम मिल रही है। शुक्र है उन सूफ़ीयों, आलिमों और जांनिसारों का जिनके जरिए ये सूफियाना बातें हम तक पहुंच रही है और दुआ है कि ताकयामत इससे लोग फैजयाब होते रहे।

ऐ मेरे दोस्त शम्सुद्दीन! रब तुम्हे हमेशा की नेकबख्ती नसीब करे। सुनो, यूं तो मुरीद का तरीका ये है कि जो भी तालीम दी जाए उस पर साफ दिल से अमल करे और नफ्सानियत से दूर रहे। और नवाफ़िल, तिलावते क़ुरान, ज़िक्र व फ़िक्र करता रहे। लेकिन याद रहे पीर की बगैर इज़ाज़त कोई नफ़ली इबादत दुरूस्त नहीं।

सारी आमाल व इबादतों में नमाज़ की बात ही कुछ और है। इसमें असरार (छिपे हुए भेद) हैं और असरारे-मामलात दर मामलात हैं। वो भी ऐसे कि बयान करना ही मुश्किल है। बुजूर्गों ने कहा है जिसने इस मज़े को चखा नहीं, उसने इसे जाना नहीं।

पांच वक्त क़ी नमाज़ें दरअस्ल शबे मेराज की यादगार हैं। हमारे आक़ा हज़रत मुहम्मद ﷺ ने काबा कौसेन से इस तोहफे को हमारे लिए लाए हैं। देखो इससे कितनी मज़ेदार बात निकलती है। हमारी औकात कुछ भी नहीं और न ही कोई रूतबा है। हमें जिस्मानी मेराज होना तो दूर, इतना दम भी नहीं कि बुराक पर बैठकर सैरे मलकूत के लिए जाएं। तो फिर क्या वजह थी कि इस उम्मत को ये दौलते अज़ीम नसीब हुई। और उस पर हुजूर ﷺ का ये फ़रमाना कि ”नमाज़ मोमीन की मेराज है”।

अब देखो तुम्हें ये मेराज किस तरह नसीब हुई। पहले तुमने तहारत की, पाक साफ कपड़े पहने। फिर धीरे धीरे मस्जिद की तरफ चले और अपने जैसे लोगों के साथ ख़ुदा की बंदगी के लिए खड़े हो गए। फिर हुक्म के मुताबिक नमाज़ अदा की। क्या इतनी आसान है मेराज?

अल्लाह ने नमाज़ में सारे अरकान डाल दिए हैं। तौहीद ऐसे कि नमाज़ अल्लाह की हम्द से शुरू होकर, हुजूर ﷺ पर दरूद पर खत्म होती है। नमाज़ में तुम हुजूर ﷺ की अदाओं की नकल करते हुए ख़ुदा की हम्दो सना करते हो। रोज़ा ऐसे कि रोज़ा में कुछ खाते पीते नहीं है और नमाज़ में भी कुछ खाया पिया नहीं जाता। बल्कि रोज़ा में सोने की चलने फिरने की इज़ाज़त है जबकि नमाज़ में नहीं है। यानि रोज़ा से बढ़कर नमाज़ में रोज़ा होता है।

ज़कात ऐसे कि जब नमाज़ में ये पढ़ा जाता है ”ऐ अल्लाह! तू मुझे बख्श दे और मेरे मां बाप को और मेरे नस्ल को और सारे ईमानवालों को बख्श दे”, तो तुम खुद भी ख़ुदा की रहमत से मालामाल होते हो और लोगों को भी उसमें से बांट रहे होते हो। हज ऐसे कि जिस तरह हज में एहराम व इहलाल है, उसी तरह नमाज़ में तहरीमा व तहलीला है। इसमें जिहाद भी है। जिहाद ऐसे कि नमाज़ की हालत में तुम अपनी नफ्स को मार कर पहुंचते हो। तुमने वजू किया गोया जिरह पहन ली, सफ़ में खड़े हुए गोया लश्कर में खड़े हुए और सब लोग इमाम यानि सेनापती की अगुवाई में जंग छेड़ दी है। अपने दुश्मन यानि नफ्स के खिलाफ़।

नतीजा ये हुआ कि जिस मोमीनीन व मुख्लिसीन ने नमाज़ अदा की, उसने जकात भी अदा की चाहे उसकी हैसियत हो न हो, उसने हज भी किया चाहे उसके लायक हो न हो, उसने रोजा भी रखा चाहे ताकत हो न हो। इससे समझ में आता है कि नमाज़ क्या चीज़ है और इसमें कितने राज़ छिपे हुए हैं।

इसलिए इसमें अदब रखना बेहद ज़रूरी है। हरग़िज़ हरग़िज़ बेबाकी या बेअदबी से इसकी जगह में कदम भी न रखें। ये जान लो कि पैगम्बरों व बड़े बड़े ख़ुदा-रसीदा बंदों की उम्र बसर हो गई इस आरजू में कि किस तरह मेराजे कमाल तक पहुंचे। कुछ किसी तरह पहुंचे तो कुछ खाली ही रहे। दिलो जान से अदा की गई सत्रह रकात में अट्ठारह हजार आलम की मिल्कियत छिपी हुई है।

जब नमाज़ और नियाज़ एक हो जाती है तो बंदा हालते तफर्रका से निकल कर नूरे नमाज़ मकामे जमा पर पहुंचता है। अब उसकी ये हालत होती है कि बदन काबा के सामने होता है, दिल बराबर अर्शे आला होता है और उसका लतिफा-ए-सिर्र, मुशाहेदा-ए-रब में डूबा हुआ होता है। साहिबे शरह ने ऐसे लोगों की कुछ इस तरह तारीफ़ की है कि ‘उनके अनवार ने पर्दों को हटा दिए है और उनके असरार ने अर्श की सैर की’। जब हुजूर ﷺ नमाज़ की हालत में होते तो आपके दिल से बहुत जोर जोर से आवाज़ आया करती थी जिसे कुछ दूरी से भी साफ सुना जा सकता था। क्यों न हो, जिस वक्त आप इस शान से अबुदियत को मजबूत करके नमाज़ का तहरिमा बांधते तो जिस्म मुबारक दिल के महल में, दिल मंजिले रूह के मकाम में, रूह पुरफतुह सिर्र की मंजिल में पहुंचती और शानो अज़मत जलाल जुलजलाल कश्फ़ होती है।

गोया हक़ीक़त की रू से बदन ए नूरानी, मक़ाम ए फतदल्ला ख्फिर वो (रब अपने हबीब के) क़रीब हुआ फिर और ज्यादा क़रीब हुआ। (क़ुरान 53:8), में और रूह पाक मकामे क़ाबा क़ौसैन में होता है। आप जो कुछ मेराज में देख सुन चुके थे, उन सब बातों का नमाज़ के वक्त फ़िर से सामना होता है। इसलिए जो कैफ़ियत मेराज के वक्त थी, वही नमाज़ के वक्त हो जाती। वही कलाम वही नमाज़ वही कैफ़ियत वही मेराज बार बार हर बार तारी होती। जब भी आपके रब की मुहब्बत का शोला भड़कता, आपका दिल रब से मिलने को तड़प उठता तो इस बेदारी के आलम में हज़रत बिलाल रज़ी. से कहते- ‘ऐ बिलाल! नमाज़ से मुझको राहत पहुंचाओ। दिल मेरा जल रहा है, जल्दी करो, अज़ान दो और नमाज़ का सामान करो, कि दिल को राहत मिले’।

जानते हो नमाज़ में आशिकों का क़िबला क्या है। आशिकों का क़िब्ला जमाले बाकमाले दोस्त के सिवा कुछ नहीं। न काबा न सख़रा न अर्श। जो इस आलमे मिजाज़ी में होता है, वो हर वक्त इबादत में, हर वक्त कैफियत में, हर वक्त नमाज़ में होता है। जब जमाले महबूब सामने हो तो बेरुकूअ व बेसुजूद नमाज़ होती है। अब देखो, मस्जिद किब्लतैन में हुजूर ﷺ, ‘बैतुल मुक़द्दस’ की जानिब रूख करके नमाज़ पढ़ रहे हैं। सहाबी भी उनके पीछे नमाज़ पढ़ रहे हैं। हुज़ूर ﷺ को रब का हुक्म हुआ और आपने नमाज़ की हालत में ही किबला बदल लिया, यानी अपना रूख़ ‘बैतुल मुक़द्दस’ से ‘खानए काबा’ की तरफ कर लिया। उनके पीछे सहाबियों में, जो सिर्फ नमाज़ अदा कर रहे थे, जिनका किबला बैतुल मुक़द्दस ही रहा, वो उसी तरह नमाज़ पढ़ते रहे। लेकिन जो आशिके रसूल थे, जिनका किबला हुज़ूर ﷺ थे, जो उन्हें देखकर नमाज़ पढ़ रहे थे, वो हुज़ूर ﷺ की तरह अपना रूख काबा की जानिब कर लिए। यहां ये नहीं दिखाना था कि आपका किबला, काबा है कि नहीं बल्कि ये दिखाना था कि आपका किबला हुज़ूर ﷺ है कि नहीं?

ख्वाजा ए आलम ﷺ ने फ़रमाया कि ‘अगर नमाज़ी ये जान ले कि किसकी बारगाह में मुनाजात कर रहा है, तो हरग़िज़ किसी और की तरफ़ ख्याल नहीं जाएगा’। इसलिए जब नमाज़ की हालत में हज़रत अली रज़ी. के पैर से तीर निकाला गया तो आपको खबर भी न हुई। क्योंकि मुशाहिदे महबूब में उस मुकाम पर थे कि अपने अवसाफ़ से फ़ानी थे।

बंदा होना, ऐब से खाली नहीं, बुराईयों से खाली नहीं। इसलिए वो क्या उसकी तलब क्या? लेकिन उस रब का करम ही ऐसा है कि जब वो नवाज़ता है तो सबको नवाज़ता है, चाहे बादशाह हो या गुलाम, अमीर हो या गरीब। अगर सब मिल कर पूरी ताकत भी लगा दें तो रात में सूरज को नहीं उगा सकते। लेकिन जब सूरज निकल आता है तो उसकी रौशनी को रोक भी नहीं सकते। वो सब पर पड़ेगी। यही ख़ुदाई खसलत सूफ़ीयों में भी पाई जाती है। वस्सलाम।

‘वो उनको दोस्त रखता है और वो लोग उसको दोस्त रखते हैं

(क़ुरान-5:54)

Water Stratification

Water can seperate into layers.

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The difference in density, temperature, salinity and CO2 concentrations in seas cause water to separate into layers. This phenomenon is called water stratification:

Water stratification is when water masses with different properties – salinity (halocline), oxygenation (chemocline), density (pycnocline), temperature (thermocline) – form layers that act as barriers to water mixing which could lead to anoxia or euxinia. These layers are normally arranged according to density, with the least dense water masses sitting above the more dense layers.
Wikipedia, Stratification, 2018

So the difference in salinity is one of the factors that separate water into layers. However this was correctly stated in the Quran:

(Quran 25.53) And it is He who merged the two seas; this one fresh and pure, and that one salty and bitter; and He placed between them a barrier and a boundary.

The Quran correctly described sea water separation caused by difference in salinity.

How could an illiterate man who lived 1400 years ago have known about water stratification?

In the Arctic oceanographers discovered a layer 150m thick that acts as a barrier between the freshwater above it and the salty water below it. This barrier is called halocline.

In oceanography, a halocline is a subtype of chemocline, caused by a strong vertical salinity gradient within a body of water. Because salinity (in concert with temperature) affects the density of seawater, it can play a role in its vertical stratification.
Wikipedia, Halocline, 2018

So a halocline separates water layers with different salinities. This was only known recently. However 1400 years ago the Quran described two seas with different salinities and said there is a barrier between them. Today we know this barrier is called halocline.

Haman

Egyptian hieroglyphs show that Haman was “Chief of the stone-quarry workers”.

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Haman is a name found in the Bible in the Book of Esther. Haman is portrayed as assistant to the king of Persia, several ages after Moses. The same name Haman is also found in the Quran however contemporary to Moses in Egypt. Skeptics claim that whoever wrote the Quran made a copying mistake and placed Haman in the wrong place and the wrong time. Today Egyptologists found ancient hieroglyphs containing the name Haman and his title.

[Quran 28.38] And Pharaoh said to his people: “I have not known a god for you other than myself; so Haman, light me a fire to bake clay so that I could build a rise high enough, maybe I see Moses’ god whom I think is a liar.”

According to the Quran Haman was in Egypt and his job was related to construction. Today Egyptologists found ancient hieroglyphs containing the name “Haman” and his title “Chief of the stone-quarry workers”.

Page 399 in German: Die aegyptischen Denkmaeler in Miramar, Leo Rienisch, S. Rienisch

 

 

Egyptologists translated from hieroglyphs two prayers asking the gods to bless the “ overseer of the stone masons of Amun Haman “. (Amun is one of their gods who has stone statues in all of Egypt.)

This proves that Haman was in Egypt and that he worked in construction. No mistakes in the Quran.