शरीअ़त तरीक़त हक़ीक़त मारफ़त

386402028adaf485146fa056d8af4bc9_220-1440-c-90

ग़ौसुल आज़म मोहीउद्दीन अब्दुल का़दिर जिलानीؓ फ़रमाते हैं-

मारफ़त ये है कि मकनुनात के पर्दों में जो मख़्फ़ी मआनी हैं और तमाम अशया में वहदानियत के मआनी पर और हर शय में इशारा के साथ हक़ के शवाहिद पर इत्तेला हो। हर एक फ़ानी के फ़ना में हक़ीक़त के इल्म का तदराक ऐसे वक़्त में हासिल हो कि बाक़ी का उस की तरफ़ इशारा हो, इस तौर पर कि तबूबियत की हैबत की चमक हो। बक़ा के असर की तासीर इसमें हो कि जिस तरफ़ बाक़ी का इशारा हो। इस तरह कि जलाल-उल-वहीत की चमक हो और उसके साथ ये भी हो कि दिल की आंख से ख़ुदा की तरफ़ नज़र हो।

(बेहिजातुल असरार)

 

ख्वाजा ग़रीबनवाज़ मोईनुद्दीन अजमेरीؓ फ़रमाते हैं-

जो लोग शरीअ़त में साबित क़दम रहते हैं। इसके तमाम अहकाम बगैर किसी कमी के अदा करते हैं, तो अक्सर वो दूसरे मरतबे पर पहुंचते हैं, जिसे तरीक़त कहते हैं। जब तरीक़त पर साबित क़दम होते हैं, बिना किसी कमी के सारे अहकाम व शर्तों को अदा करते हैं, तो वो मारफ़त के मुक़ाम पर पहुंचते हैं। जहां शनासाई व शिनाख्त का मुक़ाम आ जाता है, इसमें साबित क़दम रहने से हक़ीक़त के मरतबे पर पहुंचते हैं।

(मल्फूज़ाते ग़रीबनवाज़)

हज़रत सैय्यद ज़व्वार नक़्शबंदीؓ फ़रमाते हैं-

आम लोगों में ये मशहूर हो गया है कि सिर्फ ज़ाहिरी (दिखनेवाले) आमाल व इबादत को शरीअ़त कहते हैं और ये बातिनी (न दिखनेवाले) आमाल व इबादत पर ध्यान नहीं देते। ऐसे लोग सरासर जिहालत व ग़लती पर हैं। इसी तरह एक गिरोह बातिनी आमाल को ज़रूरी समझकर, ज़ाहिरी आमाल व इबादत को छोड़ देता है। ऐसे लोग भी गुमराही में हैं।

हुज़ूरﷺ के हुक्म को मानना ही शरीअ़त है, चाहे वो कुरान की शक्ल में हो या हदीस की शक्ल में। इसके ज़ाहिरी अहकाम को फि़क़्ह कहा जाता है (आमतौर पर इसे ही शरीअ़त कहते हैं)। और बातिनी अहकाम को तसव्वुफ़ कहा जाता है। और तसव्वुफ़ के तरीक़ों को तरीक़त कहा जाता है। शरीअ़त के बगैर, तरीक़त और तरीक़त के बगैर, शरीअ़त बेकार है।

इमामे आज़म अबू हनीफ़ाؓ फ़रमाते हैं-

नफ़्स का अपने हुकूक़ व फ़ज़्र को जानना ही शरीअ़त है।

अब्दुल हक़ मोहद्दिस देहलवीؓ फ़रमाते हैं-

जो शरीअ़त व तरीक़त में फ़र्क़ करे, वो सूफ़ी नहीं।

हज़रत अबू उस्मान हयरीؓ फ़रमाते हैं

ज़ाहिर में हुज़ूरﷺ के खि़लाफ़ करना, बातिन में रियाकारी की अलामत है।

शैख बायज़ीद बुस्तामीؓ फ़रमाते हैं-

अगर तुम किसी को करामत करते देखो, यहां तक कि हवा में उड़ता हो, तब भी धोखा न खाना। वो जो कोई भी हो, अगर हुज़ूरﷺ के हुक्म के मुताबिक नहीं है, तो किसी काम का नहीं।

इमाम कुशैरीؓ फ़रमाते हैं-

वो बातिन, जो ज़ाहिर के खिलाफ़ हो, दरअस्ल बातिल है।

हज़रत यहया मुनीरीؓ फ़रमाते हैं-

जिन दीनी मामलात का ताल्लुक़ ज़ाहिर से है, उसे शरीअ़त कहते हैं और जिनका ताल्लुक़ रूह से है, उसे तरीक़त कहते हैं।

हज़रत हाजी इमदादुल्लाह महाजर मक्कीؓ ने ‘शरह मसनवी’ में एक हदीस नक़ल की है-

‘हुज़ूरﷺ फ़रमाते हैं कि शरीअ़त मेरे क़ौल का नाम है, तरीक़त मेरे आमाल का नाम है, हक़ीक़त मेरे अहवाल का नाम है और मारफ़त मेरा राज़ है’।

(रूहानियते इस्लाम, असरारे मारफ़त)

इमाम मालिकؓ फ़रमाते हैं-

‘जिसने तसव्वुफ़ पर अमल किया, फि़क़ह न सीखी वो गुमराह है। जिसने फि़क़ह सीखी लेकिन तसव्वुफ़ न सीखा, वो फिस्क़ व फ़जूर में मुब्तेला है। जिसने दोनों को हासिल किया, वो हक़ीक़त को पहुंचा’।

(शरह ऐनुल उलूम:33)

ख़्वाजा सफै़ुद्दीन चिश्तीؓ फ़रमाते हैं-

तरीक़त, शरीअ़त की जान है, यही इस्लाम की रूह है और यही ताकत भी है। रूहानियत के बगैर इस्लाम एक खाली ढांचा और मुर्दा जिस्म की तरह है। आज हमारी ज़वाल व बर्बादी की असल वजह ये है कि ज़ाहिरी इल्म तो बहुत है लेकिन रूहानी इल्म से खाली हैं। जिस मज़हब से उसकी रूहानियत निकाल ली जाए, वो अंधेरे, गुमराही और खात्मे के दलदल में धंसता चला जाता है।

इन्सान की असल उसकी रूह है, बगैर रूह के इन्सान मिट्टी है। जिस तरह ज़िन्दा रहने के लिए हमें खाने की ज़रुरत होती है, उसी तरह रूह की गि़ज़ा रूहानियत है। क्योंकि रूहानियत से ही उस हक़ की मारफ़त नसीब होती है।

मसलके दाता गंजबख़्शؓ

1ff4d24efbfa2b852e7f598965cec168_Sufiyana-223-1440-c-90

हज़रत दाता गंजबख़्श अली हजवेरीؓ फ़रमाते हैं-

दीने मुहम्मदी, दुनियाभर में सूफ़ीया किराम की बदौलत फैली। आज भी अगर इन्सान को सुकूने कल्ब चाहिए तो सूफ़ीयों की बारगाह में आना ही पड़ेगा। और ऐसा हो भी रहा है। लोग सूफ़ीयों की ख़ानक़ाहों में रब की तलाश कर रहे हैं और जो यहां नहीं आ पा रहे हैं, तो वो जुनैद बग़दादीؓ, इमाम ग़ज़ालीؓ, इब्ने अरबीؓ, मौलाना जलालुद्दीन रूमीؓ जैसे सूफ़ीयों की किताबों से फ़ायदा उठा रहे हैं।

तसव्वुफ़ के इस उरूजियत को देखकर, अक्सर लोग इस पर तरह तरह के झूठे मनगढ़ंत इल्ज़ामात भी लगाते हैं। यहां तक कहते हैं कि तसव्वुफ़ का इस्लाम से कोई वास्ता नहीं है, क्योंकि हुज़ूरﷺ  के ज़माने में ये लफ़्ज़ इस्तेमाल ही नहीं होता था। अगर सिर्फ़ इसी बिना पर, तसव्वुफ़ ग़ैर इस्लामी है, तो फिर कुरान का तर्जुमा व तफ़्सीरें, बुखारी शरीफ़, मुस्लिम शरीफ़, तिरमिजी शरीफ़ जैसी हदीसों की किताबें, फि़क़्ह, मानी व बयान सभी के सभी ग़ैर इस्लामी हैं, क्योंकि ये सब भी हुज़ूरﷺ  के दौर में नहीं थी।

उस वक़्त सहाबी, दीन को फैलाने पर ही ज़ोर दे रहे थे। उन्हें किसी और काम की फुरसत नहीं थी। इस दौर के बाद सहाबी, ताबेईन व तबे ताबेईन, इन इल्मों की तरफ़ तवज्जह किए। जिन हज़रात ने कुरान के मानी व मतलब पर काम किया, वो मफु़स्सिरिन कहलाए और इस इल्म को इल्मे तफ़सीर कहा गया। जिन्होने हदीस पर काम किया वो मुहद्दिसीन कहलाए और इस इल्म को इल्मे हदीस कहा गया। जिन्होने इस्लामी कायदा कानून पर काम किया वो फुक़्हा कहलाए और इस इल्म को इल्मे फिक़्ह कहा गया। जिन्होने तज़्कीया ए नफ़्स व रूहानियत पर काम किया वो सूफ़ी कहलाए और इस इल्म को इल्मे तसव्वुफ़ कहा गया।

लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सहाबा किराम इल्म तफ़सीर, हदीस, फिक़्ह व तसव्वुफ़ से बेखबर थे। बल्कि ये कहा जाए कि वे इन सब इल्मों में माहिर थे तो गलत नहीं होगा। हां ये ज़रूर है कि उन्हें मफु़स्सिर या मुहद्दिस या फुक़्हा या सूफ़ी नाम से नहीं पुकारा जाता, लेकिन ये सारी ख़ासियत उनमें मौजूद थी। उस वक़्त हक़ीक़त थी, नाम न था, आज नाम है लेकिन हक़ीक़त बहुत कम है।

सूफ़ी लफ़्ज़ ‘सफ़ा’ से निकला है। और सफ़ा, इन्सानी सिफ़त नहीं है, क्योंकि इन्सान तो मिट्टी से बना है और उसे बिलआखि़र ख़त्म ही होना है। इसके उलट नफ़्स की अस्ल मिट्टी है, इसलिए वो इन्सान से नहीं छुटती। इसलिए नफ़्स का ख़ात्मा और सफ़ा का हासिल करना, बगैर मारफ़ते इलाही के मुमकिन नहीं। बगैर फ़नाहियत के ये हासिल नहीं होती। लेकिन इसके हासिल होने के बाद सफ़ा या नूरानियत, फि़तरत में बस जाती है।

(शरह कशफुल महजूब)

Milk

Milk nutrients come from the blood stream.

1400 years ago people thought that milk came from the white fat near the nipples. However today this turned out to be false. Milk is produced in mammary glands which in turn get the nutrients directly from the blood stream. The blood stream gets it nutrients from the digestive system.

[Quran 16.66] And in cattle there is a lesson for you, We give you drink, from their bellies digested food and blood, pure liquid milk for those who drink.

Internal Waves

Seas have internal waves just like they have surface waves.

Internal waves are gravity waves that oscillate within a fluid medium, rather than on its surface. To exist, the fluid must be stratified: the density must decrease continuously or discontinuously with depth/height due to changes, for example, in temperature and/or salinity.
Wikipedia, Internal Wave, 2018

The internal waves travel more slowly than surface waves of similar amplitude because the difference in density between two water masses is much less than it is between air and water. The internal waves typically have wavelengths from hundreds of meters to tens of kilometers and have periods from several minutes to several hours. Internal waves are trapped in the pycnocline of stratified oceans.
 Journal of Coastal Research, Remote sensing of ocean internal waves: an overview. KLEMAS, V., 2012. 28(3), 540-546. West Palm Beach (Florida), ISSN 0749-0208. .

It is easier for internal waves to travel between layers of different densities at the pycnocline. In open oceans this is much deeper than the photic zone. This means that those waves travel in complete darkness.

The Quran talked about those internal waves long before it was discovered:

(Quran 24.40) Or like the depths of darkness in a vast deep ocean, overwhelmed with waves topped by waves, topped by clouds: depths of darkness, one above another: if a man stretches out his hand, he will not see it! If Allah does not give light to a person he will not have light!

“Waves topped by waves, topped by clouds” are internal waves, surface waves then clouds. In deep oceans you cannot see your hand because there is no light down there. So in deep oceans those internal waves travel in darkness. No mistakes in the Quran.