काफिर और मुशरिक शब्द का सही अर्थ, ज्यादातर मुस्लिम भी नही जानते

किसी भी विषय को ठीक से समझने के लिये हर शब्द का सही-सही अर्थ मालूम होना बहुत जरूरी है | सही अर्थ ना मालूम होने की वजह से अर्थ का अनर्थ हो जाता है | इंसानों के बीच मतभेद बढ़ता जाता है, यहाँ तक की खून खराबे की नौबत भी आ जाती है | इस्लाम के बारे मे भी यह बात पूरी तरह लागू होती है | ऐसे कई इस्लामिक शब्द है जिसका सही अर्थ ज्यादातर मुस्लिम भी नही जानते | इसका परिणाम यह होता है कि एक धर्म और एक धर्मग्रंथ होने के बावजूद इस्लाम के बारे मे सही जानकारी नही हासिल कर पाते है |

काफ़िर– अक्सर काफ़िर का अर्थ गैर-मुस्लिम बताया जाता है और जिसने इस्लाम कबूल नही किया उसे काफ़िर कहा जाता है | काफ़िर शब्द “कुफ़्र” से बना है | “कुफ़्र” का मतलब “सच्चाई से इंकार करना” और काफ़िर का मतलब “सच्चाई से इंकार करनेवाला” | इस्लामिक दृष्‍टिकोण से जो ‘धर्म की सच्चाई’ से इंकार करे उसे ‘काफ़िर’ कहते है | यहाँ ‘धर्म की सच्चाई’ से अभिप्राय ‘क़ुरान की आयतों’ से है | जिन्होने क़ुरान की आयतों से इंकार किया, उसने धर्म की सच्चाई से इंकार किया और वह काफ़िर हुआ |

रहे वे लोग जिन्होने इंकार किया और हमारी आयतों को झुठलाया, वे भड़कती आग मे पड़ने वाले है | [Qur’an 5:86]

ऐसा भी हो सकता है कि इस्लाम कबूल कर चुका व्यक्ति क़ुरान की आयतों से इंकार कर दे | उदाहरण के लिये क़ुरान मे शराब पीना और जुआ खेलना हराम करार दिया गया है | लेकिन अगर कोई इस्लाम कबूल कर चुका व्यक्ति शराब और जुआ को वैध करार दे तो वह भी इस्लाम की परिभाषा के अनुसार ‘काफ़िर’ है |

पाकिस्तान, इराक सहित कई और देशों के मुस्लिम(?) किसी दूसरे मुस्लिम(?) पर ‘धर्म की सच्चाई से इंकार करने’ का आरोप लगा कर एक-दूसरे को काफ़िर करार देते है और उसके बाद भयंकर स्तर पर हिंसा फैलाते है |

 मुशरिक– मुशरिक शब्द “शिर्क” से बना है | शिर्क का मतलब है “साझीदार(शरिक) बनाना” | जो अल्लाह के साथ किसी और को साझीदार बनाता है उसे ‘मुशरिक’ कहा जाता है |

शिर्क को इस्लाम मे सबसे बड़ा पाप कहा गया है|

बेशक अल्लाह क्षमा नही करता जो उसका साझी ठहराये और उसके सिवा जिसको चाहे क्षमा कर दे और जिसने अल्लाह का साझीदार ठहराया तो उसने बड़ा गुनाह कर लिया| [Qur’an 4:48]

शिर्क मुख्यतः दो तरीके का होता है –
1. एक से ज्यादा अल्लाह/ ईश्वर/ गॉड मे विश्वास करना|
2. अल्लाह के गुण(सिफत) मे किसी और को साझीदार बनाना| मूर्तिपूजक अक्सर अल्लाह के गुण मे किसी महापुरुष, जानवर, आकृति को साझीदार बना लेता है | उदाहरण के लिये कई मूर्तिपूजक अल्लाह के सिवा किसी और को धन देनेवाला, शक्ति देनेवाला, कण-कण मे समाया हुआ मान लेता है| जबकि सच्चाई यह है कि एक अल्लाह के सिवा कोई धन, शक्ति देनेवाला नही और ना ही कोई हर जगह मौजूद है| यही कारण है कि मुशरिक शब्द का अनुवाद कई बार ‘मूर्तिपूजक’ किया जाता है |

दावाह– इसे अज्ञानतावश ‘दावा’ उच्चारण किया जाता है | दावाह का अर्थ है “निमंत्रण देना” | इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिये ‘दावाह’ शब्द का प्रयोग होता है |

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The Quran on Mountains

The Quran on Mountains:

A book entitled Earth is a basic reference textbook in many universities around the world.  One of its two authors is Professor Emeritus Frank Press.  He was the Science Advisor to former US President Jimmy Carter, and for 12 years was the President of the National Academy of Sciences, Washington, DC. His book says that mountains have underlying roots.1  These roots are deeply embedded in the ground, thus, mountains have a shape like a peg (see figures 7, 8, and 9).

Figure 7

Figure 7: Mountains have deep roots under the surface of the ground. (Earth, Press and Siever, p. 413.)

Figure 8 (Click here to enlarge)

Figure 8: Schematic section.  The mountains, like pegs, have deep roots embedded in the ground. (Anatomy of the Earth, Cailleux, p. 220.)  (Click on the image to enlarge it.)

Figure 9 (Click here to enlarge)

Figure 9: Another illustration shows how the mountains are peg-like in shape, due to their deep roots. (Earth Science, Tarbuck and Lutgens, p. 158.)  (Click on the image to enlarge it.)

This is how the Quran has described mountains.  God has said in the Quran:

 Have We not made the earth as a bed, and the mountains as pegs?  (Quran, 78:6-7)

Modern earth sciences have proven that mountains have deep roots under the surface of the ground (see figure 9) and that these roots can reach several times their elevations above the surface of the ground.2  So the most suitable word to describe mountains on the basis of this information is the word ‘peg,’ since most of a properly set peg is hidden under the surface of the ground.  The history of science tells us that the theory of mountains having deep roots was introduced only in the latter half of the nineteenth century.3

Mountains also play an important role in stabilizing the crust of the earth.4  They hinder the shaking of the earth.  God has said in the Quran:

 And He has set firm mountains in the earth so that it would not shake with you… (Quran, 16:15)

Likewise, the modern theory of plate tectonics holds that mountains work as stabilizers for the earth.  This knowledge about the role of mountains as stabilizers for the earth has just begun to be understood in the framework of plate tectonics since the late 1960’s.5

Could anyone during the time of the Prophet Muhammad  have known of the true shape of mountains?  Could anyone imagine that the solid massive mountain which he sees before him actually extends deep into the earth and has a root, as scientists assert?  A large number of books of geology, when discussing mountains, only describe that part which is above the surface of the earth.  This is because these books were not written by specialists in geology.  However, modern geology has confirmed the truth of the Quranic verses.

Makkhi Ke Parr Me Bimaari Aur Shifa: Islam Aur Science


Antidote-in-the-Wing

∗ Sawaal: Piney Aur Khane Ki Cheez Me Makhhi Gir Jaye Tou Kya Karna Chahiye ?
» Jawaab: Abu Dawood Ne Hazrate Abu Huraira (RaziAllahu Anhu) Se Riwayat Ki Hai Ki,
Rasool’Allah (Sallallahu Alaihay Wasallam) Ne Farmaya:
“Jab Khaane Me Makhkhi Gir Jaye Tou Uss Ko Gota (Dubana) Do
– Kyun Ki Uss Ke Ek Parr(wings) Me Bimaari Hai Aur Doosre Me Shifa Hai.
– Aur Usi Parr Se Apne Ko Bachati Hai Jis Me Bimaari Hai
(Wahi Par Khane Me Pehle Dalti Hai Jisme Bimaari Hai
– Lihaza Puri Ko Gota (Duba) Do.”
– (Sunan Abu Dawood; Hadith no.3844, Jild-3, Page No.511) – @[156344474474186:]

» SCIENTIFIC VIEW: Britain Ke Mashoor Medical Magazine (DOCTORIAN EXPERIENCES) No 1057 Taba Saal 1927, Me Makkhi Ke Mutaallik Nayi Tahqeeq Yun Bayan Ki Gayi Hai –
“Makkhi Jab Khetiyon Aur Sabziyon Par Baithti hai Toh Apne Saath Mukhtalib Bimaariyon Ke Jaraaseem Utha Leti Hai,
– Lekin Kuch Arsa Baad Ye Jaraaseem Marr Jaate Hai Aur Unki Jagah Makki Ke Peit Me “Baktar Falog” Naami Ek Maadah Paida Ho Jaata Hai Jo Zehareele Jaraaseem Ko Khatm Karne Ki Khaasiyat Rakhta Hai,..
– Agar Tum Kisi Namkeen Paani Me Makki Ke Pait Ka Maadah Daalo Toh Tumhe Wah “Takbar Faloj” Mil Sakta Hai, Jo Mukhtalif Bimariyan Failaane Waale Chaar Qism Ke Jaraaseem Ka Muhlak Hai,..
– Iske Elawa Makkhi Ke Pait Ka Ye Madah Badal Kar ‘Takbar Faloj’ Ke Baad Ek Aisa Madah Ban Jaayega Jo 4 Mazeed Qism Ke Jaraaseem Ko Khatm Karne Ke Liye Mufeed Hoga”…

♥ Alahmdulillah !!! Allah Ke Nabi(Sallallahu Alaihay Wasallam) ne Aaj Se 1400 Saal Pahle Hi Wajeh Farma Diya Ke –
“Hakikatan Makkhi Ke Ek Parr me Bimaari hoti Hai aur Dusre Parr me Shifaa Yaani Uss Bimaari ka Antidote hota hai.
– Lihaja Maloom Ho Jaye Ke Khaane Pine Ki Kisi Cheez Me Makkhi Gir Jaye tou Uss Makkhi Ko Uss Me Puri Taraha Se Dubo Kar Bahar Nikaal Do.. Taaki Uske Pahle Parr Se Aayi Bimaari ka Antidote Uske Dusre Parr Se Uss Cheez me Ghool-Mill Jaye,.. Aur Wo Khaane-Pine Ki Cheez Uss Bimaari ke Sharr Se Mehfuz Ho Jaye ,..

• WAJAHAT: *Makkhi Ko Dubana Uss Surat Me Mumkin Hoga Jab Ki Khane Ya Piney Ki Cheez Patli(Liquid) Ho ,..
– Jaise Ki Paani, Sharbat , Daal, Saalan Wagaira.
– Agar Liquid Na Ho Tou Aap Uss Thodi Jagah Se Us Cheez Ko Kinare Dal De Take Chinti Wagaira Khale.

कुरान में अल्लाह के इंसानियत पर 99 सीधे हुक्म

कुरान में अल्लाह के इंसानियत पर 99 सीधे हुक्म.

कुरान में अल्लाह के इंसानियत पर 99 सीधे हुक्म.

1- बदज़ुबानी से बचो (3:159)

2- गुस्से को पी जाओ (3:134)

3- दूसरों के साथ भलाई करो (4:36)

4- घमंड से बचो (7:13)

5- दूसरों की गलतियाँ माफ करो (7:199)

6- लोगों से नरमी से बात करो (20:44)

7- अपनी आवाज़ नीची रखों (31:19)

8- दूसरों का मज़ाक कभी न उड़ाओ (49:11)

9- वालदैन (माँ-बाप) की इज़्ज़त और उनकी फरमानबरदारी करो (17:23)

10- वालदैन (माँ-बाप) की बेअदबी से बचो और उनके सामने उफ़ तक न कहो (17:23)

11- इजाज़त के बिना किसी के कमरे मे (निजी कक्ष) में दाख़िल न हो (24:58)

12- आपस में क़र्ज़ के मामलात लिख लिया करो (2:282)

13- किसी की अंधी तक़लीद मत करो (2:170)

14- अगर कोई तंगी मे है तो उसे कर्ज़ उतारने में राहत दो (2:280)

15- ब्याज कभी मत खाओ (2:275)

16- रिश्वत कभी मत खाओ (2:188)

17- वादों को हमेशा पूरा करो (2:177)

18- आपस में भरोसा क़ायम रखें (2:283)

19- सच और झूठ को आपस में कभी न मिलाओ (2:42)

20- लोगों के बीच इंसाफ से फैसला करो (4:58)

21- इंसाफ पर मज़बूती से जम जाओ (4:135)

22- मरने के बाद हर शख्स की दोलत उसके क़रीबी रिश्तेदारों में बाँट दो (4:7)

23- औरतों का भी विरासत में हक है (4:7)

24- यतीमों का माल नाहक मत खाओ (4:10)

25- यतीमों का हमेशा ख़याल रखो (2:220)

26- एक दूसरे का माल नाजायज़ तरीक़े से कभी मत खाओ (4:29)

27- किसी के झगड़े के मामले में लोगों के बीच सुलह कराओ (49:9)

28- बदगुमानी से बचो (49:12)

29- गवाही को मत छुपाओ (2:283)

30- एक दूसरे के भेद न टटोला करो और किसी की चुगली मत करो (49:12)

31- अपने माल में से ख़ैरात करो (57:7)

32- मिसकीन गरीबों को खिलाने की तरग़ीब दो (107:3)

33- ज़रूरतमंद को तलाश कर उनकी मदद करो (2:273)

34- कंजूसी और फिज़ूल ख़र्ची से बचा करो (17:29)

  1. अपनी ख़ैरात लोगों को दिखा कर और एहसान जताकर बर्बाद मत करो (2:264)

36- मेहमानों की इज़्ज़त करो (51:26)

37- भलाई पर ख़ुद अमल करने के बाद दूसरों को बढ़ावा दो (2:44)

38- ज़मीन पर फसाद मत करो (2:60)

39- लोगों को मस्जिदों में अल्लाह के ज़िक्र से मत रोको (2:114)

40- सिर्फ उन से लड़ो जो तुम से लड़ें (2:190)

41- जंग के आदाब का ख़याल रखना (2:191)

42- जंग के दौरान पीठ मत फेरना (8:15)

43- दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं (2:256)

44- सभी पैग़म्बरों पर इमान लाओ (2:285)

45- हालत माहवारी में औरतों के साथ संभोग न करो (2:222)

46- ​​माँ बच्चों को दो साल तक दूध पिलाएँ (2:233)

47- ख़बरदार, ज़िना के पास किसी सूरत में नहीं जाना (17:32)

48- हुक्मरानो को ख़ूबीे देखकर चुना करो (2:247)

49- किसी पर उसकी ताक़त से ज़्यादा बोझ मत डालो (2:286)

50- आपस में फूट कभी मत डालो (3:103)

51- दुनिया की तखलीक चमत्कार पर गहरी चिन्ता करो (3:191)

52- मर्दों और औरतों को आमाल का सिला बराबर मिलेगा (3:195)

53- ख़ून के रिश्तों में शादी मत करो (4:23)

54- मर्द परिवार का हुक़्मरान है (4:34)

55- हसद और कंजूसी मत करो (4:37)

56- हसद मत करो (4:54)

57- एक दूसरे का क़त्ल मत करो (4:92)

58- अमानत में ख़यानत करने वालों के हिमायती मत बनो (4:105)

59- गुनाह और ज़ुल्म व ज़यादती में मदद मत करो (5:2)

60- नेकी और भलाई में सहयोग करो (5:2)

61- अक्सरियत (बहुमत) मे होना सच्चाई का सबूत नहीं (6:116)

62- इंसाफ पर क़ायम रहो (5:8)

63- जुर्म की सज़ा मिसाली तौर में दो (5:38)

64- गुनाह और बुराई आमालियों के ख़िलाफ भरपूर जद्दो जहद करो (5:63)

65- मुर्दा जानवर, खून, सूअर का मांस निषेध हैं (5:3)

66- शराब और नशीली दवाओं से ख़बरदार (5:90)

67- जुआ कभी मत खेलो (5:90)

68- दूसरों के देवताओं को कभी बुरा मत कहो (6:108)

69- लोगों को धोखा देने के लिये नाप तौल में कमी मत करो (6:152)

70- ख़ूब खाओ पियो लेकिन हद पार न करो (7:31)

71- मस्जिदों में इबादत के वक्त अच्छे कपड़े पहनें (7:31)

72- जो तुमसे मदद और हिफाज़त और पनाह के तलबगार हो, उसकी मदद और हिफ़ाज़त करो (9:6)

73- पाक़ी चुना करो (9:108)

74- अल्लाह की रहमत से कभी निराश मत होना (12:87)

75- अज्ञानता और जिहालत के कारण किए गए बुरे काम और गुनाह अल्लाह माफ कर देगा (16:119)

76- लोगों को अल्लाह की तरफ़ हिक़मत और नसीहत के साथ बुलाओ (16:125)

77- कोई किसी दूसरे के गुनाहों का बोझ नहीं उठाएगा (17:15)

78- मिसकीनी और ग़रीबी के डर से बच्चों की हत्या कभी मत करो (17:31)

79- जिस बात का इल्म न हो उसके पीछे मत पड़ो। (17:36)

80- निराधार और अनजाने कामों से परहेज़ करो (23:3)

81- दूसरों के घरों में बिला इजाज़त मत दाखिल हो (24:27)

82- जो अल्लाह में यक़ीन रखते हैं, अल्लाह उनकी हिफाज़त करेगा (24:55)

83- ज़मीन पर आराम और सुकून से चलो (25:63)

84- अपनी दुनियावी ज़िन्दगी को अनदेखा मत करो (28:77)

85- अल्लाह के साथ किसी और को मत पुकारो (28:88)

86- समलैंगिकता से हमेशा बचा करो (29:29)

87- अच्छे कामों की नसीहत और बुरे कामों की मुमानत करो (31:17)

88- ज़मीन पर शेखी और अहंकार से इतरा कर मत चलो (31:18)

89- औरतें अपने बनाओ श्रृंगार पर तकब्बुर (घमंड) न करें (33:33)

90- अल्लाह सभी गुनाहों को माफ कर देगा सिवाय शिर्क के (39:53)

91- अल्लाह की रहमत से मायूस मत हो (39:53)

92- बुराई को, भलाई से दफा करो (41:34)

93- सलाह लेकर अपने काम अंजाम दो (42:38)

94- तुमसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला वो है जिसने सच्चाई और भलाई इख़्तियार की हो (49:13)

95- दीन मे रहबानियत मौजूद नहीं (57:27)

96- अल्लाह के यहाँ इल्म वालों के दरजात बुलंद हैं (58:11)

97- ग़ैर मुसलमानों के साथ उचित व्यवहार और दयालुता और अच्छा व्यवहार करो (60:8)

98- अपने आप को नफ़्स की हर्ष पाक रखो(64:16)

99- अल्लाह से माफी माँगो, वो माफ करने और रहम करनेवाला है (73:20)

 

EXPLANATION OF THE HADITH: “EVERY CHILD IS BORN ON AL-FITRAH…”

Narrated Abu Hurairah رضى الله عنه : Allâh’s Messenger صلى الله عليه وسلم said, Every child is born on Al-Fitrah but his parents convert him to Judaism, Christianity or a Fire-worshipper, as an animal delivers a perfect baby animal. Do you find it mutilated? Then Abu Huraira رضى الله عنه recited the holy Verses: Allâh’s Fitrah (i.e. Allâh’s Islâmic Monotheism) with which He has created mankind. No change let there be in Khalqillah (i.e. the Religion of Allâh Islâmic Monotheism). That is the Straight Religion but most of men know not. [Bukhari 2:441]

After narrating this hadeeth Abu Hurairah (رضى الله عنه) would recite the following verse of the Holy Qur’an (from Surah Rum):

فَأَقِمْ وَجْهَكَ لِلدِّينِ حَنِيفًا فِطْرَةَ اللَّهِ الَّتِي فَطَرَ النَّاسَ عَلَيْهَا لَا تَبْدِيلَ لِخَلْقِ اللَّهِ ذَلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ وَلَكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ

Wherefore set thou thy face towards the true religion uprightly. And follow thou the constitution of Allah according to which He hath constituted mankind. No altering let there be in Allah’s creation. That is the right religion, but most men know not.

The Shaykh mentioned that this is a very famous hadeeth but he fears that many people partially misunderstand it.

The Prophet (صلى الله عليه وسلم) said that there is no child except that it is born upon fitrah. However, contrary to popular belief, the Shaykh says that not every child is born a Muslim. Each child is born upon nature i.e. fitrah and then his parents make him a Jew, Christian or a Zoroastrian or of any other religious persuasion.

The Shaykh said that based on the ahadith there is great theological discussion regarding the status of children who die out of Islam. If every child was born a Muslim then there would never be this discussion.

The Shaykh asked that if every child was born Muslim, then why should Islam be presented to any child except after puberty?

What is the meaning of fitrah in this case if it doesn’t mean Islam? The Shaykh explained that it means ‘natural state’ which is one of purity and cleanliness unaffected by external factors. If one was left in this natural, uncorrupted and pristine state then they would surely be guided to the beauty and truth of Islam. The natural state is such that it brings a person close to Islam and that person is more receptive and inclined towards religion. There is a primordial instinct and recollection of Allah and the truth of Islam. However, the Shaykh explained that it is not Islam itself.

There is a hadith of Saheeh Muslim that can help one understand this issue more. Once the Prophet (صلى الله عليه وسلم) was on a journey and they heard a shepherd calling out and they heard him calling out ‘Allahu Akbar Allahu Akbar’. The Prophet (صلى الله عليه وسلم) said ‘He is upon Fitrah’. The man then said the shahadah (testimony of faith). The Prophet (صلى الله عليه وسلم) said ‘Now he has saved himself from the fire’. 

The first statement did not make him a Muslim it was the natural instinct which stirred within him and he said ‘Allah is the Greatest’. The latter statement made him a Muslim.

In the realm of the spirits, long before our birth, Allah (سبحانه وتعالى) asked us all the question ‘Am I not your Lord?’ We have all already testified to Allah (سبحانه وتعالى) that He is our Lord and Master. Hence, it is our instinct. This is part of our fitrah.

When a child is born, external factors do come into play e.g. a different religion or even a lack of religion around the child has an impact. The child remains in a natural state until they make a decision and conscience choice with regard to religion.

We should remember that the discussion here is not related to the ultimate destiny of the child i.e. in the Aakhirah. Currently, the discussion is related to the dunya and applying the laws of Islam for the child e.g. burial, funeral prayer etc.

Some ulema have adopted the opinion that Fitrah means Al-Islam, however this is not the view of the vast majority of the scholars since it would render all other related discussions meaningless.

The verse that Abu Hurairah (رضى الله عنه) would recite (see above) contains the words ‘No altering let there be in Allah’s creation’  – what this means is that we should not contribute towards the corruption of a child’s natural state that would affect the child in recognising Allah.