वालिदैन की फरमांबरदारी -Parents respect in Islam!

بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

वालिदैन की फरमांबरदारी

क़ुरान व हदीस में वालिदैन के साथ हुस्ने सुलूक करने की खुसूसी ताकीद की गई है। अल्लाह तआला ने बहुत सी जगहों पर अपनी तौहीद व इबादत का हुकुम देने के साथ वालिदैन के साथ अच्छा बरताव करने का हुकुम दिया है, जिससे वालिदैन की इताअत, उनकी खिदमत और उनके अदब व एहतेराम की अहमियत वाज़ेह हो जाती है। अहादीस में भी वालिदैन की फमांबरदारी की खास अहमियत व ताकीद और उसकी फज़ीलत बयान की गई है। अल्लाह तआला हम सबको वालिदैन के साथ अच्छा बरताव करने वाला बनाए, उनकी फरमांबरदारी करने वाला बनाए उनके हुक़ूक़ की अदाएगी करने वाला बनाए, आमीन।
आयाते कुरानिया
“और तेरा परवरदिगार साफ साफ हुकुम दे चुका है कि तुम उसके सिवा किसी और की इबादत न करना और मां बाप के साथ एहसान करना। अगर तेरी मौज़ूदगी में उनमें से एक या दोनों बुढ़ापे को पहुंच जाएं तो उनके आगे उफ तक न कहना, न उन्हें डांट डपट करना, बल्कि उनके साथ अदब व एहतेराम से बातचीत करना और आज़िज़ी व मोहब्बत के साथ उनके सामने तवाज़ो का बाज़ू पस्त रखना और दुआ करते रहना कि ऐ मेरे परवरदिगार! उनपर वैसा ही रहम कर जैसा कि उन्होंने मेरे बचपन में मेरी परवरिश की है।” (सूरह बनी इसराइल 23, 24)
जहां अल्लाह तआला ने अपनी इबादत करने का हुकुम दिया है वहीं वालिदैन के साथ इहसान करने का भी हुकुम दिया है। एक दूसरी जगह अपने शुक्र बजा लाने के साथ वालिदैन के वास्ते भी शुक्र का हुकुम दिया। अल्लाहु अकबर ज़रा गौर करें कि मां बाप का मक़ाम व मरतबा क्या है, तौहीद व इबादत के बाद इताअत व खिदमते वालिदैन ज़रूरी क़रार दिया गया, क्योंकि जहां इंसानी वज़ूद का हक़ीक़ी सबब अल्लाह है तो वहीं ज़ाहिरी सबब वालिदैन। इससे यह भी मालूम हुआ कि शिर्क के बाद सबसे बड़ा गुनाह वालिदैन की नाफरमानी है जैसा कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि अल्लाह तआला के साथ शिर्क करना और वालिदैन की नाफरमानी करना बहुत बड़ा गुनाह है। (बुखारी)
मां बाप की नाफरमानी तो बहुत दूर नाराज़गी व नापसंदीदगी के इज़हार और झिड़कने से भी रोका गया है और अदब के साथ नर्म गुफतगू का हुकुम दिया गया है, साथ ही साथ बाज़ुए ज़िल्लत पस्त करते हुए तवाज़ो व इंकिसारी और शफक़त के साथ बरताव का हुकुम होता है और पूरी ज़िन्दगी वालिदैन के लिए दुआ करने का हुकुम उनकी अहमियत को दोबाला करता है। “और तुम सब अल्लाह तआला की इबादत करो और उसके साथ किसी चीज़ को शरीक न करो और मां बाप के साथ नेक बरताव करो।” (सूरह नीसा 36)
“हमने हर इंसान को अपने बाप के साथ अच्छा सुलूक करने की नसीहत की है।” (सूरह अंकबूत 8)

अहादीसे शरीफा
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा कि अल्लाह को कौन सा अमल ज़्यादा महबूब है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया नमाज़ को उसके वक़्त पर अदा करना। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि मैंने कहा उसके बाद कौन सा अमल अल्लाह को ज़्यादा पसंद है? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया वालिदैन की फरमांबरदारी। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं मैंने कहा कि उसके बाद कौन सा अमल अल्लाह को ज़्यादा महबूब है? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया अल्लाह के रास्ते में जिहाद करना। (बुखारी)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि एक शख्स रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आया और कहने लगा कि मैं अल्लाह तआला से अजर की उम्मीद के साथ आप के हाथ पर हिजरत और जिहाद करने के लिए बैअत करना चाहता हूं। रसुलूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया क्या तुम्हारे मां बाप में से कोई ज़िन्दा है? उस शख्स ने कहा (अलहमदु लिल्लाह) दोनों ज़िन्दा हैं। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उस शख्स से पूछा क्या तू वाकई अल्लाह तआला से अजरे अज़ीम का तालिब है? उसने कहा हां। तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाया अपने वालिदैन के पास जा और उनकी खिदमत कर। (मुस्लिम)
एक शख्स ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ किया मेरे हुस्ने सुलूक का सबसे ज़्यादा मुस्तहिक़ कौन है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया तुम्हारी मां। उस शख्स ने पूछा फिर कौन? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया तुम्हारी मां। उसने पूछा फिर कौन? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया तुम्हारी मां। उसने पूछा फिर कौन? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया तुम्हारा बाप। (बुखारी)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया बाप जन्नत के दरवाज़ों में से बेहतरीन दरवाज़ा है, चुनांचे तुम्हें इख्तियार है चाहे (उसकी नाफरमानी करके और दिल दुखा के) उस दरवाज़े को बरबाद कर दो या (उसकी फरमांबरदारी और उसको राज़ी रख कर) उस दरवाजे ही हिफाज़त करो। (तिर्मिज़ी)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया अल्लाह तआला की रज़ामंदी वालिद की रज़ामंदी में है और अल्लाह तआला की नाराज़गी वालिद की नाराज़गी में है। (तिर्मिज़ी)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जिस शख्स को यह पसंद हो कि उसकी उम्र दराज़ की जाए और उसके रिज़्क़ को बढ़ा दिया जाए उसको चाहिए कि अपने वालिदैन के साथ अच्छा सुलूक करे और रिशतेदारों के साथ सिलारहमी करे। (मुसनद अहमद)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जिसने अपने वालिदैन के साथ अच्छा सुलूक किया उसके लिए खुशखबरी है कि अल्लाह तआला उसकी उम्र में इज़ाफा फरमाएंगे। (मुस्तदरक हाकिम)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया वह शख्स ज़लील व ख्वार हो, ज़लील व ख्वार हो, ज़लील व ख्वार हो। अर्ज़ किया गया या रसूलुल्लाह! कौन ज़लील व ख्वार हो? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया वह शख्स जो अपने मां बाप में से किसी एक या दोनों को बुढ़ापे की हालत में पाए फिर (उनकी खिदमत के ज़रिये) जन्नत में दाखिल न हो। (मुस्लिम)
क़ुरान व हदीस की रौशनी में उम्मते मुस्लिमा का इत्तेफाक़ है कि वालिदैन की नाफरमानी बहुत बड़ा गुनाह है। वालिदैन की नाराज़गी अल्लाह तआला की नाराज़गी का सबब बनती है, लिहाज़ा हमें वालिदैन की इताअत और फरमांबरदारी में कोताही नहीं करनी चाहिए, खास कर जब वालिदैन या दोनों में से कोई बुढ़ापे को पहुंच जाए तो उन्हें डांट डपट करना, हत्ताकि उनको उफ तक नहीं कहना चाहिए, अदब व एहतेराम और मोहब्बत व खुलूस के साथ उनकी खिदमत करनी चाहिए। मुमकिन है कि बुढ़ापे की वजह से उनकी कुछ बातें या आमाल आपको पसंद न आऐं, आप उसपर सब्र करें, अल्लाह तआला इस सब्र करने पर भी अजरे अज़ीम अता फरमाएगा इंशाअल्लाह।

दौराने हयात हुक़ूक़
उनका अदब व एहतेराम करना, उनसे मोहब्बत करना, उनकी फरमांबरदारी करना उनकी खिदमत करना, उनको जहां तक हो सके आराम पहुंचाना, उनकी ज़रूरीयात पूरी करना, थोड़े थोड़े वक़्त में उनसे मुलाक़ात करना।

वफात के बाद हुक़ूक़
उनके लिए अल्लाह तआला से माफी और रहमत की दुआएं करना। उनकी जानिब से ऐसे आमाल करना जिनका सवाब उन तक पहुंचे। उनके रिशतेदार, दोस्त व मुतअल्लिक़ीन की इज़्ज़त करना। उनके रिशतेदार, दोस्त और मुतअल्लिक़ीन की जहां तक हो सके मदद करना। उनकी अमानत व क़र्ज़ अदा करना। उनकी जाएज़ वसीयत पर अमल करना। कभी कभी उनकी कब्र पर जाना।
नोट – वालिदैन की भी ज़िम्मेदारी है कि वह औलाद के दरमियान बराबरी क़ायम रखें और उनके हुक़ूक़ की अदाएगी करें। आम तौर पर गैर शादी शुदा औलाद से मोहब्बत कुछ ज़्यादा हो जाती है जिस पर पकड़ नहीं है, लेकिन बड़ी औलाद के मुक़ाबले में छोटी औलाद को मामलात में तरजीह देना मुनासिब नहीं है जिसकी वजह से घरेलू मसाइल पैदा होते हैं, लिहाज़ा वालिदैन को जहां तक हो सके औलाद के दरमियान बराबरी का मामला करना चाहिए। अगर औलाद घर वगैरह के खर्च के लिए बाप को रक़म देती है तो उसका सही इस्तेमाल होना चाहिए। अल्लाह तआला हमें अपने वालिदैन की फरमांबरदारी करने वाला बनाए और हमारी औलाद को भी इन हुक़ूक़ की अदाएगी करने वाला बनाए, आमीन।

Parents

The Prophet (SAW) paid stress on the rights and parents respect in Islam. The Prophet (SAW) also focused the responsibilities of their children, in the same way as he focused on the rights of children and the responsibilities of their parents.

Parents are to be treated well at all times, and The Almighty’s blessings in having empowered you to do this virtuous act, be considered as an extraordinary resource in this world and in the Hereafter. Because the appreciation we should pay our parents respect has been over and over underlined in the Holy Quran. So, In one of the verses Allah says.

“Thy Lord hath decreed that ye worship none but Him, and ye be kind to your parents.” (Qur’an 17:23)

Recognition and parents respect is specified eleven times in the Quran. And In every occurrence, Allah reminds children to admire the care, love and affection they got from their parents. In one viewpoint, Allah demands parents respect to their children by saying:

“We have enjoined on man kindness to parents.” (Quran 29:8 & 46:15)

Pleasing the Parents Causes Allah’s Pleasure:

Parents respect is a vital role to please Allah. Any individual who tries to please Allah ought to win the great joy of his parents.So, to keep the parents very much satisfied is vital since their anger and  disappointment will prompt Allah’s anger and displeasure. The Prophet (SAW)  said:

“In the good pleasure of the father lies the good pleasure of the Creator and in his displeasure, lies the displeasure of the Creator.”

Serving the Parents Is Preferable to Jihaad:

When a person give importance to parents respect and need his assistance and consideration, then it is best for him to serve them than to go to Jihaad.

A person once came to the Prophet (SAW) and said that he wanted to participate in the Jihaad.

The Prophet asked him “Are your parents alive?” “Yes, they are alive” he replied.  The Prophet said.  “Then strive in their service and assist them at the time of their need. (This is your Jihaad.)”

Great Sin For Disobeying the Parents:

The Prophet (SAW) declared the parents respect, that serving ones parents well is an act of great virtue, he condemned the showing of disobedience to them, or harming them, as a most serious and detestable sin.

The Prophet (SAW) has said

To abuse one’s parents is also a major sin.”

 “Can anyone abuse his parents?” “Yes,” the Prophet replied, “If a person abused someone else’s parents and that person, in retaliation, abused his parents, – then it is as though he himself had abused his parents.”

From the above sayings of Allah and his Prophet (SAW), we can see the importance of parents respect in Islam.

The status of parents in Islam is very high. We as a Muslim should give respect and love to our parents. Parents are to be treated well at all times this is a virtuous kind of act in the sight of Almighty Allah. Parents and children in Islam are bonded together by mutual obligations. Allah Almighty says in Holy Quran: “…No mother should be harmed through her child and no father through his child…” (Quran 2: 233). From the above-mentioned verse of Holy Quran, we can conclude that Quran has made it obligatory for the child to treat his parents with all grace and mercy.

It is obligatory for us (Muslims) to show the unconditional kindness, respect, and obedience to our parents. Just like it is beyond our means to fulfill the rights of Allah (SWT) and to thank Him for all His rewards in their integrity, similarly, we can never thank our parents adequately for their efforts which they have done for us. The only thing that we can do is to acknowledge our shortcomings and submit ourselves, in obedience and loyalty, before our parents. In Holy Quran, Allah Almighty says: “And We have enjoined on man (to be good) to his parents. In travail upon travail did his mother bear him, and in two years was his weaning. Show gratitude to Me and to thy parents; to Me is thy final goal.” (Quran, 31:14)

Every Muslim must show kindness and mercy to his parents throughout their lives. It is obligatory on children to show love, respect, and gratitude to their parents. Always speaks to parents gently and respectfully. Our Parents as a team provided for all our needs: Physical, Educational, Psychological, and in many instances, Religious, Moral, and Spiritual. It becomes obligatory for us to show the utmost Kindness, Respect, and Obedience to our Parents.

Rights of Parents according to Quran and Sunnah

The Quranic commandments and the sayings of Prophet Muhammad (SAW) guide us in this matter of respecting parents with love, respect, and kindness.

Allah mentions that human beings must recognize their parents and that this is second only to the recognition of Allah Himself. In Holy Quran Allah Almighty beautifully explained: “And your Lord has decreed that you not worship except Him, and to parents, good treatment. Whether one or both of them reach old age [while] with you, say not to them [so much as] ‘uff’ [i.e., an expression of irritation or disapproval] and do not repel them but speak to them a noble word. And lower to them the wing of humility out of mercy and say: ‘My Lord! Have mercy upon them as they brought me up [when I was] small.’” (Quran 17:23-24)

In Holy Quran respect of parents is mentioned about eleven times, Allah Almighty has mentioned in every instance to recognize and to appreciate love and care that your parents gave to you. Regarding this Allah says in Holy Quran: “And We have enjoined upon man goodness to parents…” (Quran 29:8 & 46:15)

The children must pray for parents saying, as Allah Almighty teaches us in the verse:”…My Lord and Sustainer! Be kind and have mercy on them as they cherished, nurtured and sustained me in childhood.” (Quran 17:24). From this verse, we came to know that must continue praying for parents even after they die. Such prayer will be regarded as a continuous charity as the Prophet (SAW), told us. As being grateful to Allah Almighty is a form of worship which earns divine rewards, it can, therefore, be said that being grateful to one’s parents also earns divine rewards.

There are some traditions of Prophet Muhammad (SAW) about treatment with parents in the best way are mentioned below:

  • If someone is rude and disrespectful towards his parents, hurt them by saying insulting remarks or cause them grief or misery in any manner, then he shall find his place in Hell. Once someone asked the Holy Prophet (SAW): “What right does parents have over their children?” He answered: “They are your heaven and hell.” (Ibn Majah).
  • Our duties to our parents extend even after their death. One of the best ways to honor our parents when they are gone is by being kind to their friends. Holy Prophet (SAW) said about it: “The best act of righteousness is that a man should maintain good relations with his father’s loved ones.” (Sahih Muslim)
  • In another Hadith Holy Prophet (SAW) said: “No child can compensate his father unless he finds him as a slave, buys him, and sets him free.” (Sahih Muslim)
  • The Prophet (SAW) placed kindness and respect towards parents just after the prayer offered on time as the prayer is the base of Islam. ‘Abdullah Ibn Masood, said: “I asked the Prophet (SAW) which deed is most liked by Allah. He said: ‘Prayer offered on time.’I asked him: ‘Then what? He (SAW) said: ‘Kindness and respect towards parents.’…” (Al-Bukhari)

Let us pray to Allah (SWT) that we do our best to respect our parents, honor them, be kind to them, and please them so that we may gain the love of Allah Almighty. May Allah (SWT) grant us the Divine success that we may come be regarded amongst those who have been good towards their parents. May also Almighty Allah guide us to be respectful, loving and kind to our parents and so that we always stay humble and respectful regardless of the power, wealth, position and influence we may possess. Ameen!

RIGHTS OF PARENTS IN ISLAM

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Sadqa-e-Fitr ka bayaan :

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Sadqa-e-Fitr ka bayaan :
Qur’an :
2 Surah al-Baqarah, Aayat 254 :
ﻳَﺎ ﺃَﻳُّﻬَﺎ ﺍﻟَّﺬِﻳﻦَ ﺁﻣَﻨُﻮﺍ ﺃَﻧْﻔِﻘُﻮﺍ ﻣِﻤَّﺎ ﺭَﺯَﻗْﻨَﺎﻛُﻢْ
Aye Eimaan walo, jo kuchh hum ne tumhe ata kiya hai us me se (ALLĀH ki raah me nek kaam me) kharch karo, is se pehle ke wo din aa jaaye jis me na koi khareed wa farokht hoga aur (munkiro ke liye) na koi dost hoga na sifaarish, aur ye kaafir hi zaalim hain.
Hadeeṡe Nabawi :
(1) Huzoor Rasool-Allāh sallallāhu alaihi wa sallam ne farmaaya ki :
‘Bande ka Roza aasmaan wa zameen me rooka rehta hai jab tak wo Sadqa e Fitr ada na kare.’
(Ibne Asaakir)
(2) Hazrate Ibne Umar radiy-Allāhu ta’ala anhu se riwaayat hai ki :
Huzoor Rasool-Allāh sallallāhu alaihi wa sallam ne farmaaya
‘Sadqa e Fitr Aazaad Mard, Aurat, Bache aur Budhe har musalman par waajib hai ek saa’a Jav ya Khajoor.’ Aur hukm farmaaya ki ‘Namaaz e Eid ke liye nikalne se pehle us ko ada kiya jaaye.’
(Bukhari;
Muslim)
(3) Hazrate Asma bint Abu Bakr Siddeeq radiy-Allāhu ta’ala anha se riwaayat hai ki :
Huzoor Rasool-Allāh sallallāhu alaihi wa sallam ne farmaaya
‘Maal ko thaili me band karke na rakhna warna ALLĀH ta’ala bhi us ke khazaane me tumhare liye bandish laga dega. Jaha tak ho sake logo me khairaat taqseem kiya karo.’
(Sahih Bukhari, Jild -2, Hadees -1434)
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Sadqa e Fitr ke baare me chand khaas baaten :
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(1) Sadqa e Fitr har Musalman Aazaad Maalik e nisaab par (jis ki nisaab haajat e asliya ke ilaawa ho) Waajib hai.
Is me Aaqil, Baaligh aur Maal e naami hona ya’ni maal par saal guzarna shart nahi.
(2) Mard Maalik e nisaab par apni taraf se aur apne chhote bacho ki taraf se Sadqa e Fitr waajib hai, jab ke bacha khud Maalik e nisaab na ho.
Agar bacha Maalik e nisaab ho to us ka Sadqa e Fitr usi ke maal se diya jaaye.
Aur majnoon aulaad agarche baaligh ho us ka Sadqa e Fitr us ke baap par waajib hai jab ke Ghani na ho aur ghani ho to khud us ke maal se diya jaaye.
Aurat ya Baaligh Aulaad ka Sadqa e Fitr unke baghair izn (ijaazat) ada kar diya to ada ho gaya Ba-sharte ke Aulaad us ki Ayaal me ho ya’ni us ka Nafqa us ke zimme ho warna Aulaad ki taraf se bila ijaazat ada na hoga aur Aurat ne agar Shohar ka Sadqa e Fitr baghair hukm diya to ada na huwa.
(3) Agar baap na ho to baap ki jagah Daada par apne Yateem Faqeer Pote -poti ki taraf se us ka Sadqa e Fitr dena Waajib hai.
Maa par apne chhote Bachcho ki taraf se Sadqa e Fitr dena waajib nahi.
(4) Sadqa e Fitr Shakhs par waajib hai Maal par nahi. Lihaaza mar gaya to us ke maal se Ada nahi kiya jaayega. Haan, agar waariseen bataur ehsaan apni taraf se ada karen to ho sakta hai, un par koi jabr nahi aur agar wasiyat kar gaya hai to tihaai maal se zuroor ada kiya jaayega agarche waarasa ijaazat na den.
(5) Eid ke din Subah saadiq shuru hote hi Sadqa e Fitr waajib ho jaata hai.
Lihaaza Subah saadiq se pehle mar gaya ya faqeer ho gaya to us par Sadqa e Fitr waajib na hua.
Aur Subah saadiq shuru hone ke baad mara us par Sadqa e Fitr waajib hai.
Subah saadiq shuru hone ke baad jo Bacha paida hua ya jo Kaafir musalman hua ya jo Faqeer tha wo ghani hua us par Sadqa e Fitr waajib na hua.
Aur Subah saadiq shuru hone se pehle Bacha paida hua ya Kaafir musalman hua ya jo Faqeer tha wo ghani hua us par Sadqa e Fitr waajib hai.
(6) Sadqa e Fitr waajib hone ke liye Roza rakhna Shart nahi.
Agar kisi sharai Uzr ya’ni Safar, Marz (Beemaari), Budhaapa, Hamal aur bache ko doodh pilaana ki wajah se ya Ma’az ALLĀH Bila uzr Roza na rakha jab bhi Sadqa e Fitr waajib hai .
(7) Eid se pehle Sadqa e Fitr ada kar dena Sunnat hai.
Magar us ka waqt Umr bhar hai. Agar ada na kiya ho to zindagi me jab bhi ada karega ada ho jaaega. Us ki qaza nahi.
Aur ada na karne se Saakit na hoga. Baad me bhi ada karna hoga.
(8) Sadqa e Fitr ki Miqdaar :
Gehu ya us ka aata ya sattu – Nisf (aadha) saa’a (Ya’ani 2 kg 45 g),
Khajoor ya Munaqqa ya Jav ya us ka aata ya sattu – 1 Saa’a.
Gehu aur Jav mile hue ho aur Gehu ziyada hai to – Nisf Saa’a warna – 1 Saa’a.
Gehu aur Jav ke dene ke bajaay un ka Aata dena afzal hai ur is se afzal ye hai ke Qeemat de de, chaahe Gehu ki qeemat de ya Jav ki ya Khajoor ki.
Magar giraani (mehngaai) me in cheezo ko hi dena qeemat dene se afzal hai.
Aur agar kharaab Gehu ya Jav ki qeemat di to achhe ki qeemat se jo kami pade wo puri kare .
NOTE :
Saa’a ka wazan 351 Rupye bhar hai aur Nisf Saa’a ka wazan 175 Rupye Athanni bhar upar hai, Ya’ani Aaj ke wazan se Nisf Saa’a 2 kg 45 ya 50 g hai.
(9) Sadqa e Fitr ke Masaarif 6 hain :
[1] Faqeer – Ya’ani wo aadami jis ke paas kuchh maal ho magar itna na ho ke nisaab ko pahunch jaaye ya nisaab ke barabar ho to us ki haajate asliya me mustagarik ho.
[2] Miskeen – Ya’ani Jis ke paas kuchh na ho yaha tak ke khaane aur badan chhupane ke liye bhi uska mohtaaj hai ke logo se sawal kare.
[3] Ghaarim – Madyoon ya’ani jis par itna Dain (qarz) ho ke use nikaalne ke baad nisaab baaqi na rahe.
[4] Raqaab – Ya’ani Makaatib Ghulaam jo us maal se badle kitaabat dekar apni garden chhudakar aazad ho sake.
[5] Ibn-us-Sabeel – Ya’ani wo Musaafir jis ke paas safar ke dauraan maal na raha agarche ghar par maal maujood ho. Magar itna hi le jis se zaroorat puri ho jaaye, ziyada nahi.
[6] Fee sabeelillāh – Raah e khuda me kharch karna Ya’ni Taalib e ilm ko Ilm e deen sikhne ke liye ya Jihaad me jaane wale ko agar us ke paas saamaan na ho to.
Sadqa e Fitr ke Masaarif wahi hain jo Zakaat ke hain (siwa e Aamil ke, ki us ke liye Zakaat hai Fitra nahi).
Ya’ni jin ko Zakaat de sakte hain unhe Fitra bhi de sakte hain aur jinhe Zakaat nahi de sakte unhe Fitra bhi nahi de sakte.
(10) Ek Shakhs ka Sadqa e Fitr ek Miskeen ko dena behtar hai aur Chand masaakeen ko de diya jab bhi jaa’iz hai.
Yunhi ek Miskeen ko chand logon ka Sadqa e Fitr dena bhi jaa’iz hai, agarche sab Fitre mile hue ho.
(11) Kaafir ya Bad-mazhab ko Sadqa e Fitr nahi de sakte.
*******
ALLĀH ta’ala us ke Habeeb sallallāhu alaihi wa sallam ke sadqe me
Sab ko mukammal ishq e Rasool ata farmae aur in baato ko yaad rakhkar us par amal karne ki aur dusro ko bataane ki taufiq ata farmae.
Aur Maah e Ramazaan ki ta’azeem karne ki aur is me sahi tareeqe se zyada ibaadat karne ki aur is ke foyuz o barkaat haasil karne ki taufiq ata farmae aur gunaaho se bachne ki taufiq ata farmae aur hamare Roza, Namaaz, Zakaat, Sadqa e Fitr, Tilaawat e Qur’an aur tamaam nek amal qubool farmae aur Sab ko dunya aur aakhirat me bhalai ata farmae.
Aameen.

Right of Neighbour in Islam (Huqooq e Humsaaya) इस्लाम में पड़ोसी के अधिकार

 

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Islam has great respect for the mutual rights and duties of neighbours. The Holy Prophet said:

Jibra’1 always used to advise me to be generous with neighbours, till I thought that Allah was going to include the neighbours among the heirs of a Muslim.

The rights of neighbourhood are not meant for Muslim neighbours only. of course, a Muslim neighbour has one more claim upon us – that of Islamic brotherhood; but so far as the rights of neighbourship are concerned, all are equal.

Explaining it, the Holy Prophet said:
Neighbours are of three kinds:

(1) that one who has got one right upon you;

(2) that one who has got two rights upon you;

(3) that one who has got three rights upon you.

The neighbour having three rights upon you is the one who is also a Muslim and a relative. The neighbour having two rights is the one who is either a non-Muslim or a non-relative Muslim.

The neighbour having one right is the one who is neither a Muslim nor a relative. Still he has got all the claims of neighbourhood-rights upon you.

Here are some more traditions which show the Islamic love towards the neighbours:

The Holy Prophet said:
That man is not from me who sleeps contentedly while his neighbour sleeps hungry.

Al-Imam `Ali ibn al-Husayn (a. s.) in his Risalat al-Huquq, said:
These are your duties towards your neighbour: Protect his interests when he is absent; show him respect when he is present; help him when he is inflicted with any injustice. Do not remain on the look-out to detect his faults; and if, by any chance, you happen to know any undesirable thing about him, hide it from others; and, at the same time, try to desist him from improper habits, if there is any chance that he will listen to you. Never leave him alone at any calamity. Forgive him, if he has done any wrong. In short, live with him a noble life, based on the highest Islamic ethical code.

 hamsayoon k haqooq:Urdu moral story for kids about rights of neighbors.

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हजरत मुहम्मद (सल्ललाहो अलाही वसल्लम) ने पड़ोसियों की खोज खबर लेने की बड़ी ताकीद की है, और इस बात पर बहुत बल दिया है कि कोई मुसलमान अपने पड़ोसी के कष्ट और दुख से बेखबर ना रहे। एक अवसर पर आपने फरमाया-‘ वह मोमिन नहीं जो खुद पेट भर खाकर सोए और उसकी बगल में उसका पड़ोसी भृूखा रहे।’
इस्लाम में पड़ोसी के साथ अच्छे व्यवहार पर बड़ा बल दिया गया है। परंतु इसका उद्देश्य यह नहीं है कि पड़ोसी की सहायता करने से पड़ोसी भी समय पर काम आए, अपितु इसे एक मानवीय कत्र्तव्य ठहराया गया है। इसे आवश्यक करार दिया गया है और यह कत्र्तव्य पड़ोसी ही तक सीमित नहीं है बल्कि किसी साधारण मनुष्य से भी असम्मानजनक व्यवहार न करने की ताकीद की गई है।

*पवित्र कुरआन में लिखा है- ‘और लोगों से बेरुखी न कर।’– (कुरआन, ३१:१८) 
पड़ोसी के साथ अच्छे व्यवहार का विशेष रूप से आदेश है। न केवल निकटतम पड़ोसी के साथ, बल्कि दूर वाले पड़ोसी के साथ भी अच्छे व्यवहार की ताकीद आई है। सुनिए-
‘और अच्छा व्यवहार करते रहो माता-पिता के साथ, सगे संबंधियों के साथ, अबलाओं के साथ, दीन-दुखियों के साथ, निकटतम और दूर के पड़ोसियों के साथ भी।– (कुरआन, ४:३६) – @[156344474474186:]

पड़ोसियों के साथ अच्छे व्यवहार के कई कारण हैं–
एक विशेष बात यह है कि मनुष्य को हानि पहुंचने की आशंका भी उसी व्यक्ति से अधिक होती है जो निकट हो। इसलिए उसके संबंध को सुदृढ और अच्छा बनाना एक महत्वपूर्ण धार्मिक कत्र्तव्य है ताकि पड़ोसी सुख और प्रसन्नता का साधन हो न कि दुख और कष्ट का कारण।

पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार करने के संबंध में जो ईश्वरीय आदेश अभी प्रस्तुत किया गया है, उसके महत्व को पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने विभिन्न ढंग से बताया है आपने स्वयं भी उस पर अमल करके बताया।
*एक दिन आप अपने मित्रों के बीच विराजमान थे। आपने उनसे फरमाया-‘अल्लाह की कसम, वह मोमिन नहीं! अल्लाह की कसम, वह मोमिन नहीं! अल्लाह की कसम, वह मोमिन नहीं! आपने तीन बार इतना बल देकर कहा!
तो मित्रों ने पूछा-‘कौन ए अल्लाह के रसूल?’
आपने फरमाया-‘ वह जिसका पड़ोसी उसकी शरारतों से सुरक्षित न हो।’

*एक और अवसर पर आपने फरमाया-‘जो अल्लाह पर और प्रलय पर ईमान रखता है, उसको चाहिए कि वह अपने पड़ोसी की रक्षा करे।’
*एक और अवसर पर आपने फरमाया- ‘ईश्वर के निकट मित्रों में वह अच्छा है, जो अपने मित्रों के लिए अच्छा हो और पड़ोसियों में वह अच्छा है, जो अपने पड़ोसियों के लिए अच्छा हो।’

कहते हैं कि एक बार आपने अपनी बीवी हजरत आइशा (रजि.) को शिक्षा देते हुए फरमाया –
‘जिबरील (अलै.) ने मुझे अपने पड़ोसी के अधिकारों की इतनी ताकीद की कि मैं समझाा कि कहीं विरासत में वे उसे भागीदार ना बना दें।’
– इसका साफ अर्थ यह है कि पड़ोसी के अधिकार अपने निकटतम संबंधियों से कम नहीं।

*एक बार आपने एक साथी हजरत अबू जर(रजि.) को नसीहत करते हुए कहा-
‘अबू जर! जब शोरबा पकाओ तो पानी बढ़ा दो और इसके द्वारा अपने पड़ोसियों की सहायता करते रहो।’
चूंकि स्त्रियों से पड़ोस का संबंध अधिक होता है, इसलिए आपने स्त्रियों को संबोधित करते हुए विशेष रूप से कहा -‘ऐ मुसलमानों की औरतो! तुम से कोई पड़ोसिन अपनी पड़ोसिन के उपहार को तुच्छ ना समझो, चाहे वह बकरी का खुर ही क्यों ना हो।’

*हजरत मुहम्मद सल्ल. ने पड़ोसियों की खोज खबर लेने की बड़ी ताकीद की है और इस बात पर बहुत बल दिया है कि कोई मुसलमान अपने पड़ोसी के कष्ट और दुख से बेखबर ना रहे।
*एक अवसर पर आपने फरमाया-‘वह मोमिन नहीं जो खुद पेट भर खाकर सोए और उसकी बगल में उसका पड़ोसी भृूखा रहे।’

*एक बार अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फरमाया- ‘व्यभिचार निषिद्ध (हराम) है, ईश्वर और उसके दूतों ने इसे बहुत बुरा काम कहा है। किंतु दस व्यभिचार से बढ़कर व्यभिचार यह है कि कोई अपने पड़ोसी की पत्नी से व्यभिचार करे। चोरी निषिद्ध है, अल्लाह और उसके पैगम्बर ने उसे वर्जित ठहराया है, किंतु दस घरों में चोरी करने से बढ़कर यह है कि कोई अपने पड़ोसी के घर से कुछ चुरा ले।’

– दो मुसलमान स्त्रियों के संबंध में आपको बताया गया कि पहली स्त्री धार्मिक नियमों का बहुत पालन करती है किंतु अपने दुवर्चनों से पड़ोसियों की नाक में दम किए रहती है। दूसरी स्त्री साधारण रूप से रोजा-नमाज अदा करती है किंतु अपने पड़ोसियों से अच्छा व्यवहार करती है। हजरत मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया-‘पहली स्त्री नरक में जाएगी और दूसरी स्वर्ग में।’

– अल्लाह के रसूल सल्ल. ने पड़ोसी के अधिकारों पर इतना बल दिया है कि शायद ही किसी और विषय पर दिया हो। एक अवसर पर आपने फरमाया-‘तुममें कोई मोमिन नहीं होगा जब तक अपने पड़ोसी के लिए भी वही पसंद नहीं करे जो अपने लिए पसंद करता है।’ अर्थात् पडोसी से प्रेम न करे तो ईमान तक छिन जाने का खतरा रहता है,
– यहीं पर बात खत्म नहीं होती, एक और स्थान पर आपने इस बारे में जो कुछ फरमाया वह इससे भी जबरदस्त है। आपने फरमाया- ‘जिसको यह प्रिय हो कि अल्लाह और उसका रसूल उससे प्रेम करे या जिसका अल्लाह और उसके रसूल से प्रेम का दावा हो, तो उसको चाहिए कि वह अपने पड़ोसी के साथ प्रेम करे और उसका हक अदा करे।’
अर्थात् जो पड़ोसी से प्रेम नहीं करता, उसका अल्लाह और रसूल से प्रेम का दावा भी झाूठा है और अल्लाह और रसूल से प्रेम की आशा रखना एक भ्रम है। इसिलिए आपने फरमाया कि कयामत के दिन ईश्वर के न्यायालय में सबसे पहले दो वादी उपस्थित होंगे जो पड़ोसी होंगे। उनसे एक-दूसरे के संबंध में पूछा जाएगा।

*इंसान के सद्व्यवहार और दुव्र्यवहार की सबसे बड़ी कसौैटी यह है कि उसे वह व्यक्ति अच्छा कहे जो उसके बहुत करीब रहता हो। चुनांचे एक दिन आप सल्ल. के कुछ साथियों ने आपसे पूछा-
‘ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल.! हम कैसे जानें कि हम अच्छा कर रहे हैं या बुरा?’
आप सल्ल. ने फरमाया- ‘जब अपने पड़ोसी से तुम अपने बारे में अच्छी बात सुनो तो समझा लो अच्छा कर रहे हो और जब बुरी बात सुनो तो समझाो बुरा कर रहे हो।’

*पैगम्बरे इस्लाम ने इस विषय में हद तय कर दी है। यही नहीं कि पड़ोसी के विषय में ताकीद की है बल्कि यह भी कहा है कि अगर पड़ोसी दुव्र्यवहार करे तो, जवाब में तुम भी दुव्र्यवहार ना करो और यदि आवश्यक ही हो तो पड़ोस छोड़कर कहीं अन्य स्थान पर चले जाओ।
– एक बार आपके साथी ने आपसे शिकायत की कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल.! मेरा पड़ोसी मुझो सताता है। *आपने फरमाया- ‘धैर्य से काम लो।’ इसके बाद वह फिर आया और शिकायत की।
*आपने फरमाया-‘जाकर तुम अपने घर का सामान निकालकर सड़क पर डाल दो।’ साथी ने ऐसा ही किया।
– आने जाने वाले उनसे पूछते तो वह उनसे सारी बातें बयान कर देते। इस पर लोगों ने उनके पड़ोसी को आड़े हाथों लिया तो उसे बड़ी शर्म का एहसास हुआ, इसलिए वह अपने पड़ोसी को मनाकर दोबारा घर में वापस लाया और वादा किया कि अब वह उसे न सताएगा।

*मेरे गैर मुसलमान भाई इस घटना को पढ़कर चकित रह जाएंगे और सोचेंगे कि क्या सचमुच एक मुसलमान को इस्लाम धर्म में इतनी सहनशीलता की ताकीद है और क्या वास्तव में वह ऐसा कर सकता है!
हां, निसंदेह इस्लाम धर्म और अल्लाह के रसूल सल्ल. ने ऐसी ही ताकीद फरमाई है और इस्लाम के सच्चे अनुयायी इसके अनुसार अमल भी करते हैं। अब भी ऐसे पवित्र व्यक्ति इस्लाम के अनुयायियों में मौजूद है जो इन बातों पर पूरी तरह अमल करते हैं।

*मेरे कुछ भाई इस भ्रम में रहते हैें कि पड़ोसी का अर्थ केवल मुसलमान पड़ोसी से है, गैर मुस्लिम पड़ोसी से नहीं। उनके इस भ्रम को दूर करने के लिए एक ही घटना लिख देना पर्याप्त होगा।
– एक दिन हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर रजि. ने एक बकरी जिब्ह की। उनके पड़ोस में एक यहूदी भी रहता था। उन्होंने अपने घर वालों से पूछा-‘क्या तुमने यहूदी पड़ोसी का हिस्सा इसमें से भेजा है, क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्ल. से मुझे इस संबंध में ताकीद पर ताकीद सुनने का अवसर प्राप्त हुआ है कि हर एक पड़ोसी का हम पर हक है।’

*एक बार कुछ फल मुहम्मद सल्ल. के पास उपहारस्वरूप आए। आपने सबसे पहले उनमें से एक हिस्सा अपने यहूदी पड़ोसी को भेजा और बाकी हिस्सा अपने घर के लोगों को दिया।
– निसंदेह अन्य धर्मों में हर एक मनुष्य को अपने प्राण की तरह प्यार करना, अपने ही समान समझाना, सबकी आत्मा में एक ही पवित्र ईश्वर के दर्शन करना आदि लिखा है, किंतु स्पष्ट रूप से अपने पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार करने और उसके अत्याचारों को भी धैर्यपूर्वक सहन करने के बारे में जो शिक्षा पैगम्बरे इस्लाम ने खुले शब्दों में दी है, वह कहीं और नहीं पाई जाती।

– अपने पड़ोसी से दुव्र्यवहार की जितनी बुराई अल्लाह के रसूल सल्ल. ने बयान फरमायी है और इसे जितना बड़ा पाप ठहराया है, किसी और धर्म में उसका उदाहरण नहीं मिलता। इसलिए सत्यता यही है कि पड़ोसी के अधिकारों को इस प्रकार स्वीकार करने से इस्लाम की यह शान बहुत बुलंद नजर आती है। इस्लाम का दर्जा इस संबंध में बहुत ऊंचा है। यह शिक्षा इस्लाम धर्म के ताज में एक दमकते हुए मोती के समान है और इसके लिए इस्लाम की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है।

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