कजाए उमरी नमाज़ की हकीकत

Qaza-e-Umri-Namaz-ki-hakikat

अक्सर रमजान का आखरी जुमा आने तक कजा नमाज वाली पोस्ट शोशल मिडीया पर वायरल होती रहती है, यह मैसेज किसने अपलोड किया, कोई नहीं जानता! लेकिन ताज्जुब इस बात का है के, यह कुछ मुसलमान भाई बिना सोचे समझे ऐसे मैसेज खूब फोर्वड कर रहे है , अल्लाह रेहम करे नतीजतन लोगों में बेशुमार गलतफहमिया आम हो रही है।

वो मैसेज इस तरह है

“कजा नमाज अदा करनेका मौका” इरशाद-ए-नबवी सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम है कि जिस शख्स की नमाजे कजा हुईं हों और तादाद मालूम न हो तो वह रमजान केआखिरी जुमा के दिन 4 रकात नफिल 1 सलाम के साथ इस तरह पढे।हर रकात में सूरे फातिहा के बाद “आयतल कुर्सी 7 बार” सूरे कौसर 15 बार पढ़े ।अगर 700 साल की नमाजे कजा हुईं हों तो इसके कफ्फारे के लिए यह नमाज काफी है । प्लीज ये मेसेज अभी से सेन्ड करना शुरू कर दो ताकि आखिरी जुमा से पहले ये कीमती तोहफा हर किसी को मिल जाए।

वजाहत:

सबसे पहली बात तो कजाए उमरी पढना किसी भी सहीह हदीस से साबित नहीं है। अगर किसी की जिंदगी में फर्ज नमाज छूटी हुई है तो कयामत के दिन अल्लाह तआला इसकी कमी नफ्ली नमाजों से पुरी कर देगा (देखिए जामेया तिर्मीजी हदीस नंबर-413) इसलिए अकलमंदी इसी में है कि कजा नमाजे पढ़ने के बजाय ज्यादा से ज्याद नवाफिल पढ़ी जाये।

दूसरी बात यह कि इस मैसेज में जो यह लिखी हुई है कि जिस शख्स की नमाजे कजा हुईं हों और तादाद मालूम न हो तो वह रमजान के आखिरी जुमा के दिन 4 रकात नफिल 1 सलाम के साथ इस तरह पढे। हर रकात में सूरे फातिहा के बाद “आयतल कुर्सी 7 बार” सूरे कौसर 15 बार पढ़े ।अगर 700 साल की नमाजे कजा हुईं हों तो इसके कफ्फारे के लिए यह नमाज काफी है ।

याद रहे यह बात बिलकुल गलत और झूठी है। ऐसी कोई भी हदीस नबी सल्ललल्लाहो अलेही वसल्लम से सही सनद तो दूर की बात, जईफ सनद से भी साबित नहीं है। जैसे की आप खुद देख रहे है कि इसमें हदीस की कोई दलील Reference मौजूद नहीं है।

अब इसके बावजूद कोई मुसलमान इस झूठे मैसेज को सेंड करता है तो वो अपना अंजाम भी देख ले:
रसूलुल्लाह सल्ललल्लाहो अलेही वसल्लम ने फरमाया “जो शख्स मेरे नाम से वह बात(हदीस) बयान करे जो मेंने नहीं कही,तो वह(शख्स) अपना ठिकाना जहन्नुम में बना ले।”

📗 सहीह बुखारी शरीफ हदीस नं-109

और अगर कोई भाई का यह कहना हो की हमें तो किसी ने भेजा था इसलिए हमने आगे भेज दिया तो वो भी अपना अंजाम देख ले:
रसूलुल्लाह सल्ललाहो अलेही वसल्लम ने फरमाया “किसी शख्स के झूठा होने के लिये यही काफी है कि वो जो कुछ सुने (बिना तहकीक किये) बयान करता फिरे।”

📗 सहीह मुस्लिम शरीफ हदीस नं-7,8,9,10 और 11

लिहाजा तमाम मुसलमान भाईयों से गुजारीश है कि जब भी आपके पास कजा नमाज के मुताल्लीक इस तरह के झूठे मैसेजजिसमें कुरआन या सहीह हदीस की दलील मौजूद न हो, आये तो ऐसे मैसेज को आगे न फैलाये और जो आपको ऐसा मैसेज भेजे तो उन्हे इस बात की इत्तेला की जाये के ये सब दुरुस्त नहीं है।

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हम सब को नबी सल्ललल्लाहो अलेहीवसल्लम के नाम से झूठी हदीस बयान करने से बचाये और सहीह हदीसो को बयान करने और उस पर अमल करने की तौफीक अता फरमाये। आमीन

Begum Hazrat Mahal बेगम हज़रत महल

बेगम हज़रत महल (नस्तालीक़: بیگم حضرت محل‎, 1820 – 7 अप्रैल 1879), जो अवध (अउध) की बेगम के नाम से भी प्रसिद्ध थीं, अवध के नवाब वाजिद अली शाह की दूसरी पत्नी थीं। अंग्रेज़ों द्वारा कलकत्ते में अपने शौहर के निर्वासन के बाद उन्होंने लखनऊ पर क़ब्ज़ा कर लिया और अपनी अवध रियासत की हकूमत को बरक़रार रखा। अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े से अपनी रियासत बचाने के लिए उन्होंने अपने बेटे नवाबज़ादे बिरजिस क़द्र को अवध के वली (शासक) नियुक्त करने की कोशिश की थी; मगर उनके शासन जल्द ही ख़त्म होने की वजह से उनकी ये कोशिश असफल रह गई। उन्होंने 1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ विद्रोह किया। अंततः उन्होंने नेपाल में शरण मिली जहाँ उनकी मृत्यु 1879 में हुई थी।

बेगम हज़रत महल

पती – वाजिद अली शाह
जन्म
c. 1820
फैज़ाबाद, अवध, भारत
मृत्यु – 7 अप्रैल 1879 (आयु 59)
काठमांडू, नेपाल
धर्म – इस्लाम

जीवनी 
हज़रत महल का नाम मुहम्मदी ख़ानुम था, और उनका जन्म फ़ैज़ाबाद, अवध में हुआ था। वह पेशे से एक तवायफ़ थी और अपने माता-पिता द्वारा बेचे जाने के बाद ख़्वासीन के रूप में शाही हरम में ले लिया गया था। तब उन्हें शाही आधिकारियों के पास बेचा गया था, और बाद में वे ‘परि’ के तौर पर पदोन्नत हुईं, और उन्हें ‘महक परि’ के नाम से जाना जाता था।[अवध के नवाब की शाही रखैल के तौर पर स्वीकार की जाने पर उन्हें “बेगम” का ख़िताब हासिल हुआ,और उनके बेटे बिरजिस क़द्र के जन्म के बाद उन्हें ‘हज़रत महल’ का ख़िताब दिया गया था।

वे आख़िरी ताजदर-ए-अवध, वाजिद अली शाह की छोटी पत्नी थीं। 1856 में अंग्रेज़ों ने अवध पर क़ब्ज़ा कर लिया था और वाजिद अली शाह को कलकत्ते में निर्वासित कर दिया गया था। कलकत्ते में उनके पति निर्वासित होने के बाद, और उनसे तलाक़ होने के बावजूद, बेगम हज़रत महल ने अवध रियासत के राजकीय मामलों को संभाला।

1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को समर्पित भारत का डाकटिकट जिसमें बेगम हज़रत महल का चित्र एवं उल्लेख है।
आज़ादी के पहले युद्ध के दौरान, 1857 से 1858 तक, राजा जयलाल सिंह की अगुवाई में बेगम हज़रत महल के हामियों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ बग़ावत की; बाद में, उन्होंने लखनऊ पर फिर से क़ब्ज़ा कर लिया और उन्होंने अपने बेटे बिरजिस क़द्र को अवध के वली (शासक) घोषित कर दिया।

बेगम हज़रत महल की प्रमुख शिकायतों में से एक यह थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने सड़कें बनाने के लिए मंदिरों और मस्जिदों को आकस्मिक रूप से ध्वस्त किया था। विद्रोह के अंतिम दिनों में जारी की गई एक घोषणा में, उन्होंने अंग्रेज़ सरकार द्वारा धार्मिक आज़ादी की अनुमति देने के दावे का मज़ाक उड़ाया:

सूअरों को खाने और शराब पीने, सूअरों की चर्बी से बने सुगंधित कारतूस काटने और मिठाई के साथ, सड़कों को बनाने के बहाने मंदिरों और मस्जिदों को ध्वंसित करना, चर्च बनाने के लिए, ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए सड़कों में पादरी भेजने के लिए, अंग्रेज़ी संस्थान स्थापित करने के लिए हिंदू और मुसलमान पूजास्थलों को नष्ट करने के लिए, और अंग्रेज़ी विज्ञान सीखने के लिए लोगों को मासिक अनुदान का भुगतान करने के काम, हिंदुओं और मुसलमानों की पूजा के स्थान नष्ट करना कहाँ की धार्मिक स्वतंत्रता है। इन सबके साथ, लोग कैसे मान सकते हैं कि धर्म में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा?


जब अंग्रेज़ों के आदेश के तहत सेना ने लखनऊ और ओध के अधिकांश इलाक़े को क़ब्ज़ा कर लिया, तो हज़रत महल को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। हज़रत महल नाना साहेब के साथ मिलकर काम करते थे, लेकिन बाद में शाहजहांपुर पर हमले के बाद, वह फ़ैज़ाबाद के मौलवी से मिले। लखनऊ में 1857 की क्रांति का नेतृत्व बेगम हज़रत महल ने किया था। अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस क़द्र को गद्दी पर बिठाकर उन्होंने अंग्रेज़ी सेना का स्वयं मुक़ाबला किया। उनमें संगठन की अभूतपूर्व क्षमता थी और इसी कारण अवध के ज़मींदार, किसान और सैनिक उनके नेतृत्व में आगे बढ़ते रहे।

आलमबाग़ की लड़ाई के दौरान अपने जांबाज़ सिपाहियों की उन्होंने भरपूर हौसला आफ़ज़ाई की और हाथी पर सवार होकर अपने सैनिकों के साथ दिन-रात युद्ध करती रहीं। लखनऊ में पराजय के बाद वह अवध के देहातों में चली गईं और वहाँ भी क्रांति की चिंगारी सुलगाई। बेगम हज़रत महल और रानी लक्ष्मीबाई के सैनिक दल में तमाम महिलायें शामिल थीं।

लखनऊ में बेगम हज़रत महल की महिला सैनिक दल का नेतृत्व रहीमी के हाथों में था, जिसने फ़ौजी भेष अपनाकर तमाम महिलाओं को तोप और बन्दूक चलाना सिखाया। रहीमी की अगुवाई में इन महिलाओं ने अंग्रेज़ों से जमकर लोहा लिया।

लखनऊ की तवायफ़ हैदरीबाई के यहाँ तमाम अंग्रेज़ अफ़सर आते थे और कई बार क्रांतिकारियों के ख़िलाफ़ योजनाओं पर बात किया करते थे। हैदरीबाई ने पेशे से परे अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुये इन महत्त्वपूर्ण सूचनाओं को क्रांतिकारियों तक पहुँचाया और बाद में वह भी रहीमी के सैनिक दल में शामिल हो गयी।

आख़िरकार, उन्हें नेपाल जाना पड़ा, जहाँ उन्हें पहले राणा के प्रधान मंत्री जंग बहादुर ने शरण से इंकार कर दिया था लेकिन बाद में उन्हें रहने की इजाज़त दी गयी थी। 1879 में उनकी मृत्यु हो गई और उन्हें काठमांडू के जामा मस्जिद के मैदानों में एक अज्ञात क़ब्र में दफ़नाया गया। उनकी मृत्यु के बाद, रानी विक्टोरिया (1887) की जयंती के अवसर पर, ब्रिटिश सरकार ने बिरजिस क़द्र को माफ़ कर दिया और उन्हें घर लौटने की इजाज़त दे दी।

बेगम हज़रत महल का मक़बरा जामा मस्जिद, घंटाघर के पास काठमांडू के मध्य भाग में स्थित है, प्रसिद्ध दरबार मार्ग से ज़्यादा दूर नहीं है। इसकी देखभाल जामा मस्जिद केंद्रीय समिति ने की है।

15 अगस्त 1962 को महल को महान विद्रोह में उनकी भूमिका के लिए लखनऊ के हज़रतगंज के पुराने विक्टोरिया पार्क में सम्मानित किया गया था। पार्क के नामकरण के साथ, एक संगमरमर स्मारक का निर्माण किया गया था, जिसमें अवध शाही परिवार के शस्त्रों के कोट को लेकर चार गोल पीतल के टुकड़े वाले संगमरमर के टैबलेट शामिल थे। पार्क का उपयोग रामशिला, दसहरा के दौरान, साथ ही लखनऊ महोत्सव (लखनऊ प्रदर्शनी) के दौरान किया जाता है।

10 मई 1984 को, भारत सरकार ने महल के सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। पहला दिन कवर सीआर पकराशी द्वारा डिजाइन किया गया था, और रद्दीकरण अल्का शर्मा द्वारा किया गया था। 15,00,000 टिकट जारी किए गए थे।

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स्वतंत्रता_सेनानी_शाह_वलीउल्लाह_खान

बीते 21 फरवरी, 2018 को भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे बडे विचारक-क्रांतिकारी शाह वलीउल्लाह की 315वी सालगिरह थी। दक्षिण एशिया मे, सामाजिक आर्थिक राजनीतिक तंत्र की विवेकसम्मत आलोचना, मूल्य का ‘श्रम’ सिद्धांत, इतिहास की समझ, इतिहास की प्रगतिशील गति जैसे सिद्धान्त, यूरोपियन-पश्चिमी ‘देन’ के रूप में देखे गये हैं। ये सच नही है। इन सब विषयों पर सबसे पहले, पश्चिमी प्रभाव के बिना, शाह वलीउल्लाह (जन्म-1703) ने प्रस्तावनायें रखीं। शाह वलीउल्लाह के पिता शेख अब्दुर रहीम, औरंगज़ेब के दौर मे प्रसिद्ध विद्वानो मे से एक थे। अब्दुर रहीम साहब ने ‘फतवा-ए-आलमगीरी’ के संकलन मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

अज्ञानता की स्थिति ये है कि ‘फतवा’ शब्द से हमारे दिमाग मे ‘मुल्लाओं द्वारा महिलाओं की प्रताड़ना’ जैसी छवि उभरती है। परन्तु ये महज एक डर है जो हमारे मन मे पश्चिम द्वारा पैदा किया गया है। अन्यथा ‘फतवा’ का अर्थ है ‘राय’ या ‘ओपिनियन’। और ‘फतवा-ए-आलमगीरी’, धर्म से लेकर राजनीति, विचारो की सम्पूर्ण रेंज पर सर्वाधिक परिष्कृत संकलनो मे से एक है। किसी को भी ताज्जुब होगा कि इस पुस्तक के अध्ययन के बिना भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के छात्र कैसे किसी भी विषय पर कुछ उपयोगी लिख सकते हैं!

शाह वलीउल्लाह और रूसो

पश्चिमी देश जोर देंगे कि ‘लोक संकल्प’ या ‘लोक इच्छा-शक्ती’ का सिद्धांत (theory of general will) 18वी सदी मे फ्रेंच दार्शनकि रूसो ने प्रतिपादित किया। ये कहा जाता है कि इसी विचार ने जनता की ‘इच्छा-शक्ती’ को ‘राज इच्छा-शक्ती’ से ऊंची माना। और सामंतशाही के विरुद्ध लोकतंत्र को जन्म दिया। जिसके फलस्वरूप 1789 की फ्रेंच क्रांति मे ‘व्यक्ति के अधिकारों’ की घोषणा हुई और 1776-1783 के अमेरिकन स्वतंत्रता संग्राम मे ‘बिल आफ राइट्स’ बना।

समग्र रूप मे, ये सभी विकास आधुनिक युग की नींव माने जाते हैं। रूसो ने ‘लोक संकल्प’ या ‘इच्छा-शक्ती’ के बारे मे 1760s मे लिखा। तब तक शाह वलीउल्लाह, अपने पिता द्वारा स्थापित मदरसा-ए-रहीमिया दिल्ली के बतौर शासनाधिकारी कार्य करते हुये, मृत्य को प्राप्त हो चुके थे (1761)। अपनी पुस्तक ‘हुज्जत अल्लाह अल-बलीगा’, जो धरती के लगभग सभी विषयो पर संकलन है, कब की पूरी कर चुके थे। हुज्जत मे शाह वलीउल्लाह शासन की सम्प्रभुता को शाही लोगो से छीन लेते हैं। मुगल शासन के पतन का विष्लेषण करते हुये शाह वलीउल्लाह ‘भारी भरकम टैक्स’, ‘विशेषाधिकार प्राप्त और अनुत्पादक लोगो (परजीवी) का उत्पादक तत्वो पर शासन’ को मूल कारक के तौर पर इंगित करते हैं।

फ्रेंच और अमेरिकन दोनो ही क्रांतियो मे शहरी और ग्रामीण मध्यम वर्ग ने, सामंती और उपनिवेशवादी ताकतो द्वारा आरोपित टैक्सेज के विरुद्ध बगावत की थी। शाह वलीउल्लाह ने इस घटना का पूर्वानुमान दशको पहले ही कर लिया था। उनके अनुसार दस्तकारोंं, व्यापारियो और किसानो को न्याय से वंचित करना राजसत्ता और साम्राज्यवादी शासन के पतन का कारण बनता है। इसके निवारण के लिये, शाह वलीउल्लाह शासन के लिये एक ऐसे लोकतांत्रिक तंत्र के निर्माण का प्रस्ताव करते हैं जिसमे मुखिया वंशानुगत ना होकर, चुने जाँय (selected) या चुनाव से बने (elected)।

शाह वलीउल्लाह और एडम स्मिथ

पशिचिमी देश इस बात पर ज़ोर देते हैं कि मूल्य का श्रम सिद्धांत (labour theory of value) का प्रतिपादन एडम स्मिथ ने किया। ऐडम स्मिथ ने भगवान, राजा या चर्च से जुड़ी सत्ता के बजाय, ‘श्रम’ को समाज निर्माण और दौलत पैदा करने वाली मूल शक्ती के बतौर देखा। किसी भी वस्तू का मूल्य श्रम तय करता है, यह सिद्धान्त, श्रम और समाज के आधुनिकीकरण और मानवीकारण मे बड़ी भूमिका अदा करता है। इसके बिना इन्सान दास या सामन्ती प्रथा में क़ैद रह जाता।

एडम स्मिथ ने अपनी पुस्तक “वेल्थ आफ नेशन” 1776 मे लिखी। इनसे चार centuries पहले इब्न खालदून (1332-1406)–विश्व के पहले इतिहासकार और एक अरब मुस्लिम–ने श्रम को ऐसी इकाई के तौर पर चिन्हित किया जिसके द्वारा धन पैदा होता है, और वस्तु का मूल्य, लाभ, उत्पादन, वितरण और उपभोग, तय होता है। इब्न खालदून के पूर्व धनी व्यक्ति को स्वर्ग से अवतरित माना जाता था। इसी तरह गरीब को माना जाता था कि उसे गरीबी के साथ भाग्य ने पैदा किया है।

अब सोचिये, कि मुस्लिम समाज 14वी 15वी सदी मे भी कितना आगे था कि इसने ‘ईश्वर ने अमीर बनाया’ के विचार को, जिसे पश्चिमी देश 18वी सदी मे अपना जाकर ठुकरा सके, तभी रद्द कर दिया था! शाह वलीउल्लाह ने श्रम के उचित मूल्य मे ह्रास को पिछले शासन तन्त्रों का मूल दोष बताया। शाह वलीउल्लाह के लेखों से पता चलता है कि भारत मे एडवांस स्तर के जिंस उत्पादन (commodity production), मूल्य विनिमय (exchange value), वाणिज्य (finance) और उद्योग (industry) का अन्ग्रेज़ों के आने से पहले, अस्तित्व था। शाह वलीउल्लाह ने जागीरदारी और सामंती तंत्र द्वारा पैदा किये गये अवरोध को प्रगति के रास्ते मे रोड़ा बताया। हमे आधुनिक होने के लिये ब्रिटिश शासन की जरूरत नही थी। सामंतवाद विरोधी आंदोलन, या कर-विरोधी जन-उभार, जिसे शाह वलीउल्लाह ने क्रांति (इंकलाब) कहा, यहाँ के मामलो को उसी तरह हल करने मे सक्षम था जैसे फ्रांस या अमेरिका मे हुआ।

शाह वलीउल्लाह और हेगल

19वी शताब्दी के शुरूआत मे, जर्मन दर्शनशास्त्री हेगल द्वारा, इतिहास के घटनाविज्ञान पर किये अध्ययन से पता चला कि कैसे विभिन्न ऐतिहासिक चरण आये, कैसे पुराने चरण खत्म हुये ताकि एक नये चरण का मार्ग प्रशस्त हो। हेगल ने द्वंदवाद का वर्णन ऐतिहासिक नियम की तरह किया। जिसमे पदार्थ और चेतना मे एकता और संघर्ष, वस्तुगत एवं आत्मगत फैक्टर्स शामिल हैं। मार्क्स ने इसी हेगेलियन द्वंदवादी विचार की भैतिकवादी व्याख्या कर, एक नये युग की आधारशिला रखी।

पर हेगल और मार्क्स से भी पहले शाह वलीउल्लाह ने सम्पत्ति के गतिशील और गतिहीन भागोंं के विभिन्न स्तरो के बीच द्वन्द और संघर्ष द्वारा ऐतिहासिक परिवर्तन होने पर चर्चा की थी। शाह वलीउल्लाह ने ‘इतिहास परिवर्तन मे क्लास स्ट्र्गल की भूमिका’ 18वी सदी मे देख ली थी।

शाह वलीउल्लाह और ब्रिटिश साम्राज्यवाद

ब्रिटिश दखल ने भारत मे सामंतवाद विरोधी क्रांति को रोक दिया। 1803 मे दिल्ली पर ईस्ट इंडिया कंपनी का कब्जा हो गया। सभी मुगल काल पश्चात बने राजसत्ताएं पराजित हो गयीं। हालात को देखते हुये, शाह वलीउल्लाह के पुत्र शाह अब्दुल अज़ीज़ ने सामंतवाद-विरोधी धारा को उपनिवेशवाद-विरोधी धारा मे तब्दील कर दिया।

1803 मे शाह अब्दुल अज़ीज़ ने एक अनोखा फतवा जारी किया। इसमे पहली बार मुस्लिमो के साथ साथ गैर-मुस्लिम (हिंदूओ) से भी ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई का आह्वान किया गया। शाह वलीउल्लाह के इंकलाब के सिद्धांत को शामिल करते हुये जेहाद की अवधारणा को विदेशी कब्जे के खिलाफ आजादी की लड़ाई मे बदल दिया गया।

1786 से 1803 के मध्य वस्तुतः मराठो ने मुगलो से साधिकार दिल्ली पर शासन किया। यदि शाह वलीउल्लाह की विचारधारा या ‘वलीउल्लाहइज़्म’ या ‘वलिउल्लाहवाद’ हिंदू विरोधी होती तो जेहाद का फतवा 1786 मे जारी होता। परंतु यह 1803 मे जारी हुआ। इस फतवे में सिर्फ मुस्लिम राज नही, बल्कि हिन्दुओं (धिम्मी) द्वारा राजसत्ता खोने का उसी शिद्दत के साथ ज़िक्र किया गया। इस फतवे का साफ इशारा था कि भारतीय उप-महाद्वीप के मुसलमानो को, हिन्दू राजा या शासक स्वीकार्य था, बशर्ते वो ब्रिटिश-विरोधी हो।

वलीउल्लाहवादी विचारधारा और 1857

18वी शताब्दी का प्रथमार्ध मे भारत के कई भागो मे कई सारे अलग अलग ब्रिटिश विरोधी विद्रोह हुये। कई प्रमाण, जिनमे से कुछ इस लेखक की पुस्तक ‘War of Civilisations: India 1857 AD’ मे भी शामिल हैं, मौजूद हैं कि इन विद्रोहों के पीछे शाह वलीउल्लाह की विचारधारा थी। शाह वलीउल्लाह पर नेज्द, सऊदी अरब के अब्दुल वहाब पर कोई प्रभाव नही था। परंतु ब्रिटिश सत्ता ने वलीउलाह के अनुयाइयो को ‘वहाबी’ कहना शुरू कर दिया। ये एक असत्य आरोप था जो आज भी कायम है!

1857 के शुरुआती दौर मे सैयद अहमद शहीद का आंदोलन, 1806 का वेल्लोर विद्रोह, 1831 का कोल आंदोलन, महाराष्ट्र का रामोशी विद्रोह, कर्नाटक, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, आंध्रप्रदेश, पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, बिहार, बंगाल (फरायज़ी आंदोलन), असम, मणिपुर मे किसान विद्रोह, केरल मे मोपला विद्रोह, 1856 मे संथालो का आंदोलन, ये सभी या तो शाह वलीउल्लाह के आदर्शो से प्रेरित थे या शाह वलीउल्लाह के अनुयाइयो के नेतृत्व मे हुये।

वलीउल्लाहवादी अनुयायियो मे सिख और हिंदू होने के भी प्रमाण हैं! इस तरह वलीउल्लाहवादी विचारधारा, इस्लाम से निकली एसी शाखा बन कर उभरी,जो एक मज़हब की सीमाओ से ऊपर उठकर, दक्षिण एशिया मे आज़ादी, मुक्ति,और सशक्तीकरण की सर्वमान्य थ्योरी बन गई।

ब्रिटिश दस्तावेज़ों के अनुसार वलीउल्लाह के अनुयाइयो ने पंजाब के शासक महाराजा रणजीत सिन्ह को भी प्रभावित किया। घसियारी बाबा, जो एक सनातनी हिंदू संत थे, और जिन्होने अवध के हिंदुओ के बीच क्रांति के विचार प्रसारित किये, उनकी पहचान ब्रिटिश सरकार ने शाह वलीउल्लाह के एक ब्राम्हण अनुयायी के रूप मे की।

घसियारी बाबा ने 1857 की अवध क्रांति मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। गंगू बाबू मेहतर, जो जाति से एक वाल्मीकि दलित थे, और जिन्होने 1857 मे कानपुर के कुछ क्षेत्रो मे क्रांति का नेतृत्व किया, भी शाह वलीउल्लाह के विचारो के अनुयायी थे। ब्रिटिश सत्ता ने अनुचित तरीके से गंगू बाबू, जो एक उत्साही शिवभक्त थे, को ‘वहाबी’ घोषित कर दिया।

1857 मे फज़ल-ए-हक़ खैराबादी (जावेद अख्तर के परदादा), द्वारा जारी अंग्रेज़-विरोधी लड़ाई का फतवा, स्पष्ट रूप से वलीउल्लाहवादी विचारधारा के अनुरूप था। बहादुरशाह ज़फर के नेतृत्व मे सशस्त्र संघर्ष मे शामिल सभी चार नेता मिर्ज़ा मुग़ल, बख्त खान, भागीरथ मिश्रा, और सिरधारी सिंह, बिन अपवाद, शाह वलीउल्लाह की विचारधारा से प्रभावित थे। बहादुर शाह ज़फर की सील से 1857 मे जारी राष्ट्रीय-लोकतांत्रि क्रांति का चार्टर (घोषणा पत्र) मे ट्रेडर्स, उद्योगपतियोंं, मर्चेंट्स, किसानो, दस्ताकारों के लिये अलग अलग स्पष्ट प्रोग्राम शामिल किये गये थे। भारी उद्योगो मे सरकारी सहायता का वादा था, सभी किसानो को 5 एकड़ जमीन का एकसमान आश्वासन था। ये सब शाह वलीउल्लाह के मूल सिद्धांतो से उतपन्न हुआ।

मंगल पांडे, मौलवी अहमदुल्लाह शाह, बेगम हज़रत महल, राजा जयलाल सिंह कुरमी, भोंदू सिंह अहीर, राजा कुंवर सिंह, नाना साहेब, तात्या टोपे, अज़ीमुल्लाह खान, बांदा के नवाब बहादुर, इलाहाबाद के मौलवी लियाक़त अली, सतारा के रुंगो बापोजी, आंध्रप्रदेश के रेड्डी जमींदार, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ के गोंड आदिवासी, राजस्थान, गुजरात और मालवा के भील, जाट, गुज्जर और लोध, कर्नाटक के लिंगायत, फतेहपुर के चौधरी हिकमतुल्लाह, लखनऊ और उन्नाव के पासी, जौनपुर-आज़मगढ के दलित– इन सभी ने 1857 मे ब्रिटिश सत्ता से लड़ते हुये कभी ना कभी शाह वलीउल्लाह का स्मरण किया था।

Hypoxia

Lack of oxygen.

At high altitude the oxygen concentration in the atmosphere decreases. When oxygen level drops the blood vessels in the lungs constrict:

Hypoxic pulmonary vasoconstriction (HPV), also known as the Euler-Liljestrand mechanism, is a physiological phenomenon in which small pulmonary arteries constrict in the presence of alveolar hypoxia (low oxygen levels). 
Wikipedia, Hypoxic Pulmonary Vasoconstriction, 2019

The blood vessels in the lungs constrict when oxygen level drops. This was only known recently however this was portrayed in the Quran 1400 years before it was discovered.

[Quran 6.125] Those whom Allah wants to guide, He opens their chests to Islam; And those whom He wants to leave astray, He makes their chests tight and constricted, as if they are ascending to the sky: Such is the penalty of Allah on those who refuse to believe.

He makes their chests tight and constricted, as if they are ascending to the sky” today we know why it gets constricted, lack of oxygen. No mistakes in the Quran.