एशिया की पहली महिला साशक ‘सुल्तान रज़िया’

रज़िया का पूरा नाम-रज़िया अल्-दीन (1205– अक्टूबर 14/15, 1240), सुल्तान जलालत उद-दीन रज़िया था। वह इल्तुतमिश की पुत्री तथा भारत की पहली मुस्लिम शासिका थी।

अपने अंतिम दिनों में इल्तुतमिश अपने उत्तराधिकार के सवाल को लेकर चिन्तित था। इल्तुतमिश के सबसे बड़े पुत्र नसीरूद्दीन महमूद की, जो अपने पिता के प्रतिनिधि के रूप में बंगाल पर शासन कर रहा था, 1229 ई. को अप्रैल में मृत्यु हो गई। सुल्तान के शेष जीवित पुत्र शासन कार्य के किसी भी प्रकार से योग्य नहीं थे। अत: इल्तुतमिश ने अपनी मृत्यु शैय्या पर से अपनी पुत्री रज़िया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। उसने अपने सरदारों और उल्माओं को इस बात के लिए राज़ी किया। यद्यपि स्त्रियों ने प्राचीन मिस्र और ईरान में रानियों के रूप में शासन किया था और इसके अलावा शासक राजकुमारों के छोटे होने के कारण राज्य का कारोबार सम्भाला था, तथापि इस प्रकार पुत्रों के होते हुए सिंहासन के लिए स्त्री को चुनना एक नया क़दम था।

सरदारों की मनमानी
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इल्तुतमिश के इस फ़ैसले से उसके दरबार के सरदार अप्रसन्न थे। वे एक स्त्री के समक्ष नतमस्तक होना अपने अंहकार के विरुद्ध समझते थे। उन लोगों ने मृतक सुल्तान की इच्छाओं का उल्लघंन करके उसके सबसे बड़े पुत्र रुकुनुद्दीन फ़ीरोज़शाह को, जो अपने पिता के जीवन काल में बदायूँ तथा कुछ वर्ष बाद लाहौर का शासक रह चुका था, सिंहासन पर बैठा दिया। यह चुनाव दुर्भाग्यपूर्ण था। रुकुनुद्दीन शासन के बिल्कुल अयोग्य था। वह नीच रुचि का था। वह राजकार्य की उपेक्षा करता था तथा राज्य के धन का अपव्यय करता था। उसकी माँ शाह तुर्ख़ान के, जो एक निम्न उदभव की महत्त्वाकांक्षापूर्ण महिला थी, कार्यों से बातें बिगड़ती ही जा रही थीं। उसने सारी शक्ति को अपने अधिकार में कर लिया, जबकि उसका पुत्र रुकनुद्दीन भोग-विलास में ही डूबा रहता था। सारे राज्य में गड़बड़ी फैल गई। बदायूँ, मुल्तान, हाँसी, लाहौर, अवध एवं बंगाल में केन्द्रीय सरकार के अधिकार का तिरस्कार होने लगा। दिल्ली के सरदारों ने, जो राजमाता के अनावश्यक प्रभाव के कारण असन्तोष से उबल रहे थे, उसे बन्दी बना लिया तथा रज़िया को दिल्ली के सिंहासन पर बैठा दिया। रुकनुद्दीन फ़िरोज़ को, जिसने लोखरी में शरण ली थी, क़ारावास में डाल दिया गया। जहाँ 1266 ई. में 9 नवम्बर को उसके जीवन का अन्त हो गया।

अमीरों से संघर्ष
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अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए रज़िया को न केवल अपने सगे भाइयों, बल्कि शक्तिशाली तुर्की सरदारों का भी मुक़ाबला करना पड़ा और वह केवल तीन वर्षों तक ही शासन कर सकी। यद्यपि उसके शासन की अवधि बहुत कम थी, तथापि उसके कई महत्त्वपूर्ण पहलू थे। रज़िया के शासन के साथ ही सम्राट और तुर्की सरदारों, जिन्हें चहलग़ानी (चालीस) कहा जाता है, के बीच संघर्ष प्रारम्भ हो गया।

रज़िया की चतुराई व कूटनीति
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युवती बेगम के समक्ष कोई कार्य सुगम नहीं था। राज्य के वज़ीर मुहम्मद जुनैदी तथा कुछ अन्य सरदार एक स्त्री के शासन को सह न सके और उन्होंने उसके विरुद्ध विरोधियों को जमा किया। परन्तु रज़िया में शासन के लिए महत्त्वपूर्ण सभी गुणों का अभाव नहीं था। उसने चतुराई एवं उच्चतर कूटनीति से शीघ्र ही अपने शत्रुओं को परास्त कर दिया। हिन्दुस्तान (उत्तरी भारत) एवं पंजाब पर उसका अधिकार स्थापित हो गया तथा बंगाल एवं सिन्ध के सुदूरवर्ती प्रान्तों के शासकों ने भी उसका आधिपत्य स्वीकार कर लिया। इस प्रकार जैसा कि मिनहाजस्सिराज ने लिखा है, लखनौती से लेकर देवल तथा दमरीला तक सभी मलिकों एवं अमीरों ने उसकी आज्ञाकारिता को स्वीकार किया। रज़िया के राज्यकाल के आरम्भ में नरुद्दीन नामक एक तुर्क के नेतृत्व में किरामित और अहमदिया नामक सम्प्रदायों के कतिपय पाखण्डियों द्वारा उपद्रव कराने का संगठित प्रयास किया गया। उनके एक हज़ार व्यक्ति तलवारों और ढालों के साथ पहुँचे और बड़ी मस्जिद में एक निश्चित दिन को प्रवेश किया; परन्तु वे राजकीय सेना द्वारा तितर-बितर कर दिये गये तथा विद्रोह एक भद्दी असफलता बनकर रह गया।

समकालीन मुस्लिम इतिहासकार मिनहाजस्सिराज ने लिखा है कि, “वह महती सम्राज्ञी चतुर, न्यायी, दानशील, विद्वानों की आश्रयदायी, न्याय वितरण करने वाली, अपनी प्रजा से स्नेह रखनेवाली, युद्ध कला में प्रवीण तथा राजाओं के सभी आवश्यक प्रशंसनीय विशेषणों एवं गुणों से सम्पन्न थी।” वह स्वयं सेना लेकर शत्रुओं के सम्मुख जाती थी। स्त्रियों के वस्त्र को छोड़ तथा बुर्के का परित्याग कर वह झिल्ली पहनती थी तथा पुरुष का शिरोवस्त्र धारण करती थी। वह खुले दरबार में अत्यन्त योग्यता के साथ शासन-कार्य का सम्पादन करती थी। इस प्रकार हर सम्भव तरीक़े से वह राजा का अभिनय करने का प्रयत्न करती थी। 
फिर भी बेगम के भाग्य में शान्तिपूर्ण शासन नहीं था। वह अबीसीनिया के एक दास जलालुद्दीन याक़ूत के प्रति अनुचित कृपा दिखलाने लगी तथा उसने उसे अश्वशालाध्यक्ष का ऊँचा पद दे दिया। इससे क्रुद्ध होकर तुर्की सरदार एक छोटे संघ में संघठित हुए।

दार्शनिकों के विचार
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इब्न बतूता का यह कहना ग़लत है कि अबीसीनियन के प्रति उसका चाव (लगाव) अपराधात्मक था। समकालीन मुस्लिम इतिहासकार मिनहाज़ ने इस तरह का कोई आरोप नहीं लगाया है। वह केवल इतना ही लिखता है कि अबीसीनियन ने सुल्ताना की सेवा कर (उसकी) कृपा प्राप्त कर ली।

फ़रिश्ता का उसके ख़िलाफ़ एकमात्र आरोप यह है कि, अबीसीनियन और बेगम के बीच अत्यधिक परिचय देखा गया, यहाँ तक की जब वह घोड़े पर सवार रहती थी, तब वह बाहों से उसे (रानी को) उठाकर बराबर घोड़े पर बिठा लेता था।

जैसा की मेजर रैवर्टी ने बतलाया है, टॉमस ने उचित कारण न रहने पर भी इस बेगम के चरित्र पर इन शब्दों में आक्षेप किया है, यह बात नहीं थी कि एक अविवाहिता बेगम को प्यार करने की मनाही थी-वह किसी भी जी-हुज़ूर वाले शाहज़ादे से शादी कर उसके साथ प्रेम के ग़ोते लगा सकती थी, अथवा राजमहल के हरम (ज़नानख़ाने) के अन्धेरे कोने में क़रीब-क़रीब बिना रोकथाम के आमोद-प्रमोद कर सकती थी; लेकिन राह चलते प्रेम दिखलाना एक ग़लत दिशा की ओर संकेत कर रहा था और इस कारण उसने (बेगम ने) एक ऐसे आदमी को पसन्द किया, जो कि उसके दरबार में नौकरी कर रहा था तथा वह एक अबीसीनियन भी था। जिसके प्रति दिखलाई गई कृपाओं का तुर्की सरदारों ने एक स्वर से विरोध किया।

अल्तूनिया से विवाह
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सबसे पहले सरहिन्द के शासक इख़्तियारुद्दीन अल्तूनिया ने खुले तौर पर विद्रोह किया, जिसे दरबार के कुछ सरदार गुप्त रूप से उभाड़ रहे थे। बेगम एक बड़ी सेना लेकर विद्रोह का दमन करने के लिए चली। किन्तु इस युद्ध में विद्रोही सरदारों ने याक़ूत को मार डाला तथा बेगम को क़ैद कर लिया। वह इख़्तियारुद्दीन अल्तूनिया के संरक्षण में रख दी गई। रज़िया ने अल्तूनिया से विवाह करके इस परिस्थिति से छुटकारा पाने का प्रयत्न किया, परन्तु यह व्यर्थ ही सिद्ध हुआ। वह अपने पति के साथ दिल्ली की ओर बढ़ी। लेकिन कैथल के निकट पहुँचकर अल्तूनिया के समर्थकों ने उसका साथ छोड़ दिया तथा 13 अक्टूबर, 1240 ई. को मुइज़ुद्दीन बहराम ने उसे पराजित कर दिया। दूसरे दिन रज़िया की उसके पति के साथ हत्या कर दी गई। इस तरह तीन वर्ष तथा कुछ महीनों के राज्यकाल के बाद कष्टपूर्वक रज़िया बेगम के जीवन का अन्त हो गया।

रज़िया के गुण
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रज़िया में अदभुत गुण थे। फ़रिश्ता लिखता है कि, “वह शुद्ध उच्चारण करके क़ुरान का पाठ करती थी तथा अपने पिता के जीवन काल में शासन कार्य किया करती थी।” बेगम की हैसियत से उसने अपने गुणों को अत्यधिक विशिष्टता से प्रदर्शित करने का प्रयत्न किया। समकालीन मुस्लिम इतिहासकार मिनहाजुस्सिराज ने लिखा है कि, “वह महती सम्राज्ञी चतुर, न्यायी, दानशील, विद्वानों की आश्रयदायी, न्याय वितरण करने वाली, अपनी प्रजा से स्नेह रखनेवाली, युद्ध कला में प्रवीण तथा राजाओं के सभी आवश्यक प्रशंसनीय विशेषणों एवं गुणों से सम्पन्न थी।” वह स्वयं सेना लेकर शत्रुओं के सम्मुख जाती थी। स्त्रियों के वस्त्र को छोड़ तथा बुर्के का परित्याग कर वह झिल्ली पहनती थी तथा पुरुष का शिरोवस्त्र धारण करती थी। वह खुले दरबार में अत्यन्त योग्यता के साथ शासन-कार्य का सम्पादन करती थी। इस प्रकार हर सम्भव तरीक़े से वह राजा का अभिनय करने का प्रयत्न करती थी। किन्तु अहंकारी तुर्की सरदार एक महिला के शासन को नहीं सह सके। उन्होंने घृणित रीति से उसका अन्त कर दिया। रज़िया के दु:खद अन्त से यह स्पष्ट हो जाता है कि अंधविश्वासों पर विजय प्राप्त करना सदैव ज़्यादा आसान नहीं होता।

रज़िया के पश्चात
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रज़िया की मृत्यु के पश्चात् कुछ काल तक अव्यवस्था एवं गड़बड़ी फैली रही। दिल्ली की गद्दी पर उसके उत्तराधिकारी मुइज़ुद्दीन बहराम तथा अलाउद्दीन मसूद गुणहीन एवं अयोग्य थे तथा उनके छ: वर्षों के शासनकाल में देश में शान्ति एवं स्थिरता का नाम भी न रहा। बाहरी आक्रमणों से हिन्दुस्तान (उत्तरी भारत) का दु:ख और भी बढ़ गया। 1241 ई. में मंगोल पंजाब के मध्य में पहुँच गए तथा लाहौर का सुन्दर नगर उनके निर्मम पंजे में पड़ गया। 1245 ई. में वे उच्च तक बढ़ आये। लेकिन उनकी बड़ी क्षति हुई और उन्हें पीछे हटना पड़ा। मसूद शाह के शासनकाल के अन्तिम वर्षों में असन्तोष अधिक प्रचण्ड एवं विस्तृत हो गया। अमीरों तथा मलिकों ने 10 जून, 1246 ई. को इल्तुतमिश के एक कनिष्ठ पुत्र नसीरूद्दीन महमूद को सिंहासन पर बैठा दिया।

एशिया की पहली महिला सुल्तान रज़िया (1214-1240ई०)
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महज़ 26 साल की उम्र में दिल्ली सल्तनत की फ़ौज से मुकाबला करते हुए राजपूताना के एक इलाक़े टोंक में वीरगति को प्राप्त हुई।अपनी मुख़तसर सी ज़िन्दगी में उसने मैदान ए जंग में उतर कर नौ युद्ध लड़े,हर युद्ध में अपना कौशल दिखाया और भारतीय इतिहास के आकर्षक व्यक्तित्वों में अपना नाम दर्ज कराया।उसके कारनामे तारीख़ साज़ थे।भारत में महिला सशक्तिकरण की पहली मिसाल रज़िया,हिन्दू-मुस्लिम एकता की पक्षधर रज़िया,महिला पुलिस,महिला बॉडी गार्ड और महिला गुप्तचर व्यवस्था की जन्मदात्री रज़िया,ख़ूब सूरती और ज़हानत की मिसाल रज़िया,भक्ति और शक्ति की प्रतीक रज़िया का किरदार निहायत दिलकश है।जब रज़िया बच्ची थी तो अपने पिता इल्तुतमिश के साथ ख़्वाजा बख़्तियार काकी र०अ०की बारगाह में हाज़िर हुई।क़ुतुब साहब ने उसे देखकर रज़िया के सर पर हाथ रखा और कहा,”यह बेटी मर्दों पर भारी है।”एक सिद्धपुरुष की वाणी सही साबित हुई।रज़िया ने उस दौर के बड़े बड़े सरदारों,सूबेदारों,अमीरों और मलिकों पर अपनी क़ाबलियत का सिक्का जमाया।इल्तुतमिश ने अपने जीवन में ही उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था लेकिन तुर्कों को एक महिला के अधीन रहना पसन्द नहीं था इसलिए इल्तुतमिश के दूसरे बेटे रुकनुद्दीन को तख़्त पर बैठा दिया।रुकनुद्दीन और उसकी माँ शाह तुर्कान ने इल्तुतमिश के दूसरे बेटों को मौत के घाट उतार दिया और रज़िया पर भी महल में जान लेवा हमले कराये।एक रोज़ जुमे की नमाज़ में रज़िया सुर्ख़ लिबास में अवाम से रूबरू हुई और मरहूम सुल्तान इल्तुतमिश की मंशा (वसीयत) बताई, महल में उसके खानदान के अफ़राद पर हुए अत्याचारों को इतने दिल दौज़ अंदाज़ में बयान किया कि दिल्ली के अवाम रज़िया के पक्ष में खड़े हो गए।उसने अवाम से वादा किया कि “अगर रज़िया सल्तनत की बिगड़ी हुई व्यवस्था को सुधारने में असफल रही तो अपना सर क़लम कराने का इक़रार करती है।”उसकी तक़रीर ने अवाम का दिल जीत लिया और उसे 19 नवम्बर 1236 के दिन दिल्ली सल्तनत के तख़्त पर बैठा दिया।यह तारीख़ का पहला मौक़ा था जब दिल्ली वालों ने अपना सुल्तान ख़ुद चुना था।रज़िया के सुल्तान बनते ही सूबेदारों ने बग़ावतें करदीं,वज़ीर ए आज़म जुनैदी ने भी रज़िया के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया।ऐसे मुसीबत के वक़्त में भी रज़िया ने संयम नहीं खोया,अपनी फ़ौज लेकर मैदान में आ डटी और कूटनीति के बल पर सभी विरोधियों को धूल चटा दी।अब उसने अपनी सल्तनत में सड़कें बनवाईं, व्यापार व्यवस्था को सुचारू किया,पुलिस और प्रशासन को जन कल्याण की सख़्त हिदायत दी,नए महकमात क़ायम किये और पूरी सल्तनत में अम्न व अमान को बहाल किया,ख़ुश हाली और आज़ादी का माहौल बनाया।प्रजा की सुख सुविधा और न्याय का बंदोबस्त किया।सारे अवाम ख़ुश थे लेकिन विरोधियों में साज़िश की खिचड़ी पक रही थी।रज़िया के प्रति प्रजा का प्रेम देखते हुए दिल्ली में रहते हुए रज़िया पर हावी होने की हिम्मत किसी में न थी चुनांचे साज़िशन भटिण्डा के सूबेदार अल्तूनिया ने बग़ावत करदी।उस बग़ावत को दबाने के लिए रज़िया अपनी फ़ौज लेकर भटिण्डा पहुंची ही थी कि षडयंत्रकारियों ने रज़िया को उसके ख़ेमे में ही गिरफ़्तार करके भटिण्डा के क़िले में मौजूद के क़ैदखाने में डाल दिया।यह रमज़ान का महीना था,रज़िया ने रमज़ान के रोज़े क़ैद में रह कर गुज़ारे।ईदुल फ़ित्र,ईदुल अज़हा वहीं क़ैदख़ाने में मनाई और कुछ माह और क़ैद में गुज़ारे।अल्तूनिया रज़िया की ख़ूब सूरती पर पहले से ही फ़िदा था,उसने क़ैदख़ाने में शादी का प्रस्ताव भेजा।रज़िया ने इस शर्त पर शादी का प्रस्ताव स्वीकार किया कि जल्द ही दिल्ली पर हमला करके सल्तनत पुनः हासिल करने में अल्तूनिया उसकी मदद करेगा।यह वही तुर्क अल्तूनिया है जिसने रज़िया और याक़ूत के सम्बन्धों पर उंगली उठाकर रज़िया को हुकूमत से बे दख़ल करने की साज़िश की थी।यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि रज़िया और याक़ूत के सम्बन्ध अगर अवैध होते तो अल्तूनिया कभी उससे शादी नहीं करता।यह उस समय की सियासत थी कि रज़िया को बदनाम करके हुकूमत किसी मर्द के हाथों में दी जाये।

 

बहरहाल रज़िया और अल्तूनिया ने अपनी फ़ौज इकठ्ठा की।राजपूत,जाट और खोखरों को साथ लेकर दिल्ली पर हमला किया लेकिन सल्तनत की फ़ौज का मुक़ाबला इनकी फ़ौज नहीं कर पाई,वापस नाकाम लौटना पड़ा।फिर से फ़ौज को तरबियत दी गयी और रज़िया हमले के लिए निकल पड़ी।उधर दिल्ली सल्तनत की फ़ौज भी रवाना होकर कैथल तक आ गई थी।दोनों फ़ौजों में मुठभेड़ हुई लेकिन रज़िया की फ़ौज नातजरबेकारी की वजह से तितर बितर हो गई।अल्तूनिया वहीं मारा गया,रज़िया अपने वफ़ादारों के साथ वहां से भाग निकलने में कामयाब हुई।लाहौर और मुल्तान में चूंकि तुर्क शासन कर रहे थे जो दिल्ली सल्तनत के वफ़ादार थे इसलिए रज़िया के पास एक मात्र विकल्प राजपूताने का रुख़ करना था।राजपूताना के हुक्मरान दिल्ली सल्तनत के कमज़ोरहोते ही खिराज देना बंद कर देते थे और आज़ाद हो जाते थे।सल्तनत का दुश्मन उनका दोस्त होता था।चुनांचे उन्होंने रज़िया का साथ दिया और उसकी मेहमानी की।दिल्ली का सुल्तान बहरामशाह रज़िया से ख़ौफ़ज़दा था इसलिए उसने रज़िया को ढूँढकर ठिकाने लगाने के लिए एक फ़ौजी टुकड़ी पीछे लगा रखी थी।रज़िया राजपूताना के टोंक में भेष बदल कर रह रही थी।दिल्ली की फ़ौज ने उसे चारों तरफ़ से घेर लिया।रज़िया और उसके साथी बहादुरी से लड़े और लड़ते लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए।उस समय यहाँ टोंक में रज़िया का मेज़बान ठिकानेदार ग़ालिबन राजा कल्याणदेव था।उसने और बहराम शाह के फ़ौजियों ने रज़िया को टोंक स्थित दरिया शाह के इलाक़े में दफ़्न किया जहाँ आज भी उसका वास्तविक मज़ार उसकी वीरता और बलिदान की कहानी सुनाता है।अगर रज़िया तुर्कों की साज़िश का शिकार नहीं होती तो भारत का इतिहास बदल कर रख देती,ऐसा इतिहाकारों का मत है।आज 19नवम्बर रज़िया की ताजपोशी का दिन होने के साथ साथ वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई(1835) और “आइरन लेडी”इन्दिरा गांधी(1917) की जन्मतिथि भी है।

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Razia Sultan Biography : Childhood | Love Life | Region | Death

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Razia Sultan, a brave sultan belonged to slave dynasty and was the first muslim women to rule India and only women to occupy the throne of Delhi. She succeeded her father Shams-ud-din Iltutmish to the Sultanate of Delhi in 1236. Razia Sultana was talented, wise, brave, excellent administrator, and a great warrior that attracted her father which resulted that she became the next sultan of Slave dynasty. Though her reign was just for three years, her bravery, her struggle and her undaunted spirit has been preserved in the treasures of history. Razia Sultan’s Tomb in Delhi is one of those places, which relives the unthwarted spirit of the brave woman who ruled Delhi once and for all.

Childhood & Early Life
Razia Sultan father Shams ud-Din Iltutmish belonged to the Ilbari tribe in the Eurasian steppes of Turkestan and was sold into slavery at an early age. He became a favourite of his master Qutb ud din Aibak, founder of the Mamluk dynasty and the first Sultan of Delhi. Aibak married his daughter Qutb Jaan to Iltutmish. The couple welcomed their daughter Raziya Begum bint. Shams-ud-Din Iltutmish (Razia) in c. 1205, in Budaun, Uttar Pradesh, India.

 

Razia Sultan had a full brother Nasiruddin Mahmud. Since her childhood Razia Sultana had the privilege to behold the power of the harem which was dominated by her mother as also that of the court where she had access as a favourite of both her father Iltutmish and maternal grandfather Aibak. Rukn ud din Firuz and Muiz ud din Bahram were her half-brothers born through former slave-girls. Aibak died in 1210 AD when Razia was five years old. He was succeeded by Aram Shah. Iltutmish was invited by a group of 40 Turkic nobles called the “Chihalgani” to take the throne of Delhi Sultanate as they were against Shah. In 1211 Shah and Iltutmish met on the plain of Bagh-i-Jud near Delhi where the former was defeated by Iltutmish who then became third ruler of Delhi Sultanate.

Razia Sultana grew up as a brave young girl who took training in military skills and professional warfare like her brothers. Iltutmish would allow his favourite child Razia Sultan to be around him while he handled affairs of the state. Razia Sultana also received training on how to administer an empire in absence of a male ruler like some of the princesses of those times. Razia Sultan thrived in impressing her father with her skills and perseverance in carrying out her tasks and duties.

After Death of Razia Sultan’s Father
One of Iltutmish sons, Rukn-ud-din Firuz occupied the throne. He ruled Delhi for about seven months. In 1236, Razia Sultana defeated her brother with the support of the people of Delhi.

FALLING IN LOVE
No other thing can stop Razia Sultana except love. The reason behind end of her was her unacceptable love. Jamal-ud-Din Yaqut, an African Siddi slave turned noble man who was a close confidante to her and was speculated to be her lover. Though it happened behind the many veils and doors their relationship was not secret in the Delhi High court.

Malik Ikhtiar-ud-din Altunia, the governor of Bhatinda, was against such relationship of Razia Sultan. The story goes that Altunia and Raziya were childhood friends. As they grew up together, he fell in love with Raziya and the rebellion was simply a way of getting back Razia Sultan.

Accession & Reign of Razia Sultan
Razia Sultan proved her efficiency as a ruler. Razia Sultan gave up purdah as also the women attire for Muslims and wore attire that was similar to the ones worn by rulers before her. The conservative Muslims were however shocked and did not like her move of breaking the custom by giving up the veil and displaying her face in public. Razia Sultana ran her government adroitly and confidently and at the same time demonstrated her warrior skills by riding an elephant and leading her forces from the front in the battles as the chief of her army. Razia Sultan captured new territories thus fostering her kingdom.

During her reign, Razia Sultan made significant reforms in government thus displaying her skills as a competent administrator. Razia Sultana established proper law and order in her empire and made attempts in bettering the infrastructure of the country by digging wells, building roads and encouraging trade. A secular ruler, Razia made efforts in safeguarding and conserving the inherent culture of the Hindu subjects in her reign. Razia Sultan attempted to do away with the tax imposed on non-Muslims, but was opposed by the nobility. Razia Sultana set up schools, centers for research and academies apart from public libraries that had the Quran and the traditions of the Prophet as well as works of ancient philosophers. Schools and colleges also imparted lessons from Hindu works in literature, astronomy, philosophy and science. Razia Sultana was also a patron of art and culture and supported musicians, poets and painters. Razia Sultan ordered coins that would be minted with her name engraved.

Succession to the Throne
Razia Sultan full brother and eldest son of Iltutmish, Nasiruddin Mahmud was the heir apparent of Iltutmish and was therefore groomed to succeed his father. Nasiruddin Mahmud became the governor of Bengal and was bestowed with the title of Malik-us-Sharq (Lord of the East) by his father. However after his sudden death in 1229 CE, Iltutmish became worried of a worthy successor as he felt all his surviving sons born of his other wives were incapable to rule.

Razia Sultan demonstrated her capability by acting as an able regent with the support of a loyal minister of Iltutmish while the latter left Delhi in 1230 to invade Gwalior. After a one-year siege Iltutmish captured Gwalior and returned to Delhi in 1231 and was impressed to see his daughter’s performance. He nominated Razia Sultana as his heir apparent while in death bed in 1236 and with this he made history by becoming the first ever Sultan to break all norms and designate a woman as successor. However the nobles of the court were not happy to have a woman as ruler and thus did not support Razia Sultan. Upon her father’s death on April 30, 1236, her half-brother Rukn ud din Firuz was made the fourth sultan of the Mamluk Sultanate.

The newly crowned Rukn ud din Firuz was a self-endowed person and indulged himself in personal pleasures including resolving in music, and debauchery which caused much indignation among the people of the kingdom. His mother Shah Turkaan took advantage of his casual attitude as a king and grasped all powers in her hand and started running the government. Shah Turkaan proved to be a despotic ruler who directed execution of several people of the kingdom. Eventually Rukn ud din Firuz was considered an unfit ruler and on November 9, 1236, he and his mother were murdered. The nobility then reluctantly agreed the ascension of Razia to the throne as the fifth sultan of the Mamluk Sultanate. This made her the first and only female ruler of the Delhi Sultanate. Her coronation ceremony was held on November 10, 1236 and she started reigning with the Regnal name of Jalâlat-ud-Dîn Raziyâ.

Major Work of Razia Sultan

Being an efficient ruler Razia Sultana set up proper and complete law and order in her in his empire. Razia Sultan tried to improve the infrastructure of the country by encouraging trade, building roads, digging wells and also she established schools, academies, centers for research, and public libraries that included the works of ancient philosophers along with the Quran and the traditions of Muhammad. Hindu works in the sciences, philosophy, astronomy, and literature were reportedly studied in schools and colleges. Razia Sultana contributed even in the field of art and culture and encouraged poets, painters and musicians.

Achievements of Razia Sultan
The greatest achievement for the Razia Sultan was that she successfully won the confidence of her people. Razia Sultana had all the support of the common peoples.

The governor of the Multan or Hansi or Lahore and Badaun joined by Junaidi, they Wazir encamped their troops near Delhi. Razia Sultana did not possess adequate forces to engage them in the open conflict. Razia Sultan therefore led her forces out of the fort but tried to gain her end by diplomacy rather than by war.

 

Death of Razia Sultan
When the Razia Sultan was trying to curb a rebellion against her by the Turkish Governor of Batinda, the Turkish nobles who were against such female throne, took advantage of her absence at Delhi and dethroned her. Her brother Bahram was crowned.

To save her own head, Razia Sultana sensibly decided to marry Altunia, the governor of Batinda and marched towards Delhi with her husband. On October 13, 1240, Razia Sultan was defeated by the Bahram and the unfortunate couple was put to death the very next day.

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PROPHET MUHAMMAD’S (PBUH) LETTERS TO VARIOUS KINGS

After settling down in Medina on return from Hudaibiya, the Prophet (peace and blessings of Allah be upon him) instituted another plan for the spread of his Message. When he mentioned this to the Companions, some of them who were acquainted with the customs and forms observed in the courts of kings told the Prophet (peace and blessings of Allah be upon him) that kings did not entertain letters which did not bear the seals of the senders. Accordingly the Prophet (peace and blessings of Allah be upon him) had a seal made on which were engraved the words, Muhammad Rasulullah (peace and blessings of Allah be upon him).

Out of reverence, Allah was put at the top, beneath it Rasul and lastly Muhammad (peace and blessings of Allah be upon him).

The invitation to Islam was an invitation to believe that God is One and that Muhammad (peace and blessings of Allah be upon him) is His Messenger. Where the letter says that if Heraclius becomes a Muslim, he will be rewarded twice over, the reference is to the fact that Islam teaches belief in both Jesus and Muhammad (peace and blessings of Allah be upon him).

In Muharram 628, envoys went to different capitals, each with a letter from the Prophet (peace and blessings of Allah be upon him), inviting the rulers to accept Islam. Envoys went to Heraclius, the Roman Emperor, the Kings of Iran, Egypt (the King of Egypt was then a vassal of the Kaiser) and Abyssinia. They went to other kings and rulers also.

The letter addressed to the Kaiser was taken by Dihya Kalbira. The text of the letter which the Prophet (peace and blessings of Allah be upon him) wrote to the Kaiser is to be found in historical records. It runs as follows:

From Muhammad (peace and blessings of Allah be upon him),the Servant of Allah and His Messenger. To the Chief of Rome, Heraclius. Whoever treads the path of divine guidance, on him be peace. After this, O King, I invite you to Islam. Become a Muslim. Allah will protect you from all afflictions, and reward you twice over. But if you deny and refuse to accept this Message, then the sin not only of your own denial, but of the denial of your subjects, will be on your head. “Say, ‘O People of the Book! come to a word equal between us and you that we worship none but Allah, and that we associate no partner with Him, and that some of us take not others for lords beside Allah.’ But if they turn away, then say, ‘Bear witness that we have submitted to God’ ”.

LETTER TO THE KING OF IRAN

The letter to the King of Iran was sent through ‘Abdullah bin Hudhafara (may Allah be pleased with him). The text of this letter was as follows:

“In the name of Allah, the Gracious, the Merciful. This letter is from Muhammad (peace and blessings of Allah be upon him), the Messenger of Allah, to Chosroes, the Chief of Iran. Whoever submits to a perfect guidance, and believes in Allah, and bears witness that Allah is One, and has no equal or partner, and that Muhammad (peace and blessings of Allah be upon him) is His Servant and Messenger, on him be peace. O King, under the command of Allah, I invite you to Islam. For I have been sent by God as His Messengersa to all mankind, so that I may warn all living men and complete my Message for all unbelievers. Accept Islam and protect yourself from all afflictions. If you reject this invitation, then the sin of the denial of all your people will rest on your head.”

THE LETTER TO THE NEGUS

The letter to the Negus, King of Abyssinia, was carried by ‘Amr bin Umayya Damrira (may Allah be pleased with him). It ran as follows:

“In the name of Allah, the Gracious, the Merciful, Muhammad (peace and blessings of Allah be upon him), the Messenger of Allah, writes to the Negus, King of Abyssinia. O King, peace of Allah be upon you. I praise before you the One and Only God. None else is worthy of worship. He is the King of kings, the source of all excellences, free from all defects, He provides peace to all His servants and protects His creatures. I bear witness that Jesus, son of Mary (as) was a Messenger of Allah, who came in fulfilment of promises made to Mary by God. Mary had consecrated her life to God. I invite you to join with me in attaching ourselves to the One and Only God and in obeying Him. I invite you also to follow me and believe in the God Who hath sent me. I am His Messenger. I invite you and your armies to join the Faith of the Almighty God. I discharge my duty hereby. I have delivered to you the Message of God, and made clear to you the meaning of this Message. I have done so in all sincerity and I trust you will value the sincerity which has prompted this message. He who obeys the guidance of God becomes heir to the blessings of Allah.”

LETTER TO THE RULER OF EGYPT

The letter to Muqauqis was carried by Hatib ibn Abi Balta‘ara (may Allah be pleased with him). The text of this letter was exactly the same as that to the Roman Emperor. The letter to the Roman Emperor said that the sin of the denial of the Roman subjects would be on his head. The letter to the Muqauqis said that the sin of the denial of the Copts would be on the head of the ruler. It ran as follows:

“In the name of Allah, the Gracious, the Merciful. This letter is from Muhammad (peace and blessings of Allah be upon him), the Messenger of Allah, to Muqauqis, the Chief of the Copts. Peace be upon him who follows the path of rectitude. I invite you to accept the Message of Islam. Believe and you will be saved and your reward will be twofold. If you disbelieved, the sin of the denial of the Copts will also be on your head. Say, “O People of the Book! come to a word equal between us and you that we worship none but Allah, and that we associate no partner with Him, and that some of us take not others for lords beside Allah. But if they turn away, then say, ‘Bear witness that we have submitted to God.’”(Halbiyya, Vol. 3, p. 275).

LETTER TO CHIEF OF BAHRAIN

The Prophet (peace and blessings of Allah be upon him)also sent a letter to Mundhir Taimi, Chief of Bahrain. This letter was carried by ‘Ala’ ibn Hadramira (may Allah be pleased with him). The text of this letter has been lost. When it reached this Chief, he believed, and wrote back to the Prophet (peace and blessings of Allah be upon him) saying that he and many of his friends and followers had decided to join Islam. Some, however, had decided to stay outside. He also said that there were some Jews and Magians living under him. What was he to do about them?

The Prophet (peace and blessings of Allah be upon him) wrote again to this Chief thus:

“I am glad at your acceptance of Islam. Your duty is to obey the delegates and messengers whom I should send to you. Whoever obeys them, obeys me. The messenger who took my letter to you praised you to me, and assured me of the sincerity of your belief. I have prayed to Allah for your people. Try, therefore, to teach them the ways and practices of Islam. Protect their property. Do not let anyone have more than four wives. The sins of the past are forgiven. As long as you are good and virtuous you will continue to rule over your people. As for Jews and Magians, they have only to pay a tax. Do not, therefore, make any other demands on them. As for the general population, those who do not have land enough to maintain them should have four dirhams each, and some cloth to wear.”

Uman, the Chief of Yamama, the King of Ghassan, the Chief of Bani Nahd, a tribe of Yemen, the Chief of Hamdan, another tribe of Yemen, the Chief of Bani ‘Alim and the Chief of the Hadrami tribe. Most of them became Muslims.

These letters show how perfect was the Prophet’s (peace and blessings of Allah be upon him) faith in God. They also show that from the very beginning the Prophet (peace and blessings of Allah be upon him) believed that he had been sent by God not to any one people or territory, but to all the peoples of the world. It is true that these letters were received by their addressees in different ways. Some of them accepted Islam at once. Others treated the letters with consideration, but did not accept Islam. Still others treated them with ordinary courtesy. Still others showed contempt and pride. But it is true also—and history is witness to the fact—that the recipients of these letters or their peoples met with a fate in accordance with their treatment of these letters.

FROM CANDY TO SERENDIPITY; ARABIC WORDS IN THE ENGLISH LANGUAGE

The English language has absorbed all manner of Arabic words over the centuries. Surprising entries include the word ‘jar,’ and ‘serendipity,’ adapted from the Arabic language and now used with no reference to their Middle Eastern origin.

A selection of interesting and unexpected English words, derived from Arabic, highlight the historical relationship between the two cultures.

The word Assassin, for example, comes from the Arabic ‘al-Hashashoon’ meaning hashish eater. The word refers back to the Crusades in the 1200’s during which the leader of Northern Persia would send armed men on targeted killing missions while intoxicated with the drug.

Ghoul, a particularly frightening ghost, is also derived from Arabic according to Gulf News on Tuesday.

The word first appeared in Europe in 1712 in a French translation of the epic 1001 Arabian Nights.

Serendipityfinds its root in Serendip, the Arabic denomination for Sri Lanka which is in turn derived from the Sanskrit name for the country; Suvarnadweep. The word was first introduced by English writer Horace Walpole in 1754 in his fairy tale The Three Princes of Serendip.

Surprisingly, a word as common as Jar is also derived from Arabic. Jarra is the term used for a large earthenware container made of pottery. The first recorded use of the word in English was made in reference to olive oil containers in the 1400’s.

The word Algorithm was thought up by famous Arab mathematician Mohammad Musaal- Khwarizmi, who worked in Baghdad in the 800’s. It filtered into Medieval Latin before entering the English language.

The Arabic Qand turned into the English for Candy, a general word for a sweet treat. The Arabic form was used to denote a crystallized mass of sugar and was initially derived from Persian, which in turn was rooted in Sanskrit as sugar cane was grown in India.

A Tabby catis a striped feline with brindled fur, it is not widely known that the word is an adaptation of its original meaning used to describe watered silk fabric. The English language took the word from the Arabic Attabi for silk, which in turn came from Attabiyah, a quarter of Baghdad where the silk was made.

 

आप_मुसलमान_क्यों_हैं

★#आप_मुसलमान_क्यों_हैं★

यह एक बिल्‍कुल साफ और ज़ाहिर सवाल है लेकिन हममें से कई लोगों के पास इसका साफ जवाब नहीं होता है। मेरा पहला जवाब खानदान मुसलमान है इसलिए के हमारा परिवार मुसलमान है उसके बाद असल सवाल ज्यों का त्यों लेकिन उसके जवाब ने मुझे सोचने पर मज़बूर कर दिया जब उसने कहा अगर तुम्‍हारा परिवार हिन्‍दू या ईसाइ होता तो क्‍या तुम वही होते तो मेरा जवाब था के नहीं इस्‍लाम हक़ है। उसके बाद मुझे इस सवाल ने अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोचने पर मज़बूर कर दिया और ज़िन्दगी की बुनियाद पर ही सवालिया निशान लगा दिया और मेरी ज़िन्दगी को बदल कर रख दिया।

उसने इस बात पर मुझे सोचने पर मज़बूर किया के मैं कैसे साबित करूँ कि इस्‍लाम हक़ है ना कि हम इस पर एक जज़बाती और अंधे तौर पर यक़ीन रखते है। हक़ीक़त यह है के अल्‍लाह سبحانه وتعال ने उन लोगों की तर्दीद (खण्‍डन) की है जो अपने बाप-दादाओं की अंधी तक़्लीद करते है और अपने अक़ीदे को बिना दलायल को इख्तियार करते है। अल्‍लाह سبحانه وتعال ने क़ुरआन मजीद में बयान फरमाया है :

وَمَا لَهُمْ بِهِ مِنْ عِلْمٍ إِنْ يَتَّبِعُونَ إِلا الظَّنَّ وَإِنَّ الظَّنَّ لا يُغْنِي مِنَ الْحَقِّ شَيْئًا

” और इस बात को कुछ भी नहीं जानते महज़ वहम व गुमान पर चलते हैं और बैशक़ वहम व गुमान हक़ का 
मुतबादिल नहीं हो सकता।” (तर्जुमा मआनिए क़ुरआन, अन नजम – 28)

مَا لَهُمْ بِهِ مِنْ عِلْمٍ إِلا اتِّبَاعَ الظَّنِّ وَمَا قَتَلُوهُ يَقِينًا

”उनको इल्‍मुल यक़ीन नहीं है और वोह नहीं करते मगर वहम व गुमान की पैरवी। और यक़ीनन उन्‍होंने (ईसा को) क़त्‍ल नहीं किया” (तर्जुमा मआनिए क़ुरआन, अन्निसा – 157)

إِنْ هِيَ إِلا أَسْمَاءٌ سَمَّيْتُمُوهَا أَنْتُمْ وَآبَاؤُكُمْ مَا أَنْزَلَ اللَّهُ بِهَا مِنْ سُلْطَانٍ إِنْ يَتَّبِعُونَ إِلا الظَّنَّ وَمَا تَهْوَى الأنْفُسُ وَلَقَدْ جَاءَهُمْ مِنْ رَبِّهِمُ الْهُدَى

‘यह कुछ नहीं मगर सिर्फ वोह नाम है जो तुमने और तुम्‍हारे बाप-दादाओं ने खुद गढ़ लिये है, जिसके लिए अल्‍लाह سبحانه وتعال ने कोई दलील नहीं उतारी है। और वोह इत्तिबा नहीं करते मगर सिर्फ वहम व गुमान और ज़न की और अपनी नफ्स की। इसके बावजूद भी के उनके पास रहनुमाई आ गयी है उनके रब की तरफ से।” (तर्जुमा मआनिए क़ुरआन, अन नजम- 23)

قُلْ هَلْ عِنْدَكُمْ مِنْ عِلْمٍ فَتُخْرِجُوهُ لَنَا إِنْ تَتَّبِعُونَ إِلا الظَّنَّ وَإِنْ أَنْتُمْ إِلا تَخْرُصُونَ

”क्‍या तुम्‍हारे पास ईल्‍म है जिसका तुम दावा करते हो ताके तुम दलील के तौर पर उसे ला सको? तुम नहीं चलते मगर सिर्फ वहम व गुमान।” (तर्जुमा मआनिए क़ुरआन, अल अनाम- 148)

दूसरे धर्मो के मानने वालों के पास निश्‍चित तौर पर अपने अक़ीदे (आस्था) को अक़्ली तौर पर सहीह साबित करने का कोई सबूत नहीं है, इसलिए वोह उनके धर्म पर ज़ज्‍बाती तौर पर या सिर्फ अंधी तक्‍लीद के तौर पर ईमान रखते है, हममें से कोई यह सोच सकता है के हम में बिना वाजे़ह दलील के भी ईमान हो सकता है। हाँलाकि जबकि हम ज़िन्दगी के आम मामलात में देखते है तो हम पाते है कि लोग छोटी-छोटी बातों में भी सोच विचार करते है जैसाकि उन्‍हें कार खरीदना हो, घर खरीदना हो, अगर उन्‍हें यूनिवर्सिटी का कोई कोर्स करना है या उनको कोई नोकरी या बिज़नेस करना हो, ऐसा कैसे हो सकता है के जब ज़िन्दगी के बारे में सबसे अहम सवाल का मामला आए जिससे हमें अपनी ज़िन्दगी का मक़सद पता लगता है तो हम यह कहते है के हमारे पास सिर्फ ईमान होना चाहिए जबकि हम पूरी तरह से उससे मुतमईन नहीं होते। 
इसलिए यह बहुत अहम है के एक मुसलमान बिना किसी शक के अल्‍लाह سبحانه وتعال के वजूद पर, हज़रत मुहम्मद (صلى الله عليه وسلم) की रिसालत पर इमान लाये और यह की क़ुरआन अल्‍लाह سبحانه وتعال की आखरी किताब है, जो वह्यी के ज़रिए इन्‍सानों के लिये नाज़िल हुई है, और यह की अल्‍लाह سبحانه وتعال की तरफ से क़ुरआन एक आखरी किताब है जो ज़िन्दगी के दस्तूर के तौर पर तमाम इंसानो के पास भेजी गई है। इस्‍लाम दूसरे मज़हबों की तरह नहीं है क्‍योंकि इसमे ईल्‍मे यक़ीन यानी यकीनी दलील पाये जातें है जो दिल व दिमाग को मुतमईन करतें है।

हज़रत आदम अलैहिस्सलाम पर नाज़िल ताबूत सकीना, जिसे यहुदी शिद्दत से खोज रहे हैं, लेकिन…

ये ताबूत शमशार की लकड़ी का एक संदूक था जो हज़रत आदम अलैहिस्सलाम पर नाज़िल हुआ था। यह आपकी आखरी ज़िंदगी तक आपके पास ही रहा फिर बतौर मिरा के बाद दीगरे आप की औलाद को मिलता रहा।

यहां तक कि यह हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम को मिला और आप के बाद आप की औलाद बनी इसराइल के कब्ज़े में रहा और जब यह संदूक हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को मिल गया तो आप उसमें तौरात शरीफ और अपना खास खास सामान रखने लगे।
यह बड़ा ही मुकद्दस और बा बरकत संदूक था बनी इसराइल जब कुफ्फार से जिहाद करते थे और कुफ्फार के लशकरों की कसरत और उनकी शौकत देख कर सहम जाते और उनके सीनों में दिल धड़कने लगते तो वह उस संदूक को अपने आगे रख लेते थे तो उस संदूक से ऐसी रहमतों और बरकतों का ज़हूर होता था कि मुजाहिदीन के दिलों में सकून व इत्मीनान का सामान पैदा हो जाता था और मुजाहिदीन के सीनों में लरज़ते हुए दिल पत्थर की चट्टानों से ज़्यादा मज़बूत हो जाते थे।
और जिस कदर संदूक आगे बढ़ता था आसमान से (नसरूम मिनल्लाही वफ्तहुंन करीब) की बशारत अज़्मा नाज़िल हुवा करती और फत्ह मुबीन हासिल हो जाया करती थी। बनी इसराइल में जब कोई इख़्तिलाफ़ पैदा होता था तो लोग उसी संदूक से फैसला कराते थे संदूक से फैसला की आवाज़ और फतह की बशारत सुनी जाती थी बनी इसराइल उस संदूक को अपने आगे रखकर और उसको वसीला बनाकर दुआएं मांगते थे तो उनकी दुआएं मकबूल होती थी और बालाओं की मुसीबतें और वबाओं की आफतें टल जाया करती थी।

अल्गर्ज़ यह संदूक बनी इसराइल केलिए ताबूत सकीना बरकत व रहमत का खजीना और नुसरत खुदावंदी की नज़ूल का नेहायत मुक़द्दस और बेहतरीन ज़रिया था मगर जब बनी इसराइल तरह-तरह के गुनाहों में मुलौविस हो गए और उन लोगों में म्आसी व तुगियान और सरकरशी व असीयान का दौर हो गया तो उन्की ब्दआमालियों की नहूस्त से उन पर खुदा का यह ग़ज़ब नाज़िल हो गया कि कौम अमाल्का के कुफ्फार ने एक लश्कर ज़र्रार के साथ उन लोगों पर हमला कर दिया।
उन काफिरों ने बनी इसराइल का कत्लेआम करके उनकी बस्तियों को ताखत व ताराज कर डाला इमारतों को तोड़-फोड़ कर सारे शहर को तहस-नहस कर डाला और उस मोतबर्रक संदूक को भी उठा कर ले गए उस मुक़द्दस तबर्रक को नजास्तों के कुड़े खाना में फेंक दिया लेकिन उस बे अदबी का कौम अमाल्का पर यह वबाल पड़ा कि यह लोग तरह तरह की बीमारियों और बालाओं में मुब्तला कर दिए गए चुनांचे कौम अमाल्का के पांच शहर बिलकुल बर्बाद और वीरान हो गए यहां तक कि उन काफिरों को यकीन हो गया कि यह संदूक रहमत की बेअदबी का अज़ाब हम पर पड़ गया है तो उन काफिरों की आंखे खुल गई चुनांचे उन लोगों ने उस मुक़द्दस संदूक को एक बैलगाड़ी पर लाद कर बैलों को बनी इसराईल की बस्तियों की तरफ हांक दिया।

फिर अल्लाह ताला ने चार फरिश्तों को मुकर्रर फरमा दिया जो उस मुबारक संदूक को बनी इसराइल के नबी हज़रत शमवील अलैहिस्सलाम की खिदमत में लाएं इस तरह फिर बनी इसराइल की खोई हुई नेमत दुबारा उनको मिल गई और ये संदूक ठीक उस वक्त हज़रत श्मवील अलैहिस्सलाम के पास पहुंचा जबकि हज़रत शमवील अलैहिस्सलाम ने तालूद को बादशाह बना दिया था और बनी इसराइल तालुद की बादशाही तस्लीम करने पर तैयार नहीं थे और यही शर्त ठहरी थी की मुक़द्दस संदूक आ जाए तो हम तालुद की बादशाही तस्लीम कर लेंगे चुनांचा संदूक आ गया और बनी इसराइल तालूद की बादशाही पर रज़ामंद हो गए
(تفسیر الصاوی.ج ا.ص 209.تفسیر روح البیان.ج ا.
ص 385.پ2.البقرہ237)

कुरआन मजीद में खुदावंद कुद्दूस ने सूरह बकरह में उस मुकद्दस संदूक का तज़किरा फरमाते हुए इरशाद फरमाया की तर्जुमा: और उनसे उनके नबी ने फरमाया उसकी बादशाही की निशानी यह है कि आए तुम्हारे पास ताबूत जिसमें तुम्हारे रब की तरफ से दिलों का चैन है और कुछ बची हुई चीज़ें हैं मोअज़्ज़ मूसा और मोअज़्ज़ हारून के तर्का की उठाते लाएगें उसे फरिश्ते बेशक उसमें बड़ी निशानी है तुम्हारे लिए अगर ईमान रखते हो
(پ2البقرہ248

ताबूत सकीना में क्या था

उस मुक़द्दस संदूक में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का असा और उनकी मुकद्दस जूतियां और हज़रत हारुन अलैहिस्सलाम का अमामा हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम की अंगूठी तौरात की तख्तियों के चंद टुकड़े कुछ मनवा सलवा उसके अलावा हज़रात अंबियाए केराम अलैहिस्सलाम की सूरतों के हुलिए वगैरह सब सामान थे।
(तफ्सीर रुहुल अल्बयान जिल्द 1 सफा 389 पा 2 अल्बकरह 298)
ताबूत सकीना कहां है
हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के ज़माने तक उस ताबूत को रखने के लिए कोई खास इंतज़ाम नहीं था और उसके लिए पड़ाओ की जगह पर एक अलग खेमा लगा दिया जाता था हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने खुदा के हुक्म से खुदा का घर बनाना शुरू किया जो एन उस मक़ाम पर है।
जहां आज मस्जिद अक्सा मौजूद है लेकिन यह आलीशान घर आपके बेटे हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम के अहद में मुकम्मल हुआ। और उसको यहूदी हैकल सुलेमानी के नाम से पुकारते हैं उस घर की तामीर के बाद ताबूत सकीना को यहां पूरे एहतराम के साथ रख दिया गया और इस तरह ये मक़ाम यहूदियों के मुकद्दस तरीन मकाम बन गया बाद के ज़माने में होने वाली जंगों ने इस हैकल को बहुत नुकसान पहुंचाया।

लेकिन बाबल के बादशाह बख्त नसर ने उसको मुकम्मल तौर पर तबाह कर दिया और उसको आग लगा दी वोह यहां से माल गनीमत के साथ साथ ताबूत सकीना भी ले गया था इस तबाही के नतीजे में आज असली हैंकल की कोई चीज़ बाकी नहीं है!

इन तमाम तबाहियों के नतीजे में ताबूत सकीना कहीं गायब हो गया और उसका कोई निशान नहीं मिला आज भी बहुत सारे माहिर आसार कदीमा और खुसुसन यहूदी मज़हब से ताल्लुक रखने वाले माहिर उसकी तलाश में सरगर्दा हैं ताकि उसको ढूंढकर वह अपने उसी रूहानियत को वापस पा सकें जो कभी उनको अता की गई थी ताबूत सकीना की मौजूदह जगह के बारे में मुख़्तलिफ़ लोग कयास आराईयां करते रहते हैं उस पर अंग्रेज़ ईसाईयों और यहूदियों ने बड़ी रिसर्च की हैं लेकिन हत्तमी तौर पर सारे एक नुक़्ते पर मुत्तफिक नहीं हो सके।

लेकिन मुझे जो सबसे करीन कयास थ्योरी लगती है वो ये कि इस वक़्त यह संदूक या ताबूत हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम के महल में कहीं दफ़न है जो फलीस्तीन में आज भी गुम है जिसको यहूदी काफी अरसे से ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं और आए दिन वहां बैतूल मुक़द्दस में खुदाई करते रहते हैं यह वही महल है जिसको हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने जिन्नात की मदद से बनाया था।

उसकी बुनियादों को आज भी ढूंढने की कोशिश की जा रही हैं जिसको हैकल सुलेमानी भी कहते हैं बहरहॉल उसके मुताबिक बहुत से नज़रियात हैं और मेरा ख्याल है कि यह ताबूत अबभी हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम के महल के अंदर ही कहीं दफन है।कुछ के नज़दीक उसको अफ्रीका ले जाया गया एक मशहूर माहिर असार कदीमा रान वाइट का कहना है क यह मुशरिक वस्ता में मौजूद है कुछ लोगों के मुताबिक इसको ढूंढने की कोशिश इंग्लैंड के इलाके में करनी चाहिए जबकि कुछ स्कॉलर्ज़ का मानना है कि यह ताबूत इथोपिया के तारीखी गिरजाघर एक्सम में पड़ा हुआ है।
एक और नज़रिया है कि यह बह्एर्ह मुराद के करीब एक गार के अंदर कहीं गुम हो चुका है और एक नजरिया यह भी है की यहूदियों ने 1981 में उसे हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम के पहले महल से खुदाई के दौरान निकालकर कहीं नामालूम जगह पर मूनतकिल कर दिया है जब की खुदाई करने वाले यहूदियों का कहना था की वोह उस संदूक के बिल्कुल करीब पहुंच गए थे।

लेकिन इसराइली गवर्नमेंट ने मुसलमानों और ईसाइयों के परेशर में आकर उसकी खुदाई पर पाबंदी लगा दी थी इसलिए उन्हें ये काम ना मुकम्मल ही छोड़ना पड़ा।
आज भी बहुत सारे माहिर आसार कदीमा और खूसूसन यहूदी मज़हब से ताल्लुक रखने वाले माहिर उसकी तलाश में सरकरदा हैं ताकि उसको ढूंढकर वह अपनी उसी रूहानियत को वापस पा सकें जो कभी उनको अता की गई थी। ताबूत सकीना की मौजूदह जगह के बारे में मुख्तलिफ लोग कयास आराईयां करते रहते हैं।
कुछ के नज़दीक उसको अफ्रीका ले जाया गया एक मशहूर माहिर आसार कदीमा रान वाइट का कहना है कि हेमू मुशरिक वस्ता में मौजूद है और कुछ लोगों के मुताबिक उसको ढूंढने की कोशिश इंग्लैंड के इलाके में करनी चाहिए बहर हाल कोशिशें जारी हैं लेकिन ता हाल उन्हें नाकामी का सामना है!!