सूरे फ़ातिर : : पवित्र क़ुरआन अज्ञानता और अंधकार से मुक्ति दिलाता है!

#ईश्वरीय वाणी पार्ट 48 : सूरे फ़ातिर : : पवित्र क़ुरआन अज्ञानता और अंधकार से मुक्ति दिलाता है!

फ़ातिर का अर्थ चीरने वाला है और यहां पर फ़ातिर का अर्थ पैदा करने वाला है और इसकी गणना महान ईश्वर की विशेषताओं में होती है।

महान ईश्वर इस सूरे की दूसरी आयत में फरमाता है ईश्वर जो दयालुता लोगों के लिए खोल दे उसे कोई रोकने वाला नहीं है और जिसे वह रोक ले तो उसके बाद उसे कोई जारी करने वाला नहीं है वह अत्यंत प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है।“

हर प्रकार की दया व कृपा का स्रोत महान ईश्वर है और वह जिसे भी इसका योग्य पाता है उसे अपनी दया व कृपा का पात्र बनाता है और जहां ज़रूरत होती है वहां अपनी कृपा का द्वार खोल देता है। अगर पूरी दुनिया के लोग मिल जायें और उस द्वार को बंद करना चाहें जिसे महान ईश्वर ने खोल दिया है तो नहीं बंद कर सकते। इसी प्रकार उसने जिस द्वार को बंद कर दिया है पूरी दुनिया के लोग मिलकर उसे खोलना चाहें तो नहीं खोल सकते।

रहमत व दया का अर्थ विस्तृत है और इसमें भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों आयाम शामिल हैं। यही कारण है कि इंसान कभी देखता है कि उसकी ओर समस्त विदित द्वार बंद हैं परंतु साथ ही यह एहसास भी करता है कि ईश्वरीय कृपा के द्वार खुले हुए हैं अतः वह प्रसन्न और खुशहाल होता है यद्यपि वह जीवन की कठिनाइयों में ग्रस्त ही क्यों न हो। ठीक इसके विपरीत इंसान कभी विदित रुप में समस्त द्वार अपनी ओर खुला देखता है परंतु ईश्वरीय कृपा के द्वार उसकी ओर बंद होते हैं और यह आभास करता है कि पूरी दुनिया उसके लिए एक अंधेरी जेल में परिवर्तित हो गयी है। यह वह चीज़ है जिसका विश्व के बहुत से लोग आभास करते हैं।

बहरहाल पवित्र कुरआन की इस आयत का अर्थ इंसान को इस प्रकार की शांति प्रदान करता है कि वह समस्त कठिनाइयों का सामना करता है और वह किसी भी समस्या व कठिनाइ से नहीं डरता है और न ही किसी भी सफलता पर घमंड करता है।

पवित्र कुरआन का यह सूरा हमें महान ईश्वर की प्रशंसा, उसकी महानता और उसकी असीम शक्ति की याद दिलाता है। इसी प्रकार यह सूरा हमें उस महान ईश्वर की याद दिलाता है जिसने आसमान और ज़मीन को पैदा किया है और वह सबको रोज़ी देता है। महान ईश्वर सूरे फ़ातिर की तीसरी आयत में कहता है हे लोगो! उन नेअमतों को याद करो जिन्हें ईश्वर ने तुम्हें दिया है क्या ईश्वर के अतिरिक्त कोई और है जो आसमान और ज़मीन से तुम्हें आजीविका देता है?”

महान ईश्वर सूरे फ़ातिर की चौथी आयत में महत्वपूर्ण बात की ओर संकेत करता और फरमाता है ”प्रलय, हिसाब किताब, स्वर्ग और नरक ईश्वर के वे वादे हैं जिनकी उपेक्षा नहीं की जायेगी तो तुम्हें दुनिया की ज़िन्दगी धोखा न दे और इस दुनिया की धोखा देने वाली चीज़ें ईश्वर के वादे से तुम्हें निश्चेत न कर दें। इसी तरह इस सूरे की छठी आयत सबको चेतावनी देती है कि निश्चित रूप से शैतान तुम्हारा दुश्मन है तुम भी उसे अपना दुश्मन समझो। जब इंसान इस बिन्दु से निश्चेत हो जाता है कि शैतान उकसाता है तो उसका निश्चेत हो जाना उसके ग़लत रास्ते पर चले जाने का कारण बनता है। सूरे फ़ातिर की नवीं आयत में महान ईश्वर फरमाता है “ईश्वर वह है जिसने हवाओं को भेजा है ताकि बादलों को चलायें। फिर हम उन्हें मुर्दा ज़मीनों की ओर ले गये और उनके माध्यम से हमने मुर्दा ज़मीन को ज़िन्दा किया। प्रलय इसी प्रकार है।“

वास्तव में हवाओं का चलना, जीवनदायक वर्षा का होना और मुर्दा ज़मीनों का ज़िन्दा होना सब एक नियत कार्यक्रम के अंतर्गत है और यह इस वास्तविकता का गवाह है कि इन सबके पीछे एक महान शक्ति है। सूरे फ़ातिर की दसवीं आयत अनेकेश्वरवादियों की बड़ी ग़लती की ओर संकेत करती है और वह यह है कि वे अपनी इज़्ज़त को मूर्तियों से मांगते हैं। इस आयत में महान ईश्वर कहता है जो इज़्ज़त चाहता है तो सारी इज़्ज़त ईश्वर के लिए है।“ यानी ईश्वर जिसे चाहे इज़्ज़त दे क्योंकि वास्तविक इज़्ज़त उसी के पास है। इसी तरह इस आयत में अच्छी बात , अच्छे कार्य और अच्छे विश्वास को इज़्ज़त प्राप्त करने का मार्ग बताया गया है और ये वे चीज़ें

हैं जो इंसान को ऊपर उठाती हैं। यह वही परिपूर्णता और विकास का मार्ग है। उसके बाद इस आयत में कहा गया है कि जो लोग षडयंत्र करते हैं उनके लिए कड़ा दंड है और अर्थहीन प्रयास उन्हें तबाह कर देगा और वे कहीं नहीं पहुंच सकेंगे। सूरे फ़ातिर की १२वीं और १३वीं आयत महान ईश्वर की असीम शक्ति की ओर संकेत करते हुए कहती है” दो समुद्र समान नहीं हैं यह एक समुद्र है जिसका पानी मीठा है और दूसरे समुद्र का पानी खारा है परंतु तुम दोनों समुद्रों से ताज़ा मांस खाते हो और उनसे साज- सज्जा की चीज़ें बाहर निकलती हैं और तुम उन्हें पहनते हो और तुम नावों को उनके अंदर देखते हो जो लहरों को चीरते हैं ताकि तुम ईश्वर की नेअमतों से लाभ उठा सको और शायद तुम उसका आभार व्यक्त करो।“

इसी प्रकार सूरे फ़ातिर की १३ वीं आयत के एक भाग में भी महान ईश्वर की असंख्य नेअमतों के एक भाग की ओर संकेत किया गया है ताकि इंसान को अवगत कराके महान ईश्वर के आभार के लिए प्रेरित किया जा सके।

महान ईश्वर इस आयत में कहता है” वह रात को दिन में प्रविष्ट करता है और दिन को रात में प्रविष्ट करता है उसने सूर्य और चंद्रमा को काम पर लगा रखा है। प्रत्येक, एक नियत समय को पूरा करने के लिए चल रहा है वही ईश्वर तुम्हारा पालनहार है उसी का शासन है उससे हटकर जिन्हें तुम पुकारते हो वे एक तिनके के भी मालिक नहीं हैं।“

ये सारी चीज़ें इंसान के फायदे के लिए हैं और वे मानव जीवन के विभिन्न प्रकार की नेअमतों व विभूतियों का स्रोत हैं। सूरज, चांद और तारे सब अपनी नियत कक्षा में चक्कर लगा रहे हैं और इन सबका नियत कक्षा में चक्कर लगाना महान ईश्वर के होने का बेहतरीन प्रमाण है।

सूरे फ़ातिर की १५वीं आयत में महान ईश्वर कहता है हे लोगो तुम सब लोगों को ईश्वर की आवश्यकता है और केवल ईश्वर है जो आवश्यकता मुक्त और प्रशंसनीय है।

वास्तव में पूरे ब्रह्मांड में एक ही हस्ती है जो हर प्रकार की आवश्यकता से मुक्त है और वह महान व सर्वसमर्थ ईश्वर है। समस्त इंसान ही नहीं बल्कि ब्रह्मांड की हर वस्तु को महान ईश्वर की आवश्यकता है क्योंकि केवल वही है जो हर आवश्यकता की पूर्ति कर सकता है। उसे किसी ने पैदा नहीं किया है बल्कि उसने हर चीज़ को पैदा किया है और उसे किसी भी चीज़ की आवश्यकता नहीं है। वह इस सीमा तक प्रदान करने वाला और दयालु व कृपालु है कि वह हर प्रशंसा का पात्र है। इस आधार पर हमें उसकी उपासना करके परिपूर्णता का मार्ग तय करना चाहिये और उसका सामिप्य प्राप्त करना चाहिये। सूरे फातिर की १९वीं से २२वीं तक कि आयतों में विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से इस बात को बयान किया गया है कि मोमिन और काफिर बराबर नहीं हैं। पवित्र क़ुरआन में उदाहरणों के माध्यम से मोमिन और काफिर में अंतर को बयान किया गया है। इन आयतों में कहा गया है कि देखने और न देखने वाले बराबर नहीं हैं, अंधकार और प्रकाश एकसमान नहीं हैं, शीतल छांव और गर्म हवा बराबर नहीं हैं और मुर्दा और ज़िन्दा समान नहीं हैं।“

महान ईश्वर पर ईमान इंसान के विचारों और कार्यों को प्रकाशमयी बनाता है परंतु कुफ्र व अनेकेश्वरवाद अंधकार है और वह गुमराही की जड़ है। मोमिन ईमान की छांव में शांति व सुरक्षा का आभास करता है और काफिर कुफ्र के कारण असुरक्षा व अशांति का आभास करता है। इसी प्रकार इन आयतों में महान ईश्वर कहता है कि ज़िन्दा और मुर्दा समान नहीं हैं। इन आयतों में विभिन्न उपमाओं के माध्यम से मोमिन और काफिर के भविष्य की एक दूसरे से तुलना की गयी है क्योंकि ईमान, व्यक्ति और समाज को जीवन प्रदान करता है और कुफ्र गुमराही का कारण है। मोमिन आध्यात्मिक ऊंचाई की ओर अग्रसर होता है जबकि काफिर अंधेरे में ही रह जाता है।

सूरे फातिर की २८वीं आयत में महान ईश्वर कहता है कि ईश्वर के बंदों के मध्य केवल विद्वान ही उससे डरते हैं। इसी प्रकार महान ईश्वर सूरे फातिर की २९ आयत में कहता है जो ईश्वर की किताब की तिलावत करते हैं वे नमाज़ क़ाएम करते हैं और जो हमने रोज़ी दी है उसमें से वे गुप्त और खुले रूप से ख़र्च करते हैं और वे उस सौदे की आशा में हैं जिसमें उनको कदापि घाटा नहीं होगा।“

मानो यह आयत विद्वानों के अस्ली रूप को बयान करती है। वे पवित्र कुरआन से प्रेम करते हैं और नमाज़ क़ायम करते हैं। वे ईश्वर के मार्ग में धन खर्च करके ग़रीबों, निर्धनों और वंचितों की सहायता करते हैं। विद्वान इन कार्यों के माध्यम से ऐसे सौदे की आशा में हैं जिसमें उन्हें कदापि घाटा नहीं होगा और वे सफलता प्राप्त करने वाले हैं।

पवित्र कुरआन के सूरे फातिर का अंत इस बयान के साथ होता है कि अगर महान ईश्वर बंदों को उनके किये का दंड देने लगे तो ज़मीन पर कोई भी बंदा बाक़ी नहीं बचेगा परंतु उन सबको नियत समय तक अवसर दिया गया है तो जैसे ही उनकी मौत का समय आ पहुंचता है ईश्वर अपने बंदों की हालत को देखने वाला है।“

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इसलिए आपने रोज़ा रखा और तमाम लोगों को रोज़ा रखने का हुकुम दिया

इसलिए आपने रोज़ा रखा और तमाम लोगों को रोज़ा रखने का हुकुम दिया

Aaiye nazar daalte hain2⃣ruiyat ke dalaail par.

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2⃣. इमाम सरख़सी रहमउल्लाह. ने अल-मबसूत्त में इब्ने अब्बास र. अ. से मरवी ये हदीस बयान की है :— 
“मुसलमानों ने सुबह रोज़ा: न रखा क्यों कि उन्हें चाँद नज़र न आया. फिर एक बदु पहुंचा और इस बात की शहादत दी कि उसने चाँद देखा है तो रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:—क्या तुम इस बात की गवाही देते हो कि अल्लाह के सिवा कोई मअबूद नहीं और और मैं अल्लाह का रसूल ﷺ हूँ. बदु ने कहा : हाँ ! आपने फ़रमाया अल्लाहु अकबर ! तमाम मुसलमानों के लिए एक शख़्स ( की गवाही ) ही काफ़ी है. इसलिए आपने रोज़ा: रखा और तमाम लोगों को रोज़ा: रखने का हुकुम दिया.”

इस हदीस को अबु दाऊद ने भी इब्ने अब्बास र.अ. से मुख़्तलिफ़ अल्फ़ाज़ से बयान किया है.
( सुनन अबु दाऊद हदीष न. 2333 )

आप ﷺ ने एक अराबी की रुइयत को जिसे आप ﷺ जानते भी नहीं थे क़ुबूल किया जिसने मदीना: के बाहर चाँद देखा था.0

ये हदीष अपने इलाक़े से बाहर चाँद नज़र आने के हुकुम को बयान करती है क्योंकि वोह बदु मदीना: के बाहर से आया था.0

आप ﷺ ने इसकी रुइयत को क़ुबूल करने की महज़ एक शर्त्त लगाई यानि कि आया वोह मुसलमान है या नहीं.0

मंदर्ज़ा ( उपरोक्त ) ऊपर दोनों हदीष को जोड़कर हुकुम ये निकलता है कि अगर कोई भी मुसलमान चाँद के देखे जाने की गवाही देदे तो उसकी गवाही मुअतबर समझी जाएगी और तमाम मुसलमानों पर फ़र्ज़ हो जाएगा के वो इसके मुत्ताबिक़ रमज़ान की शुरुआत और इख़्तताम करें.

रही बात ये कि वो अगर झूठ बोल रहा हो तो गुनाह का वबाल उसके सर होगा और हम अल्लाह के यहाँ हुकुम शरई पर चलने की वजह से सुरख़रू होंगे.0

इस हदीष में रसूलुल्लाह ﷺ का यह कहना कि “तमाम मुसलमानों के लिए एक शख़्स ( की गवाही ) ही काफ़ी है.” क़ाबिले ज़िक्र है और इस से रुगरदानी ( मुंह मोड़ना ) नहीं की जानी चाहिए. रमज़ान के मसअले की वज़ाहत के बाद ईद के दिन के मसअले की वज़ाहत भी ज़रूरी है. जैसा कि रमज़ान के आग़ाज़ का फ़ैसला: चाँद नज़र आने पर होता है, इसी त्तरह ईद का इंहसार ( दारोमदार ) भी चाँद का नज़र पर होता है. इस से मुतअल्लिक़ अबु हुरैरा: र.अ. ने रसूलुल्लाह ﷺ से यह हदीष रिवायत की है. “रसूलुल्लाह ﷺ ने दो दिन रोज़ा: रखने से मना किया है :— ईदुल अज़हा और ईदुल फ़ित्तर के दिन.”
( बुख़ारी व मुस्लिम)

यह हदीष दुरुस्त ईद का दिन मुत्अय्यन करने को इन्तेहाई अहम मसअला: बना देती है. आइए अब ईद से मुतअल्लिक़ अहादीष का मुत्तालेआ करें :—–

जारी—–
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2⃣. امام سرخسیؒ نے المبسوط میں ابن عباسؓ سے مروی یہ حدیث بیان کی ہے: 
’’مسلمانوں نے صبح روزہ نہ رکھا کیونکہ انہیں چاند نظر نہ آیا۔ پھر ایک بدو پہنچا اور اس بات کی شہادت دی کہ اس نے چاند دیکھا ہے۔ تو رسول اللہ ا نے فرمایا: کیا تم اس بات کی گواہی دیتے ہو کہ اللہ کے سوا کوئی معبود نہیں اور میں اللہ کا رسول ہوں۔ بدو نے کہا: ہاں! آپ ا نے فرمایا: اللہ اکبر!تمام مسلمانوں کے لیے ایک شخص (کی گواہی)ہی کافی ہے۔ پس آپ ا نے روزہ رکھا اور تمام لوگوں کو روزہ رکھنے کا حکم دیا ‘‘ ۔ اس حدیث کو ابو داؤدؒ نے بھی ابن عباسؓ سے مختلف الفاظ سے بیان کیا ہے (سنن ابو داؤد حدیث نمبر ۲۳۳۳)۔

O آپ ﷺ نے ایک اعرابی کی رویت کو، جسے آپ ﷺ شاید جانتے بھی نہ تھے، قبول کیا جس نے مدینہ کے باہر چاند دیکھا تھا

O یہ حدیث اپنے علاقے سے باہر چاند نظر آنے کے حکم کو بیان کرتی ہے کیونکہ وہ بدو مدینہ کے باہر سے آیا تھا

O آپ ﷺ نے اس کی رؤیت کو قبول کرنے کی محض ایک شرط لگائی یعنی کہ آیا کہ وہ مسلمان ہے یا نہیں

O مندرجہ بالا دونوں حدیث کو جوڑ کر حکم یہ نکلتا ہے کہ اگر کوئی بھی مسلمان چاند کے دیکھے جانے کی گواہی دے دے تو اس کی گواہی معتبر سمجھی جائیگی اور تمام مسلمانوں پر فرض ہو جائے گا کہ وہ اس کے مطابق رمضان کی شروعات اور اختتام کریں

O رہی بات یہ کہ وہ اگر جھوٹ بول رہا ہو تو گناہ کا وبال اس کے سر ہوگا اور ہم اللہ کے ہاں حکم شرعی پر چلنے کی وجہ سے سرخرو ہوں گے

O اس حدیث میں رسول اللہﷺ کا یہ کہنا کہ ’’تمام مسلمانوں کے لیے ایک شخص (کی گواہی)ہی کافی ہے‘‘ قابل ذکر ہے اور اس سے رو گردانی نہیں کی جانی چاہئے رمضان کے مسئلے کی وضاحت کے بعد عید کے دن کے مسئلے کی وضاحت بھی ضروری ہے : جیسا کہ رمضان کے آغاز کا فیصلہ چاند نظر آنے پر ہوتا ہے اسی طرح عید کاانحصار بھی چاند کے نظر آنے پر ہے۔ اس سے متعلق ابوہریرہؓ نے رسول اللہ ﷺسے یہ حدیث روایت کی ہے : ’’رسول اللہ ﷺنے دو دن روزہ رکھنے سے منع کیا ہے : عیدالاضحیٰ اور عید الفطرکے دن‘ ‘(بخاری و مسلم)۔

یہ حدیث درست عید کا دن متعین کرنے کو انتہائی اہم مسئلہ بنا دیتی ہے۔ آئیے اب عید سے متعلق احادیث کا مطالعہ کریں:

جاری……

तमाम मुसलमान एक उम्मत हैं

तमाम मुसलमान एक उम्मत हैं

तमाम मुसलमान एक उम्मत हैं, “इनका चाँद भी एक और ईद भी एक”

नबी (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) ने फ़रमाया : “अगर कोइ शक्स अपनी अक्ल से राए इख्तेयार करेगा, तो वह अपना ठिकाना जेहन्नुम मे कर लेगा” (मफहूम हदीस: बुखारी, मुस्लिम)

शरइ हुक्म की नस सिर्फ : क़ुरआन और नबी (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) की सुन्नत है

हमारी राए, हमारे जज़बात, राए आम्मा, रिवाजों और रिवायतें की हक़ीक़त इस्लाम में कुछ नहीं

हर साल खास तौर पर रमज़ान की आमद के साथ चाँद के अपने मुल्क या अपने शहर में दिखने या न दिखने पर उम्मत का वह हिस्सा जो हिन्दुस्तान में रहता है एक कशमकश और उलझन का शिकार हो जाता है, कि जब उम्मत एक है उसके मसाइल क़रीब क़रीब सारे आलम में एक हैं, उम्मत का हर हिस्सा दूसरे से एक गहरे जज़्बाती रिश्ते से जुड़ा हुआ है तो फिर क्या सबब है कि जब बात रमज़ान या ईद के चाँद देखने की हो तो उम्मत का यह हिस्सा तक़रीबन सारी दुनिया के मुसलमानों से अलहदा हो जाता है। एक आम मुसलमान यह समझने से क़ासिर है कि उलेमा जब एक ऐसे मसले में इत्तेफ़ाक़ राय करने से आजिज़ हैं, तो फिर उम्मत में इत्तेफ़ाक़ और इत्तेहाद क्यूँकर मुमकिन हो सकता है ? बाज़ अवक़ात मुसलमानों के मुमालिक में खास कर हिन्दुस्तान से दो दिन पहले ही रमज़ान शुरु हो जाते हैं और ईद भी दो दिन पहले ही हो जाती है। बल्कि एक ही मुल्क के अलग अलग सूबों में अलहदा ईदें मनाना आज आम बात हो गई है। इन सुतूर के ज़रिए इस मसले के फि़क़्ही और इससे वाबस्ता शरई मसाइल पर ग़ौर किया गया है, जो उम्मत के बाशऊर लोग, खास कर हर वह शख़्स जो उम्मत का दर्द रखता है, और उम्मत को एक मुत्तहिद व वहदत की शकल में देखने की तमन्ना रखता है, इसके जज़्बात की तर्जुमानी हो सके।

बहैसियत मुसलमान होने के, हमारे सामने पेश आने वाली हर सूरतेहाल का हल हमें अल्लाह तआला के कलाम, अल्लाह के रसूल (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) की सुन्नत और सहाबा किराम रिज़्वानुल्लाहे तआला अलयहिम अजमईन के इज्मा से बिलतरतीब हासिल करना चाहिए। चुनांचे अब हम इन तीनों चीज़ों में इस मस्ले के बारे में मोजूद हिदायात पर नज़र डालेंगे.

क़ुरआने हकीम से :

सूरह बक़रह की आयात 189 में चाँद को महीनों के तअइयुन का आलाए शनाख़्त बताया है। नमाज़ों के वक़्त का तअइयुन सूरज से होता है और महीनों का तअइयुन चाँद से। फिर कुछ लोग यह बहस रखते हैं कि मसलन सऊदी अरब और हिन्दुस्तान में ढाई घन्टे का फर्क है तो फिर यहॉ ईद एक या दो दिन बाद होना फि़तरी बात है। अगर यह मन्तक़ मान भी ली जाए तो इसकी रु से सऊदी अरब और इन्डोनेशिया में पॉच घन्टे का फर्क है चुनांचे इन्डोनेशिया में ईद सऊदी अरब के दो या चार दिन बाद होना चाहिए और अमेरिका क्यूंकि सऊदी अरब से दस घन्टे पीछे है इसलिए वहॉ ईद चार से आठ दिन पहले ही हो जाना चाहिए ! ऐसी दलील दरहक़ीक़त कोई दलील नहीं बल्कि बेइल्मी पर मब्नी है, किसी भी संजीदा शख़्स के तवज्जह के क़ाबिल नहीं।

सूरह बनी इसराईल:17 की आयत 78, सूरह निसाअ की आयत 103 में अल्लाह तआला ने मोमिनों पर मुक़र्रर अवक़ात में नमाज़ फर्ज़ की है जो हर ऐक जगह पे सूरज की एंगुलर पोज़ीशन से जुड़ा है । इस्लिए, हर थोड़ी दुरी पर हर नमाज़ के औकात बदल जाएंगे।

हुज़ूरे अकरम (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) का अमल और क़ौल :

1) रमज़ान शुरू करने और पूरा होने के तआल्लुक़ से:
आइये हम हुज़ूरे अकरम (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) के अमल पर नज़र डालें। बुखारी और मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में अल्लाह के नबी (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) ने फ़रमाया, “चाँद देख कर रोज़े रखो और चाँद देख कर रोज़े खोलो, अगर तुम पर बादल छाऐ हों तो तीस दिनों की गिनती पूरी करो” (सही बुखारी किताबुल सोम जिल्द अव्वल हदीस रक़म 1782)। हदीसे पाक में लफज़ “सूमू” है जो जमा है और पूरी उम्मत से हुज़ूरे अकरम (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) का आम खिताब है।

2) रमज़ान के चांद की इत्तेला और रमज़ान शुरू होने के तआल्लुक़ से:

अबुदाऊद से रिवायत हदीस के मुताबिक़ एक एअराबी हुज़ूर (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) के पास आया और बताया कि उसने रमज़ान का चाँद देख लिया है, हुज़ूर (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) ने एअराबी से पूछा कि क्या अल्लाह तआला के एक होने की शहादत देता है, एअराबी ने इक़रार किया कि हॉ वह यह शहादत देता है, फिर हुज़ूर (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) ने सवाल किया कि क्या वह मुहम्मद (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) का अल्लाह के रसूल होने का इक़रार करता है, इस पर भी एअराबी ने हॉ कहा और गवाही दी कि उसने चाँद देखा है, फिर हुज़ूर (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) ने हज़रत बिलाल (रज़ीअल्लाहो अन्हो). को हुक्म दिया कि वह यह एलान कर दें कि कल से रोज़ों का हुक्म है।
(रावी हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास (रज़ीअल्लाहो अन्हो).- सुनन अबुदाऊद रक़म हदीस 2333)। इसी तरह अबुदाऊद की और रिवायात जैसे हदीस रक़म 2334 और 2335 में भी यही बात दूसरे रावियों के हवाले से नक़ल की गई है।

3) ईद के चांद की इत्तेला और माहे रमज़ान पूरा होने के तआल्लुक़ से:

इसी तरह ईद के चाँद के वक्त भी हुज़ूर (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) ने लोगों की शहादतें क़ुबूल फ़रमाई। दिलचस्प बात यह है कि चाँद की शहादतें क़ुबूल किए जाने वाली तक़रीबन हर हदीस में हुज़ूर (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) ने गवाही देने वाले से इसके इस्लाम क़ुबूल करने की बात को पूछ पूछ कर यक़ीनी बनाया कि वह मुस्लिम ही है लेकिन इनमें से किसी भी हदीस में उस गवाह से उसके नाम, या शहर या उसके शहर के मदीने मुनव्वरह से फ़ासले के बाबत पूछा जाना रिवायत नहीं किया गया है, क्यूंकि चाँद की इत्तिला को तो सारे मुसलमानों पर, ख़्वाह वह किसी भी खित्ते में मुक़ीम हों, और उनका शहर मदीना मुनव्वरह से कितने ही फ़ासले पर हो, मुन्तबिक़ होना ही है, वरना आप खुद (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) ऐसे गवाह से फ़ासले की बाबत पूछ कर उसकी शहादत को रद्द फ़रमा देते और उम्मत को यह सबक़ दे जाते कि इतने इतने फ़ासले के बाद चाँद की शहादत क़ुबूल न करते हुए अपने ही मोहल्ले, गली, शहर या मुल्क में चाँद के दिख जाने का इन्तेज़ार करो। मिसाल के तौर पर अबुदाऊद ही में हदीस रक़म 1153 मुलाहिज़ा फ़रमाइये, हज़रत अबु अमीर इब्ने अनस (रज़िअल्लाहो अन्हू) अपने चचा की सनद पर रिवायत करते हैं कि कुछ लोग ऊॅटों पर सवार हुज़ूर (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) के पास तशरीफ़ लाए और बयान किया कि इन्होंने कल चाँद देखा है, हुज़ूर (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) ने लागों को रोज़ा खेालने का और अगले दिन (ईद की) नमाज़ के लिए ईदगाह पहुंचने का हुक्म दिया। हालांकि उस वक़्त असर का वक़्त हो चुका था और रोज़ा मुकम्मिल हुआ ही चाहता था, लेकिन कहीं और चाँद के दिख जाने से मदीना मुनव्वरह में भी अब चूंकि ईद होना थी लिहाज़ा रोज़ा हराम हो जाता चुनांचे उसी वक्त हुज़ूर (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) ने अफ़तार का हुक्म दिया। आज उसी मदीने में चाँद हो जाने और ईद हो जाने के बावजूद हिन्दुस्तान के बेशतर इलाक़ों में तीसवां या कभी उन्तीसवां रोज़ा रखना आम बात हो गई है, सवाल यह पैदा होता है कि हुज़ूर (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) के बाद अब कौनसा शरई हुक्म बदल गया है ?

दूसरी जगह का चांद ना मानने की हक़ीकत:

1) रिवायत : इसके दूसरी तरफ़ एक रिवायत सामने आती है जिससे बज़ाहिर ऐसा तसव्वुर उभरता है के दो मुका़मात पर दो अलग-अलग दिन चाँद होने का इमकान है। इस रिवायत के मुताबिक़ एक शख़्स मुल्क शाम से लौटे तो हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास (रज़ीअल्लाहो अन्हो) ने उनसे चाँद के बारे में दरयाफ़्त किया कि शाम मे चाँद कब हुआ, जवाब मिला के वहाँ चाँद जुमा की शब को हुआ, जबकि मदीना मुनव्वरह में चाँद सनीचर को हुआ, और जब पूछा गया कि क्या आप मआविया के चाँद देखने को दलील नही मानते, तो हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास (रज़ीअल्लाहो अन्हो)। ने फ़रमाया के हमें रसूलल्लाह (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) ने ऐसा ही हुक्म दिया है।

हक़ीकत: अब इस रिवायत की बुनियाद पर हर इलाक़े में अलग चाँद होने के इमकान को क़ुबूल किया जा रहा है और मौजूदा तर्ज़े अमल का जवाज़ पेश किया जा रहा है, जबकि इसमें दो क़बाहतें हैं। अव्वल तो ये के हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास (रज़ीअल्लाहो अन्हो) का यह ज़ाति इज्तेहाद हो सकता है। दूसरे यह हुज़ूरे अकरम (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) की हदीस नही बल्की सहाबी का फेसला और अमल है। इस बात को उलेमा की अक्सरीयत ने तस्लीम किया है कि फिलहक़ीक़त ये हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास (रज़ीअल्लाहो अन्हो) का इन्फ़रादी अमल था।
इस मौज़ू पर ‘‘तोहफ़तुल कद़ीर’’ में जो कि फि़क़्हा हन्फि़या की मुअतबर किताब है, लिखा है कि इस रिवायत में हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास (रज़ीअल्लाहो अन्हो) के मुल्के शाम के चाँद को तस्लीम न करने की वजह दरअसल उस ख़बर का सिर्फ एक गवाह होना है (‘‘तोहफ़तुल कद़ीर’’: 2 / 314)।

इसी राय की ताईद एक और मुअतबर किताब अलमुग़ना में है कि इस रिवायत में दूसरी जगह के चाँद को मुस्तरिद करने की बात नहीं की गई है कि हर जगह के चाँद को मुस्तरिद करो और अपने मुक़ाम पर ही चाँद के दिखने का इन्तेज़ार करो (अलमुग़ना-3:5)।
इमामुल नूवी रहमतुल्लाह अलैह मुस्लिम शरीफ़ की शरह में फ़रमाते हैं कि अगर चाँद का दिखना एक मुक़ाम पर साबित हो जाऐ तो दूसरी जगह के लोगो पर इसका मानना ज़रूरी हो जाता है। हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास (रज़ीअल्लाहो अन्हो) ने एक शख़्स की गवाही पर चाँद को कुबूल नहीं किया था क्योंकि रमज़ान के चाँद के लिऐ दो अशख़ास की गवाही को मुअतबर मानते थे।
किताब: नैलुल-औतार जिल्द:4 सफा: 268 पे अल्लामा शौकानी रहमतुल्लाह अलैह ने इसी राय को इखि़्तयार किया है।

2) “इख्तिलाफुल मतालेअ” : एक दूसरी दलील यह दी जाती है कि हर जगह मतलअ अलग होता है और इस “इख्तिलाफुल मतालेअ” की बुनियाद पर हर जगह अलग-अलग ईद होने को सही क़रार दिया जाता है।

इख्तिलाफुल मतालेअ की शरई हक़ीक़त क्या है:
फि़क़्हा हन्फि़या के फ़तावा का मुअतबर तरीन ज़खीरा फ़तावा आलमगीरी माना जाता है। जिल्द अव्वल सफ़हा 198 मुलाहिज़ा फ़रमाएँ लिखा है कि मतालेअ के इखि़्तलाफ़ की कोई एहमियत हज़रत इमामे आज़म रहमतुल्लाह अलैह से मनक़ूल नहीं है।
इमाम जुज़ैरी रहमतुल्लाह अलैह की किताब मज़ाहिबे अरबअ की जि़ल्द अव्वल सफ़हा 550 पर इस मौजू़ पर चारों मसलकों की राय का हवाला देते हुआ लिखा है कि जब चाँद कहीं साबित हो जाए तो रोज़े रखना तमाम मुसलमान पर फर्ज़ हो जाता है। मतालेअ के इख्तिलाफ की कोई वक़अत् नहीं है।
इसी तरह शेखुल इस्लाम इमाम इब्ने तैमीया रहमतुल्लाह अलैह “फ़तावा” में लिखते हैं, “एक शख्स जिसको कहीं चाँद के दिखने का इल्म बरवक़्त हो जाए तो वो रोज़ा रखे और ज़रूर रखे, इस्लाम की नस और सल्फ़े स्वालेहीन का अमल इसी पर है, इस तरह चाँद की शहादत को किसी खास फ़ासले में या किसी मखसूस मुल्क में महदूद कर देना अक़्ल के भी खिलाफ़ है और इस्लामी शरियत के भी” (फ़तावा, जिल्द 5: सफ़ा 111)।
हनफी मज़हब के इमाम क़सानी रहमतुल्लाह अलैह की किताब बिदा-अस्-सनाई पूरी उम्मत के एक चांद होने और मानने की बात दलील से कहती है।
फिर अगर बहस की खातिर यह मान भी लिया जाए के उलूमे नजूमियात (astronomy) के तमाम मुसल्लेमा उसूलों के खिलाफ़ मतलअ के इखि़्तलाफ़ का यह असर होता है के हिन्दुस्तान व पाकिस्तान के मशरिक़, मग़रिब, शिमाल, जुनूब के तमाम मुमालिक में एक दिन और सिर्फ इन दो मुमालिक में एक या दो दिन बाद चाँद दिखे, और हर साल ऐसा ही हो और यह इख्तिलाफ क़रीब-क़रीब उस वक़्त से शुरू हुआ जब खि़्ालाफ़ते उसमानिया को खत्म किया गया, क्योंकि मग़रिबी मुमालिक और यहूदी दरअसल मुसलमानों के एत्तेहाद से डरते थे और खिलाफत मुसलमानों के एत्तेहाद का आलातरीन और अमली मज़हर थी जो हमेशा दुश्मनों को खटकती थी फिर इसके बाद दुनिया भर में फैली हुई उम्मत एक दिन ईद मनाए, यह कैसे दुश्मन गवारा करता, चुनांचे इख्तिलाफ़े मतलअ के नाक़ाबिले फ़हम तसव्वुर में उलझा दिया गया जिसे हमारे कबाइर उलेमा ने कभी तसलीम न किया था। फिर इसकी रु से ऐसा ही क्यों होता है के हिन्दुस्तान में यह मसला अब पैदा होने लगा है। जबकि पुराने वक्तों में यहाँ तक कि पहली आलमी जंग तक यह बात नहीं थी। मसलन उससे पहले के हज के सफ़रनामों के मुताले से यह साबित होता है कि अरब और हिन्दुस्तान में चाँद की एक ही तारीख चलती थी. शेखुलहिन्द हज़रत मौलाना महमूदुलहसन और शेखुल इस्लाम हज़रत मौलाना हुसैन एहमद साहब मदनी रहमतुल्लाह अलैह के सफ़रनामे हिजाज़ से भी यही बात सामने आती है कि दोनो जगह एक ही तारीख चलती थी मिसाल के तौर पर ’’असीराने माल्टा’’ मुलाहिज़ा फ़रमाइये जिसमें इन अकाबिर उलेमा के सफरनामे को हज़रत मौलाना सय्यद मोहम्मद मियॉं साहब रहमतुल्लाह अलैह ने तरतीब दिया, और कुतुबखाना नईमिया देवबन्द ने शाया किया है।

क़ुदरती तौर पर एक आम आदमी या पढ़ा लिखा और साइंसी उलूम से वाकि़फ़ शख़्स यह सोचकर हैरान होता है कि जब चाँद किसी भी इलाके में दो दिन पहले दिख गया यानी नया चाँद हो गया जिसकी एक खास शक्ल होती है, फिर यह कैसे मुमकिन है कि वही चाँद दो दिन या एक दिन बाद जबकि वह कुछ बड़ा हो जाता है, किसी और जगह अपने पहले दिन की शक्ल में नज़र आए जबकि ऐसा करने के लिए चाँद को फिर बारीक होना पड़ेगा जो कि नामुमकिन है, जब तक कि वह दोबारह एक माह पूरा न कर ले? यह एक इतनी आम फ़हम हक़ीक़त है कि साइंस पढ़ने वाला कोई मिडिल स्कूल का बच्चा हो या किसी यूनिवर्सिटी के शोबए एस्ट्रोनॉमी का प्रोफेसर, वो इससे लाज़मन इत्तिफ़ाक़ ही करेगा क्योंकि यही असल वाकि़या है जिससे इन्कार मुमकिन नहीं।

एक और हक़ीक़त एक मुसलमान की हैसियत से हमें मलहूज़ रखना चाहिए कि क़ुरआन और हदीस का हर हुक्म हर मुसलमान के लिए बहैसियत एक मुस्लिम होने के आयद होता है, अलबत्ता बाज़ एहकामात मर्दों के लिए खास है ना कि औरतों के लिये। जबकि दीगर अहकामात औरतों के लिये मखसूस है ना कि मर्दो के लिये, लेकिन बहरहाल कोई भी हुक्म किसी इलाके खास में रहने वालों को खास तौर से नहीं दिया गया, कि फलॉं हुक्म सिफ़‍र् यूरोप के गोरों के लिये है और अफ्रीका के सियाह फ़ाम इससे मुस्तश्ना हैं, फिर चाँद के साथ ऐसा किस शरई दलील से किया जाए ? जब अल्लाह के रसूल (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) का फ़ेल यह था कि आपने मदीने से बाहर की गवाही पर ये पूछे बग़ैर कि शहादत देने वाला किस गाँव या किस शहर या कितने फ़ासले से आया है, चाँद के होने को तस्लीम फ़रमाया और रोज़ा रखने और तोड़ने का हुक्म दिया, जबकि आप (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) साहिबे वही थे, और बहुत मुमकिन है कि अल्लाह की तरफ़ से आपको यह इल्म भी हो लेकिन इस वाक़ेअ से मुसलमानों को यह तालीम देना मक़सूद थी, कि अगर हमारे इलाक़े में किसी वजह से चाँद नहीं नज़र आए तो दो मुसलमानों की शहादत क़ुबूल कर लें। फिर आज शहादत तस्लीम भी की जाती है तो सिफ़‍र् एक मुल्क खास के शहरों से, दूसरे मुल्क के शहरों से नहीं, जबकि इस्लाम में ऐसा करने की कोई शरई दलील नहीं है, और यह बात रसूल (स्वलल्लाहो अलैहिवस्ल्लम) के उस फ़रमान के बराहेरास्त टकराती है, कि मुसलमान एक उम्मत हैं, उनका शहर (या मुल्क) एक है और उनकी जंग एक। मसलन 1971 तक मशरिक़ी पाकिस्तान के ढाका शहर में मग़रिबी पाकिस्तान के पेशावर या कराची से चाँद की शहादत क़ाबिल एतबार थी। लेकिन तक़सीम पाकिस्तान के बाद अब बंगलादेश क्यूँ उन मक़ामात से शहादत न ले ? मुल्क की इस तक़सीम के बाईस कौन सा शरई हुक्म बदला है कि अब यह शहादत क़ुबूल न की जाए।

यह भी तसलीमशुदा हक़ीक़त है कि चाँद की पूरी गोलाई 14 तारीख ही को होती है। जबकि कुछ साल पहले हिन्दुस्तान में वहाँ के बारहवें रोज़े की शाम को ही चौदहवीं का चाँद इस बात का खुला हुआ सबूत बन कर चमक रहा था कि रमज़ान हक़ीक़त में दो दिन पहले शुरू हो चुके थे। लेकिन मुन्दरजाबाला तमाम हक़ाईक़ और दलाईल को ताक़ पर रख कर इस्लामी दुनिया से चाँद की गवाही क़ुबूल नहीं की गई। नतीजतन शुरू के दो रोज़े ज़ाया हो गऐ। आखि़र इसका जि़म्मेदार कौन है ? और क्या उम्र भर क़ज़ा रोज़े रखकर भी वो सवाब हासिल किया जा सकता है।

इस हक़ीक़त से इन्कार तो मुमकिन नहीं अल्बत्ता अमलन बाज़ लोग ऐसा करने की जसारत नहीं कर पाते, या तो अक्सरियत के दबाव से या खानदान भर में अकेले पड़ने के खौफ़ से, मज़ाक उड़ाऐ जाने के डर से, या आदत के खिलाफ़ न जा पाने की फि़तरी कमज़ोरी के सबब, या फिर महज़ पुरानी रिवायात से चिमटे रहने के बाइस। मगर क्या हमें ऐसे अहम मसले में जिस पर उम्मत का एत्तेहाद मौक़ूफ़ हो और रमज़ान के रोज़ों के मामले में तो ईद के दिन, जब के रोज़ा रखना हराम है फिर भी रोज़ा रखना पड़ जाता हो, ऐसी ग़ैरअहम चीज़ो को ख़ातिर में लाना चाहिऐ या मसले की अहमियत के पेशे नज़र इन तकल्लुफ़ात को जिनकी कोई शरई हैसियत नहीं है, उखाड़ फेंकना चाहिऐ।

अगर आज उम्मते मुस्लेमा एक खलीफा के ज़ेरे साया होती जो इस्लाम के एहकामात को नाफि़ज़ कर रहा होता तो क्या इस मसले में या इस जैसे दीगर मआमलात में उम्मत को इलाक़ो की बुनियाद पर इस तरह बांटना मुमकिन होता ? हमारे पिछली सदी के तमाम अकाबिर उलेमा का ये मुत्तफि़क़ा फैसला रहा था, कि शरियत के हर मामले मे खलीफा-ए-वक़्त का मौकि़फ़ वाजिबुल इताअत है, बल्कि पहली आलमी जंग के दौरान जमीअतुल उल्मा का क़याम अमल में आ रहा था तो इसके बानियों ने यानी शेखुलहिन्द हज़रत मौलाना महमूदुल हसन साहब रह., शेखुलइस्लाम हज़रत मौलाना हुसैन अहमद साहब मदनी रह., मौलाना मोहम्मद अली जौहर रह. और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद रह. ने इस जमीअत की तासीस की ज़रूरत को यह कहकर ज़रूरी क़रार दिया के अब खि़्ालाफ़त के ख़ात्में के बाद मुसलमानाने हिन्द के शरई आमाल की निगेहदाश्त को यक़ीनी और शरअ़न सही रखने के लिऐ हिन्दुस्तान के मुसलमानों की एक ऐसी शरई शक्ल होना चाहिए जो इन शरई ज़रूरियात जैसे नमाज़े जुमा का क़याम, रुयते हिलाल वग़ैरह को सही निहज पर चला सके, और वाक़ेअतन हुआ भी यही, अगर आज खिलाफ़त क़ायम होती और वही उल्माऐ हक़ हमारे दरमियान मौजूद होते तो क्या खलीफा के चाँद दिखने के ऐलान को मुस्तरद करना हमारे लिऐ मुमकिन होता ?

फ़ैज़ान माहे रमज़ान

*फैजाने माहे रमज़ान *

जन्नत मे 8 दरवाजे है उनमे एक दरवाजे का नाम रैयान है उसम दरवाजे से वही जन्नत मे जायेंगे जो रोजा रखते हैं

(صحیح البخارى، كتاب بدء الخلق، باب صفةابواب الجنة، ج-1، ص-394)

जिसने अल्लाह की रजा के लिए एक दीन का रोजा रखा तो अल्लाह उसे जहन्नम से इतना दूर कर देगा कि कव्वा जब बच्चा था तब से उसने उडना शुरु किया यहा तक की बुढा हो कर मरा

{المسند، للإمام أحمد بن حنبل، الحدیث-619}

उमुमन रिसर्च के मुताबिक कव्वा 22 साल जिंदा रेहता है ओर कव्वा 30-60 मिल फी घंटा (यानी 1 घंटे मे 45-90 km) उड लेता है

तो गौर करे इस हदीस मे है कि *एक रोजे* की बरकत से इन्सान को जहन्नम से इतना दुर कर दीया जाता है जितना कव्वा बचपन से ले कर मरने तक उड कर जितना फासला तै करे यानी करोडो किलोमीटर

तो *सारे* रोजे का सवाब कितना ज्यादा होगा

मगर याद रहे ये हदीस 1 रोजे की फजीलत बताने के लिए है इसका हरगिज़ ये मतलब नही के रमजान मे कोइ एक रोजा रखे ओर बाकी के न रखे, 
ऐसे शख्स को हरगीज ये सवाब न मिलेगा बल्कि वो तो जहन्नम का हकदार होगा

हदीस मुख्तसर होती है मगर उसका मतलब जामेअ होता है

इस हदीस का बरअक्स देखे तो जो रोजा नही रखता वो उतना हि जहन्नम के करीब होगा

आका करीम ﷺ ने इरशाद फरमाया : अगर बन्दो को मालूम होता कि रमजान क्या है तो मेरी उम्मत तमन्ना करती के कि काश पुरा साल रमजान ही हो

(ابن خزيمه ، جلد 3 ،صفحہ 190)

इस हदीस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि रमजान की फजीलत कितनी ज्यादा है कि इसमे शदीद भुख प्यास की शिद्दत होने के बावजूद उम्मत तमन्ना करती के पुरा साल रमजान हो

माशा अल्लाह

इस्लाम और मानवाधिकार

#इस्लाम और मानवाधिकार : पार्ट 45

जनसभा के आयोजन का अधिकार पहली पीढ़ी के मानवाधिकार के सबसे अहम अधिकारों में है कि जिसे राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न दस्तावतेज़ों में नागरिक व राजनैतिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गयी है।

यह अधिकार लोगों को एक साथ इकट्ठा होने अपने संयुक्त हितों पर चर्चा करने, उसे बेहतर से बहेतर बनाने और उसकी रक्षा करने के लायक़ बनाता है। इस तरह की जनसभा के आयोजन की आज़ादी का उद्देश्य राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक, व्यवसायिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सहित दूसरे क्षेत्रों में संयुक्त हितों की प्राप्ति है।

जनसभा ऐसे लोगों के जमघट को कहते हैं जहां लोग किसी निर्धारित समय पर किसी विशेष स्थान पर थोड़े समय के लिए इकट्ठा होते हैं ताकि सामाजिक व राजनैतिक समस्याओं को पेश और संयुक्त हितों की रक्षा करें। जब यह जनसभा सरकार या जनता का ध्यान खींचने के लिए सड़कों पर आयोजित होती है तो उसे प्रदर्शन कहा जाता है।

जनसभा के आयोजन की आज़ादी मूल आज़ादी में से है। इस आज़ादी का अर्थ है लोग शांतिपूर्ण ढंग से एक जगह इकट्ठा हों, एक दूसरे के विचार से लाभ उठाएं और उनके इकट्ठा होने पर किसी तरह की रुकावट न हो।

जनसभा व प्रदर्शन के आयोजन की आज़ादी प्रजातंत्र के प्रतीकों में से है कि जिसके ज़रिए जनता सीधे तौर पर अपनी बात सरकार को पहुंचाती है। कभी मुमकिन है समाज के लोगों की आम आज़ादी व अधिकार के व्यवहारिक होने में रुकावट पैदा हो। ऐसी स्थिति में लोगों का इकट्ठा होना और आपस में सहानुभूति उन्हें जनसभा के ज़रिए यह शक्ति प्रदान करती है कि वे सरकार और आम लोगों का ध्यान अपनी मांग की ओर खींचे।

इस आधार पर जनसभा की आज़ादी का अर्थ यह है कि हर व्यक्ति को यह अधिकार हासिल है कि वह अपने कुछ दृष्टिकोण को बयान करने के लिए किसी निश्चित स्थान व समय पर उन लोगों के साथ इकट्ठा हो जो उसके विचार से सहमत हों। ऐसी जनसभाओं में भाषण, बैठक, कॉन्फ़्रेंस या शास्त्रार्थ भी होता है और आम अनुशंसाओं व नियमों के साथ एक घोषणापत्र से संपन्न होती है।

जनसभाओं का आयोजन अस्थायी होता है और जब उनमें शामिल लोग अपने विचार व्यक्त कर लेते हैं तो एक दूसरे से अलग हो जाते हैं। इसी प्रकार जनसभाएं लोगों के विचार जानने के उद्देश्य से पूर्व सूचना के साथ आयोजित होती हैं। इस प्रकार की सभाओं में विशेष प्रकार की व्यवस्था पायी जाती है जो दूसरों से इसे भिन्न बनाती है।

जनसभा के आयोजन के अधिकार का स्वरूप यह है कि यह एक व्यक्तिगत अधिकार है न कि सामूहिक या गुट का अधिकार । हालांकि इस अधिकार को लागू करने में अनेक लोग एक दूसरे के साथ सहभागी हो सकते हैं और किसी गुट का गठन कर सकते हैं लेकिन इसके साथ ही यह चीज़ इसके सदस्यों को इस अधिकार से लाभ उठाने से नहीं रोक सकती। इस बिन्दु का उल्लेख ज़रूरी है कि जनसभा के आयोजन से अभिप्राय यह है कि यह, लोगों को शांतिपूर्ण जनसभा के आयोजन का अधिकार देता है। इस अधिकार में वे जनसभाएं शामिल नहीं हैं जो हिंसक लक्ष्य के साथ आयोजित होती हैं।

जनसभा के अधिकार को मानवाधिकार के अनेक स्रोतों में मान्यता दी गयी है। इन महत्वपूर्ण स्रोतों में मानवाधिकार के प्रतिज्ञापत्र व दस्तावेज़ शामिल हैं। मानवाधिकार के दस्तावेज़ों में जो राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पारित हुए हैं, इस अधिकार को इंसान के अधिकार के रूप में मान्यता दी गयी और व्यापक स्तर समर्थन किया गया है।

1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में पारित विश्व मानवाधिकार घोषणापत्र के 20वें अनुच्छेद में आया है, “हर व्यक्ति को शांतिपूर्ण उद्देश्य के लिए संगठन व सोसाइटी के गठन का अधिकार है।”

16 दिसंबर 1966 में पारित अंतर्राष्ट्रीय नागरिक व राजनैतिक अधिकार प्रतिज्ञापत्र के 21वें अनुच्छेद में इस अधिकार की विशेषता में आया है, “शांतिपूर्ण सभाओं के गठन के अधिकार को मान्यता दी जाती है। इस अधिकार के लागू होने में कोई सीमित्ता नहीं है मगर जो क़ानून के तहत एक प्रजातांत्रिक समाज में राष्ट्रीय सुरक्षा, आम सुरक्षा, क़ानून व्यवस्था, या आम नैतिकता या दूसरों के अधिकार व आज़ादी के लिए निर्धारित की गयी हैं।”

मानवाधिकार के क्षेत्रीय दस्तावेज़ों में भी जनसभा के आयोजन के अधिकार को साफ़ तौर पर स्वीकार किया गया है।

इस्लाम ने आरंभ से ही इंसान की मुक्ति के लिए कोशिश की और मानव समाज की सबसे जटिल समस्या से सबसे अच्छे ढंग से निपटा और इस पुरानी बीमारी के उपचार के लिए उचित व आनुक्रमिक हल पेश किया। इस्लाम ने अपने उदय के आरंभ में न्याय व मानवीय दानशीलता और भाईचारे व समानता के सिद्धांत को आधार बनाकर नई मानवीय व्यवस्था की बुनियाद रखी, इंसान को मुक्ति दिलाने की कोशिश की, इंसान को कंघी के सभी दांतो की तरह बराबर माना, जातीय व क़बायली पहचान को नकारा, इंसान को लिंग व जाति के बंधन से निकाल कर एक मानवीय प्रवृत्ति का स्वामी माना, सभी इंसान की मिट्टी से पैदाइश को मद्देनज़र रखा और एक पर दूसरे की वरीयता का आधार ईश्वर से डर को बताया। शरीर व विचार की आज़ादी का उपहार दिया। मशविरे के सांचे में इंसानी भागीदारी को इस्लामी सरकार में राजनैतिक ढांचे का मुख्य सिद्धांत क़रार दिया। विभिन्न मंचों पर व्यक्तिगत व सार्वजनिक आज़ादी दी सिवाए कुछ स्थान के जहां आज़ादी मानवीय मार्यादा या दूसरों के अधिकार से टकराती हो।

जनसभा का अधिकार मौजूदा सरकारों से संबंधित नहीं है। बल्कि कुछ संस्कार इस्लाम में शुरु से थे और हैं जैसे जुमे की नमाज़ कि जिसका उपासना के साथ राजनैतिक व सामाजिक आयाम भी है। इसी तरह हज और धार्मिक सभा का आयोजन भी इस्लाम के आरंभ से रहा है। दूसरी ओर इस्लामी सरकार के विरोधियों का भी सम्मान होता था और उनके ख़िलाफ़ किसी भी प्रकार के अतिक्रमण को रोका जाता था।

इस संदर्भ में शहीद मुतह्हरी कहते हैं, “आपने इतिहास में कहां देखा होगा कि किसी राष्ट्र में सभी लोगों में धार्मिक भावना हो, ग़ैर धार्मिक लोगों को इस हद तक आज़ादी दी जाए कि वे मस्जिदुन नबी या मक्के में बैठें और जिस तरह की बात करना चाहें करें, ईश्वर का इंकार करें, पैग़म्बर को न मानें लेकिन इन सबके बावजूद धर्म के अनुयायी उनके साथ पूरे सम्मान के साथ व्यवहार करें।”

नागरिकों की विभिन्न प्रकार की आज़ादी व अधिकार से संपन्नता निरंकुश नहीं है बल्कि इसके साथ कुछ बिन्दु हैं जिन पर अमल ज़रूरी है। एक व्यक्ति अपनी आज़ादी के साथ साथ दूसरे लोगों की आज़ादी व अधिकार पर अतिक्रमण नहीं कर सकता। इसी प्रकार उसे ऐसे काम से बचना चाहिए जिससे आम सुरक्षा ख़तरे में पड़े या अराजकता फैले। इस लिए मानवाधिकार के मानदंड के आधार पर जनसभा के आयोजन के अधिकार के लिए भी कुछ शर्तें निर्धारित हो सकती हैं। जैसे आम सुरक्षा व्यवस्था व स्वास्थ्य और आम नैतिक सिद्धांतों के सामने मौजूद ख़तरे के मद्देनज़र कुछ प्रकार की जनसभा के आयोजन को रोका जा सकता है लेकिन इस बात पर ध्यान देना ज़रूरी है कि मानवाधिकार के मानदंड के पीछे अस्ल भावना जनसभा के आयोजन की आज़ादी का समर्थन करती है और क़ानून की ओर से कुछ शर्तें एक अपवाद की हैसियत रखती हैं। कुछ शर्तें या सीमित्ताएं एक प्रजातांत्रिक समाज के तक़ाज़ों के तहत लगायी जाती हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि क़ानूनी व तार्किक सीमित्ताएं आम नागरिकों के हितों के मद्देनज़र लगायी जाती हैं न कि सरकार के हित में। जो चीज़ एक जनसभा के आयोजन की आज़ादी को सीमित कर सकती है वह इसके आयोजन की मांग करने वालों या अन्य नागरिकों के स्वास्थ्य का ख़तरे में पड़ना है न सरकार के आलोचना का पात्र बनने का डर।