Taleemat e Ameer 4

** تعلیمات امیر (Taleemat e Ameer r.a)
** چوتھا حصہ (part-4)…

پس تمام روہانی سلسلہ آپ پر ہی منتہی ہوتے ہیں اور تمام ولیوں کی ولایت آپ ہی کا خاصّہ ہے۔ پس فقیر ان پانچ برگزیدہ ہستیوں کا ذکر کرنے کی سعادت حاصل کرتا ہے کہ جن سے گروہ صوفیاء کا سلسلہ بلواسطہ یہ بلاواسطہ تور پر جاری و ساری ہوا اور اس کے بعد فقیر ائمہ اثنا عشریہ ان ۱۲ خلیفہ برحق کا ذکر کرنے کی سعادت حاصل کریگا جو سرکار دو عالم صلی اللہ علیہ وسلم کے علم کے بلافصل جانشین ٹھہرے۔ پس ان سب میں پہلے امام حسن ال مجتبی سرکار سبز قبا علیہ السلام ہے کہ جو علم بزرگی مرتبہ مقام شجاعت بلاغت سخاوت شرافت امامت وجاہت قناعت میں اپنے جدّ سرورے کونین سرکار دو عالم صلی اللہ علیہ وسلم اور اپنے پدرے بزرگوار حضرت مولی المتقیان امام علی علیہ السلام کے حقیقی جانشین ٹھیریں۔
۱۔ پس آپؑ سے آپ کے برادر اصغر امام حسین علیہ السلام نے اور ان سے آپ کے فرزند ارجمند امام حسن ال مثنی علیہ السلام نے بیت و خلافت حاصل کیا جن سے ‘قطبیہ’ اور ‘قادریہ’ سلسلہ کا آغاز ہوا۔جو اس طرح سے ہے کہ حضرت رسول القدس محمد صلی اللہ علیہ وسلم نے خرقہ خلافت حضرت مولی علی علیہ السلام کو عطا کیا۔جن سے خرقہ خلافت امام حسن مجتبی علیہ السلام کو حاصل ہوا جن سے امام حسین شہید کربلا علیہ السلام کو حاصل ہوا جن سے حضرت حسن مثنیؑ کو حاصل ہوا جن سے حضرت عبداللہ ال محضؑ کو حاصل ہوا جن سے حضرت محمد ذیاالنفس زکیہ شہیدؑ کو حاصل ہوا (پس ان سے دو سلسلہ، سلسلہ قطبیہ جو امام حسنؑ سے آپ تک پہنچا اور دوسرا سلسلہ زیدیہ جو حضرت زید شہیدؑ سے پہنچا تھا کا آغاز ہوا جس کے آپ امام تھیں) اور آپ سے آپ کے چھوٹے بھائی حضرت موسی الجونؑ کو خرقہ خلافت حاصل ہوا (پس ان سے سلسلہ قادریہ کا آغاز ہوا جو حضور غوث الاعظم شیخ سید عبدالقادر جیلانی کی نسبت سے مشہور و معروف ہے)۔ اس طرح سلسلہ زیدیہ حضرت سرکار امیر کبیر ابو محمد عبد اللہ ال اشتر شہید عرف عبد اللہ شاہ غازیؒ سے سندھ (پاکستان) کی سرزمین پر پہنچا۔
اور سلسلہ قطبیہ کبیریہ حضرت سرکار غوث العالمین ہندل ولی بادشاہ مطلک امیر کبیر سید قطب الدین محمد ال مدنی ال کڑوی رحمت اللہ علیہ سے ہندوستان کی سرزمین پر پہنچا۔ اور اس طرح سے خانوادہ و سلسلہ بزرگ برتر قطبیہ کبیریہ سے سب سے اول ہند- سندھ کی سرزمین پر دین حق کا پرچم پھیرا اور ان کے مقدس وجود سے یہ سرزمین شاد آباد ہوئی۔ لیکن اس عالی شان خاندان و سلسلہ کے بزرگوں نے ہمیشہ اپنے آپ کو چھپاۓ رکھا اور امر مخفی کے تحت ان کو پس پردہ رکھا گیا۔ پس وقت وقت پر امر خاص کے تحت بزرگوں میں اشخاص پر ان کی عظمت عیاں رہی۔ پس انہی اشخاص میں ایک حضرت مخدوم اشرف سمنانی کچھوچھوی رحمت اللہ علیہ بھی ٹھیریں جنہوں نے اپنے مکتوبات میں یہ ارشاد فرمایا کہ ‘سادات کڑا جو سادات بنی حسن ال مجتبی علیہ السلام سے ہیں، ان کے حسب (شانِ بزرگی و کمالات) و نسب (سلسلہ آباؤ اجداد) کی طہارت میں میرے پاس کوئی کلام نہیں یعنی یہ خاندان و سلسلہ بےمثل و بےمثال ہے۔

📚 ماخز از کتاب چراغ خضر و منبع الولایت۔

हिजरत का पहला साल

img-20201026-wa00395620102773678183830.jpgसन्न १ हिजरी

मस्जिदे कुबा

“कुबा में सब से पहला काम एक मस्जिद की तअमीर थी। इसी मकसद के लिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हजरते कुलसुम बिन हिदम रदियल्लाहु तआला अन्हु की एक जमीन को पसन्द फ्रमाया जहाँ खानदाने अमर बिन औफ की खजूरें सुखाई जाती थीं। इसी जगह आप ने अपने मुकद्दस हाथों से एक मस्जिद की बुनियाद डाली। यही वो मस्जिद है जो आज भी मस्जिदे कुबा’ के नाम से मशहूर है। और जिस की शान में कुरआन की ये आयत नाज़िल हुई! ल-मस्जुिदुन उस-सिसा अलततक़वा मिन अव्वलि यौमिन अ-हक्कु फीह। फ़ीहि रिजालँय्-युहिबूना. अंप-य-त-तहहरू। वल्लाहु युहिबुल मु-त-तह-हिरीन। (तौबा

तर्जमा यकीनन वो मस्जिद जिस की बुनियाद पहले ही दिन से परहेज़गारी पर रखी हुई है। वो इस बात की ज़्यादा हकदार है आप उस में खड़ें हों। इस (मस्जिद) में ऐसे लोग हैं जिन को पाक बहुत पसन्द है। और अल्लाह तआला पाक रहने वालों से

महब्बत फ़रमाता है। (सूरए तौबा)

इस मुबारक मस्जिद की तअमीर में सहाबए किराम के साथ । साथ खुद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम भी ब नफसे नफीस अपने दस्ते मुबारक से इतने बड़े बड़े पत्थर उठाते कि इस के बोझ से जिस्मे नाजुक ख़म हो जाता था। और अगर आप के जाँ निसार अस्हाब में से कोई अर्ज करता कि या रसूलल्लाह! आप पर हमारे माँ बाप कुरबान हो जाएँ। आप छोड़ दीजिए। हम उठालेंगे। तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम उस की दिलजुई के लिए छोड़ देते मगर फिर उसी वज़न का दूसरा पत्थर उठा लेते। और खुद ही उस को ला कर इमारत में लगाते और तअमीरी काम में जोश व वलवले पैदा करने के लिए सहाबए किराम के साथ ब-आवाज़ मिलाकर हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हज़रते अब्दुल्लाह बिन रवाहा रदियल्लाहु तआला अन्हु के ये अश्आर पढ़ते जाते थे कि अफ़-लहा मंय्युआलिजुल मस्जिदा व यक-रउल कुरआना काइमंव- व काइदा वला यबीतुल लैला अन्हु . राकिदा।

तर्जमा :- वो कामयाब है जो. मस्जिद तअमीर करता है। और उठते बैठते कुरआन पढ़ता है. और सोते हुए रात नहीं गुजारता।

(वफाउल वफा जि.१ स.१८०)

मस्जिदुल जुम

चौदह या बीस रोज़ के कियाम में मस्जिदे कुबा की तअमीर फ़रमा कर जुमअ के दिन आप कुबा से शहरे मदीना की तरफ रवाना हुए। रास्ते में क़बीलए बनी सालिम की मस्जिद में पहला जुमअ आप ने पढ़ाया। यही वो मस्जिद है तो आज तक “मस्जिदुल • जुम के नाम से मशहूर है। अहले शहर को खबर हुई। तो हर

तरफ से लोग जज्बाते शौक में मुश्ताकाना इस्तिकबाल के लिए दौड़ पड़े। आप के दादा Hazrat अब्दुल मुत्तलिब की नन्हाली रिश्तेदार “बनू नज्जार’ हथियार लगाए “कुबा” से शहर तक दो रोया सर्फे बाँधे मस्ताना वार चल रहे थे। आप रासते में तमाम कबाएल की महब्बत का शुक्रिया अदा करते, और सब को खैर व बरकत की दुआएँ देते हुए चले जा रहे थे। शहर करीब आ गया तो अहले मदीना के जोश व खरोश का ये आलम था कि पर्दा नशीन खवातीन मकानों की छतों पर चढ़ गईं। और ये इस्तिकबालिया अश्आर पढ़ने लगीं कि

त-ल-अल बदरु अलैना व-ज-बश शुक्र अलैना

मिन सनीयातिल वदाई मा दआ लिल्लाहि दाई

हम पर चाँद तुलूअ हो गया वदाअ की घटियों से हम पर खुदा का शुक्र वाजिब है जब तक अललाह से दुआ माँगने वाले माँगते रहें।ا

अय्युहल मब-ऊसु फ़ीना अन्ता शर-रफ़-तल मदीना

जिअता बिल अम-रिल मुताई मर-हबन या खैर दाई

ऐ वो ज़ाते गिरामी! जो हमारे अन्दर मबऊस किए गए। आप वो दीन लाए जो इताअत के काबिल है आप ने मदीना को मुशर्रफ़ फरमा दिया तो आप के लिए “खुश आमदीद है। एक बेहतरीन

दअवत देने वाले।

फ-ल-बिस्ना सौबा य-म-नि फ-अलैकल्लाहु सल्ला

बअदा तल-फीकिर-रिकाई मा सआ लिल्लाहि साई

तो हम लोगों ने यमनी कपड़े पहने, हालाकि इस से पहले पैवंद जोड़ जोड़ कर कपड़े पहना करते थे। तो आप पर अल्लाह तआला उस वक्त तक रहमतें नाज़िल फ़रमाए। जब तक अल्लाह के लिए कोशिश करने वाले कोशिश करते रहें।

मदीना की नन्ही नन्ही बच्चियाँ जोशे मसर्रत में झूम झूम कर और दफ़ बजा बजा कर ये गीत गाती थीं कि

नहनु जवारिम मिम बनीइन नज्जारि

या हब-बज़ा मुहम्मदुम मिन जारि हम ख़ानदाने “बनू नज्जार’ की बच्चियाँ हैं, वाह, क्या ही खूब हुआ कि हज़तत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हमारे पड़ौसी हो गए।

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इन बच्चियों के जोशे मसर्रत और उनकी वालिहाना महब्बत से मुतास्सिर हो कर पूछा कि ऐ बच्चियो! क्या तुम मुझ से महब्बत करती हो? तो बच्चियों ने यक ज़बान हो कर कहा कि “जी हाँ ये सुनकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने

खुश

हो कर मुस्कुराते हुए फरमाया कि “मैं भी तुम से प्यार करता हूँ।”

(जरकानी अलल मवाहिब जि.१ स.३५९,३६०) छोटे छोटे लड़के और गुलाम झुंड के झुंड मारे खुशी के मदीना की गलियों गलियों में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि

वसल्लम की आमद आमद का नअरा लगाते हुए दौड़ते फिरते थे। सहाबीए रसूल बरा बिन आज़िब रदियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि जो फरहत व सुरूर और अनवार व तजल्लियात हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मदीना में तशरीफ लाने के दिन जाहिर हुए। न इस से पहले कभी जाहिर हुए थे. न इस के

(मदारिजुन नुबूव्वत जि.२ स.६५)

बाद।

अबू अय्यूब अन्सारी का मकान

तमाम कबाएले अन्सार जो रास्ते में थे इन्तिहाई जोशे मसर्रत के साथ ऊँटनी की महार थाम कर अर्ज करते कि या रसूलल्लाह! आप हमारे घरों को शरफे नुजूल बख़्शे। मगर आप उन सब मुहिब्बीन से यही फ़रमाते कि मेरी ऊँटनी की महार छोड़ दो। जिस जगह खुदा को मंजूर होगा। उसी जगह मेरी ऊँटनी बैंठ जाएगी। चुनान्चे जिस जगह आज मस्जिदे नबवी शरीफ़ है उस के पास हज़रते अय्यूब अन्सारी रदियल्लाहु तआला अन्हु का मकान था। उसी जगह हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ऊँटनी. बैठ गई। और हज़रते अबू अय्यूब अन्सारी रदियल्लाहु तआला अन्हु आप की इजाज़त से आप का सामान उठाकर अपने घर में ले गए। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उन्हीं के मकान पर कियाम फ़रमाया। हज़रते अबू अय्यूब अन्सारी रदियल्लाहु तआला अन्हु ने ऊपर की मंज़िल पेश की। मगर आप ने मुलाक़ातियों की आसानी का लिहाज़ करते हुए नीचे की मंज़िल को पसन्द फ़रमाया। हज़रते अबू अय्यूब अन्सारी रदियल्लाहु तआला अन्हु दोनों वक्त आप के लिए खाना भेजते और आप का बचा हुआ खाना तबर्रुक समझ कर मियाँ बीवी खाते। खाने में जहाँ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की उंगलियों का निशान पड़ा होता। हुसूले बरकत के लिए हज़रते अबू अय्यूब अन्सारी रदियल्लाहु तआला अन्हु उसी जगह से लुकमा उठाते

और अपने हर कौल व फेअल से बे पनाह अदब व एहतराम, और अकीदत व जाँ निसारी का मजाहरा करते। एक मर्तबा मकान के ऊपर की मंजिल पर पानी का घड़ा झूट गया। तो इस अन्देशे से कि कहीं पानी बहकर नीचे की मंज़िल में न चला जाए। और हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को कुछ तकलीफ न हो जाए। हज़रते अबू अय्यूब अन्सारी रदियल्लाहु तआला अन्हु ने सारा पानी अपने लिहाफ में खुश्क कर लिया। घर में यही एक लिहाफ था जो गीला हो गया। रात भर मियाँ बीवी ने सर्दी खाई मगर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ज़र्रा बराबर तकलीफ पहुँच जाए। ये गवारा नहीं किया सात महीने तक हज़रते अबू अय्यूब अन्सारी रदियल्लाहु तआला अन्हु ने इसी शान के साथ हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की मेज़बानी का शरफ हासिल किया। जब मस्जिदे नबवी और उसके आस पास क हुजरे तय्यार हो गए। तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम उन हुजरों में अपनी अज़वाजे मुतहहरात के साथ कयाम पज़ीर हो गए।

(ज़रकानी अलल मवाहिब जि. स.३५७ वगैरा) हिजरत का पहला साल किस्म किस्म के बहुत से वाकिआत को अपने दामन में लिए है। मगर इन में से चन्द बड़े बड़े वाकिआत को निहायत इख्तिसार के साथ हम तहरीर करते हैं।

हज़रते अब्दुल्लाह बिन सलाम का इस्लाम

हज़रते अब्दुल्लाह बिन सलाम रदियल्लाहु तआला अन्हु मदीना में यहूदियों के सब से बड़े आलिम थे, खुद उन का अपना बयान है कि जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मक्का से हिजरत फरमा कर मदीना में तशरीफ लाए। और लोग जूक दर जूक उन् की ज़ियारत के लिए हर तरफ से आने लगे तो मैं भी उसी वक्त ख़िदमते अकदस में हाज़िर हुआ और जूं ही मेरी नज़र जमाले नुबूब्बत पर पड़ी। तो.पहली नज़र में मेरे दिल ने ये फैसला

कर दिया कि “ये चेह्रा किसी झूटे आदमी का चेहरा नहीं हो सकता।”

फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने वज में इर्शाद फरमाया कि

अय्युहन्नासु अफ-शुस-सलामा व अत-इमुत-तआमा व सिलुल अरहामा व सल्लू बिल्लैलि वन्नासु नियामुन।

तर्जमा :- ऐ लोगो! सलाम का चर्चा करो। और खाना खिलाओ। और (रिश्तेदारों के साथ) सिलए रहमी करो। और रातों को जब लोग सो रहे हों तो तुम नमाज़ पढ़ो।

हज़रते अब्दुल्लाह बिन सलाम फ़रमाते हैं कि मैं ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को एक नज़र देखा और आप के ये चार बोल मेरे कान में पड़े। तो मैं इस कदर मुतास्सिर हो गया कि मेरे दिल की दुनिया ही बदल गई और मैं मुशर्रफ ब-इस्लाम हो गया। हज़रते अब्दुल्लाह बिन सलाम रदियल्लाहु अन्हु का दामने इस्लाम में आ जाना ! ये इतना अहम वाकिआ था कि मदीना के यहूदियों में खलबली मच गई।

(मदारिजुन्नुबूव्वा जि.२ स.६६ व बुख़ारी वगैरा)

हुजूर के अहल- अयाल मदीना में

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जब कि अभी हज़रते अबू अय्यूब अन्सारी रदियल्लाहु तआला अन्हु के मकान ही में तशरीफ फरमा थे। आप ने अपने गुलाम हज़रते जैद बिन हारिसा और हज़रते अबू राफेअ रदियल्लाहु अन्हुमा को पाँच सौ दिरहम और दो ऊँट दे कर मक्का भेजा। ताकि ये दोनों साहिबान अपने साथ हुजूर

अहल- अयाल को मदीना लाएँ। चुनान्चे ये दोनों हज़रात जा कर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की दो साहिब जादियों हज़रते फातिमा और हज़रते उम्मे कुलसूम रदियल्लाहु अन्हुम और आप की ज़ौजए मुतहा उम्मुल नमाज़ों की रक्अत में इज़ाफ़ामुमिनीन हजूते बीबी सौदह रदियल्लाहु अन्हा और हज़रते उसामा बिन जैद और हज़रते उम्मे ऐमन रदियल्लाहु अन्हुमा को मदीना ले आए। तीन जाँ निसारों की वफ़ातआप की साहिब जादी हज़रते जैनब रयिल्लाहु अन्हा न आ सकीं। क्योंकि उनके शौहर हज़रते अबुल आस इन्नुर रबीअ रदियल्लाहु अन्हु ने उन को मक्का में रोक लिया। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की एक साहिबज़ादी हज़रते बीबी रुकय्या रदियल्लाहु अन्हा अपने शौहर हज़रते. उस्माने गनी रदियल्लाहु तआला अन्हु के साथ हशा में थीं। इन्हीं लोगों के साथ हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु के फ़रज़न्द हज़रते अब्दुल्लाह रदियल्लाहु तआला अन्हु भी अपने सब घर वालों को साथ ले कर मक्का से मदीना आ गए। इन में हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु तआला अन्हा भी थीं। ये सब लोग मदीना आकर पहले हज़रते हारिसा बिन नुअमान रदियल्लाहु तआला अन्हु के मकान पर ठहरे।

(मदारिजुन्नुबूढा जि.२ स.६७)

मस्जिदे नबवी की तअमीर

मदीना में कोई ऐसी जगह नहीं थी जहाँ मुसलमान बा जमाअत नमाज़ पढ़ सकें। इस लिए मस्जिद की तअमीर निहायत ज़रूरी थी। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की कियाम गाह के करीब ही ‘बनू नज्जार का एक बाग था। आप ने मसिजद तअमीर करने के लिए इस बाग को कीमत देकर ख़रीदना चाहा। उन लोगों ने ये कहकर कि या रसूलल्लाह! सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हम खुदा ही से इस की कीमत (अज- सवाब) लेंगे। मुफ्त में ये जमीन मस्जिद की तअमीर के लिए पेश कर दी।

लेकिन चूंकि ये जमीन असल में दो यतीमों की थी। आप ने दोनों यतीम बच्चों को बुला भेजा। उन यतीम बच्चों ने भी जमीन मस्जिद के लिए नज़ करनी चाही। मगर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस को पसन्द नहीं फ़रमाया । इस लिए हजरते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु के माल से आप ने इस की कीमत अदा फरमा दी। (मदारिजुन्नुबूव्वा जि.२ स.६८)

इस जमीन में चन्द दरख्त, कुछ खन्डरात और कुछ मुशरिकों की कनें थीं। फिर ज़मीन को हमवार करके खुद आप ने अपने

मुबारक से मस्जिद की बुनियाद डाली। और कच्ची ईंटों की दीवार और खजूर के सुतूनों पर, खजूर की पत्तियों से छत बनाई जो बारिश में टपकती थी। इस मस्जिद की तअमीर में सहाबए किराम के साथ खुद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम भी ईंटें उठा उठा कर लाते थे। और सहाबए किराम को जोश दिलाने के लिए उन के साथ आवाज़ मिलाकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम रजज़ का ये शेअ पढ़ते जाते थे कि –

अल्लाहुम्मा ला खैर इल्ला खैरुल आखिरह फ़ग़फि-रिल अन्सार वल-मुहाजिरह

(बुख़ारी जि.१ स.६१)

ऐ अल्लाह! भलाई तो सिर्फ आख़िरत ही की भलाई है। लिहाजा ऐ अल्लाह! तू अन्सार व मुहाजिरीन को बख्श दे।

इसी मस्जिद का नाम “मस्जिदे नबवी है। ये मस्जिद हर किस्म के दुनियावी तकल्लुफात से पाक और इस्लाम की सादगी की सच्ची. और सही तसवीर थी, इस मस्जिद की इमारते अव्वल, तूल व अर्ज में साठ (६०) गज़ लम्बी और चव्वन (५४) गज़ चौडी थी। और इस का किबला बैतुल मुकद्दस की तरफ बनाया गया था। मगर जब किबला बदल कर कबा की तरफ हो गया। तो

मस्जिद के शुमाली जानिब एक नया दरवाजा काएम किया गया। इस के बाद मुख्तलिफ ज़मानों में मस्जिदे नबवी की तजदीद व तौसीअ होती रही।

मस्जिद के एक किनारे पर एक चबूतरा था जिस पर खजूर की पत्तियों से छत बना दी गई थी। इसी चबूतरे का नाम “सुफ्फा” है। जो सहाबा घर बार नहीं रखते थे। वो इसी चबूतरे पर सोते बैठते थे। और यही लोग “अस्हाबे सुफ्फा” कहलाते थे।

(मदारिजुन्नुबूव्वा जि.२ स.६९ व बुख़ारी)

अज़वाजे मुतहात के मकानात

मस्जिदे नबवी के मुत्तसिल ही आप ने अज़वाजे मुतहरात

के लिए हजुरे भी बनवाए उस वक्त तक हज़रते बीबी सूदह और हज़रते आइशा रदियल्लाहु अन्हुमा निकाह में थीं। इस लिए दो ही मकान बनवाए। जब दूसरी अज़वाजे मुतहात आती गईं तो दूसरे मकानात बनते गए। ये मकानात भी बहुत ही सादगी के साथ बनाए गए थे। दस दस हाथ लम्बे, छे छे, सात सात हाथ चौडे। कच्ची ईंटों की दीवारें, खजूर की पत्तीयों की छत, वो भी इतनी नीची कि आदमी खड़ा हो कर छत को छू लेता,दरवाज़ों में कवाड़ भी न थे। कम्बल या टाट के पर्दे पड़े रहते थे।

(तबकात इब्ने सअद वगैरा) अल्लाहु अकबर! ये है शहंशाहे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का वो काशानए नुबूव्वत, जिस की आस्ताना बोसी और दरबानी जिबरईल अलैहिस्सलाम के लिए सरमायए सआदत और बाइसे इफ्तिखार थी।

अल्लाह! अल्लाह! वो शहंशाहे कौनैन जिस को खालिके काएनात ने अपना मेहमान बनाकर अर्श अअजम पर मसनद नशीं बनाया और जिस के सर पर अपनी महबूबियत का ताज पहना कर ज़मीन के खजानों की कुंजियाँ जिस के हाथों में अता फरमा दी

और जिस को काएनाते आलम में किस्म किस्म के तसर्रुफात का मुख्तार बना दिया। जिस की ज़बान का हर फ़रमान कुन की कुन्जी। जिस की निगाहे करम के एक इशारे ने उन लोगों को जिस के हाथों में ऊँटों की महार रहती थी। उन्हें अकवामे आलम की किस्मत की लगाम अता फरमा दी। अल्लाहु अकबर! वो ताजदारे रिसालत जो सुल्ताने दारैन, और शहंशाहे कौनैन है उस की हरम सरा का ये आलम? ऐ सूरज! बोल। ऐ चाँद! बता। तुम दोनों ने इस जमीन के बे शुमार चक्कर लगाए हैं मगर क्या तुम्हारी आँखों ने ऐसी सादगी का कोई मंज़र कभी भी और कहीं भी देखा है?

मुहाजिरीन के घर

मुहाजिरीन जो अपना सब कुछ मक्का में छोड़कर मदीने चले गए थे। उन लोगों की सुकूनत के लिए भी हुजूर सल्लल्लाहु । तआला अलैहि वसल्लम ने मस्जिदे नबवी के कुर्ब- जवार ही में इन्तिज़ाम फ़रमाया। अन्सार ने बहुत बड़ी कुर्बानी दी कि निहायत फ़राख दिली के साथ अपने मुहाजिर भाईयों के लिए अपने मकानात और ज़मीनें दी और मकानों की तअमीरात में हर किस्म की इमदाद बहम पहुँचाई। जिस से मुहाजिरीन की आबाद कारी में बड़ी सुहूलत हो गई।

सब से पहले जिस अन्सारी ने अपना मकान हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को बतौर हिबा के नज़ किया। उस खुश नसीब का नामे नामी हज़रते हारिसा बिन नुअमान है। चुनान्चे अजवाजे मुतहरात के नकानात हज़रते हारिसा बिन नुअमान की जमीन में बनाए गए। (रदियल्लाहु अन्हु)

हज़रते आइशा की रुख्सती

हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा का हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से निकाह तो हिजरत से कब्ल ही मक्का

में हो चुका था मगर उन की रुख्सती हिजरत के पहले ही साल भदीना में हुई। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एक प्याला दूध से लोगों की दवते वलीमा फरमाई। (मदारिजुन्नुबूब्बा)

अज़ान की इब्तिदा

मस्जिदे नबवी की तअमीर तो मुकम्मल हो गई। मगर लोगों को नमाजों के वक्त जमा करने का कोई ज़रीआ नहीं था। जिस से नमाज़ बा जमाअत का इन्तिज़ाम होता। इस सिलसिले में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने सहाबए किराम से मश्वरा फरमाया बअज ने नमाज़ों के वक़्त आग जलाने का मश्वरा दिया। बज़ ने नाकूस बजाने की राय दी। मगर हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने गैर मुस्लिमों के उन तरीकों को पसन्द नहीं फ़रमाया। हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु ने ये तजवीज़ पेश की कि हर नमाज़ के वक्त किसी आदमी को भेज दिया जाए जो पूरी मुस्लिम आबादी में नमाज़ का एलान कर दे। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस राय को पसन्द फ़रमाया और हज़रते बिलाल रदियल्लाहु तआला अन्हु को

हुक्म फ़रमाया। कि वो नमाज़ों के वक़्त लोगों को पुकार दिया करें। चुनान्चे वो – अस्सलातु जामिअतुन’ कहकर पाँचों नमाज़ों के वक्त एअलान करते थे। इसी दरमियान में एक सहाबी हज़रते अब्दुल्लाह बिन ज़ैद अन्सारी रदियल्लाहु तआला अन्हु ने ख्वाब में देखा कि अज़ाने शरई के अल्फाज़ कोई सुना रहा है इस के बाद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु और दूसरे सहाबा को भी इसी किस्म के ख्वाब नजर आए। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस को मिनजानिब अल्लाह समझकर कबूल फ़रमाया। और हज़रते अब्दुल्लाह बिन जैद रदियल्लाहु अन्हु को हुक्म दिया कि तुम बिलाल को अज़ान के कलिमात सिखा दो। क्योंकि वो तुम

से ज्यादा बलन्द आवाज़ हैं। चुनान्चे उसी दिन से शरई अजान का तरीका जो आज तक जारी है और कियामत तक जारी रहेगा शुरू हो गया। (जरकानी अलल मवाहिब जि.१ स.३७६ व बुख़ारी)

अन्सार व मुहाजिर भाई भाई

हज़रात! मुहाजिर चूँकि इन्तिहाई बे सरो सामानी की हालत में बिल्कुल खाली हाथ अपने अहल- अयाल को छोड़कर मदीना आए थे इस लिए परदेस में मुफलिसी के साथ वहशत- बेगानगी और अपने अहल- अयाल की जुदाई का सदमा महसूस करते थे। इस में शक नहीं कि अन्सार ने उन मुहाजिरीन की मेहमान नवाज़ी और दिलजुई में कोई कसर नहीं उड़ा रखी। लेकिन मुहाजिरीन देत तक दूसरों के सहारे जिन्दगी बसर करना पसन्द नहीं करते थे। क्योंकि वो लोग हमेशा से अपने दस्त व बाजू की । कमाई खाने के खूगर थे। इस लिए ज़रूरत थी कि मुहारिजी की परेशानी को दूर करने और उन के लिए मुस्तकिल ज़रीअए मुआश : मुहय्या करने के लिए कोई इन्तिज़ाम किया जाए। इस लिए हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने ख़याल फ़रमाया कि अन्सार व मुहाजिरीन में रिश्तए उखूवत (भाई चारा) काएम करके उनको भाई भाई बना दिया जाए। ताकि मुहाजिरीन के दिलों से अपनी तन्हाई और बे कसी का एहसास दूर हो जाए और एक दूसरे के मददगार बन जाने से मुहाजिरीन के ज़रीअए मआश का मसला भी हल हो जाए। चुनान्चे मस्जिदे नबवी की तअमीर के बाद एक दिन हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते अनस बिन मालिक रदियल्लाहु तआला अन्हु के मकान में अन्सार व मुहाजिरीन को जमअ फरमाया। उस वक्त तक मुहाजिरीन की तअदाद पैंतालीस या पचास थी। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अन्सार को मुखातब करके फरमाया। ये मुहाजिरीन तुम्हारे भाई हैं। फिर मुहाजिरीन व अन्सार में से दो दो

शख्स को बुला कर फरमाते गए कि “ये और तुम भाई भाई हो” हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के इर्शाद फरमाते ही ये रिश्तए उखूवत बिल्कुल हकीकी भाई जैसा रिश्ता बन गया। चुनान्चे अन्सार ने मुहाजिरीन को अपने साथ ले जा कर अपने घर की एक एक चीज़ सामने ला कर रख दी। और कह दिया कि आप हमारे भाई हैं इसलिए इन सब सामानों में आधा आपका और आधा हमारा है, हद हो गई कि हजरते सअद बिन रबीअ अन्सारी रदियल्लाहु तआला अन्हु जो हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रदियल्लाहु तआला अन्हु के भाई करार पाए थे। उन की दो बीवीयाँ थीं। हज़रते सद बिन रबीअ अन्सारी रदियल्लाहु तआला अन्हु ने हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ रदियल्लाहु तआला अन्हु से कहा कि मेरी एक बीवी जिसे आप पसन्द करें, मैं उस को तलाक दे दूँ। और आप उस से निकाह कर लें।

अल्लाहु अकबर! इस में शक नहीं कि अन्सार का ये ईसार एक ऐसा बे मिसाल शाहकार है कि अकवामे आलम की तारीख़ में इस की मिसाल मुश्किल ही से मिलेगी। मगर मुहाजिरीन ने क्या तर्जे अमल इख्तियार किया ये भी एक काबिल तकलीद तारीख़ी कारनामा है। हज़रते सध्द बिन रबीअ अन्सारी रदियल्लाहु तआला अन्हु की इस मुखलिसाना पेश कश को सुनकर हजरते अब्दुर्रहमान बिन औफ रदियल्लाहु तआला अन्हु ने शुक्रिया के साथ ये कहा कि अल्लाह तआला ये सब माल व मताअ और अहलने अयाल आप को मुबारक फरमाए मुझे तो आप सिर्फ बाज़ार का रास्ता बता दीजिए। उन्होंने मदीना के मशहूर बाज़ार “कैनुकाअ का रासता बता दिया। हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ रदियल्लाहु तआला अन्हु बाजार गए। और कुछ घी, कुछ पनीर ख़रीद कर शाम तक बेचते रहे। इसी तरह रोजाना वो बाज़ार जाते रहे। और थोड़े ही अर्से में वो काफ़ी मालदार हो गए और उन के पास इतना सरमाया हो गया कि उन्होंने शादी करके अपना घर बसा लिया। जब ये बारगाहे रिसालत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम में हाज़िर

हुए तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने दर्याफ्त फ़रमाया कि तुम ने बीवी को कितना महर दिया? अर्ज़ किया कि पाँच दिरहम बराबर सोना। इर्शाद फरमाया कि अल्लाह तआला तुम्हें बरकतें अता फरमाए। तुम दअवते वलीमा करो अगरचे एक ही बकरी हो। (बुख़ारी बाबुल वलीमा वल वबशाह स.७७७ जि.२)

और रफ्ता रफ़्ता तो हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रिदयल्लाहु अन्हु की तिजारत में इतनी खैर- बरकत हुई कि खुद उन का कौल है कि “मैं मिट्टी को छू देता हूँ तो सोना बन जाती है। मन्कूल है कि उन का सामाने तिजारत सात सौ ऊँटों पर लद कर आता था। और जिस दिन मदीना में उन का तिजारती सामान पहुँचता था तो तमाम शहर में धूम मच जाती थी।

(असदुल गाबा जि.३ स.३१४) हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रदियल्लाहु अन्हु की तरह दूसरे मुहाजिरीन ने भी दुकानें खोल लीं। हज़रते अबू बकर रदियल्लाहु अन्हु कपड़े की तिजारत करते थे। हज़रते उस्मान रदियल्लाहु अन्हु “कैनुकाअ के बाज़ार में खजूरों की तिजारत करने लगे। हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु भी तिजारत में मशगूल हो गए थे। दूसरे मुहाजिरीन ने भी छोटी बड़ी तिजारत शुरू कर दी। गर्ज बावजूद ये कि मुहाजिरीन के लिए अन्सार का घर मुस्तकिल मेहमान ख़ाना था। मगर मुहाजिरीन ज़्यादा दिनों तक अन्सार पर बोझ नहीं बने बल्कि अपनी मेहनत और बे पनाह कोशिशों से बहुत जल्द अपने पार्वं पर खड़े हो गए।

मशहूर मुअरिंखे इस्लाम हज़रते अल्लामा इब्ने अब्दुल बर अलैहिर्रहमा का कौल है कि ये अक्दे मुआख़ात (भाई चारे का मुआहदा) तो अन्सार व मुहाजिरीन के दर्मियान हुआ। इस के अलावा एक ख़ास “अकदें मुआख़ात’ मुहाजिरीन के दर्मियान भी हुआ। जिस में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एक मुहाजिर को दूसरे मुहाजिर का भाई बना दिया। चुनान्चे हज़रते अबू बकर व हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हुमा,

व हज़रते जुबैर रदियल्लाहु अन्हुमा और हजरते उस्मान व हजरते अब्दुर्रहमान बिन औफ रदियल्लाहु अन्हुमा के दर्मियान जब भाई चारा होगया। तो हजरते अली रदियल्लाहु तआला अन्हु ने दरबारे रिसालत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम में अर्ज किया कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम आप ने अपने सहाबा को एक दूसरे का भाई बना दिया। लेकिन मुझे आप ने किसी का भाई नहीं बनाया। आखिर मेरा भाई कौन है? तो हुजूर सल्लल्लाह तआला अलैहि वसल्लम ने इर्शाद फ़रमाया कि.

“अन्ता अख़ी फिददुन्या वल-आखिरति” यानी तुम दुनिया और आख़िरत में मेरे भाई हो। (भदारिजुन नुबूव्वत जि. स.७१)

यहूदियों से मुआहदा

मदीना में अन्सार के अलावा. बहुत से यहूदी आबाद थे। उन यहूदियों के तीन कबीले बनू कैनुकाअ, बनू नज़ीर, कुरैज़ा। मदीना के अतराफ में आबाद थे और निहायत मज़बूत महल्लात और मुस्तहकम किलो बनाकर रहते थे। हिजरत से पहले यहूदियों और अन्सार में हमेशा इख्तलाफ रहता था। और वो इख़्तलाफ अब भी मौजूद था। और अन्सार के दोनों कबीले अवस व खुज़रज बहुत कमजोर हो चुके थे। क्योंकि मशहूर लड़ाई जंगे बुआस’ में इन दोनों कबीलों के बड़े बड़े सरदार और नामवर बहादुर आपस में लड़ लड़कर कत्ल हो चुके थे। और यहूदी हमेशा इस किस्म की तदबीरों और शरारतों में लगे रहते थे कि अन्सार के ये दोनों कबाएल हमेशा टकराते रहें। और कभी भी मुत्तहिद न होने पाएँ। इन वुजूहात की बिना पर हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने यहूदियों और मुसलमानों के आइन्दा तअल्लुकात के बारे में एक मुआहदा की ज़रूरत महसूस फरमाई। ताकि दोनों फरीक अमन व सुकून के साथ रहें। और आपस में कोई तसादुम

और टकराव न होने पाए। चुनान्चे आप ने अन्सार और यहूद को बुला कर मुआहदा की एक दस्तावेज़ लिखवाई जिस पर दोनों फरीक के दस्तखत हो गए।

इस मुआहदा के दफआत के खुलासा हस्बे जेल हैं। खू बहा (जान के बदले जो माल दिया जाता है) और फ़िदया (कैदी को छुड़ाने के बदले जो रकम दी जाती है) का जो तरीका पहले से चला आता था। अब भी वो काएम रहेगा

। (२) यहूदियों को मज़हबी आज़ादी हासिल रहेगी। उन के मजहबी

रुसूम में काई दखल अन्दाजी नहीं की जाएगी। (३) यहूदी और मुसलमान बाहम दोस्ताना बरताव रखेंगे। (४) यहूदी या मुसलमानों को किसी से लड़ाई पेश आएगी तो एक

फ़ीक दूसरे की मदद करेगा। (५) अगर मदीना पर कोई हमला होगा तो दोनों फरीक मिलकर

हमला आवर का मुकाबला करेंगे। (६) कोई फ़ीक़ कुरैश और उन के मददगारों को पनाह नहीं देगा। (७) किसी दुश्मन से अगर एक फ़ीक सुलह करेगा तो

दूसरा फ़ीक़ भी इस मुसालहत में शामिल होगा। लेकिन मज़हबी लड़ाई इस से मुस्तसना रहेगी।

(सीरते इब्ने हश्शाम जि.४ सं. ५०१ ता ५०२)

मदीना के लिए दुआ

चूँकि मदीना की आबो हवा अच्छी नहीं थी। यहाँ तरह तरह की वबाएँ और बीमारियाँ फैलती रहती थीं। इस लिए कसरत से मुहाजिरीन बीमार होने लगे। हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु और हज़रते बिलाल रदियल्लाहु अन्हु शदीद लरज़ा बुख़ार में मुब्तला होकर बीमार हो गए। और बुख़ार की शिद्दत में ये हज़रात अपने वतन मक्का को याद करके कुफ्फार पर लअनत भेजते थे। और मक्का की पहाड़ियों और घासों के फिराक में अश्आर पढ़त

थे। हुजूपढ़्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस मौकअ पर ये दुआ फ़रमाई कि या अल्लाह! हमारे दिलों में मदीना की ऐसी ही महब्बत डाल दे जैसी मक्का की महब्बत है। बल्कि इस से भी ज्यादा। और मदीना की आबो हवा को सेहत बख्श बना दे और मदीना के साअ और मुद (नाप तौल के बरतनों) में खैर- बरकत अता फरमा। और मदीना के बुख़ार को “हुजफा” की तरफ मुन्तकिल करदे । (मदारिज जि.२ स.७० व बुखारी)

हज़रते सलमान फ़ारसी मुलमान हो गए

सन्न १ हिजरी के वाकिआत में हज़रते सलमान फारसी रदियल्लाहु अन्हु के इस्लाम का वाकिआ भी बहुत अहम है। ये फारस के रहने वाले थे। उन के आबा व अजदाद बल्कि उन के मुल्क की पूरी आबादी मजूसी (आतश परस्त) थी। ये अपने आबाई दीन से बेजार हो कर दीने हक की तलाश में अपने वतन से निकले। मगर डाकूओं ने उनको गिरफ्तार करके अपना गुलाम बना लिया। फिर उनको बेच डाला। चुनान्चे ये कई बार बिकते रहे। और मुख़्तलिफ़ लोगों की गुलामी में रहे। इसी तरह ये मदीना पहुँचे। कुछ दिनों तक ईसाई बनकर रहे और यहूदियों से भी मेल जोल रखते रहे। इस तरह उनको तौरेत व इन्जील की काफी मालूमात हासिल हो चुकी थी। ये हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुए तो पहले दिन ताजा खजूरों का एक तबाक ख़िदमते अकदस में ये कहकर पेश किया कि ‘ये सदका है हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि इस को हमारे सामने से उठाकर फुकरा व मसाकीन को दे दो क्योंकि मैं सदका नहीं खाता। फिर दूसरे दिन खजूरों का ख्वान लेकर पहुंचे। और ये कहकर कि “ये हदया है* सामने रख दिया। तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने सहाबा

हाथ बढ़ाने का इशारा फरमाया और खुद भी खा लिया। इस

दर्मियान में हज़रते सलमान फारसी रदियल्लाहु अन्हु ने हुजूर सीरतुल मुस्तफा अलहि सल्लम

के दोनों शानों के दर्मियान जी नजर डाली तो मुहरे नुबूब्बत’ को देख लिया। चूंकि ये तौरेत व इन्जील में नबी आखिरुज-ज़माँ की निशानियाँ पढ़ चुके थे इस लिए फौरन ही इस्लाम कबूल कर लिया ।(मदारिज जि.२ स.७१ वगैररा)

नमाज़ों की रक्अत

में इज़ाफ़ा अब तक फर्ज नमाज़ों में सिर्फ दो ही रक्अतें थीं। मगर हिजरत के साले अब्बल ही में जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मदीना तशरीफ़ लाए तो जुहर व इशा में चार चार रक्अतें फर्ज हो गईं। लेकिन सफ़र की हालत में अब भी दो ही रक्अतें काएम रहीं। इसी को सफ़र की हालत में नमाजें में “कस्र कहते हैं। (मदारिज जि.२ स.७१)

तीन जाँ निसारों की वफ़ात

इस साल हज़रात सहाबए किराम में से तीन निहायत ही शानदार और जाँ निसार हज़रात ने वफ़ात पाई। जो दर हकीकत इस्लाम के जाँ निसार और बहुत ही बड़े मुईन व मददगार थे।

अव्वल : हज़रते कुलसूम बिन हिदम रदियल्लाहु अनहु वो खुश नसीब मदीना के रहने वाले अन्सारी हैं कि हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जब हिजरत फ़रमाकर ‘कुबा’ में तशरीफ लाए तो सब से पहले इन्ही के मकान को शर्फे नुजूल बख़्शा। और बड़े बड़े मुहाजिरीन सहाबा भी इन्ही के मकान में ठहरे थे। और इन्होंने दोनों आलम के मेज़बान को अपने घर में मेहमान बनाकर ऐसी मेजबानी की कि कियामत तक तारीखे रिसालत के सफहात पर इन का नामे नामी सितारों की तरह चमकता रहेगा।

दुबम : हज़रते बरा बिन मअरूर अन्सारी रदियल्लाहु अन्हु ये वो शख्स हैं कि बैअते उक्बा में सब से पहले हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दस्ते हक परस्त पर वैअत की और ये अपने कबीले “खुज़रज” के नकीबों में थे

सुव्वम : हज़रते असअद बिन जुरारह अन्सारी रदियल्लाहु अन्हु

ये बैअते अक्वा ऊला और बैअते उक्या सानिया की दोनों बैअतों में शामिल रहे। और ये पहले शख्स हैं जिन्होंने मदीना में इस्लाम का डंका बजायां और हर घर में इस्लाम का पैगाम पहुँचाया।

जब मजकूरा बाला तीनों मुअज्ज़िज़ीन सहाबा ने वफात पाई तो मुनाफिकीन और यहूदियों ने इस की खुशी मनाई और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को तअना देना शुरू किया कि अगर ये पैगम्बर होते तो अल्लाह तआला उन को ये सदमात क्यों पहुँचाता? खुदा की शान कि ठीक उसी ज़माने में कुफ्फार के दो बहुत ही बड़े बड़े सरदार भी मर कर मुरदार हो गए। एक “आस बिन वाएल सहमी जो हज़रते अमर बिनुल आस सहाबी रदियल्लाहु अन्हु फातहे मिस्र का बाप था। दूसरा “वलीद बिन मुगय्यरा” जो हज़तरे ख़ालिद सैफुल्लाह सहाबी रदियल्लाहु अन्हु का बाप था।

रिवायत है कि “वलीद बिन मुगय्येरा’ जाँ कनी के वक्त बहुत ज़्यादा बेचैन हो कर तड़पने और बे करार हो कर रोने लगा। और फ़र्याद करने लगा। तो अबू जहल ने पूछा कि चचा जान! आखिर आप की बे करारी और इस गिरया वज़ारी की क्या वजह है? तो ‘वलीद बिन मुगय्येरा’ बोला कि मेरे भतीजे! मैं इस लिए इतनी बे करारी से रो रहा हूँ कि मुझे अब ये डर है कि मेरे बाद मक्का में मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) का दीन फैल जाएगा। ये सुनकर अबू सुफयान ने तसल्ली दी और कहा कि चचा! आप हरगिज़ हरगिज़ इस का गम न करें मैं ज़ामिन होता हूँ कि मैं दीने इस्लाम को मक्का में नहीं फैलने दूंगा। चुनान्चे अबू सुफ़यान अपने इस अहद पर काएम रही कि मक्का फतह होने तक वो बराबर इस्लाम के खिलाफ जंग करते रह