






” अहलेबैत ए अतहार के दुश्मन पर जन्नत हराम है “
हुज़ूर नबी ए अकरम صلی اللہ علیہ وآلہ وسلم ने फ़रमाया
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने जन्नत को हराम क़रार दे दिया है उस पर जो मेरे अहलेबैत पर ज़ुल्म करे, उन से जंग करे, उन पर हमला करे या उन्हें गालियां दे
हवाला :-
यनाबि अल मुवद्दा 2 /119/344
तफ़्सीर ए क़ुरतबी 16 सफ़ह 22
कश्शाफ़ 3 सफ़ह 402

“Aur Mere gharwalon me se mera ek wazeer banade.
(Wo) Mera bhai Harun (Alaihissalam) ho.” Surah Taha 20:29,30
Hazrat Musa Alaihissalam ko Apne bhai Harun Alaihissalam se bahot zyada mohabbat thi isliye jo Naymaten Unhe mili wo Chahte they ke Unke bhai ko bhi wo mile.
Aaqa SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ko bhi Apne Bhai se bahot zyada mohabbat thi isliye farmaya: “Ali Mere liye aise hai jaise Harun Alaihissalam Musa Alaihissalam keliye, bus Mere baad ab koi Nabi nahi”. (Ye Hadees 100 se zyada Asaneed ke saath riwayat hui, yaani itni pukhta!)
Aur Maula Ali Alaihissalam se farmaya Ay Ali! Ek baar bhi aisa nahi hua ke jo Maine Apne liye Allah se manga ho wo Tumhare liye na manga ho! (Jo Apne liye mangte Wo Apne Is Azeem Bhai keliye bhi mangte).
hamare Aaqa ko kaisi Muhabbat thi Maula Ali se, to hum Aaqa ke gulamo ko kis darje ki Mohabbat hone chahiye Maula-e-Kainat se.
सूरह फातिहा के, 55,नाम हैं जो कि क़ुर्आन में ही मज़कूर हैं

📕 अलइतकान,जिल्द 1,सफह 67
हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि, सूरह फातिहा की मिस्ल कोई भी सूरह तौरैत-ज़बूर-इंजील और खुद क़ुर्आन मुक़द्दस में भी नहीं है
📕 तिर्मिज़ी,जिल्द 2,सफह 318
हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि👇
सूरह फातिहा हर मर्ज़ के लिए शिफा है
📕 वज़ाइफे रज़वियह,सफह 126
फज्र की सुन्नत और फर्ज़ के दर्मियान 41 बार सूरह फातिहा इस तरह पढ़ें कि = बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीमिल हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन!= इस तरह हर 41 बार पढ़कर मरीज़ पर दम करें और पानी में भी दम करके पिला सकते हैं,इंशाअल्लाह तआला शिफा हासिल होगी
📕 जन्नती ज़ेवर,सफह 459
हाजत बरारी के लिए इसी तरह 40 बार पढ़ने की ताकीद हज़रत ख्वाजा निज़ाम उद्दीन औलिया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु भी फरमाते हैं मगर इसके पढ़ने में हर बार =अर्रहमानिर रहीम!= को, 3 बार कहना है और हर बार आखिर में, 3 मर्तबा आमीन कहना है,और सबसे आखिर में अपने मक़सद के लिए दुआ करें,और हाजत बरारी के लिए कोई वक़्त मुतय्यन नहीं है जब चाहें पढ़ें
📕 फवादुल फवाद,सफह 74