हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और चार परिन्दे


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〽️हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने एक रोज़ समुंद्र के किनारे एक आदमी मरा हुआ देखा। आपने देखा के समुद्र की मछलियाँ उसकी लाश को खा रही हैं और थोड़ी देर के बाद फिर परिन्दे आकर उसकी लाश को खाने लगे फिर आपने देखा के जंगल के कुछ दरिन्दे आए और वो भी उसकी लाश को खाने लगे।

आपने ये मंजर देखा तो आपको शौक़ हुआ की आप मुलाहेज़ा फ़रमाएँ की मुर्दे किस तरह ज़िन्दा किए जाएँगे।

चुनाँचे आपने ख़ुदा से अर्ज़ किया- इलाही! मुझे यकीन है की तू मुर्दों को जिन्दा फरमाएगा और उनके अज्ज़ाऐ दरयाई जानवरों, परिन्दों और दरिन्दों के पेटों से जमा फरमाएगा। लेकिन मैं ये अजीब मंज़र देखने की आरज़ू रखता हूँ।

खुदा ने फ़रमाया- अच्छा ऐ खलील! तुम चार परिन्दे लेकर उन्हें अपने साथ हिला लो ताकी अच्छी तरह उनकी शनाख़्त हो जाए। फिर उन्हें ज़िबह करके उनके अज्ज़ाऐ बाहम मिला जुला कर उनका एक-एक हिस्सा, एक-एक पहाड़ पर रख दो और फिर उनको बुलाओ और देखो वो किस तरह ज़िन्दा होकर तुम्हारे पास दौड़ते हुए आते हैं।

चुनाँचे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने मोर, कबूतर, मुर्ग़ और कव्वा, ये चार परिन्दे लिए और उन्हें ज़िबह किया और उनके पर उखाड़े, और उन सब का कीमा करके और आपस में मिला जुला कर उस मजमूऐ के कई हिस्से किए और एक-एक हिस्सा एक-एक पहाड़ पर रख दिया और सर सब के अपने पास महफूज़ रखे और फिर आपने उनसे फ़रमाया- “चले आओ” आपके फ़रमाते ही वो अज्ज़ा उड़े और हर-हर जानवर के अज्ज़ा अलेहदा-अलेहदा होकर अपनी तरतीब से जमा हुए और परिन्दों की शक्लें बनकर अपने पाँऊ से दौड़ते हुए हाज़िर हुए और अपने-अपने सरों से मिलकर बईनही पहले की तरह मुकम्मल होकर उड़ गए।

(कुरआन करीम, पारा-3, रूकू-3, ख़ज़ायन-उल-इऱफान, सफा-66)

🌹सबक़ ~

ख़ुदा तआला बड़ी क़ुदरत व ताक़त का मालिक है। कोई डूब कर मर जाए और उसे मछलियाँ खा जाएं या जल
कर मरे और राख हो जाए या किसी को दरिन्दे-परिन्दे और दरयाई जानवर थोड़ा-थोड़ा खा जाएं और उसके अज्ज़ा मुनतशिर हो जाएँ, ख़ुदाऐ बरतर व तवाना फिर भी उसे जमा फ़रमा कर ज़रूर जिन्दा फ़रमाएगा और बारगाह ऐज़्दी की हाज़री से उसे मुफ़िर नहीं और ये भी मालूम हुआ के मुर्दे सुनते हैं। वरना खुदा अपने खलील से ये ना फ़रमाता के उन मुर्दा और क़ीमा शुदा मुर्दा परिन्दों को बुला। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने बहुक्म इलाही उन मुर्दा परिन्दों को बुलाया और वो मुर्दा परिन्दे आपकी आवाज़ को सुन कर दौड़ पड़े, ये परिन्दों की समाअत है और जो अल्लाह वाले हैं, उनकी समाअत का आलम क्या हुआ? और ये भी मालूम हुआ है, उन परिन्दों को जिन्दा तो खुदा ने किया लेकिन ये ज़िन्दगी उन्हें मिली इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बुलाने और उनके लब हिलने से, गोया किसी अल्लाह वाले के लब हिल जाएँ तो ख़ुदा काम कर देता है। इसी लिए मुसलमान अल्लाह वालों के पास जाते हैं ताकी उनकी मुबारक और मुसतजाब दुआओं से अल्लाह हमारा काम कर दे।

📕»» सच्ची हिकायात ⟨हिस्सा अव्वल⟩, पेज: 75-76, हिकायत नंबर- 61

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