Month: May 2019
Fawaid ul fuwaad (Morals For The Heart)

तसव्वुफ़ में साहित्य के विशाल भंडार को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है । मक्तूबात (पत्र ), तज़किरा (जीवनवृत) एवं मल्फ़ूज़ात (उपदेश)। मक्तूबात के अंतर्गत उन पत्रों का संकलन आता है जो सूफी संतों ने अपने मुरीदों और समकालीन संतों को लिखे हैं । तज़किरे के अंतर्गत जीवनवृत संग्रह आता है जो किसी सूफी संत के मुरीद अथवा परवर्ती संतों ने बाद में लिखा । तीसरे और सबसे महत्वपूर्ण हिस्से मे मल्फ़ूजात अर्थात उपदेश और वाणियों का संग्रह आता है जिन्हें किसी सूफ़ी संत के मुरीद अथवा परवर्ती संतों ने संकलित किया है । अपनी खानक़ाहों में नियमित रूप से सूफ़ी गुरु अपने शिष्यों को उपदेश देते थे । इन मजलिसों मे भारी संख्या में मुरीद एवं आम जन की उपस्थिति होती थी । इन उपदेश संग्रहों (माल्फ़ूज़ातों) को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है –
– ऐसे उपदेश जिन्हें सूफ़ी संत के अपने मुरीद अथवा उनके परिजनों ने उनके देहांत के बहुत बाद संकलित किया है । इन मल्फ़ूज़ात संग्रहों में अक्सर उनका संक्षिप्त जीवनवृत, उनके प्रमुख उपदेश एवं उनके कुछ चमत्कार संग्रहीत होते हैं । ये कहानियाँ सूफ़ी ख़ानक़ाहों में प्रचलित जनश्रुतियों को आधार बनाकर लिखी जाती हैं और इनका प्रामाणिक महत्व कम होता है ।
दूसरे प्रकार के माल्फ़ूज़ात वह हैं जो सूफ़ी मजलिसों में उपदेश दिये जाने के कुछ समय पश्चात ही लिख लिए गए और इन उपदेशों को तारीख़ वार सूचीबद्ध कर लिया गया । इनमे से कई माल्फ़ूज़ात ऐसे भी हैं जिनका संग्रह करने के पश्चात लेखक ने उपदेशकर्ता को दिखा कर उसमे यथा स्थान सुधार भी किए । इन माल्फ़ूज़ातों का प्रामाणिक और ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक होता है ।
पहले प्रकार के माल्फ़ूज़ातों में सबसे पहला नाम हालात व सुख़न ए शेख अबू सईद बिन अबुल खैर का आता है । यह शेख अबू सईद के पड़पोते जमालुद्दीन की रचना है । शेख अबू सईद के चचेरे भाई मुहम्मद बिन मुनव्वर बिन अबू सईद ने अपेक्षाकृत बड़े मल्फ़ूज़ात का संग्रह प्रकाशित किया जिसमे उपर्लिखित रचना को भी शामिल कर उसका नाम असरार उत तौहीद फ़ी मक़ामात ए शेख अबू सईद रखा गया । उन्होने यह किताब 1153-54 में लिखनी शुरू की और 1175-75 में इस किताब का लेखन कार्य समाप्त हुआ ।
पहले प्रकार के माल्फ़ूज़ातों में प्रमुख हैं –
अनीस उल अरवाह
दलाइल उल आरिफ़ीन
फवाईद उस सालिकीन
असरार उल औलिया
राहत उल कुलूब
अफजल उल फवाईद
मिफ़्ताह उल आशिक़ीन
दूसरे प्रकार के माल्फ़ूज़ातों में सबसे अहम नाम फवाईद उल फुवाद का आता है जिसमे हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के उपदेशों का संग्रह है । यह किताब हज़रत के समय में ही पूरी हुई और लेखक ने यह किताब पूरी होने के बाद हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया को दिखाई थी । हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने इस किताब को आखिर तक पढ़ा और इसमे सुधार भी करवाए। यह किताब चिश्ती मल्फ़ूज़ातों में सबसे अहम और प्रामाणिक मानी जाती है । इस श्रेणी की अन्य प्रमुख किताबों मे सियार उल औलिया एवं खैर उल मजालिस प्रमुख हैं ।
तसव्वुफ़ पर उपलब्ध किताबों पर बहुत कुछ लिखा गया है और लिखा जा रहा है । न सिर्फ तसव्वुफ़ को जानने के लिए वरन उस समय के सामाजिक परिवेश और राजनीतिक वातावरण को भी जानने में इन किताबों का महत्वपूर्ण योगदान है । सूफ़ीनामा पर हमारा प्रयास है कि सूफी साहित्य के इन अनमोल मोतियों को दोबारा आम किया जाये और लोगों को सूफियों की मानवतावादी सोंच से परिचित कराया जाए। इसी कड़ी मे सूफ़ीनामा ब्लॉग पर हमने पुस्तक समीक्षाओं की एक सिरीज शुरू करने का निश्चय किया है ।
इस कड़ी मे सबसे पहली किताब फवाईद उल फुवाद है । इस एक किताब के बदले हज़रत अमीर खुसरौ ने अपना पूरा साहित्य देने की बात कही थी । यह किताब हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया महबूब ए इलाही के उपदेशों का संग्रह है जिसे हज़रत के ही प्रिय मुरीद ख्वाजा हसन अला सिजज़ी देहलवी ने लिखा था । हज़रत निजामुद्दीन औलिया के ही एक मुरीद मौलाना अलाउद्दीन नीली इस किताब को रात दिन पढ़ा करते थे । हिंदुओं के मनः भाव पर भी इस किताब का असर उललेखनीय है । कुचेसर के एक जमींदार राव उमराओ सिंह ने इस किताब का लिप्यंतरण करवाया । उसका मानना था कि जिस मनोकामना को लेकर इस किताब का लिप्यंतरण करवाया गया था वह पूरी हो गयी थी । सर सय्यद के समय मे भी मुस्लिम लड़कियां फवाइद उल फुवाद पढ़ा करती थीं ।
हसन से प्रेरित होकर हज़रत के उपदेशों का संकलन उनके दूसरे शिष्यों ने भी किया जिनमे कुछ उललेखनीय हैं –
दुरार ए निज़ामी – अली जानदार
खुलासात अल लताइफ – अली जानदार
मल्फ़ूजात – ख्वाजा शम्सउद्दीन विहारी
अनवार उल मजालिस – ख्वाजा मुहम्मद -मौलाना बदरुद्दीन इसहाक के बेटे
हरसत नामा – ज़ियाऊद्दीन बर्नी।
तुहफ़ात उल अबरार व करामात उल अख़यार – ख्वाजा अज़ीज़ुद्दीन सूफ़ी ।
दुरार ए निज़ामी के अलावा और कोई मल्फ़ूजात आज उपलब्ध नही है ।
फवाईद उल फुवाद पाँच जिल्दों मे है, जिसमे हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की मजलिसों का वर्णन है । हर जिल्द मे उस अवधि का भी उल्लेख आता है जिस अवधि मे ये उपदेश संग्रहीत किए गए ।
पहली जिल्द – इसमे 34 मजलिसों का वर्णन है जिन्हें 3 शाबान 707 हिजरी से 29 ज़िलहिज्जा 708 हिजरी के बीच जमा किया गया ।
दूसरी जिल्द – इस जिल्द में 38 मजलिसों का उल्लेख है । इसमे 29 शौवाल 709 हिजरी से 31 शौवाल 712 हिजरी तक के उपदेश संग्रहीत हैं ।
तीसरी जिल्द – इस जिल्द मे 17 मजलिसें शामिल की गयी हैं, जिनमे 27 ज़िलक़दह 712 हिजरी से 21 ज़िलहिज्जा 713 हिजरी तक के मल्फ़ूजात संग्रहीत किए गए हैं ।
चौथी जिल्द- इस जिल्द 67 मजलिसों का ज़िक्र आता है जिन्हें 24 मुहर्रम 712 हिजरी से 23 रजब 719 हिजरी तक संग्रहीत किया गया है ।
पाँचवी जिल्द – इस जिल्द में हज़रत की 32 मजलिसों का उल्लेख है जिन्हें अज़रा शाबान 719 हिजरी से 20 शाबान 722 हिजरी के बीच संकलित किया गया है ।
फवाईद उल फुवाद अपने समकालीन मल्फ़ूज़ातों से इस मामले मे अनूठी किताब है कि इसमे हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के उपदेशों को बिना किसी काट -छांट के यथावत प्रस्तुत किया गया है । ये उपदेश किस दिन दिये गए इसका भी विवरण लिखा गया है और बाद में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने खुद यह किताब पढ़ी है और इसमे यथास्थान सुधार भी किए हैं । अपने पहले और बाद के तमाम मल्फ़ूज़ातों मे फवाईद उल फुवाद सबसे प्रामाणिक और अनूठी किताब है । तसव्वुफ़ के तमाम बिन्दुओं पर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने अपने विचार अपनी मजलिसों मे खुलकर व्यक्त किए हैं और अपने बुजुर्ग संतों की प्रेरणादायक कहानियों द्वारा अपने मुरीदों मे नयी चेतना का संचार किया है । ख्वाजा हसन अला सिजज़ी हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के सबसे चहेते मुरीदों मे थे और बादशाह के लश्कर मे बतौर सेनानायक भी कार्य करते थे । बादशाह की सेना मे होने की वजह से उन्हें शहर से दूर छावनी में रहना पड़ता था जहां से वह अक्सर गयासपुर स्थित हज़रत की ख़ानक़ाह मे आया करते थे । कई दफा उन्होने हज़रत से आग्रह भी किया कि उन्हें शहर में ख़ानक़ाह के पास रहने कि अनुमति दे दें ताकि वह अपना ज़्यादा समय हज़रत के सनिध्य में व्यतीत कर सकें मगर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने उन्हें यह कहकर मना कर दिया कि शहर से बाहर छावनियों में वातावरण अच्छा होता है । ख्वाजा हसन अला सिजज़ी का एक दीवान भी मिलता है जिनमे उनकी फारसी ग़ज़लें हैं । हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने तसव्वुफ़ की शब्दावली को मानो अपनी मजलिसों में आम लोगों और मुरीदों के लिए खोल दिया है ।




जहां ख़ानक़ाह के बगल से जमुना का प्रवाह अनवरत होता रहता था वहीं हज़रत के पावन मुख से ज्ञान की गंगा का प्रवाह भी अनवरत होता रहता था। तीर तलवार, दरबार सरकार से परे यह एक अलग ही दुनिया थी जहां आकर हर दुखी आत्मा सुकून हासिल करती थी ।
फवाईद उल फुवाद में सूफियों द्वारा प्रयोग में आने वाले कई मूल शब्दों की व्याख्या हज़रत द्वारा की गयी है । उनमे से कुछ ज़ेर ए ग़ौर हैं –
1-करामात – हर मामला जो अक़ल में आ जाए वह और होता है और जिसमें अक़ल का दखल न हो वह करामत होती है ।
-जिल्द पहली -पाँचवी मजलिस
2- तर्के दुनिया – तर्के दुनिया यह नहीं है कि कोई अपने आप को निर्वस्त्र कर ले, मसलन लंगोटी बांधकर बैठ जाये । तर्के दुनिया यह है कि लिबास पहने और खाना खाये । अलबत्ता जो कुछ आए उसे खर्च करता रहे । कुछ भी अपने पास जमा न करे । न किसी चीज़ से रगबत रखे और न दिल को किसी चीज़ पर अटकाए ।
-जिल्द पहली -छठी मजलिस
3- इख्तियार का तर्क – वह लोग जो दूसरों के महकूम हैं, उन लोगों से बेहतर हैं जो हाकिम हैं । इसके बाद इरशाद हुआ कि जुमे के रोज़ नमाज़ के लिए शेख अबू सईद अबुलखैर अपनी ख़ानक़ाह से बाहर निकले । उन्होने मुरीदों से पूछा कि जामा मस्जिद का रास्ता कौन सा है ? किस तरह जाना उचित होगा ? हाज़िरीन में से किसी ने कहा कि रास्ता यह रहा । उनसे बाद में पूछा गया कि इतनी बार आप जुमे कि नमाज़ को गए हैं फिर भी आपको रास्ता याद नहीं था ? शेख ने फरमाया – जानता हूँ लेकिन इस वजह से पूछता हूँ कि थोड़ी देर के लिए दूसरे का महकूम बन जाऊँ ।
-जिल्द पहली – बारहवी मजलिस
4- औरतों की सलाहियत – दरवेश लोग नेक औरतों और नेक मर्दों की हुरमत से जो दुआ मांगते हैं तो पहले नेक औरतों की दुहाई देते हैं । जब शेर जंगल से निकलता है तो कोई नहीं पूछता कि यह शेर नर है या मादा । यानि बात तो जब ही कि आदम का फ़रज़ंद ताअत व तक़वा में मशहूर हो फिर चाहे वह मर्द हो या औरत ।
-जिल्द पहली -बीसवीं मजलिस
5- आदाब ए मजलिस – अदब यह है कि जब किसी मजलिस में जाएँ तो जो जगह खाली दिखे वहाँ बैठ जाएँ । जब पीर की खिदमत में जाएँ तो ऊंची या नीची जगह के खयाल में न रहें । जहां भी खाली जगह देखें वहीं बैठ जाएँ क्यूंकि आने वाले कि वही जगह होती है ।
-जिल्द पहली – बत्तीसवी मजलिस
6- फुक़रा का लेन देन और ख़रीद फ़रोख्त – शेख बदरुद्दीन इसहाक़ ने किसी को एक शतरंजी देकर कहा कि इसे बाज़ार में जाकर बेच आओ । फिर फरमाया कि दरवेशाना बेचना । उनसे जब इसका मतलब पूछा गया तो उन्होने कहा कि वापस घर न लाना, जो भी मोल मिले बेच डालना ।
-जिल्द पहली – तैतीसवी मजलिस
7- तवक्कुल– तवक्कुल के तीन दर्जे हैं । पहला दर्जा यह कि जैसे कोई शख्स अपने दावे के लिए किसी को अपना वकील करे और वह वकील आलिम भी हो और मुवक्किल का दोस्त भी । इससे मुवक्किल को यह भरोसा रहेगा कि मेरा वकील अपने काम में होशियार भी है और मेरा दोस्त भी । इस सूरत में तवक्कुल भी है और सवाल भी क्योंकि कभी कभी वह अपने वकील से यह भी कहेगा कि इस सवाल का जवाब इस तरह देना और यह काम इस तरह करना । तवक्कुल के इस पहले दर्जे में तवक्कुल भी है और सवाल भी । तवक्कुल के दूसरे दर्जे की मिसाल ऐसी है कि जैसे कोई दूध पीता बच्चा है जिसे उसकी माँ दूध पिलाती है । उसको महज तवक्कुल होता है, सवाल नहीं होता । बच्चा यह नहीं कहता कि फलां वक़्त दूध देना । बस रोने लगता है और उसे अपनी माँ की शफकत पर यकीन होता है । तवक्कुल के तीसरे मरतबे की मिसाल मुर्दे को नहाने वाले के सामने मुर्दे जैसी है । मुर्दा नहलाने वाले से कोई सवाल नहीं करता न उसकी कोई हरकत होती है । नहलाने वाला जिस तरह भी ज़रूरत होती है उसे नहलाता है। यह तवाककुल का तीसरा मर्तबा है और यह सबसे आला और बुलंद है ।
-जिल्द दूसरी- नवीं मजलिस
8- हुस्न ए एतक़ाद – मैंने अवध के शेख़ुलइस्लाम शेख़ रफ़ीउद्दीन से सुना है वह कहते थे कि मेरा एक अज़ीज़ ख़्वाजा अजल शीराज़ी रहमतउल्लाह अलैह का मुरीद था। एक दफ़ा यह मुरीद किसी तोहम्मत में गिरफ़्तार हुआ और क़त्लगाह में लाया गया। जल्लाद ने जो उसकी गर्दन उडाने वाला था, उसे इस तरह खड़ा किया कि चेहरा क़िब्ले की तरफ़ हो। मुरीद चाहता था कि अपने क़िब्ले की तरफ़ मुंह करे, क्योंकि (पहली सूरत में) शायद उसकी पीठ अपने पीर की क़ब्र की तरफ़ हो जाती थी। चुनांचे उसने फ़ौरन अपने पीर की क़ब्र की तरफ़ मुंह कर लिया। जल्लाद ने कहा कि इस वक्त तो चेहरा क़िब्ले की तरफ रखना चाहिए, तू मुंह क्यों फेरता है। मुरीद बोला कि मैंने मुंह अपने क़िब्ले की तरफ कर लिया है ! तू अपना काम कर !
-जिल्द दूसरी- सोलहवीं मजलिस
9- याद ए हक़ – एक बहुत बुजुर्ग पीर थे जो नदी के किनारे रहते थे। उन्होंने कुछ खाना मुहैया किया और अपनी बीवी से बोले कि यह खाना सर पर रखो और पानी पार करो। घाट पर एक दर्वेश बैठे हैं। यह खाना उनके सामने रखो ताकि वह खा लें। औरत बोली कि पानी बहुत है पार उतारना मुश्किल है। शेख़ ने फ़रमाया कि पानी के किनारे पर जाओ और पानी को मुख़ातिब कर के कहो- ऐ पानी ! इस बात की हुर्मत से कि मेरे शौहर ने कभी मेरे साथ सोहबत नहीं की मुझे रास्ता दे। उस औरत को बड़ा ताज्जुब हुआ और अपने आप से बोली कि उस मर्द से मेरे इतने लड़के हैं मैं यह बात कैसे कहूं। बहर हाल उसने शौहर के हुक्म की तामील की। पानी के किनारे जाकर मज़कूरा फ़िक़रा कहा। उसी वक़्त पानी में शगाफ़ पड़ गया। और पानी दो फाट हो गया। और बीच में सूखा रास्ता निकल आया। औरत ख़ैरियत से पार चली गई जब उस दर्वेश के पास पहुंची तो उसके सामने खाना रखा। दर्वेश ने खाना खा लिया और औरत से कहा कि तुम वापस जाओ । औरत ने कहा कि मैं आपके पास इस तरह आई थी कि मेरे शौहर ने एक बात कही थी। मैंने वह बात पानी से कही और पानी ने रास्ता दे दिया, अब किस तदबीर से वापस जाऊं। दर्वेश ने पूछा कि तुम्हारे शौहर ने क्या बात कही थी औरत ने वह बात दुहराई। दर्वेश ने कहा कि जाओ ! पानी के किनारे जाकर पानी से यह बात कहो कि इस दर्वेश की हुर्मत से कि जिसने तीस साल की मुद्दत में कभी भी खाना नहीं खाया मुझे रास्ता दे (इस बात से) औरत को और भी हैरत हुई। अनपे आप से बोली कि एक नामुम्किन बात तो वह थी जो मेरे शौहर ने कही थी और दूसरी नामुम्किन बात यह है जो यह शख़्स कहता है। इसने अभी अभी मेरे सामने खाना खाया है। मैं यह बात कैसे कहूं ? बहरहाल उन दर्वेश के कहने के मुवाफ़िक पानी के किनारे पहुंची और कहा कि ऐ पानी इस बात की हुर्मत से कि उस दर्वेश ने तीस साल की मुद्दत से एक दफा भी खाना नहीं खाया , मुझे रास्ता दे ! उसी वक़्त पानी में शिगाफ़ पड़ गया और दो फाट हो गया और सूखा रास्ता बीच में निकल आया। औरत ख़ैर आफ़ियत से गुज़र गई।
जब अपने शौहर के पास आई तो उनके पैरों पड़ कर बोली कि मुझे इन दो बातों का भेद बताओ कि क्या था तुमने भी इतने बार मुझ से सोहबत की और उस दर्वेश ने भी मेरे सामने खाना खाया यह दोनों झूठ मैंने पानी से बोले और पानी ने मुझे रास्ता दे दिया। यह क्या हिकमत थी? शेख़ ने कहा कि समझ लो और याद रखो कि मैंने तुम्हारे साथ कभी अपने नफ़्स की ख़्वाहिश पूरा करने के लिए सोहबत नहीं की जो सोहबत भी तुम से की वह तुम्हारा हक़ अदा करने के लिए की न कि नफ़्सानी ख़्वाहिशात और अपने नफ़्स के ज़ौक़ के लिए की। पस इस लिहाज़ से मैंने गोया तुम्हारे साथ भी सोहबत की ही नहीं और उस शख़्स ने उन तीस सालों में कोई खाना न ज़ौक़े-नफ़्स के लिए खाया न हुसूले-लज़्ज़त के लिए खाया। जब भी खाया इबादत की ताक़त हासिल करने के लिए खाया।
-जिल्द दूसरी –अठारहवीं मजलिस
10- दुआ– दुआ के वक़्त बन्दे को चाहिए कि न तो जो गुनाह कर चुका हो उनका ख़याल दिल में लाए और न किसी ताअत (व इबादत) का, क्योंकि अगर उसका ख़याल दिल में लाएगा तो यह गुरूर होगा, और घमंडी की दुआ कुबूल नहीं हुआ करती और अगर गुनाह का ध्यान दिल को होगा तो दुआ के यकीन में सुस्ती आएगी । पस दुआ के वक़्त नज़रे-ख़ास रमहते हक़ (ताला) पर रखनी चाहिए। और यह यक़ीन होना चाहिए कि यह दुआ ज़रूर कुबूल होगी। अगर ख़ुदा चाहे। मज़ीद फ़रमाया कि दुआ के वक़्त दोनों हाथ एक दूसरे से मिले हुए हों और सीने के सामने हों । और यह भी आया कि है कि दोनों हाथ एक दूसरे से मिले हुए रखने चाहिएं। और ख़ासे बुलंद रखने चाहिएं और ऐसी सूरत बनानी चाहिए कि गोया उसी वक़्त कोई चीज़ उसके हाथ में डाली जाएगी। इस दर्मियान में यह मानी बयान फ़रमाए कि दुआ दिल की तस्कीन के वास्ते है। (वरना) ख़ुदाए अज़्ज़ों जल (ख़ूब) जानता है कि क्या करना चाहिए।
-जिल्द दूसरी –अठारहवीं मजलिस

फवाइद उल फुवाद का हिन्दी अनुवाद भी ख़्वाजा हसन सानी निजमी द्वारा हो चुका है । इस किताब में सूफी संतों की कई हिकायतें भी हज़रत द्वारा बयान की गयी हैं । इन हिकायतों में न सिर्फ तसव्वुफ़ के मार्ग पर चलने वालों के लिए संदेश छुपे हैं बल्कि आम जन के लिए भी भाईचारे और शांति का संदेश छुपा है । हज़रत शेख जलालूद्दीन तबरेजी की एक हिकायत पेश है –
शेख़ शहाबुद्दीन सुहरावर्दी एक दफ़ा सफ़र हज से वापस आए हुए थे और अहले बग़दाद उनकी ख़िदमत में हाज़िर थे । हर एक नक़द और जिन्स की सूरत में कोई नज़र लाया । इस दर्मियान एक बुढ़िया आई और अपनी पुरानी चादर की गिरह खोली और एक दिरम सामने रखा। शेख़ शहाबुद्दीन ने वह एक दिरम उठा लिया और उन सब तोहफ़ों और हदियों के ऊपर रखा दिया। फिर जो भी लोग हाज़िर थे उन से फ़रमाया कि इन नज़रानों और तोहफ़ों में तुम लोग जो चाहो उठा लो। हर शख़्स उठा और नक़दी और थैली और अच्छा अच्छा सामान लेने लगा। वहाँ शेख़ जलालुद्दीन तब्रेज़ी भी हाज़िर थे। उनको भी इशारा किया कि आप भी कोई चीज़ ले लें। शेख़ जलालुद्दीन उठे और वह एक दिरम जो बुढ़िया लाई थी ले लिया। शेख़ शहाबुद्दीन ने जब यह देखा तो फ़रमाया कि आप तो सब कुछ ले गए। इस बात पर बन्दे ने अर्ज़ की कि शेख़ जलालुद्दीन क्या शेख़ शहाबुद्दीन के मुरीद थे फरमाया नहीं। वह शेख़ अबूसईद तब्रेज़ी के मुरीद थे। जब उनके पीर परदह कर गए तो वह शेख़ शहाबुद्दीन के पास आ गए और ऐसी ख़िदमतें कीं कि किसी गुलाम और मुरीद को मयस्सर नहीं होतीं। यहां तक कहा जाता है कि शेख़ शहाबुद्दीन रहमत उल्लाह अलैह हर साल बग़दाद से सफ़रे-हज को जाते। वह बूढ़े और कमज़ोर हो गए थे उनके लिए जो तोशा साथ ले जाते वह बुढ़ापे की वजह से उनके मिज़ाज के मावफ़िक़ न होता । ठंहा खाना उन्हें पसंद नहीं आता था। शेख़ जलालुद्दीन तब्रेज़ी यह तर्कीब करते कि चूल्हा और पतीली सर पर लिए फिरते और उसमें आग इस तरह जलाते कि उनका सर न जले। और शेख़ जिस वक़्त भी खाना मांगते, गर्म खाना उनके सामने पेश किया करते थे ।
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के उपदेशों की यह किताब निश्चय ही सूफी साहित्य के प्रेमियों के लिए अनमोल थाती है ।
View of Milawat Jamakhoori aur Mehangai in Islam specially in Ramzan
मध्ययुगीन काल में इस्तेमाल की गई दुनिया मे उस वक्त की सबसे बड़ी तोप ‘मालिक-ए-मैदान तोप’
क्या कभी आपने ऐसी तोप के बारे में सुना है जिसे खींचने में 10 हाथी, 400 बैल और सैकड़ों लोगों की ताकत लगी हो। यह बात जरुर हैरान करने वाली है, लेकिन ऐसी एक तोप भारत में मौजूद है। जिसकी गिनती दुनिया के सबसे भारी तोपों में होती है।
इस तोप का नाम है मालिक- ए- मैदान, जो कर्नाटक के एतिहासिक नगर बीजापुर में मौजूद है। – मध्ययुगीन काल में इस्तेमाल की गई यह उस वक्त की सबसे बड़ी तोप है। इसका वजन 55 टन, जबकि लम्बाई 14.6 फीट (4.45 मीटर), बाहरी डायामीटर 4.9 फीट (1.5 मीटर) है। इसे बीजापुर के शासक #इब्राहिम_आदिल_शाह II ने तालीकोट युद्ध की जीत के बाद 16 वीं शताब्दी में स्थापित करवाया था।
बीजापुर में बुर्ज- ए- शरीफ नाम के टावर पर यह तोप आज भी मौजूद है। बुर्ज- ए- शरीफ का मतलब है शेरों का टावर। यह टावर आदिल शाही सल्तनत के दौरान बनवाया गया था। इस तोप पर इस प्रकार के डि़जाइन किए गए हैं जैसे शेर अपना जबड़ा खोले हुऐ हो।
इस तोप पर मौजूद अभिलेखों (इन्सक्रिप्शन) से यह पता चलता है कि
1) एक तुर्क हसन रूमी के पुत्र मोहम्मद ने इसका निर्माण करवाया था l
2) दूसरा अभिलेख बताता है कि सन् 1549 में इसकी ढलाई की गई थी।
3) तीसरे अभिलेख में औरंगज़ेब ने लिखा है कि मैंने मालिक-ए-मैदान को अपने कब्जे में कर लिया है।सन् 1886 में कैप्टन टेलर एवं जेम्स फर्ग्यूसन की एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी। इसमें लिखा था कि मालिक-ए-मैदान विश्व की सबसे भारी तोप है। इस तोप की विशेषता यह है कि धधकते सूरज की गर्मी में भी यह शांत रहती है ।
Malik-e-Maidan or ‘Lord of the Battlefield’, which is a huge cannon set up by Muhammad Adil Shah I in 1549 on the top of Sherzah Burj in Bijapur. It faces towards the west at the plains outside the city of Bijapur.
Located 3 km from the district of Bijapur, this cannon is believed to be the largest warhead of the medieval era. The nozzle of the weapon is designed into the shape of a lion with open jaws. There is a small elephant between the two large fangs of l a on being crushed to death.
There is also an inscription made by Aurangzeb on the top of the cannon. This 55 tons heavy cannon has a diameter of 1.5 m and its length is 4.45 m. This legendary cannon has a unique feature that is even in the blazing sun it remains cool.It is believed that the legendary cannon always remains cool and tinkles like a bell on tapping. On top of the cannon is present an inscription commissioned by Aurangzeb.
HALA SULTAN: THE HIDDEN JEWEL OF CYPRUS
Umm Haram bint Milhan (Hala Sultan) was a female companion of the Prophet Muhammad (peace be upon him) who fell martyr in Cyprus
The religion of Islam is today the fastest growing religion in the world with around 1.5 billion followers from many places and backgrounds. Although the Prophet Muhammad (peace be upon him) was an Arab based in the cities of Mecca and Medina in the Hejaz region of the Arabian peninsula, his message was intended to reach the ears and hearts of all people.
Even though the the message of Islam attracted many converts from different parts of the world during the lifetime of the Prophet, due to the socio-geographical starting point of this call, the responsibility to carry this message to the rest of the world mainly fell upon the Arab companions of the Prophet after his death.
From Arabia, his companions spread across the world, covering a region from Portugal to Indonesia and from the northern Caucasus to the southern Sahara. Some of them arrived as conquerers whereas others arrived as merchants, migrants and governors, while some arrived simply to call people to faith in the one true diety. In doing so, some never returned home, and instead chose to be buried in foreign soil, serving as a reminder of their great sacrifice for generations afterwards.
One such companion is Umm Haram bint Milhan, who unlike what one would typically imagine these fearless companions to be, was not a dashing young man galloping through the desert on his horse. Rather, Umm Haram was an old woman, perhaps in her eighties or nineties. Nonetheless, that did not prevent her from accompanying the Muslim army in their first naval conquest of the eastern Mediterranean island of Cyprus.
Umm Haram was the sister of Umm Sulaym bint Milhan, which also made her the maternal aunt of one of the Prophet’s closest companions, Anas bin Malik. She was also a paternal relative of the Prophet via his great grandmother, who was from the Banu Najjar tribe. The Prophet Muhammad (peace be upon him) would often visit her.
During one such visit, the Prophet was taking a nap in her home, upon which he woke up laughing. When Umm Haram asked the Prophet why he was laughing, the Prophet replied that he had seen a dream of his companions ‘sailing on the sea like kings’. Umm Haram, despite her age, had a very youthful character and was an adventurous woman who liked to travel. The concept of sailing on the sea was unknown to most Arabs at the time, who were bound to the rough and tough deserts of Arabia.
Umm Haram could not contain her glee on hearing this, and asked the Prophet to pray that she be among those companions. The Prophet made a supplication for her and went back to sleep, before he woke up again in the same manner. Again she asked the Prophet what he had seen, to which he gave the same answer, and then asked him to pray for her one more time. ‘You will be with the first group,’ the Prophet reassured.
Long after the Prophet passed away, during the reign of the third Caliph Uthman, the governorship of Shaam (modern day Syria, Lebanon and Palestine) decided to form the first Muslim naval fleet under the command of Umm Haram’s husband Ubadah bin al-Samit, who was the judge of Palestine. With the orders of Muawiyah, who was the governor of Syria at the time (later to become the first Umayyad Caliph), the fleet set sail in the year 647 to Cyprus, which was under Byzantine control at the time.
The fleet arrived at the eastern shores of Larnaca, where they sought to continue their expedition on land. Shortly after mounting their horses, however, they came under siege and in the chaos that unfolded, Umm Haram fell from her horse and suffered a fatal injury. As was custom for martyrs, she was buried on the spot she fell, by the beautiful Salt Lake of the city.
The Arabs continued their presence on the island of Cyprus for centuries afterwards. After the Ottomans conquered the island in 1570-1571 from the Venetians, they gave great importance to Umm Haram. In around 1760, a scholar by the name of Sheikh Hassan built a mosque close to her burial site, which became known as the Hala Sultan Tekke.
The mosque was, and still is, an important monument representing the 1,400-year history of Islam in Cyprus for all Muslims, especially the Turkish Cypriots. After the Cyprus war of 1974, which saw the island split with Turkish Cypriots forming the Turkish Republic of Northern Cyprus in the north and Greek Cypriots maintaining control of the south, the mosque remained with the Greek Cypriot administation.
Turkish Cypriots were unable to access the mosque for thirty years until the borders were finally opened due to a breakthrough in negotiations. Today, Turkish Cypriots are campaigning for the Greek Cypriot administration to recognize the building’s status as a place of worship. As it is currently registered as a museum, it is subject to museum opening and closing times, restricting Muslims from visiting and performing their prayers outside opening hours.
Nonetheless, the glorious landscape around the mosque still draws visitors from all over the world, all coming to seek inspiration from the sacrifices Umm Haram made to leave Islam’s mark on Cyprus and to pray for her soul. Her story inspired the likes of the wife of Sharif Hussein, the ousted post-Ottoman leader of the Hejaz and founder of the Hashimite royal dynasty in Jordan, who insisted on being buried in the same soil as Umm Haram.
Upon entering the room in which Umm Haram’s grave is located, one is almost suffocated by the sweet smell of musk. Despite this, the caretakers of the mosque insist that they have never perfumed the room, and that it is a natural aroma emanating from the grave itself. In 2013, out of their respect to Umm Haram, the Turkish Cypriots named a new theology faculty in Lefkosa (Nicosia) after her.











