Aftab e Ashraf 17

आपका उर्स मुसाफ़िर खाना ज़िला सुल्तानपुर मेंमुसाफ़िर ख़ाना वालों ने शदीद इसरार किया कि हज़रत के उर्स की
एक तारीख़ हमें भी इनायत की जाये! लिहाज़ा हज़रत के मंझले भाई मैय्यद सिराज अशरफ़ साहब मरहूम ने हज़रत के उर्स की एक ख़ास तारीख मुसाफ़िर ख़ाना वालों को दे दिया! फ़ौरन ही उर्स कमेटी तश्कील हुई और ये तय पाया कि हज़रत के विसाल की ख़ास तारीख में हमेशा मुसाफ़िर ख़ाना में हज़रत के मक़बरा और बारहदरी में हज़रत के जानशीन हज़रत मेराज अशरफ़ क़िब्ला की सरपरस्ती में उर्स होगा। साथ ही साथ ये भी तय पाया कि हज़रत के जूते और पैरहन रुमाल मुबारक यहाँ तबरुक़न रहेंगे ताकि हर शख़्स इनकी ज़ियारत से मुस्तफ़ीज़ हो सके!



आपके जानशीनो ख़लीफ़ा- १२ जून १९७९ ईस्वी मुताबिक ५ रजाबुल मुरज्जब १३९९ हिजरी बरोज़ दो शम्बा १० बजे दिन में आपके मकान के सामने बंगला जायस पर एक अज़ीम मजलिस इसाले सवाब मुनअक़िद हुई! जिसमें इसाले सवाब के बाद ख़ानदानी रिवायत के मुताबिक़ हज़ारहा मुरीदीन व मोतक़िदीन व अहले खानदान सज्जादा नशीनांन दरगाह जायस व दीगर रहबराने मिल्लते इस्लामिया व मशाइखेकिराम व उलेमाए उज़्ज़ाम मोअज़्ज़िज़ीन मकामी व बेरूनी व रऊसाए दयार के नूरानी इज्तेमा में हज़रत के भतीजे हज़रत सैय्यद शाह मेराज अशरफ़ जायसी क़िब्ला के सर पर दस्तारे जानशीनी बाँधी गयी! जिन्हें हज़रत ने अपनी हयात ही में दो साल क़ब्ल अपना मुरीद फ़रमाया था और इजाज़त व ख़लाफ़त से सरफ़राज़ फ़रमा कर अपना जानशीन और सज्जादा नशीन दरगाह हज़रत मख्दूम अशरफ़ जायस नामज़द फ़रमाया था!

तबर्रुक़ातसज्जादानशीनांन दरगाह मख़दूम अशरफ़ जायस में हज़रत हाजी शाह अहमद जायसी रहमतउल्लाह अलैह की औलाद से आपका क़दीम जायसी घराना है इसलिए आपके घर में खानवादाए अशरफ़िया के बुजुर्गों के नायाब तबकात भी मौजूद हैं ।जो एक साहिबे सज्जादा से दूसरे साहिबे सज्जादा तक मुन्तक़िल होते रहें और उसी तरह दस्त ब दस्त और सिलसिलाब सिलसिला आप तक पहुँचा और आपसे आपके जानशीनो ख़लीफ़ा और मौजूदा सज्जादा नशीन हज़रत सैय्यद मेराज अशरफ़ क़िब्ला तक पहुँचा! इन तबर्रुक़ात में ख़िरका.ए.मुबारक हुजूर मख्दूम अशरफ़ जहांगीर सिमनानी किछौछवी रहमतउल्लाह अलैह, क़लमी तस्वीर हज़रत मौलाए कायनात हज़रत अली मुरतज़ा शेरे ख़ुदा रज़िअल्लाहु तआला अन्हु, गुदड़ी मुबारक हज़रत शाह अता अशरफ़ जायसी रहमतउल्लाह अलैह क़ाबिले ज़िक्र है! इसके अलावा और दूसरे तबरीक़ात भी हैं जिनके ज़ियारत से खल्के ख़ुदा मुस्तफ़ीज़ होती आईं है

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