THE NOBLE VIRTUES OF THE PROPHET صلى الله عليه وسلم .

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According to Abu Hurayra : “Messenger of Allah صلى الله عليه وسلمsaid: ‘I have been bestowed favors
over the other Prophets in six ways: I have been given the gift of
encompassing speech (Jawame al-Kalim i.e. few words carrying
many meanings), I have been helped with fear (fear upon to my
enemy); the spoils of war have been made permissible for me; the
earth has been made a means of purification and a place of
prostration for me; I have been sent to all creatures; and the
Prophets were sealed with me (i.e. I am the last of the
Prophets).’”
Reported by al-Muslim and al-Tirmidhi.

According to Jabir b. Abd Allah al-Ansari :“The Messenger of Allah said: ‘I have been bestowed
five favors that were not given to anyone before me: I have been
helped with fear (fear of mine to my enemy) with the distance of
one month; the earth has been made pure for me, a means of
purification, so wherever a man from my Umma wanted to pray
can pray anywhere; the spoils of war have been permitted to me
and they were not permitted to anyone before me; I have been
granted intercession; every Prophet was sent only to his own
people, but I have been sent for all people in general.’”
Reported by al-Bukhari, al-Muslim, al-Nasa’i, Ibn Hibban, alDarimi, Ibn Abi Shayba and others.

 Set forth by al-Muslim in al-Sahih, Bk.: al-Masajid wa Mawazi’ al-Salat,
1/199, $ 523. al-Tirmidhi in al-Sunan, Bk.: al-Siyr, Ch.: Concerning war
spoils, 4/123, $ 1553. Ahmed b. Hanbal in al-Musnad, 2/411, $ 9326. al￾Bayhaqi in al-Sunan, 2/433, $ 4063, 5/9, $ 17496. al-Suyuti in Mushkil al￾Aasa’r, 1/451. Ibn Hibban in al-Sahih, 6/87, $ 2313. al-Hindi in Kanz al￾U’maal, 11/412, $ 32932. al-Baghawi in Sharh al-Sunnah, 13/197, $ 3617. Abu
A’wana in al-Musnad, 1/395.
Set forth by al-Bukhari in al-Sahih, Bk.: al-Tayammum, 1/127, $ 328, and
in Bk.: al-Salat, 1/168, $ 427. al-Muslim in al-Sahih, Bk.: al-Masajid wa
Mawazi’ al-Salat, 1/370, $ 521. al-Nas’ai in al-Sunan, Bk.: al-Ghusl wa al￾Tayammum, 1/210, 211, $ 432. al-Bayhaqi in al-Sunan al-Kubra, 2/329, 6/291
and in Shou’b al-Iman, 2/177, $ 1479. Ibn Hibban in al-Sahih, 14/308, $
6398. Ibn Abi Shayba in al-Musannaf, 6/303, $ 31642, al-Darimi in al-Sunan,
1/374, 1389. Abu A’wana in al-Musnad, 1/330, $ 1173, Abd Hameed in al￾Musnad, 1/349, $ 1154.

Aftab e Ashraf 10

आपका कश्फ़-ओ-करामात- हज़रत सैय्यद जलाल अशरफ़ रहमतउल्लाह अलैह की कश्फ़.ओ.करामात हद्दे शुमार से बाहर हैं जिसे इस अदना किताब में दर्ज करना तवालत का बाइस होगा चुनाँचे यहाँ हम उन्हीं करामातों का ज़िक्र कर रहें हैं जो आपके मुताल्लिक़ मशहूर और मारूफ़ है!

6) गुस्ताख़ी करने वाला हलाक हो गया– हाफ़िज़
मुहम्मद ज़हीर उद्दीन साहब मौज़ा कोटवाड़ा का ख़ाना हसनपुर ज़िला सुल्तानपुर हज़रत के मुरीदों में थे! आप बयान करते थे कि एक बार हज़रत इनके गावं तशरीफ़ लाएं! फ़िरोज़पुर का एक बदअक़ीदा शख्स जिसका नाम ज़फर था और जिसने कोटवा में आलू का खेत खरीदा था! वोह आलू खुदवा चुका था अब फ़िरोज़पुर आलू ले जाने की तैयारी में था! हाफ़िज़ ज़हीरउद्दीन के चचा इत्तेफ़ाक़िया उसके पास पहुंचे और वहां हज़रत का ज़िक्र आ गया उसने हज़रत के शान में कुछ ना ज़ेबा अल्फ़ाज़ कहें, हाफ़िज़ साहब के चचा आग बगूला हो गए और कहने लगें की तू मरदूद है एक सैय्यद ज़ादे को बुरा भला कहता है, अल्लाह के एक वली के शान में गुस्ताख़ी करता है, तबाह हो जायेगा और ये कहकर उसके पास से उठकर चले गए! उस वाकेआ के दूसरे दिन ये मालूम हुआ कि वोह फ़िरोज़पुर गया और वहां उसका क़त्ल हो गया!

(7) नाबीना को बीनाई मिल गयी– मुहम्मद यूनुस तहसील मुसाफ़िर ख़ाना ज़िला सुल्तानपुर ने बयान किया है कि हज़रत मकान पर तशरीफ़ फरमा थें, नाटे नामी एक शख़्स मौज़ा एसौली का परेशान हाल हज़रत को सुनकर मेरे मकान पर आया और रोने लगा और मुझसे कहने लगा की मेरे नौजवान लड़के जिसकी उम्र तक़रीबन १७, १८ साल है उसकी दोनों आँखों की रौशनी बीमारी के वजह से ख़त्म हो के गयी है! हज़रत से मेरे लड़के के लिए दुआ करवा दीजे! हज़रत ने ने मुहम्मद यूनुस से पूछा भैया ये क्या कह रहा है? मुहम्मद यूनुस ने हज़रत से सारा वालेआ बयान किया और कहा की हज़रत ये बहुत ग़रीब है और इस वक़्त बहुत परेशान है इसके लड़के के लिए दुआ फरमा दीजिये! हज़रत ने फ़रमाया उसकी आँखें अल्लाह ने चाहा ठीक ने हो जाएगी! फिर उसे पानी दम कर के पिलाने और आँखों में डालने के लिए दिया और साथ में एक तावीज़ भी लिखकर दिया! नाटे अपने मकान गया और फ़ौरन हज़रत की दी हुई तावीज़ अपने लड़के के गले में पहनाया और पानी के चंद क़तरे उसके आँखों में डाला और पिलाया उसी वक़्त लड़के को कुछ फायदा महसूस हुआ! इसी तरह तीन दिन तक यही अमल करता रहा यहाँ तक की उसका लड़का तीन दिन में
बिल्कुल ठीक हो गया और उसकी आँखों में रौशनी आ गयी! चौथे दिन नाटे और उसका लड़का जो बीनाई से महरूम हो गया था हँसते
मुस्कुराते हुए हज़रत के क़दम बोसी के लिए आएं।

(8) पचीस हज़ार के जेवरात मिल गयें– छोटे लाल सुनार साकिन बंधवा हसनपुर की सर्राफ़ा की दुकान बाज़ार साहेबगंज मुसाफ़िर ख़ाना में थी! एक दिन का वाक़आ है की वोह मोटर साईकिल पर पचीस हज़ार के जेवरात वगैरा लेकर क़स्बा एसौली दुकानदारी के ग़रज़ से जा रहे थे की मोटर साईकिल से उनका सामान कहीं गिर गया! जब वोह एसौली घाट पर पहुंचे तो देखा सामान मौजूद नहीं फ़ौरन सामान की तलाश में वापस हुएं लेकिन सामान नहीं मिला! उसे मालूम हुआ की यहाँ एक बहुत बड़े बाबा मुहम्मद यूनुस के मकान पर आये हुएं हैं! वोह मुहम्मद यूनुस के मकान पर हाज़िर हुआ और मुहम्मद यूनुस से सारा वालेआ बयान कर दिया और हज़रत से दुआ करने की सिफ़ारिश किया! मुहम्मद यूनुस ने हज़रत से वाकेआ बयान किया और छोटे लाल के लिए दुआ की दरख्वास्त की! हज़रत ने फ़रमाया जाओ तम्हारा सारा सामान मिल जायेगा और एक तावीज़ भी लिखकर दिया! छोटे लाल तावीज़ लेकर चला गया! दूसरे दिन जिस शख़्स ने सामान पाया था खुद छोटे लाल के दुकान पर जाकर सारा सामान बिलकुल उसी तरह छोटे लाल के हवाले कर दिया! छोटे लाल ने एक हज़ार रुपये उसको दिया और फ़ौरन हज़रत के ख़िदमत में हाज़िर हुआ और कहने लगा हज़रत ने जो फ़रमाया था वोह पूरा हुआ फिर उसने हज़रत की बारह दरी में पांच हज़ार ईंटें नज़र किया!

(9) दूध का दरिया जारी हो गया– मुहम्मद इल्यास ख़ान मौज़ा छितौनी ज़िला सुल्तानपुर बयान करते थे की जब जब हज़रत मेरे घर तशरीफ़ लाते तो मैं दूध से आपकी ख़ातिर करता था! हज़रत मेरे घर को दूध वाला घर कहते थे! मैंने कसाई के यहाँ से एक ख़ाली भैंस खरीदा था लेकिन हज़रत की दुआ से बाद को मालूम हुआ कि
उसके पेट में बच्चा है! फिर तो ये आलम हुआ की मेरे घर में दूध का दरिया जारी हो गया और कोई ऐसा बर्तन नहीं रहा जिसमें दूध न हो और उस भैंस से उस वक्त पांच भैंस हो गयी थी जो सब की सब दूध देती थीं।

(10) बहरा सुनने लगा- रहमतुल्लाह क़व्वाल लंभुआ मौज़ा ज़िला सुल्तानपुर बयान करते थे की मेरे उस्ताद मंजूर अहमद उज़्मी रेलवे मुलाज़िम थें उनकी सुनने की ताक़त बिल्कुल ख़त्म हो गयी थी और वह बिल्कुल बहरे हो गए थे! कई जगह इलाज करवाया बड़े से बड़े डॉक्टर को दिखाया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ और माली हालत भी खराब हो गयी यहाँ तक की नौकरी भी खतरे में पड़ गयी बहुत परेशान थें! एक दिन मैं उनकी अयादत में गया तो उन्होंने मुझसे पूरे हालात बयान किये! मैंने उनसे हज़रत का तज़किरह किया और अपने मकान पर बुलाया वोह मेरे मकान पर आएं और मै उनको | लेकर सुल्तानपुर गया! हज़रत उस वक़्त रफ़ीक़ पेशकार मोहल्ला खैराबाद सुल्तानपुर के दरवाज़े पर तशरीफ़ फरमा थें मुझको देखकर बहुत खुश हुएं लेकिन मेरे उस्ताद को देख कर मुंह फेर लिया और उनसे हाथ भी नहीं मिलाया मेरे उस्ताद इस बात पर रोने लगें लेकिन मैंने उन्हें तसल्ली दिया! हज़रत ने मुझको कुछ कलाम सुनाने का हुक्म दिया! मैंने अपने साथियों को बुलाया जो सुल्तानपुर में रहते थे और कलाम सुनाना शुरू किया! थोड़ी देर में बहुत से लोग आ गयें और एक अच्छी ख़ासी महफ़िल हो गयी! ऐन उसी वक़्त जबकि पूरी महफ़िल आलमे वज्द में थी और हज़रत के ऊपर एक इस्तग़राकी कैफियत तारी थी मैं यकायक ख़ामोश हो गया! हज़रत ने फ़रमाया और सुनाओ मैंने कहा हुजूर मेरे उस्ताद पर नज़रे करम फरमाएं ये सब इन्हीं का दिया हुआ है वरना मैं किसी क़ाबिल ना था! मैं सिर्फ इसीलिए हाज़िरे ख़िदमत हुआ हूँ! हज़रत ने फ़ौरन कड़वा तेल मंगवाया और उसे दम फ़रमाया और फ़रमाया इसे कान में डालो। मैंने उसी वक्तथोड़ा तेल कान में डाला उसके बाद आपने एक तावीज़ भी अता फ़रमाई और फ़रमाया जाओ सब ठीक हो जायेगा। उसके बाद हम लोग हज़रत की दस्तबोसी कर के शहर चले गयें और एक होटल में बैठकर चाय पीने लगें! मेरे उस्ताद ने मुझसे कहा अब मैं अपने अंदर काफी फ़र्क महसूस कर रहा हूँ प्यालियों की खनक मुझे सुनाई दे रही है! कुछ ही दिनों के बाद वोह बिल्कुल ठीक हो गयें!

Aftab e Ashraf 9

आपका कश्फ़-ओ-करामात- हज़रत सैय्यद जलाल अशरफ़ रहमतउल्लाह अलैह की कश्फ़.ओ.करामात हद्दे शुमार से बाहर हैं जिसे इस अदना किताब में दर्ज करना तवालत का बाइस होगा चुनाँचे यहाँ हम उन्हीं करामातों का ज़िक्र कर रहें हैं जो आपके मुताल्लिक़ मशहूर और मारूफ़ है!

(1) मशहूर है कि आपके मुरीद मुहम्मद याकूब खान मरहूम उनके बेटे मुहम्मद तैयब ख़ान माहे मऊ ज़िला अमेठी बयां करते हैं की एक दफ़ा हज़रत मेरे घर में तशरीफ़ फरमा थें। सावन भादौ की काली रात थी! चिराग़ जल रहा था जो हवा के एक झोंके के बाद बुझ गया! मैं हज़रत की ख़िदमत में लगा हुआ था हज़रत का पैर दबा रहा था! मैं हज़रत मुझको बार बार ताक़ीद कर रहे थे कि भैया दीवार के तरफ़ ना जाना वहां कुछ है मुहम्मद तैयब ख़ान कहते हैं कि जब हज़रत ने कई बार इस जुमले को दोहराया तो मुझे भी उलझन पैदा हुई! चिराग़ बुझ गया था मैंने माचिस तलाशा और लालटेन जलाया! जब रौशनी हो गयी तो मैंने दीवार के तरफ कदम बढ़ाया और देखा की उसमें एक होल है जिसमें एक काला बिच्छू बैठा है और वोह ज़ोर ज़ोर से उसमें डंक मार रहा है! मैंने उसे बाहर निकाला और उसे मार दिया! सावन भादौ की काली रात में काले बिच्छू को देख लेना ये उनकी बसारत नहीं बल्कि बसीरत का कमाल था!

(2) मुहम्मद वकील ख़ान इन मुहम्मद कासिम ख़ान मरहूम सेमरा परगना अठेहा ज़िला प्रतापगढ़ जिनका पूरा घराना हज़रत का मुरीद अक़ीदतमन्द और चाहने वाला था! वोह बयान करते थे कि एक बार हज़रत मेरे घर पर मौजूद थे! हम लोग हज़रत की ख़िदमत पर लगे हुए थें! हज़रत ने हम लोगों से कहा कि भैया शिकार कर लाओ। मै थें और मेरे भाई सईद ख़ान साथ में थे! मैंने देखा की अरहर के एक खेत में मुर्गाबी बैठी है! मैंने उस पर निशाना साधा और तीन बार ट्रिगर दबाया मगर मेरी बंदूक न चल सकी न काम कर सकी मैंने जब गौर करके मुर्गाबी के आगे देखा तो मेरे होश उड़ गयें सामने एक औरत बैठी हुई घास छील रही थी अगर गोली चल जाती तो यकीनन वोह औरत
भी उसके ज़द में आ जाती! मैंने फिर उस मुर्गाबी को वहां से उड़ाया तो वोह एक आम के दरख्त पर जाकर बैठ गयी! मैंने निशाना लगाया और निशाना लग गया मुर्गाबी तड़पती हुई नीचे आ गिरी मैंने उसे ज़बह किया और हज़रत के पास लेकर हाज़िर हुआ! इधर हज़रत की निगाहें पहले ही सब कुछ देख चुकी थीं! मैं जब हज़रत की ख़िदमत में हाज़िर हुआ तो हज़रत ने मुझसे पूछा भैया शिकार मिल गया मैंने हज़रत के सामने शिकार हाज़िर किया! हज़रत ने कहा भैया आज बड़ा ग़ज़ब हो जाता अगर पहली बार में तुम्हारी बंदूक चल जाती तो, क्यूंकि जब तुमने पहली बार गोली चलाने की कोशिश की थी तो तीन बार ट्रिगर दबाया था तो मैंने उसे रोक लिया था! अगर गोली चल जाती वोह औरत ज़द में आजाती! अल्लाह तआला ने अपने कामलीन बन्दों को कैसी ताक़त दे रखी है वोह दूर से होने वाले वालेआत को अपनी निगाहों से देख भी रहें हैं और उसे अपने क़ुदरते कामिला से रोक भी रहें हैं! ये उनकी वलायत और बसीरत का खुला हुआ सबूत है! I

(3) मर्ज़ काफूर हो गया- मुहम्मद रफ़ीक़ माहे मऊ ने बयान किया की मेरे लड़के मुहम्मद इश्तियाक़ को कालरा हो गया था यकायक तबियत बहुत ज़्यादा ख़राब हो गयी थी यहाँ तक की हाथ पैर ठण्डे हो गयें!
मैं एक गिलास में पानी लेकर हज़रत की कुटिया पर पहुंचा! हज़रत कुटी के बाहर ही तशरीफ़ फरमा थे! हज़रत के पास मुहर्रम अली पेश इमाम भी मौजूद थें! मैंने हज़रत से कहा मेरे लड़के की तबियत बहुत ख़राब है बचने की कोई उम्मीद नहीं पानी दम फरमा दीजे और मैं रोने लगा! हज़रत कुछ बोले नहीं और थोड़ी दूर जाकर दौड़ लगाना शुरू कर दिया! थोड़ी देर के बाद तशरीफ़ लाएं और चारपाई पर बैठ गये। मैंने हज़रत से पानी दम करने के लिए फिर दरख्वास्त की, आप चारपाई से फिर उठे और दौड़ लगाने लगें उसके बाद चारपाई पर तशरीफ़ लाएं और लेट गयें और मुंह पर चादर डाल लिया! मुहम्मद रफ़ीक़ का बयान है मै कुछ देर तो खड़ा रहा फिर मैंने सोचा अब हज़रत पानी नहीं दम फरमाएंगे अभी मैंने ये सोचा ही था के हज़रत उठ बैठे और मुझसे पानी दम करने के लिए माँगा और फ़रमाया जाओ ठीक हो जायेगा! मैंने घर जाकर लड़के को पानी पिलाया बच्चे ने फ़ौरन आँखे खोल दिया और उठ बैठा और मर्ज़ काफूर हो गया!

(4) क़त्ल का मुजरिम बरि हो गया- अब्दुल शकूर माहे मऊ |ने बयान किया था कि प्रताप भुजवा जो की अशरफपुर का रहने वाला था और ९९ वे डकैतों में माखुज़ था और एक क़त्ल के केस में भी मुलव्विस था। पुलिस उसे पकड़ कर थाने ले गयी और इस क़दर मारा की हाथ पैर की हड्डी हड्डी टूट गयी और सुल्तानपुर चालान कर दिया! वोह उस वक़्त जेल में था! उसकी माँ हज़रत के पास आई और हज़रत को एक रुपये नज़राना किया और अपने बेटे का हाल बयां किया और दुआ की दरख्वास्त किया! हज़रत ने फ़रमाया वह बिल्कुल ठीक हो ! जायेगा और छूट जायेगा! हज़रत की दुआ से वोह तमाम डकैतों से बरि हो गया और सबसे हैरत अंगेज़ बात ये हुई की क़त्ल वाला केस जिसमें ये माखुज़ था ऐसा दबा कि फिर चला ही नहीं और उसके तमाम साथियों को उम्रकैद की सज़ा हो गयी!

(5) बे औलाद को औलाद मिल गयी- सुल्तान अहमद मौज़ा मीरा मऊ ज़िला रायबरेली ने बयान किया कि हमारे यहाँ एक शख़्स मुहम्मद यार नामी हज़रत के मुरीद थे! इनके कोई औलाद नरीना (बेटे) नही थे! वोह हज़रत के पास आएं और तालिब ए दुआ हुए! हज़रत ने फ़रमाया तुम्हारे बच्चा होगा चुनांचे चंद ही दिनों के बाद हज़रत की दुआ से इनकी बीवी हामला हुईं! अब इन्होंने हिफाज़त हमल के लिए कुछ दूसरे लोगों से भी गंडा तावीज़ बनवायें लेकिन बिल आख़िर हमल साकित हो गया! दूसरी बार जब हज़रत को मीरा मऊ लाया गया तो मुहम्मद यार की बीवी खैरुन्निसा आईं और हज़रत के सामने रोने लगीं! हज़रत ने मुझसे फ़रमाया चलो भैया भाग चलें इसका ईमान दुरुस्त नहीं है और आबादी से बाहर एक बाग़ में चले गयें! वोह औरत भी हज़रत के साथ हो ली! आपने मुझसे फरमाया ये तो भैया यहाँ भी आ गयी! मैंने फ़रमाया हज़रत ये आपकी ख़ादिमा है आपको किस तरह छोड़ सकती है! आपने उस से कहा दूर हो जा! ! औरत थोड़ी दूर जाकर बैठ गयी फिर आहिस्ता आहिस्ता हज़रत के पास पहुंची और आपका पैर दबाना चाहा हज़रत ने पैर खींच लिया लेकिन मेरी सिफ़ारिश से हज़रत ने पैर फैला दिया! औरत हज़रत का पैर दबाने लगी और रोने लगी उसी वक़्त उसके शौहर मुहम्मद यार भी पहुंच गयें! हज़रत ने मुझसे फ़रमाया लो ये भी आ गया! हज़रत ने फिर फ़रमाया इस से कह दो कि दौड़ता हुआ जाये और चारपाई ले कर आये! हज़रत का ये हुक्म सुनकर मुहम्मद यार दौड़ता हुआ गया और ! चारपाई ले आया! हज़रत ने फ़रमाया ख़ाली चारपाई ले कर आया है कह दो बिस्तर भी लेकर आये ये सुनकर वोह बिस्तर भी ले आया! फिर आपने उस से तकिया मंगवाया फिर लोटा और डोरी इसी तरह पांच बार उसे दौड़ाया! बेचारे का दौड़ते दौड़ते बुरा हाल हो गया था! फिर आपने मुझसे फ़रमाया की ये औरत क्या कहती है? तो मैंने औरत से कहा कि अब अपना मुद्दा बयान करो तो उसने आपसे एक बेटा होने के दुआ के लिए दरख्वास्त किया! हज़रत वै फिर मुझसे फ़रमाया भैया इसका ईमान दुरुस्त नहीं है! औरत ये बात सुनकर रोती रही तो हज़रत ने औरत से फ़रमाया अपना ईमान दुरुस्त रखना जाओ अल्लाह ने तुमको औलाद दिया और हज़रत मखदूम साहब ने और मैंने यही कलमात आपने दो बार फ़रमाया चुनांचे उसके बाद उस औरत के यके बाद दीगरे दो बच्चे पैदा हुएं जो शिफ़ात अहमद और सिराज अहमद नाम से मौजूद थे!

Huzur ﷺ advice to Hazrat Ali AlaihisSalam

Huzur ﷺ advice to Hazrat Ali AlaihisSalam in the battle of (Ghazwa) Ta’if and Huzur’s confirmation that Allah, the Almighty tells Hazrat Ali AlaihisSalam in his ears, that is to say, what Hazrat Ali AlaihisSalam says, is His word.

When the unbelievers were defeated in the battle of Hunnain, they sought shelter in Ta’if. They started preparations for the war. Ta’if was very much protected place because it was covered by walls on all the four directions. Saqif’s family was living here who were very courageous. There was a protected fort also. Ta’if and Hunnain’s defeated armies renovated the fort and provisions were stored for one year. Observation posts were established on all the four sides of the fort, and they tightened their belts to fight against the Islamic armies. On receiving the information, Huzur ﷺ came to Ta’if, and the Islamic armies encircled the fort. The enemies showered the heated iron-bars. Many people were
injured. The encirclement continued for twenty days. Then, Huzur ﷺ ordered that the encirclement should be lifted up and instead of fight, he offered following pray for them before the Almighty:

“Kindly inspire Saqif to come to me for the acceptance of Islam.”

Due to the impact of this prayer, a great craving for acceptance of Islam was created in the heart of Urva Ibn-e-Masood, the wealthiest person of Saqfi. Hence, yet Huzur ﷺ did not even reach Medina, the person presented him before Huzur ﷺ, accepted Islam and returned with a vast treasure of acceptance of Islam. The stone-hearted people of Saqif killed him. But after some days, Ehl-e-Ta’if sent a representative in the service of Huzur ﷺ who was converted into a Muslim, went back to Ta’if and advocated Islam. The miraculous result of this movement was that on the occasion of the historical last Hajj, there was not a single Saqfi who was devoid of the treasure of accepting Islam.

The encirclement during the war of Ta’if had its own importance. It took twenty days. There were two points, the first one was, how to manage the food and other facilities for the army of eleven to twelve thousand soldiers. The other point was, if the encirclement was released, the nonbelievers would take Muslims to be weak, and they would try to dominate over them. On this matter, Huzur ﷺ very confidently talked to Hazrat Ali AlaihisSalam for a long time. There may be some other matters also. Some people were jealous about this, and they said, “With your cousin, you had a long discussion.” On this, Huzur ﷺ said, “I did not discuss with him, it was Allah, the Almighty who talked to him.” While writing this Hadith, Imam Tirmizi says, “The meaning of ‘Allah, the Almighty has talked to him’ means, Allah has ordered me that I should discuss with him.”

This interaction shows that Hazrat Ali AlaihisSalam has been made the sharer of divine secrets. So much so that He ordered Nabi to undertake the divine discussions with Hazrat Ali AlaihisSalam. These blessings of Allah had been so much exhibited that in the presence of about eleven to twelve thousand people, the Prophet ﷺ was nominated to talk to Hazrat Ali AlaihisSalam about the secrets of Divine Being. The purpose of this arrangement was that the whole truth should come before people at large so that the entire community becomes aware of the Prophet’s ﷺ mystical aspect. This implies that Huzurletet is the greatest experiencer of the Ultimate Truth and divine feelings of the spiritualism

ज़मीन पर हुकूमत

ज़मीन पर हुकूमत

हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत सिद्दीक अकबर रज़ियल्लाहु अन्हु की मइय्यत में जब मक्का से हिजरत फ़रमाई तो कुरैशे मक्का ने एलान किया कि जो कोई मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और उसके साथी (सिद्दीक अकबर रज़ियल्लाहु अन्हु) को गिरफ्तार करके लायेगा उसे सौ ऊंट इनाम में दिये जायेंगे! सुराका बिन जअशम ने यह एलान सुना तो अपना तेज़ रफ्तार घोड़ा निकाला और उस पर बैठकर कहने लगा कि मेरा यह तेज़ रफ्तार घोड़ा मुहम्मद और अबू-बक्र का पीछा कर लेगा। मैं अभी उन दोनों को पकड़ कर लाता हूं चुनांचे उसने अपने घोड़े को दौड़ाया । थोड़ी देर में हुजूर के करीब पहुंच गया। सिद्दीक़ अकबर ने जब देखा कि सुराका में घोड़े पर सवार हमारे पीछे आ रहा है। हम तक पहुंचने ही वाला है। तो अर्ज किया या रसूलल्लाह! सुराका ने हमें देख लिया है और वह देखिए हमारे पीछे आ रहा है। हुजूर ने फ़रमाया : ऐ सिद्दीक! कोई फिक्र न करो अल्लाह हमारे साथ है। इतने में सुराका बिल्कुल करीब आ पहुंचा तो हुजूर ने दुआ फ़रमाई। ज़मीन ने फ़ौरन सुराका के घोड़े को पकड़ लिया और उसके चारों पैर पेट तक ज़मीन में धंस गए। सुराका यह मंज़र देखकर घबराया और अर्ज करने लगा।

या मुहम्मद! मुझे और मेरे घोड़े को इस मुसीबत से नजात दिलाइए। मैं आपसे वादा करता हूं कि मैं पीछे मुड़ जाऊंगा | जो कोई आपका पीछा करता हुआ आपकी तलाश में इधर आ रहा होगा उसे भी वापस ले जाऊंगा। आप तक न आने दूंगा चुनांचे हुजूर के हुक्म से ज़मीन ने उसे छोड़ दिया।

सबक़ : हमारे हुजूर का हुक्म व फ़रमान ज़मीन पर भी जारी है और काइनात की हर चीज़ अल्लाह ने हुजूर के ताबे कर दिया है। फिर जिस शख्स की अपनी बीवी भी उसकी ताबे न हो वह अगर हुजूर की मिस्ल बनने लगे तो वह किस क़द्र अहमक व बेवकूफ है।