Hadith Aqiqa

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Translation of Sahih Bukhari, Book 66:
Sacrifice on Occasion of Birth (`Aqiqa)
Volume 7, Book 66, Number 376:

Narrated Abu Musa:

A son was born to me and I took him to the Prophet who named him Ibrahim, did Tahnik for him with a date, invoked Allah to bless him and returned him to me. (The narrator added: That was Abu Musa’s eldest son.)

Volume 7, Book 66, Number 377:
Narrated ‘Aisha:

A boy was brought to the Prophet to do Tahnik for him, but the boy urinated on him, whereupon the Prophet had water poured on the place of urine.

Volume 7, Book 66, Number 378:
Narrated Asma’ bint Abu Bakr:

I conceived ‘Abdullah bin AzZubair at Mecca and went out (of Mecca) while I was about to give birth. I came to Medina and encamped at Quba’, and gave birth at Quba’. Then I brought the child to Allah’s Apostle and placed it (on his lap). He asked for a date, chewed it, and put his saliva in the mouth of the child. So the first thing to enter its stomach was the saliva of Allah’s Apostle. Then he did its Tahnik with a date, and invoked Allah to bless him. It was the first child born in the Islamic era, therefore they (Muslims) were very happy with its birth, for it had been said to them that the Jews had bewitched them, and so they would not produce any offspring.

Volume 7, Book 66, Number 379p:
Narrated Anas bin Malik:

Abu Talha had a child who was sick. Once, while Abu Talha was out, the child died. When Abu Talha returned home, he asked, “How does my son fare?” Um Salaim (his wife) replied, “He is quieter than he has ever been.” Then she brought supper for him and he took his supper and slept with her. When he had finished, she said (to him), “Bury the child (as he’s dead).” Next morning Abu Talha came to Allah’s Apostle and told him about that. The Prophet said (to him), “Did you sleep with your wife last night?” Abu Talha said, “Yes”. The Prophet said, “O Allah! Bestow your blessing on them as regards that night of theirs.” Um Sulaim gave birth to a boy. Abu Talha told me to take care of the child till it was taken to the Prophet. Then Abu Talha took the child to the Prophet and Um Sulaim sent some dates along with the child. The Prophet took the child (on his lap) and asked if there was something with him. The people replied, “Yes, a few dates.” The Prophet took a date, chewed it, took some of it out of his mouth, put it into the child’s mouth and did Tahnik for him with that, and named him ‘Abdullah.

Volume 7, Book 66, Number 379i:
Narrated Anas:

As above.

Volume 7, Book 66, Number 380:
Narrated Salman bin ‘Amir Ad-Dabbi:

I heard Allah’s Apostle saying, “‘Aqiqa is to be offered for a (newly born) boy, so slaughter (an animal) for him, and relieve him of his suffering.” (Note: It has been quoted in Fateh-AL-Bari that the majority of the Religious Scholars agrees to the Hadith narrated in Sahih At-TlRMlZY that the Prophet was asked about Aqiqa and he ordered 2 sheep for a boy and one sheep for a girl and that is his tradition “SUNNA”.)

Volume 7, Book 66, Number 381:
Narrated Habib bin Ash-Shahid:

Ibn Sirin told me to ask Al-Hassan from whom he had heard the narration of ‘Aqiqa. I asked him and he said, “From Samura bin Jundab.”

Volume 7, Book 66, Number 382:
Narrated Abu Huraira:

The Prophet said, “Neither Fara’ nor ‘Atira (is permissible):” Al-Fara’ nor ‘Atira (is permissible):” Al-Fara’ was the first offspring (of camels or sheep) which the pagans used to offer (as a sacrifice) to their idols. And Al-‘Atira was (a sheep which was to be slaughtered) during the month of Rajab.

Volume 7, Book 66, Number 383:
Narrated Abu Huraira:

The Prophet said, “Neither Fara’ nor ‘Atira) is permissible).” Al-Fara’ was the first offspring (they got of camels or sheep) which they (pagans) used to offer (as a sacrifice) to their idols. ‘Atira was (a sheep which used to be slaughtered) during the month of Rajab.

Aftab e Ashraf 13

मीरा मऊ में आपकी तशरीफ़आवरीये मौज़ा भी आपके हल्का-ए-इरादत में दाखिल था और यहाँ के लोग भी आपके जांनिसारों और अक़ीदतमंदों में शुमार होते थे! यहाँ के लोग आपको साल में एक बार या दो बार अपने यहाँ ज़रूर लाते थे! आप यहाँ सुल्तान अहमद के मकान क़याम फरमा होते थें।

सुल्तानपुर– ये वो शहर है जहाँ हज़रत अक्सर और बेशतर आया करते थें! यहाँ हर मज़हबो मिल्लत के लोग आपके अक़ीदतमंद थे! गैर मुस्लिमों में जमुना प्रसाद चूने वाले और राम सुन्दर आपके में ख़ास अक़ीदतमंदों में से थे! यहाँ आप अब्दुल मजीद उर्फ बन्ने भाई के मकान पर क़याम फरमाते थें फिर बाद में अशफ़ाक़ अहमद ख़ान (
उर्फ मन्नू भाई मोहल्ला शाहगंज जमीला मंज़िल में क़याम फ़रमाने लगे। आप जामिया अरबिया और पाँचों पीर अक्सर तशरीफ़ ले जाया करते थें।



जामिया अरबिया सुल्तानपुर- जब आप सुल्तानपुर तशरीफ़ ले जाते तो जामिया अरबिया ज़रूर तशरीफ़ ले जाते थें! यहाँ के तमाम उलेमा तुलबा व मुर्रिसीन और खुद मोहतमिम जामे अरबिया मौलाना सलीम साहब हद दर्जे आपका ऐहतिराम फ़रमाते थे! हज़रत जामे अरबिया के सालाना जलसे में ज़रूर शिरकत फ़रमाते थे! जामिया अरबिया के उलेमा व तुलबा हज़रत से दुआएं और तावीज़ात लेतें और आपकी ख़िदमत करते थें!



सफ़र कानपूरसुल्तान अहमद ख़ान मौज़ा मीरा मऊ बयान करते थे कि एक बार हज़रत मेरे हमराह कानपूर तशरीफ़ ले गयें वहां ज़हीर अहमद, मुहम्मद इस्हाक़ जर्राह जायस के भांजे के क्वार्टर पर क़याम फरमा थे! दूसरे दिन कुछ क़व्वाल आएं और हज़रत को कुछ कलाम सुनाने की ख्वाहिश ज़ाहिर की! हज़रत ने फ़रमाया मैं हज़रत मख़दूम जाजमऊ के आस्ताने पर हाज़री देने जा रहा हूँ! कल | सुनूँगा! दूसरे दिन जाजमऊ से हज़रत वापस हुएं और क़व्वाल आपकी ख़िदमत में हाज़िर हुएं! दस बजे दिन में क़व्वाली शुरू हुई लेकिन हज़रत को उनका कोई कलाम पसंद नहीं आया! क़व्वालों ने मुझसे पूछा हज़रत कैसा कलाम पसंद फ़रमाते हैं, मैंने कहा आपके जद अमजद हज़रत मख़दूम अशरफ़ सिमनानी रहमतउल्लाह अलैह के शान में सुनाओ! क़व्वालों ने मख़दूम अशरफ़ रहमतउल्लाह अलैह के शान में कलाम पढ़ना शुरू कर दिया! हज़रत झूम उठे! नोटों की बारिश शुरू हो गयी! महफ़िले क़व्वाली अभी शबाब पर थी की अचानक पुलिस ने छापा मार दिया और ज़हीर अहमद को गिरफ़्तार कर लिया और बहुत से लोगों के नाम नोट कर लिया! जुर्म ये था की पर्मीशन के बगैर क़व्वाली हो रही थी! हज़रत ने पूछा ये कौन हैं? मैंने कहा दरोगा और पुलिस वाले हैं आपके मेज़बान को पकड़ लिया है।

आपने मुझसे फ़रमाया जाकर उनसे कह दो उनको छोड़ दें लेकिन मेरी हिम्मत नहीं पड़ी! हज़रत ने तीन बार यही फ़रमाया! बिलआख़िर मैंने हज़रत की दस्बोसी किया और डरते हुए दरोगा के पास गया और हज़रत का फरमान सुना दिया! दरोगा बोला ये कानपूर है यहाँ ना जाने कितने ऐसे खाने कमाने वाले आते जाते रहते हैं। हज़रत दूर खड़े थे! मैंने देखा अचानक हज़रत के तेवर बदलने लगें और आप सड़क पर दौड़ लगाने लगें और दहन मुबारक से जी.ज़ी की आवाज़ निकालने लगें | ये देख कर दरोगा और पुलिस वाले बदहवास हो गए! दरोगा ने फ़ौरन ज़हीर अहमद को छोड़ दिया और पुलिस को लेकर वहां से चला गया! दूसरे दिन दरोगा हज़रत के पास आया और माफ़ी का तलबगार हुआ क़व्वाली का पर्मीशन दिलवाया लेकिन हज़रत ने फिर क़व्वाली नहीं सुना और चले आएं!



लम्भुआ ज़िला सुल्तानपुरइस बस्ती में भी हज़रत के के मुरीदो मोतक़िद कसरत से थे! अव्वल आपकी शर्फ़ बैत जिसको हासिल हुई वो रहमतउल्लाह नामी शख्स थे और सबसे पहले हज़रत ने इन्हीं के घर क़याम फ़रमाया! धीरे धीरे ये पूरा गाँव हज़रत के हल्का-ए-इरादत और बैअत में शामिल हो गया। यहाँ हज़रत ज़िन्दगी के आखरी अय्याम में तशरीफ़ लाएं इस वजह से यहाँ के लोगों को आपकी ख़िदमत का ज़्यादा मौक़ा ना मिल सका लेकिन उसके बावजूद

आपने यहाँ खूब फ़ैज़ो करम का दरिया बहाया! ज़ाहिद हुसैन साहब ने बयान किया कि मेरे चार बच्चे पैदा हुएँ लेकिन चारो फौत हो गयें! एक बार हज़रत, मूसा भाई के हमराह लम्भुआ तशरीफ़ लाएं! हज़रत की खुशी के लिए लम्भुआ बाज़ार में मेरे दरवाज़े के सामने महफ़िले सिमाअ का एहतमाम हुआ! महफ़िले सिमाअ के बाद हज़रत की ख़िदमत में मैंने अपनी दरख्वास्त पेश किया और तालिबे दुआ हुआ! हज़रत जज़्ब की हालत में उठे और सड़क पर दौड़ लगाने लगें और इसी आलम में फज्र का वक़्त हो गया, उस वक़्त हज़रत ने फ़रमाया जाओ बच्चा पैदा होगा और महफूज़ रहेगा! आपने एक तावीज़ भी दिया! उसके बाद मेरे दो बच्चे पैदा हुएं वाजिद हुसैन और मुहम्मद अनीस और हज़रत की दुआ से दोनों बा हयात रहें!

सफर बम्बई- एक बार आप अब्दुल शकूर के हमराह बम्बई तशरीफ़ ले गये! बम्बई में भी आपके मुरीदीन अच्छी खासी तायदाद में मौजूद थें! यहाँ हज़रत ने दो दिन मदनपुरा सायरा मंज़िल में क़याम किया और जनाब मुहम्मद मुस्तकीम साहब के मेहमान रहें! लौहर के जनाब ख़लील भाई और ज़हीर उद्दीन भाई के इसरार पर हज़रत कुर्ला कुरैश नगर तशरीफ़ ले गयें! वहां के लोगों ने हज़रत को हाथों हाथ लिया और आपकी बड़ी खिदमत किया! क़याम के दौरान आपने हज़रत हाजी अली, हज़रत मख़दूम माहिमी, हज़रत हाजी मलंग के आस्तानों पर हाज़री भी दिया! एक दिन आप रानी बाग़ चिड़िया घर तशरीफ़ ले गयें! हज़रत को जानवरों से बहुत लगाव था! आप चिड़िया घर में तमाम जानवरों को देख रहे थें देखते देखते आप वहां पहुचें जहाँ लोग हाथी की सवारी कर रहे थें! आपको हाथी की सवारी बहुत पसंद थी लेहाज़ा हाथी देखकर आपने उस पर बैठने की ख्वाहिश ज़ाहिर किया! फीलबान को बुलाया गया वो हाथी लेकर आया लेकिन जब हाथी सामने आया तो आपने उस पर बैठने से इन्कार कर दिया और फ़रमाया की इसने एक मुसलमान का खून किया है! तहक़ीक़ के बाद मालूम हुआ कि वाक़ई उस हाथी ने एक मुसलमान का खून किया था! जलील अहमद कुर्ला कुरैश नगर बयान करते थे की हज़रत
बम्बई से वतन जाने वाले थे और मेरी गाड़ी पासिंग में खोली गयी थी। मैंने हज़रत से दुआ करवाया की गाड़ी पास हो जाये! हज़रत ने फ़रमाया तुम्हारी गाड़ी पास हो जाएगी!मैं गाड़ी लेकर ताड़देव आर०टी०ओ० ऑफिस पहुंचा तो चौहान इंस्पेक्टर ने गाड़ी फेल कर दिया! मैं दोबारा गाड़ी लेकर फिर पहुंचा तो पाटेकर इंस्पेक्टर ने गाड़ी फेल कर दिया! मैं बहुत हैरान कि ये कैसे हो गया बहरहाल फिर मैं गाड़ी कुर्ला आगरा रोड कॉल टैक्स पेट्रोल पम्प ले गया और वहां याकूब फेड गाड़ी में काम करने लगा! वहां मैं एक दरख़्त की शाख पकड़ कर खड़ा था की मैंने देखा चौहान और पाटेकर दोनों स्कूटर पर बैठकर सामने सड़क से गुज़र रहे हैं, जैसे ही मेरे सामने से गुज़रे टायर सलामत और ट्यूब फट गया दोनों स्कूटर से गिर पड़ें! मैंने आगे बढ़कर दोनों को उठाया! जब उनके होश हवास दुरुस्त हुए तो मेरे गाड़ी के काग़ज़ात देखें और आर०टी०ओ० ऑफिस बुलाकर गाड़ी पास कर दिया!

Hajj-tul-Wida and the Hajj (Pilgrimage) of Hazrat Ali AlaihisSalam

On Saturday, the 26th of Zilqada Hijri 10, Huzur ﷺ left from Medina for Hajj after performing Namaz-e-Zuhar. He wore the Hajj Ehram at Zul Huleifa, which is 6 miles away from Medina and he recited the Talbia (Labbayka Allāhumma Labbayk)-name of prayer. His programme of departure for Hajj had already been publicly declared. Especially from Medina, a number of people joined him for Hajj. He was surrounded by people on all the four sides at the Zul Huleifa camp. His call of Labbaek was responded by the same word from the people in such a way that the forest, the sky and the whole atmosphere was full of its echo. People on the way to Mecca were constantly reciting Labbayk, Labbayk. At the place of Arafat, one lac of pilgrims (Hajis) was gathered.

Huzur ﷺ entered Holy Mecca in the morning of Sunday, the 4ch of Zilhajj. The whole journey was completed in nine days. First of all, they performed a Tawa’af of Ka’aba. After that, they fulfilled other Arkans (ceremonies) of Safa and Marwa. But they did not untie the Ehram after the performance of Umrah. Not only that, they untie it only after completing all the requirements of Hajj. This type of Hajj is known as Hajj-e-Quran, and it is performed with the same Ehram and the intention (Niyat) of both, Umrah as well as Hajj. First, Umrah is performed, and then, the requirements of Hajj are fulfilled. After performing both these processes, the Ehram is untied.

Hazrat Ali AlaihisSalam, who was on the post of Qazi at Yemen, arrived at Mecca-eMuazzama from Yemen, with the caravan of Hajjis for Haj brought a camel for Huzurki to perform Qurbani (sacrificing the animal) Huzurist asked him, “Which words did you recite while tying Ehram ?”

Hazrat Ali AlaihisSalam replied, “I said, ‘O Allah, I am tying the Ehram in the same way as Huzurss has tied. He has tied Ehram-e-Quran, which once tied, cannot be untied till even after the Tawa’af-e-Baitullah and Sahih of Safa-Marwa, but can be opened only after performing all the requirements of Hajj.’ Then, he told Hazrat Ali AlaihisSalam, “Do not untie the Ehram now.” He sacrificed a hundred camels on the 10th of Zil Hajj, out of which 63
were sacrificed by his own Holy hands, and then Hazrat Ali AlaihisSalam was made to sacrifice the remaining 37 camels. This description is given in Sahih Muslim Vol-I.

Translation: 63 camels were sacrificed by Rasul-e-Khuda ﷺ own holy hands, and then Hazrat Ali AlaihisSalam was made to sacrifice the remaining 37 camels. In this way, Huzur ﷺ joined Hazrat Ali AlaihisSalam in the process of Qurbani. Then he ordered to cook one piece of this meat. They cooked it, and both of them ate it.

Note: Huzur ﷺdelivered a Khutba (lecture) at Arafaat wherein he advocated various important guidances. Due to this fact, this lecture is more significant than all his other lectures.

Besides Islam, though there are so many other religions brought through messengers, in whom the commandments that were given by Allah are almost lost, and there are two reasons for this position:

i. The followers stopped the practices of the Divine Books, not only which; the books were abused by new additions and omissions.

ii. In those communities, there was none at that time who could reflect the religion rightly in his speech and behaviour, nor there anyone who could preach The Truth in its proper light.

No religion can survive in its real nature if, the Divine Message is neglected, and if there is no true spiritual person who would guide in the path of religion. The religion can live only if there are persons practising a religion with their deeds and thoughts. The persons who live a life based on real truth and founded on the basis of religious norms can only help the religion to survive. Islam is such a religion that would survive untill the day of judgement, and there cannot be any other Nabi after Huzur ﷺ, hence for its protection, it was necessary that:

i. Each and every letter of the Quran is preserved, and each one of my descendents is associated with it.

ü. In all the times, the persons, who are living a life of truth and are selected by Allah, are sheltered by the society, and their way of life is imitated by all other persons. Huzur ﷺ clearly stated, “This is the true and pious value of life, and you be associated with it so that you will not be misled.”

As the Muslims from all the regions were present in Arafat at the time of Hajj-tul-Wida, Huzur ﷺ preached the basic two principles of Islam and insisted that everyone should always remain informed of these two principles. Then stating the principles he said, “Everyone should have firm faith in the commandments of Holy Quran, and the pious path of life that has been shown by me is followed in the right spirit, Islam will never scatter. “Hazrat Jabir says, in Tirmizi Vol-II;

Translation:At Hajj-tul-Vida, on the day of Arafat, I have seen Huzur ﷺ preaching while riding on Qiswa, and I have also heard him saying from his Holy tongue,

“O people, I am leaving two things for you; if you hold them tightly you would never be misguided. These two things are the HolyBook and my descendents i.e. Hazrat Fatema AlahisSalam and Hasnain Karimain AlaihisSalam
Hazrat Ali AlaihisSalam

There is a clear indication of this in one of the Hadiths which is being bestowed now.

Hazrat Fatema AlahisSalam, Hasnain Karimain AlaihisSalam and Hazrat Ali AlaihisSalam are the direct descendents of Huzur ﷺ. The Hadith now is going to follow also, indicates this point.