Adab o ehtram e Taziya

अल्हमदो लिल्लाहे रब्बिल आलामीन वस्सलातों वस्सलामो अला रसूले ही व हबीबेही व खैर ख़लके ही मोहम्मादिंव व आलेही व असहाबेही अजमाईन

इस दर्ज वो हैं पाक के हम सबको चाहिए नामे हुसैन लेने से पहले वजू करें । ताज़ियत – के लफ़जी मानी इज़हारे गम के है ताजियेदारी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और शौहदाए करबला के गम मनाने को कहते है पेंगम्बरों और उनके खानदान कुरान और हदीस से साबित है हज के अरकान मे भी बीबी हाजिरा और इबराहीम की याद और गम शामिल है।

ताज़िया शरीफ और शरियत – ताज़िया मुबारक इस्तलाहतन (special term) मे हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रोज़ाए मुबारक की नक़ल ( 3D Picture या MODEL है शरियत की रूह से अच्छी तस्वीर (जो फतथा तस्वीर पे सादिर होता है वही (30) तस्वीर या MODEL पे भी होगा यो भी नक्ल की ही किस्म मे शामिल है) जो नेक और पाकिज़ा नियत से हुसूले बरकत के लिए खीची जाये जैसे- काबा तुल्ला, रोज़ा-ए-रसूल वदीगर मज़ार व मसाजिद की तस्वीर या MODEL तो इजतिहादन और मबल्लिगाना रूह से मस्तहसन है चंद उलामा-ए-जाहिरी को छोड़ के आज तक किसी आलिम ने ताजिये शरीफ के खिलाफ फतवा नहीं दिया खामोशी इख्तिया की या ताजीम के साथ शामिल रहे दोनो ही रवाइये रज़ामन्दी और ताईद के होते है इसलिए अहतराम और ताज़ीम के साथ ताजिये शरीफ का बनाना जियारत करना, सब अदाबे शरियत के साथ जाईज़ है, हिन्दुस्तान में तमाम बड़ी दरगाह मे ताज़ियेदारी होती चली आ रही है। अमल है जो माहे मुहरर्म मे शोहदायें करबला की याद मे हुजूर सल्ललाहो अलैह वसल्लम और आपके (ख़ानदान) अहेलैबैत से

उमूरे ताज़ियेदारी मुस्तहब मुहब्बत करने वाले करते है

जिसमे मजालिस,लंगर, ताज़िये व जियारते बनाना, इमामबाडे, सबिलें सजाना, सीजो सलाम की महफिले करना व शरीक होना वगैराह शामिल हैं। कुरान करीम में अल्लाह ताअला इरशाद फरमाता है :- “ व मैयूअज़िम शाअिर ल्लाही फ़ा इन्नहा मिन तक़वल कुलूब ” (सूरह ताहा पारा 16) जो शाअिरल्लाह (अल्लाह की निशानियॉ) की ताज़िम करे तो ये दिलों की परहेज़गारी है। (मुहब्बतें शाअिर से मुराद,मुहब्बते कुरान, मुहब्बते काबा और अल्लाह वालों की मुहब्बत है) -: गम हुसैन सुन्नतें रसूल :-हज़रत हाकिम और बेहक़ी ने उम्मे फज़ले बिन्ते हारिस रज़ि से रिवायत की आप फरमाती हैं के मै एक दिन हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को लेकर हुजुर सल्ललाहो अलैह वा अलैहिवसल्लम की बारगाह मे हाज़िर हुई मैंने हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को हुजुर सल्ल0 की गोद मे दे दिय फिर जब मैंने रसूल अल्लाह की जानिब देखा तो आप की आखों से आंसू बह रहे थे फिर हुजूर सल्ल0 ने फरमाया के मुझे जिबराईल ने खबर दि है के मेरी उम्मत मेरे इस बेटे को शहीद कर देगी और मुझे जिबराईल ने इस के मक़तल (क़त्ल की जगहों) की सुरख मिटटी लाकर दी है। शहादातैन”

: हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मौहददिस देहलवी :

अहदीस शरीफ “का मफहुम है ” अदब वाले ही अल्लाह वाले है। किसी बुजुर्ग ने फरमाया है जो अदब के रास्ते से (दीन में) दाखिल होता है कामियाब हो जाता है जो आश्किान अल्लाह की तौफिक से आका मौला इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की मुहब्बत में ताज़ियेदारी करते हैं उनहे चाहिए के अदब अहतराम का ख्याल रखें पाकी से रहें पाकी निस्फ़ ईमान है पाकी से अमल मे तासीर पैदा होती है ब वजू होकर ताज़िये शरीफ की तामीर करें।

  • ब वजू होकर बैठे महफिलों मजलिसो मे अदब और अहतराम से रहें क्योंकि अर्ज और सवाब नियत और खुलूस पर है)
  • मुहरम के दिनों मे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम व दिगर शौहदा का ज़िक करे उनकी मुहब्बत मे जिस तरह भी हो सबके साथ या अकेले उनकी अज़मत उन का गम अपने दिल मे खुलूस और मुहब्बत से पैदा करें बेशक उन की मुहब्बत उनकी याद उनका गम अल्लाह और रसूल की मुहब्बत, याद और गम है। * ताज़िये शरीफ बनाने, निकालने व दफनाने सभी मे अदब का ख्याल रखना चाहिए ये ऐसा पाक और अज़ीम अमल है ऐसा मक़बूल – ए- बारगाह के ज़रा सी बेअदबी अज़ाब मे डाल देती है जिस तरह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम आली मुकाम की बारगाह मे हाज़िर होने वालों को अल्लाह पसंद करता है उसी तरह उनके गुस्ताखो और बेअदबों को नपसंद भी करता है।
  • इन दिनों कोशिश करें किसी को आपकी ज़ात से तकलीफ न पहुंचे अल गरज किसी भी तरह की बुराई और न पाकी से बचे। ★ लंगर, नज़र वगैरा मे सफाई व पाकी का ख्याल रखें।

★ करबला शरीफ में इमाम बारगाहों मे शौर-गुल हंसी मज़ाक तफरी या किसी तरहा की ना जेबा हरकत से बचे (ध्यान रखिये मुहब्बत वो ही कुबूल होती है जसमे सच्चाई हो पाकी हो ईमानदारी हो कुरबानी हो) फिर ये तो महबूबे खुदा रसूल अल्लाह के नवासों की मुहब्बत है किस कदर अदब अहतराम और अज़मत का मक़ाम है यकीन रखिये एक बार हम इश्क और अदब के साथ उन के हो गये तो दुनिया की कोई ताक़त या हमारा कोई मुखालिफ हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। हशर के मैदान में भी उन का साथ नसीब होगा।

वमा तौफिका इल्ला बिल्लाह व आख़िर दावाना अनल हम्दोल्लिलाहे रब्बिल आलामीन वस्सलातो वस्सलाम अला रसूले ही व आले ही व असहाबैहि अजमाईन

जिनके घर में बे इजाज़त जिबरईल आते नहीं कदर वाले जानते हैं कदरो शाने अहलेबैत

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