एअलाने नुबूव्वत के सातवें साल ७ नबवी में कुफ्फारे मक्का ने जब देखा कि रोज़ ब-रोज़ मुसलमानों की तअदाद बढ़ती जा रही है और हज़रते हम्जा व हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हुमा जैसे बहादुराने कुरैश भी दामने इस्लाम में आ गए। तो गैज- गजब में ये लोग आपे से बाहर हो गए। और तमाम सरदाराने कुरैश और मक्का के दूसरे कुफ्फार ने ये स्कीम बनाई कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और आप के ख़ानदान का मुकम्मल बाइकाट कर दिया जाए। और उन लोगों को किसी तंग व तारीक जगह में महसूर (कैद) करके उनका दाना पानी बन्द कर दिया जाए ताकि ये लोग मुकम्मल तौर पर तबाह व बरबाद हो जाएँ। चुनान्चे इस ख़ौफ़नाक तजवीज़ के मुताबिक तमाम कबाइले कुरैश ने आपस में ये मुआहदा किया कि जब तक बनी हाशिम के
खानदान वाले हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को कल्ल के लिए हमारे हवाले न कर दें :(१) कोई शख्स बनू हाशिम के खानदान से शादी ब्याह न करें। (२) कोई शख्स इन लोगों के हाथ किसी किसम के सामान की
खरीद-ो फरोख्त न करे। (३) कोई शख्स इन लोगों से मेल जोल, सलाम- कलाम और
मुलाकात बात न करे। (8) कोई शख्स इन लोगों के पास खाने पीने का कोई सामान न जाने दे
। मनसूर बिन अकरमा ने इस मुआहदा को लिखा । और तमाम सरदाराने कुरैश ने इस पर दस्तखत करके इस दस्तावेज़ को कबा के अन्दर आवेजा (लटका) कर दिया। हज़रते अबू तालिब हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और दूसरे तमाम खानदान वालों को ले कर पहाड़ की उस घाटी में जिस का नाम “शिअबे अबी तालिब’ था पनाह गज़ी हुए। अबू लहब के सिवा खानदाने बनू हाशिम के काफिरों ने भी ख़ानदानी हमय्येत व पासदारी की बिना पर इस मामले में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का साथ दिया। और सब के सब पहाड़ के इस तंग व तारीक दर्रे में महसूर हो कर कैदियों की जिन्दगी बसर करने लगे। और ये तीन बरस का ज़माना इतना सख्त और कठिन गुजरा
कि बनू हाशिम दरख्तों के पत्ते, और सूखे चमड़े पका पका कर खाते थे। और उनके बच्चे भूक प्यास की शिद्दत से तड़प तड़पकर दिन रात रोया करते थे। संग दिल और जालिम काफिरों ने हर तरफ पहरा बिठा दिया था कि कहीं से भी घाटी के अन्दर दाना पानी न जाने पाए। (जरकानी अलल मवाहिब जि.१२७८)
मुसलसल तीन साल तक हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और ख़ानदाने बनू हाशिम उन होश रुबा मसाएब को झेलते रहे। यहाँ तक कि खुद कुरैश के कुछ रहम दिलों को बनू हाशिम की इन मुसीबतों पर रहम आ गया। और उन लोगों ने इस
जालिमाना मुआहदा को तोड़ने की तहरीक उठाई। चुनान्चे हश्शाम बिन अमर व आमिरी, जुहैर बिन उमय्या, मुतअम बिन अदी, अबुल बख्तरी, जम्आ बिनुल असवद वगैरा ये सब मिलकर एक साथ हरमे कञ्बा में गए। और जुहैर ने जो अब्दुल मुत्तलिब के नवासे थे। कुफ्फारे कुरैश को मुखातिब करके अपनी पुर जोश तकरीर में ये कहा कि ऐ लोगो! ये कहाँ का इन्साफ है? कि हम लोग तो आराम से जिन्दगी बसर कर रहे हैं। और ख़ानदाने बनू हाशिम के बच्चे भूक प्यास से बे कार हो कर बिलबिला रहे हैं। खुदा की कसम जब तक इस वहशियाना मुआहदा की दस्तावेज़ फाड़ कर पाँव से न रौंद दी जाएगी मैं हरगिज हरगिज चैन से नहीं बैठ सकता। ये तकरीर सुनकर अबू जहल ने तड़पकर कहा कि खबरदार! हरगिज़ हरगिज़ तुम इस मुआहदा को हाथ नहीं लगा सकते। ज़म्आ ने अबू जहल को ललकारा। और इस ज़ोर से डाँटा कि अबू जहल की बोलती बन्द हो गई। इसी तरह मुतअम बिन अदी और हश्शाम बिन अमर ने भी ख़म ठोंक कर अबू जहल को झिड़क दिया और अबुल बख्तरी ने तो साफ़ साफ़ कह दिया कि ऐ अबू जहल! इस ज़ालिमाना मुआहदे से न हम पहले राजी थे। और न अब हम इस के पाबन्द हैं!
इसी मजमअ में एक तरफं, हजरत अबू तालिब भी बैठे हुए थे। उन्होंने कहा कि ऐ लोगो! मेरे भतीजे मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) कहते हैं कि इस मुआहदे की दस्तावेज़ को कीड़ों ने खा डाला है। और सिर्फ जहाँ जहाँ खुदा का नाम लिखा हुआ है। इस को कीड़ों ने छोड़ दिया है। लिहाजा मेरी राय ये है कि तुम
लोग इस दस्तावेज़ को निकाल कर देखो। अगर वाकेई इस को कीड़ों ने खा लिया है। जब तो इस को चाक कर के फेंक दो। और अगर मेरे भतीजे का कहना गलत साबित हुआ तो मैं मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) को तुम्हारे हवाले कर दूंगा। ये सुनकर मुतअम बिन अदी कअबे के अन्दर गया। और दस्तावेज़ को उतार
लाया। और सब लोगों ने उस को देखा तो वाकई ब-जुज़ अल्लाह तआला के नाम के पूरी दस्तावेज़ को कीड़ों ने खा लिया था। मुतअम बिन अदी ने सब के सामने उस दस्तावेज़ को फाड़ कर फेंक दिया। और फिर कुरैश के चन्द बहादुर बावुजूद ये कि ये सब के सब उस सवक्त कुफ्र की हालत में थे। हथियार ले कर घाटी में पहुंचे और खानदाने बनी हाशिम के एक एक आदमी को वहाँ से निकाल लाए और उन को उन के मकानों में आबाद कर दिया। ये वाकिआ १० नबवी का है। मन्सूर बिन इकरमा जिस ने इस दस्तावेज़ को लिखा था उस पर कहरे इलाही टूट पड़ा कि उस का हाथ शल होकर सूख गया। (मदारिजुन नुबूव्वा जि.२ स.४६ वगैरा)
गम का साल सन्न १० नबवी
हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम “शिअबे अबी तालिब’ से निकल कर अपने घर तशरीफ़ लाए और चन्द ही रोज़ कुफ्फारे कुरैश के जुल्म व सितम से कुछ अमान मिली थी कि अबू तालिब बीमार हो गए। और घाटी से बाहर आने के आठ महीने बाद उन का इन्तिकाल हो गया। अबू तालिब की वफात हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लिए एक बहुत ही जाँ गुदाज़ और रूह फरसा हादिसा था क्योंकि बचपन से जिस तरह प्यार व महब्बत के साथ अबू तालिब ने आप की परवरिश की थी और और ज़िन्दगी के हर मोड़ पर जिस जाँ निसारी के साथ आप की नुसरत व दस्तगीरी की। और आप के दुश्मनों के मुकाबिल सीना सिपर हो कर जिस तरह आलाम व मसाइब का मुकाबला किया। उस को भला हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम किस तरह भूल सकते थे?
हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु तआला अन्हा की वफात
अभी हज़रत अबू तालिब के इन्तिकाल का जख्म ताज़ा ही था कि हज़रत अबू तालिब की वफ़ात के तीन दिन या पाँच दिन के बाद हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाह तआला अन्हा भी दुनिया से रेहलत फरमा गईं। मक्का में हज़रत अबू तालिब के बाद सब से ज़्यादा जिस हस्ती ने रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नुसरत व हिमायत में अपना तन मन धन सब कुछ कुर्बान किया। वो हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु तआला अन्हा की जाते गिरामी थी। जिस वक्त दुनिया में कोई आप का मुख्लिस मुशीर व गमख्वार नहीं था। हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु तआला अन्हा ही थीं कि हर परेशानी के मौका पर पूरी जाँ निसारी के साथ आप की गमख्वारी और दिलदारी करती रहती थीं ।इस लिए हज़रत अबू तालिब और हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु । तआला अन्हा दोनों की वफ़ात से आप के मददगार और गमगुसार दोनों ही दुनिया से उठ गए जिस से आप के कल्बे नाजुक पर इतना अजीम सदमा गुज़रा कि आप ने इस साल का नाम आमुल हुज्न’ (गम का साल) रख दिया।
हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु तआला अन्हा ने रमजान १० नबवी में वफात पाई। ब-वक्ते वफात पैंसठ बरस की उम्र थी। मकामे हजून , (कब्रिस्तान जन्नते मुअल्ला) में मदफून हुईं। हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम खुद बनफ्से नफीस उनकी कब्र में उतरे। और अपने मुकद्दस हाथों से उन की लाशे मुबारक को जमीन के सिपुर्द किया। (जरकानी जि. १ स.२९६)
कुफ्फारे मक्का ने जब अपने जुल्म व सितम से मुसलमानों पर अरसए हयात तंग कर दिया। तो हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मुसलमानों को “हशा’ जाकर पनाह लेने का हुक्म दिया।
नज्जाशी “हब्शा का बादशाह जिस का नाम ‘असमहा’ और लकब नज्जाशी’ था। ईसाई दीन का पाबन्द था मगर बहुत ही इन्साफ पसन्द और रहम दिल था। और तौरात व इन्जील वगैरा आसमानी किताबों का बहुत ही माहिर आलिम था।
एअलाने नुबूब्बत के पाँचवें साल रजब के महीने में ग्यारह मर्द और चार औरतों ने हशा की जानिब हिजरत की। इन मुहाजिरीने किराम के मुकद्दस नाम हस्बे जैल हैं :(७) हज़रते उसमाने गनी रदियल्लाहु तआला अन्हु अपनी बीवी
हज़रते रुकय्या रदियल्लाहु तआला अन्हा के साथ जो हुजूर
सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की साहिबज़ादी हैं। (२) हज़रते अबू हुजैफा रदियल्लाहु तआला. अन्हु अपनी बीवी
हज़रते सहला बिन्ते सुहैल रदियल्लाहु तआला अन्हा के साथ। (३) हज़रते अबू सल्मा रदियल्लाहु तआला अन्हु अपनी अहलिया.
हज़रते उम्मे सल्मा रदियल्लाहु तआला अन्हा के साथ। (४) हजरते आमिर बिन रबीआ रदियल्लाहु अन्हु अपनी जौजा
(ज़रकानी अलल मवाहिब जि. १ स. २७०) कुफ्फारे मक्का को जब इन लोगों की हिजरत का पता चला इन जालिमों ने उन लोगों की गिरफ्तारी के लिए उन का तआकुब किया। लेकिन ये लोग कश्ती पर सवार हो कर रवाना हो चुके थे। इस लिए कुफ्फार नाकाम वापस लौटे। ये मुहाजिरीन का काफिला हशा की सरज़मीन में उतरकर अमन व आमान के साथ खुदा की इबादत में मसरूफ हो गया। चन्द दिनों के बाद नागहाँ ये खबर फैल गई के कुफ्फ़ारे मक्का मुसलमान हो गए। ये ख़बर सुनकर चन्द लोग हब्शा से मक्का लौट आए। मगर यहाँ आ कर पता चला कि ये खबर गलत थी। चुनान्चे कुछ लोग तो फिर हब्शा चले गए मगर कुछ लोग मक्का में रूपोश हो कर रहने लगे। लेकिन कुफ्फारे मक्का ने उन लोगों को ढूंढ निकाला। और उन लोगों पर पहले से भी ज़्यादा जुल्म ढाने लगे। तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फिर लोगों को हब्शा चले जाने का हुक्म दिया। चुनान्चे हब्शा से वापस आने वाले और उन के साथ दूसरे मज़लूम मुसलमान कुल तिरासी (८३) मर्द और अठारह औरतों ने हब्शा की जानिब हिजर त की। (जुरकानी अलल मवाहिब जि. १ स.२८७)
कुफ्फ़ार का सफीर नज्जाशी के दरबार में
तमाम मुहाजिरीन निहायत अमन व सुकून के साथ हब्शा
में रहने लगे। मगर कुफ्फार को कब गवारा हो सकता था कि फरज़न्दाने तौहीद कहीं अमन व चैन के साथ रह सकें। उन ज़ालिमों ने कुछ तहाएफ के साथ “अमर बिन वलीद और उम्मारा बिन वलीद’ को बादशाहे हशा के दरबार में अपना सफीर बना कर भेजा। उन दोनों ने नज्जाशी के दरबार में पहुँचकर तोहफों का नजराना पेश किया। और बादशाह को सज्दा करके ये फरयाद करने लगे कि ऐ बादशाह! हमारे कुछ मुजरिम मक्का से भाग कर आप के मुल्क में पनाह गुजीन हो गए हैं। आप हमारे उन मुजरिमों को हमारे हवाले कर दीजिए। ये सुनकर नज्जाशी बादशाह ने मुसलमानों को दरबार मे तलब किया। और हज़रते अली रदियल्लाहु तआला अन्हु के भाई हजरते जअफर रदियल्लाहु तआला अन्हु मुसलमानों के नुमाइन्दा बनकर गुफ्तगू के लिए आगे बढ़े। और दरबार के आदाब के मुताबिक बादशाह को सज्दा नहीं किया। बल्कि सिर्फ सलाम करके खड़े हो गए। दरबारियों ने टोका। तो हज़रते जअफर रदियल्लाहु तआला अन्हु ने फरमाया कि हमारे रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने खुदा के सिवा किसी को सज्दा करने से मनअ फरमाया है इस लिए मैं बादशाह को सज्दा नहीं कर सकता। (जरकानी अलल मवाहिब जि. १ स. २८८)
इस के बाद हज़रत जफ़र बिन अबी तालिब रदियल्लाहु तआला अन्हु ने दरबारे शाही में इस तरह तकरीर शुरू फ़रमाई कि ऐ बादशाह! हम लोग एक जाहिल कौम थे। शिर्क
बुत परस्ती करते थे। लूट मार, चोरी, डकैती, जुल्म- सितम, और तरह तरह की बदकारियों और बद अमालियों में मुब्तला थे। अल्लाह तआला ने हमारी कौम में से एक शख्स को अपना रसूल बनाकर भेजा। जिस के हसब- नसब और सिद्को दियानत को हम पहले से जानते थे। उस रसूल ने हम को शिर्क- बुत परस्ती
रोक दिया। और सिर्फ एक खुदाए वाहिद की इबादत का हुक्म दिया। और हर किस्म के जुल्म-7 सितम और तमाम बुराइयों और बदकारियों से हम को मना किया। हम उस रसूल पर ईमान लाए और शिर्क- बुत परस्ती छोड़कर तमाम बुरे कामों से ताएब हो गए। और इन लोगों ने हमें इतना सताया कि हम अपने वतन को खैर बाद कहकर आप की सल्तनत के जेरे साया पुर अमन जिन्दगी बसर कर रहे हैं। अब ये लोग हमें मजबूर कर रहे हैं कि हम फिर उसी पुरानी गुमराही में वापस लौट जाएँ।
हजरत जअफर रदियल्लाहु तआला अन्हु की इस तकरीर से नज्जाशी बादशाह बेहद मुतास्सिर हुआ। ये देखकर कुफ्फारे मक्का के सफीर अमर बिन आस ने अपने तरकश का आखिरी तीर भी फैंक दिया। और कहा कि ऐ बादशाह! ये मुसलमान लोग आप के नबी हजरत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में कुछ दूसरा ही एअतिकाद रखते हैं। जो आप के अकीदा के बिल्कुल ही खिलाफ है। ये सुन कर नज्जाशी बादशाह ने हज़रते जअफ़र रदियल्लाहु तआला अन्हु से इस बारे में सवाल किया। तो आप ने सूरए मरयम की तिलावत फ़रमाई। कलामे रब्बानी की तासीर से नजाशी बादशाह के कल्ब पर इतना गहरा असर पड़ा। कि उस पर रिक्कत तारी हो गई। और उसकी आँखों से आँसू जारी हो गए। हज़रते जअफर रदियल्लाहु तआला अन्हु ने फ़रमाया कि हमारे रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हम को यही बताया है कि हजरते ईसा अलैहिस्सलाम खुदा के बन्दे और उस के रसूल और मैं गवाही देता हूँ कि बेशक हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम खुदा के वही रसूल हैं जिन की बिशारत हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने इन्जील में दी है। और अगर मैं दस्तूरे सल्तनत के मुताबिक तख्ते शाही पर रहने का पाबन्द न होता । तो मैं खुद मक्का जा कर रसूले अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की जूतीयाँ सीधी करता और उनके कदम धोता।
बादशाह की तकरीर सुनकर उस के दरबारी जो कट्टर किस्म के ईसाई थे नाराज़ व बरहम हो गए। मगर नज्जाशी बादशाह ने जोशे ईमानी में सब को डाँट फटकार कर खामोश कर दिया। और कुफ्फारे मक्का के तोहफों को वापस लौटा कर अमर बिनुल आस और अम्मारा बिन वलीद को दरबार से निकलवा दिया। और मुसलमानों से कह दिया कि तुम लोग मेरी सल्तनत में जहाँ चाहो अमन व सुकून के साथ आराम व चैन की ज़िन्दगी बसर करो। कोई तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। (जुरकानी जि. १ स. २७८)
वाजेह रहे कि नज्जाशी बादशाह मुसलमान हो गया था। चुनान्चे उस के इन्तिकाल पर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मदीना मुनव्वरा में उस की नमाज़े जनाज़ा पढ़ी। हालाँकि नज्जाशी बादशाह का इन्तिकाल हब्शा में हुआ था। और वो हब्शा में मदफून भी हुए। मगर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने गाएबाना उन की नमाजे जनाजा पढ़कर उनके लिए दुआए मगफिरत फरमाई।
हज़रते अबू बकर और इब्ने दगना
हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु ने भी हब्शा की तरफ हिजरत की। मगर जब आप मकामे “बरकुल गुमाद’ में पहुँचे। तो कबीला कारा का सरदार “मालिक बिन दगना’ रास्ते में मिला। और दर्याप्त किया। कि क्यों? ऐ अबू बक! कहाँ चले? आप ने अले मक्का के मज़ालिम का तज्किरा फ्रमाते हुए कहा कि अब मैं अपने वतन मक्का को छोड़कर खुदा की लम्बी चौड़ी ज़मीन में फिरता रहूँगा। और खुदा की इबादत करता रहूँगा। इने दगना ने कहा कि ऐ अबू बकर! आप जैसा आदमी न शहर से निकल सकता है। न निकाला जा सकता है। आप दूसरों का बार उठाते हैं। महमानाने हरम की महमान नवाजी करते हैं। खुद कमा कमा कर मुफ्लिसों और मुहताजों की माली
इमदाद करते हैं। हक के कामों में सब की इमदाद व इआनत करते हैं। आप मेरे साथ मक्का वापस चलिए मैं आप को अपनी पनाह में लेता हूँ। इब्ने दगना आप को जबरदस्ती मक्का वापस लाया। और तमाम कुफ्फारे मक्का से कह दिया कि मैं ने बकर को अपनी पनाह में ले लिया है। लिहाज़ा ख़बरदार! कोई इनको न सताए। कुफ्फ़ारे मक्का ने कहा कि हम को इस शर्त पर मंजूर है कि अबू बकर अपने घर के अन्दर छुप कर कुरआन पढ़ें। ताकि हमारी औरतों और बच्चो के कान में कुरआन की आवाज़ न पहुँचे। इब्ने दगना ने कुफ्फार की शर्त को मंजूर कर लिया। और हज़रते अबू बकर रदियल्लाहु तआला अन्हु चन्द दिनों तक अपने घर के अन्दर कुरआन पढ़ते रहे । मगर हज़रते अबू बकर रदियल्लाहु तआला अन्हु के जज्बए इस्लामी और जोशे ईमानी ने ये गवारा नहीं किया कि मबूदाने बातिल लात व उज्ज़ा की इबादत तो अलल एलान हो। और मअबूदे बरहक अल्लाह तआला की इबादत घर के अनदर छुपकर की जाए। चुनान्चे आप ने घर के बाहर अपने सेहन में एक मस्जिद बना ली। आर उस मस्जिद में अलल एलान नमाज़ों में बुलनद आवाज़ से कुरआन पढ़ने लगे। और कुफ्फारे मक्का की औरतें और बच्चे भीड़ लगाकर कुरआन सुनने लगे। ये मंज़र देखकर कुफ्फ़ारे मक्का ने इब्ने दगना को बुलाया। और शिकायत की कि अबू बकर घर के बाहर कुरआन पढ़ते हैं। जिस को सुनने के लिए उन के गिर्द हमारी औरतों और बच्चों का मेला लग जाता है। इस से हम को बड़ी तकलीफ होती है। लिहाज़ा तुम इन से कह दो कि या तो वो घर में कुरआन पढ़ें। वरना तुम अपनी पनाह की ज़िम्मेदारी से दस्त बरदार हो जाओ। चुनान्चे इब्ने दगना ने हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु से कहा कि ऐ अबू बकर! आप घर के अन्दर छुप कर कुरआन पढ़ें। वरना मैं अपनी पनाह से कनारा कश हो जाऊँगा। इस के बाद कुफ्फारे मक्का आप को सताएँगे तो मैं इस का
ज़िम्मेदार नहीं हूँगा। ये सुन कर हजरते अबू बकर रदियल्लाहु तआला अन्हु ने फ़रमाया कि एक इब्ने दगना! तुम अपनी जिम्मेदारी से अलग हो जाओ। मुझे अल्लाह की पनाह काफी है और मैं उस की मर्जी पर राजी ब-रिज़ा हूँ।
(बुखारी जि. १ स. ३०१ बार जवारे अबी बकर सिद्दीक)
हज़रते हम्ज़ा मुसलमान हो गए
एअलाने नुबूव्वत के छटे साल हज़रते हम्जा और हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हुमा दो ऐसी हस्तियाँ दामने इस्लाम में आ गईं। जिन से इस्लाम और मुसलमानों के जाह- जलाल
और उनके इज्जत- इकबाल का परचम बहुत ही बुलन्द हो गया। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के चचाओं में हजरते हम्जा को आप से वालिहाना महब्बत थी। और वो सिर्फ दो तीन साल हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से उमर में ज्यादा थे। और चूंकि उन्होंने भी हज़रते सुवैबा रदियल्लाहु तआला अन्हा का दूध पिया था। इस लिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के रिजाई भाई भी थे। हज़रते हम्जा रदियल्लाहु तआला अन्हु बहुत ही ताक़तवर और बहादुर थे और शिकर के बहुत शौकीन थे। रोजाना सुबह सवेरे तीर कमान ले कर घर से निकल जाते और शाम को शिकार से वापस लौटकर हरम में जाते। खानए कबा का तवाफ़ करते और कुरैश के सरदारों की मजलिस में कुछ देर बैठा करते थे। एक दिन हस्बे मअमूल शिकार से वापस लौटे तो इब्ने जुदआन की लौंडी और खुद उनकी बहन हजरते बीबी सफीया रदियल्लाहु तआला अन्हा ने उन को बताया कि आज अबू जहल ने किस किस तरह तुम्हारे भतीजे हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ बे-अदबी और गुस्ताखी की है। ये सुनकर मारे गुस्से के हज़रते हम्ज़ा रदियल्लाहु तआला अन्हु का खून खौलने लगा। एक दम तीर
कमान लिए हुए मस्जिदे हराम में पहुंच गए और अपनी कमान से अबू जहल के सर पर इस ज़ोर से मारा कि उस का सर फट गया और कहा कि तू मेरे भतीजे को गालियाँ देता है? तुझे खबर नहीं कि मैं भी उसी के दीन पर हूँ। ये देखकर कबीलए बनी मख्जूम के कुछ लोग अबू जहल की मदद के लिए खड़े हो गए। तो अबू जहल ने ये सोच कर कि कहीं बनू हाशिम से जंग न छिड़ जाए ये कहा कि ऐ बनी मख्जूम! आप लोग हम्जा को छोड़ दीजिए। वाकेई आज मैंने उन के भतीजे को बहुत ही ख़राब किस्म की गालियाँ दी थीं ।(मदारिजुन नुबूव्वत जि.२ स ४४ व जरकानी जि. १ स.२५६)
हज़रते हम्जा रदियल्लाहु तआला अन्हु ने मुसलमान हो जाने के बाद ज़ोर ज़ोर से इन अशआर को पढ़ना शुरू कर दिया।
हमिद्तुल्लाहा हीना हदा फुवादी
इलल इस्लामि वहीनिल हनीफी मैं अल्लाह तआला की हम्द करता हूँ जिस वक्त कि उस ने मेरे दिल को इस्लाम और दीने हनीफ की तरफ़ हिदायत दी।
इजा तुलियत रसा-इलुहू अलैना
तहद्दरा दमओ ज़िल-लुब-बिल हसीफी जब अहकामे इस्लाम की हमारे सामने तिलावत की जाती है तो बा कमाल अक्ल वालों के आँसू जारी हो जाते हैं
व अहमदु मुस्तफन फ़ीना मुताउन
फला तग़शौहु बिल कौलिल अनीफी और खुदा के बरगुज़ीदा अहमद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमारे मुक्तदा हैं। तो (ऐ काफिरो!) अपनी बातिल बकवास से उन
पर गलबा मत हासिल करो।
फला वल्लाहि नुस-लिमुहू लि-कौमिन
व लम्मा नक-दि फीहिम बिस-सुयूफ़ि तो
खुदा की कसम हम उन्हें कौमे कुफ्फार के सिपुर्द नहीं करेंगे। हालाँकि अभी तक हम ने उन कुफ्फारों के साथ तलवारों से फैसला नहीं किया है। (जरकानी जि. १ स. २५६)
हज़रते उमर का इस्लाम
हज़रते हम्ज़ा रदियल्लाहु तआला अन्हु के इस्लाम लाने के बाद तीसरे ही दिन हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु भी दौलते इस्लाम से माला माल हो गए, आप के मुशर्रफ़ ब-इस्लाम होने के वाकिआत में बहुजत सी रिवायात हैं।
एक रिवायत है कि आप एक दिन गुस्से में भरे हुए नंगी तलवार ले कर इस इरादे से चले कि आज मैं इसी तलवार से पैगम्बरे इस्लाम का खात्मा कर दूंगा। इत्तफाक से रास्ते में हजरते नुम बिन अब्दुल्लाह कुरैशी रदियल्लाहु तआला अन्हु से मुलाकात हो गई। ये मसुलमानं हो चुके थे। मगर हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु को इन के इस्लाम की खबर नहीं थी। हजरते नुम बिन अब्दुल्लाह रदियल्लाहु तआला अन्हु ने पूछा कि क्यों? ऐ उमर! इस दोपहर की गर्मी में नंगीतलवार ले कर कहाँ चले? कहने लगे कि आज बानीए इस्लाम का फैसला करने के लिए घर से निकल पड़ा हूँ। उन्होंने कहा कि पहले अपने घर की खबर लो। तुम्हारी बहन फ़ातिमा बिन्तुल खत्ताब और तुम्हारे बहनोई “सईद बिन जैद’ भी तो मुसलमान हो गए हैं। ये सुन कर आप बहन के घर पहुंचे और दरवाजा खटखटाया। घर के अन्दर चन्द मुसलमान छुपकर कुरआन पढ़ रहे थे। हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु
की आवाज़ सुनकर सब लोग डर गए और कुरआन के औराक छोड़कर इधर उधर छुप गए। बहन ने उठकर दरवाजा खोला तो हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु चिल्लाकर बोले। कि ऐ अपनी जान की दुश्मन! क्या तू भी मुसलमान हो गई है? फिर अपने बहनोई हज़रते सईद बिन जैद रदियल्लाहु तआला अन्हु पर झपटे और उन की दाढ़ी पकड़ कर उनको जमीन पर पटख दिया। और सीने पर सवार हो कर मारने लगे। उनकी बहन फातिमा अपने शौहर को बचाने के लिए दौड़ पड़ी तो हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु ने उन को ऐसा तमांचा मारा कि उन के कान के झूमर टूटकर गिर पड़े और उनका चेहरा खून से लुहूलुहान हो गया। बहन ने साफ़ साफ़ कह दिया कि उमर! सुन लो तुम से जो हो सके कर लो। मगर अब इस्लाम दिल से नहीं निकल सकता। हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला. अन्हु ने बहन का खून आलूदा चेहरा देखा और उनका अज्म व इस्तिकामत से भरा हुआ ये जुम्ला सुना तो उन पर रिक्कत तारी हो गई और एक दम दिल नर्म पड़ गया थोड़ी देर तक खामोश खड़े रहे। फिर कहा कि अच्छा तुम लोग जो पढ़ रहे थे मुझे भी दिखाओ । बहन ने कुरआन के औराक को सामने रख दिया। उठाकर देखा तो इस आयत पर नज़र पड़ी कि RESenine
“सब्बहा लिल्लाहि मा फिस-समावाति वल-अर्दि व हुवल अजीजुल. हकीम” इस आयत का एक एक लफ्ज़ सदाकत की तासीर का तीर बनकर दिल की गहराई में पैवस्त होता चला गया। और जिस्म का एक एक बाल लरजा बरअन्दाम होने लगा। जब इस आयत पर पहुँचे कि “आमिनु बिल्लाहि व रसूलिही (हदीद) तो बिल्कुल ही बे काबू हो गए और बे इख्तियार पुकार उठे कि अश-हदु अंल-ला इलाहा
इल्लल्लाहु व अश-हदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह ये वो वक्त था कि हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हजरते अरकम बिन अरकम रदियल्लाहु तआला अन्हु के मकान में मुकीम थे। हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु बहने के घर से निकले। और सीधे हज़रते अरकम रदियल्लाहु तआला अन्हु के मकान पर पहुँचे तो दरवाज़ा बन्द पाया। कुंडी बजाई। अन्दर के लोगों ने दरवाजे की झरी से झाँकर देखा तो हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु नंगी तलवार लिए खड़े थे, लोग घबरा गए और किसी में दरवाजा खोलने की हिम्मत नहीं हुई। मगर हजरते हम्जा रदियल्लाहु तआला अन्हु ने बुलन्द आवाज से फरमाया कि दरवाजा खोल दो। और अन्दर आने दो अगर नेक नीय्यती के साथ आया है तो उस का खैर मकदम किया जाएगा वरना उसी की तलवार से उस की गर्दन उड़ा दी जाएगी। हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु ने कदम रखा तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने खुद आगे बढकर हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु का बाजू पकड़ा। और फरमाया कि ऐ खत्ताब के बेटे! तू मुसलमान हो जा। आखिर तू कब तक मुझ से लड़ता रहेगा? हजरते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु ने ब-आवाज बुलन्द कलिमा पढा। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मारे खुशी के नअए तकबीर बुलन्द फरमाया। और तमाम हाजिरीन ने इस ज़ोर से अल्लाहु अकबर का नअरा मारा कि मक्का की पहाड़ियाँ गूंज उठी। फिर हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु कहने लगे क या रसूलल्लाह! ये छुप छुप कर खुदा की इबादत करने के क्या मनी? उठिए हम कबा में चलकर अलल एलान खुदा की इबादत करेंगे। और
खुदा की कसम मैं
कसम मे कुफ्र में जिन जिन मजलिसों में बैठकर इस्लाम की मुखालफत करता रहा हूँ। मैं अब उन तमाम मजालिस में अपने इस्लाम का एलान करूँगा। फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम सहाबा
की हालत
की जमाअत को ले कर दो कतारों में रवाना हुए। एक सफ के आगे आगे हजरते हम्जा रदियल्लाहु तआला अन्हु चल रहे थे। और दूसरी सफ के आगे आगे हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु थे। इस शान से मस्जिदे हराम में दाखिल हुए और नमाज अदा की। और हजरते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु ने हरमे कबा में मुशरिकीन के सामने अपने इस्लाम का एलान किया। ये सुनते ही हर तरफ से कुफ्फार दौड़ पड़े और हजरते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु को मारने लगे। और हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु भी उन लोगों से लड़ने लगे। एक हंगामा बरपा होगया। इतने में हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु का मानूं अबू जहल आ गया। उस ने पूछा कि ये हंगामा कैसा है? लोगों ने बताया कि हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु मुसलमान हो गए हैं। इस लिए लोग बरहम हो कर उन पर हमला आवर हुए हैं। ये सुनकर अबू जहल ने हतीमे कबा में खड़े हो कर अपनी आस्तीन से इशारा कर के एअलान कर दिया कि मैं ने अपने भांजे उमर को पनाह दी अबू जहल का ये एलान सुनकर सब लोग हट गए। हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु का बयान है कि इस्लाम लाने के बाद मैं हमेशा कुफ्फारों को मारता और उनकी मार खाता था। यहाँ तक कि अल्लाह तआला ने इस्लाम को गालिब फरमा दिया। (जरकानी अलल मवाहिब जि.१ स.२७२)
हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु के मुसलमान होने का सबब ये भी बताया गया है कि खुद हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु फ़रमाया करते थे कि मैं कुफ्र की हालत में कुरैश के बुतों के पास हाज़िर था। इतने में एक शख्स गाय का एक बछड़ा ले कर आया। और उस को बुतों के नाम पर जिबह किया। फिर बड़े जोर से चीज मार कर किसी ने ये कहा कि “
: “या जलीहु अमरुन नजीहुन रजुलुन फसीहुन यकूलु ला इलाहा इल्लल्लाहु ये
आवाज़ सुनकर सब लोग वहाँ से भाग खड़े हुए लेकिन मैं ने ये अज्म कर लिया कि मैं इस आवाज देने वाले की तहकीक किए बिगैर हरगिज़ हरगिज यहाँ से नहीं टलँगा। इस के बगद फिर यही आवाज़ आई कि hystery
* “”या जलीहु अमरुन नजीहुन रजुलुन फ़सीहुन यकूलु ला इलाहा इल्लल्लाहु यानी ऐ खुली हुई दुश्मनी करने वाले! एक कामयाबी की चीज़ है। कि एक फसाहत वाला आदमी
“ला इलाहा इल्लल्लाह” कह रहा है हालाँकि बुतों के आस पास मेरे सिवा दूसरा कोई नहीं था। इस के फौरन ही बाद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी नुबूव्वत का एलान फ़रमाया। इस वाकिआ से हजरते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु बेहद मुतास्सिर थे। इस लिए उन के इस्लाम लाने के असबाब में से इस वाकिआ को भी कुछ न कुछ ज़रूर दखल है। (बुख़ार जि.५४६ व जरकानी जि. १ स.२७६ बाब इस्लामे उमर)
Imām Yūsuf b. Isma’īl b. Yūsuf b. Isma’īl al-Nabhānī was born in Ijzīm in 1849. In his formative years he studied the Holy Qur’ān with his father Imām Isma’īl al-Nabhānī, later travelling to al-Azhar University in Egypt to continue his studies for approximately 6 years.
He travelled thereafter learning the spiritual sciences stopping at spiritual centers across the Levantine. Gaining ijāzāt in numerous spiritual orders like Idrīsiyyah, Rafā`iyyah, Khalwatiyyah, Shādhiliyyah, Naqshbandiyyah and Qādiriyyah. He then found settlement in Beirut, Lebanon working as a Judge (Qāḍī).
He authored over 100 books upon many areas of religious sciences some of which are taught and studied by scholars and students alike.
To conclude, Imām Kattānī said “he was the [Imām] Būṣīrī of his time, eloquent poet, prolific author and a pearl of his time”. An individual who was truly a master of many sciences and marvellous scholar. The Imām passed away in Beirut in the beginning of Ramaḍān in 1931.
Abridged biography courtesy of Muhammad Ali Asghar and Sayyid Muhammad Samdani in Forty Divine Narrations
The Righteous Life and Blessed Works of the Poet of the Holy Prophet ! the Pious Erudite Sidi Shaykh Yusuf Al Nabhani (1265/1849-1350/1932) ” Al-Nabhānī wrote of himself in his first published book, al-Sharaf al-Mu’abbad li-Āli Muh.ammad ! (1309/1891), in Asbāb al-Ta’līf lil-‘Abdi al-D.a‘īf, and in Jāmi‘ Karāmāt al-Awliyā’ (both 1329/1911):
I am the faqīr Yūsuf ibn Ismā‘īl ibn Yūsuf ibn Ismā‘īl ibn Muh.ammad Nās.ir al -Dīn al-Nabhā nī. We go back to the Banū Nabhā n, an Arab desert folk who settled of old in the town of Ijzim1 North of the Holy sites in the land of Palestine, presently part of the district (qad.ā’) of H.aifa in ‘Akka, province of Beirut. I was born in Ijzim in 1265/1849 approximately.
I read the Qur’ān with my Master and father, the righteous Shaykh and meticulous memorizer of the Book of Allāh, Shaykh Ismā‘īl al-Nabhānī who is now [in 1891] past eighty, in full pos-session of his senses, of strong build and excellent health, and who spends most of his time in works of obedience.
My father’s daily devotion in every twenty-four hours was one third of the Qur’ān, then he would complete the Qur’ā n three times every week. The praise for this belongs to Allā h! #Say: In the bounty of Allāh and in His mercy: therein let them rejoice. It is better than what they hoard$ (10:58).
Then he sent me – Allāh save him and thank him on my behalf! – to Cairo for study. I entered the Mosque of al-Azhar the day of al-Sabt in early Muh.arram of the year 1283 [16 May 1866] and resided there until Rajab 1289 [October 1872]. During that time, I learnt all that Allāh destined for me to learn of the sciences of the Sharī‘a and its preparatory disciplines at the hands of the accomplished teachers and major established masters of the time, any one of whom, if he were found in a place, would be the leader of its people to the gardens of Paradise and would meet their requirements in all of the sciences – the spoken and the rational.
One of them, or rather their peerless leader was the accomplished, erudite teacher, the refuge of meticulous understanding, the Shaykh of all Shaykhs, Teacher of all Teachers, Sayyidī al-Shaykh Ibrā hīm al-Saqqā al-Shāfi‘ī who died in 1298 aged around ninety years. He spent his entire blessed long life reading lessons until most of the Ulema of our time became his students, either directly, or through an intermediary. I attended his classes – Allāh have mercy on him! – for three years and read with him the two commentaries – al-Tah.rīr and al- Manhaj – of Shaykh al-Islām Zakariyyā al-Ans.ārī together with their marginalia by al-Sharqāwī and al-Bujayrimī respectively.
Also among my teachers is the venerable erudite Scholar, Sayyid ī al-Shaykh al-Sayyid Muh.ammad al-Damanhūrī al-Shāfi‘ī who died in 1286 aged around ninety years.
Also the erudite Scholar Sayyidī al-Shaykh Ibrāhīm al-Zurrū al-Khalīlī al-Shāfi‘ī who died in 1287 aged around seventy.
Also the erudite Scholar Sayyidī al-Shaykh Ah.mad al-Ajhūrī al-D.arīr al-Shāfi‘ī who died in 1293 aged around sixty.
Also the erudite Scholar Sayyidī al-Shaykh H.asan al-‘Adawī al-Mālikī who died in 1298 aged around eighty.
128 kms. south of H.aifa, Palestine on the Southern edge of Mount Carmel, 100 meters above sea level.
Life and Works of al-Qād.ī Yūsuf al-Nabhānī 2
Also the erudite Scholar Sayyidī al-Shaykh al-Sayyid ‘Abd al-Hādī Najā al-Abyārī who died in 1305 aged just over seventy years. Also Shaykh Shams al-Dīn Muh.ammad al-Anbābī al-Shāfi‘ī the Master of al-Azhar Mosque, who died in 1313.
Also Shaykh ‘Abd al-Rah.mān al-Sharbīnī al-Shāfi‘ī the Master of al-Azhar Mosque, who died in 1326.
Also Shaykh ‘Abd al-Qā dir al-Rāfi‘ī al-H.anafī al-T.arabulsī the Master of the Damascenes’ Porch (Ruwāq al-Shawāmm) in al-Azhar Mosque, who died in 1323.
Also Shaykh Yūsuf al-Barqāwī al-H.anbalī the Master of the H.anbalīs’ Porch in al-Azhar Mosque.2
[And many others, some of whom are named in Hādī al-Murīd and Jāmi‘ Karāmāt al-Awliyā’.]
[After I graduated and returned home to Ijzim] I began to hold a number of religious courses in ‘Akka and my home town of Ijzim. Then I travelled frequently to Beirut, then Damascus where I met the eminent Ulema. Chief among them was the Jurist of Damascus at the time, our Master the erudite Imām, al- Sayyid al- Sharīf Mah.mūd Effendī H.amza – Allāh have mercy on him! – with whom I read the beginning of al-Bukhār ī’s S.ah.īh., after which he gave me a general certificate comprising the rest of the S.ah.īh. as well as all his other narrations and his own works. He wrote this long certificate in his superb style and handsome handwriting.
Then I headed for Constantinople twice and worked there for several years. I edited the periodical al-Jawā’ib until it folded. I also proofread the Arabic books that came out of its press. My monthly salary there was ten Līras for editing and proofreading. I worked on this for about two or three hours [daily] and did it on the insistant request of the paper’s owner, Ah.mad Effendī Fāris. He considered me his greatest blessing and showed great sadness at seeing me leave for my new position with the government [as a judge]. He offered me to work as his partner or a raise, but I refused.
I left Constantinople, the first time, for Iraq. I went to the district of Kawī S.anjaq in the province of Mosul. Then I returned to Constantinople. I left it a second time in 1300 when I was appointed head judge of al -Jaza’ court in al-Lā dhiqiyya on the Syro -Palestinian sea-shore. After living there for five years the Dawla – Allāh grant her victory! – transferred me to the head judgeship of the court of al-Qudus al-Sharīf. This took place through those at whose hands Allāh decreed goodness for me, without request nor prior knowledge on my part. Then, after less than a year – eight months to be precise – they promoted me, without request nor prior knowledge on my part, to the chief judgeship of the Beirut Court of Justice. This was in 1305/1888.3
After al-Nabhānī retired he turned entirely to writing and worshipping. He travelled to al-Madīna al-Munawwara and lived in the Noble Neighborhood for a while. Then he returned to Beirut where he passed on to the mercy of His Lord in the beginning of the month of Ramad.ān 1350/1932.
Bibliography of al-Qād.ī al-Nabhānī
Afd.alu al-S.alawāt ‘alā Sayyid al-Sādāt (“The Choicest Invocations of Blessings on the Master of Masters”) . Ah.san al-Wasā’il fī Naz.mi Asmā’i al-Nabiyyi al -Kāmil (“The Best Means in Versifying the Names of the Perfect Prophet !”), in three hundred verses, in print. The Qād.ī wrote a brief history of the compilations of the Prophetic Names in his introduction to his commentary on al-Jazūlī’s Dalā’il al-Khayrāt titled al-Dalālāt al-Wād.ih.āt in which he mentioned various recensions to date: Al-Qād.ī ‘Iyād.’s superlative masterpiece al-Shifā’ Al-Fākihānī’s al-Fajr al-Munīr Abū ‘Imrān al-Zanātī’s compendium (201 names) Al-Jazūlī’s devotional masterpiece Dalā ’il al-Khayrāt in which he relied on al-Zanātī Al-Suyūt.ī’s al-H.adā’iq fī Asmā’i Khayr al-Khalā’iq (300+ names) Al-Suyūt.ī’s al-Riyād. al-Anīqa fī Asmā’i Khayr al-Khalīqa listing sources for the H.adā’iq Al-Suyūt.ī’s al-Bahjat al-Saniyya (500 names) Al-Sakhāwī’s al-Qawl al-Badī‘ fil-S.alāt ‘alāl-H.abīb al-Shafī‘ (450 names)
2Al-Sharaf al-Mu’abbad li-Āli Muhammad ! (p. 140-142). 3Asbāb al-Ta’līf (p. 290, 332) and .Jāmi‘ Karāmāt al-Awliyā’ (2:52).