




Dushmane Ahle Bayt hone ki wajah se Allah Ta’aala Uski Ibadat ko Radd Farmakar use Yahudiyo ke Saath Uthayega.
📝Hadrat Jabir Bin Abdullah رضی اللہ تعالی عنهما riwayat Bayan Karte hain ke Rasool Allah Ne Hume Khutba Irshad Farmaya ,Aap صلی اللہ تعالی علیه وآله وسلم farma rahe they
من أبغضنا أھل البیت حشرہ اللہ یوم القیامته یهودیا. فقلت : یا رسول اللہ صلی اللہ تعالی علیه وآله وسلم! و ان صام و صلی؟ قال: و ان صام و صلی.
Ya’ani Jisne Hum Ahle Bayt ke Saath Bugz rakha to Roze Qayamat Uska Hashr Yahuduiyo ke saath hoga. Maine Arz kiya Ya Rasool Allah صلی اللہ تعالی علیه وآله وسلم! Agarche wo Roza rakhe aur Namaz bhi Padhe? Aap صلی اللہ تعالی علیه وآله وسلم ne Farmaya : Haa Agarche wo Roza rakhe aur Namaz bhi Padhe uske bawajud Dushmane Ahle Bayt hone ki wajah se Allah Ta’aala Uski Ibadat ko Radd Farmakar use Yahudiyo ke Saath Uthayega.
📚References:-
📚”Mu’jamal Awsat Jild 4 Hadeeth Number 4002″
📚”Majmuah Az-Zawaid Jild 9 Safah 172″
इमाम हसन अलैहिसलाम की शहादत पर मुआविया ने क्या कहा ??? गौर से पढीये और ज्यादा से ज्यादा share कीजिये।
सहाबी अल मिक़्दाम इबने मदिकारीब और एक दूसरा शख्श बनु असद से मुआविया से मिलने गए।
मुआविया ने अल मिक़्दाम से कहा “क्या तुम जानते हो की हसन इबने अली फौत हो चुके ??”
हज़रत मिक़्दाम ने कहा “इन्ना लिल्लाहे व इन्ना अलैहि राजिऊन”
जो की किसी भी मुसलमान के गुज़र जाने पर हम पढ़ ते है, ये तो फिर भी नवासा इ रसूल थे। पर मुआविया को ये बात पसंद न आयी
और मुआविया बोल पड़ा “क्या तुम हसन का मरना इस्लाम के लिए मुसीबत समाज ते हो ??”
हज़रात मिक़्दाम ने कहा “क्यों ना समझु जब की ये हकीकत है की अल्लाह के पैगम्बर हसन और हुसैन को अपनी गोद में रखते और कहते की हसन मुझ से है और हुसैन अली से”
अल्लाहु अकबर !!!! अल्लाहु अकबर !!!!
तब उसने कहा “वो तो आग का अंगारा था, जो अल्लाह ने बुझा दिया”
नऊज़ुबिल्लाह मीन ज़ालिक
तब हज़रात इ मिक़्दाम ने कहा आज मैं तुझे तेरी हकीकत बताऊंगा चाहे तुझे गुस्सा आये और वो बताऊंगा जो तुझे सुन न पसंद नहीं।
फिर कहा “मुआविया मैं सच बोलू तो सच बताना और जुठ बोलू तो जुठ, क्या तूने नहीं सुना की अल्लाह के पैगम्बर ने सोना पहन ने से मना फ़रमाया था????”
मुआविया ने कहा “हा”
फिर हज़रात इ मिक़्दाम ने कहा “तुझे अल्लाह की कसम, क्या नबी ने रेशम के कपडे पहन ने से मना नहीं फ़रमाया ???” मुआविया ने फिर कहा “हा”
फिर हज़रात इ मिक़्दाम ने कहा “तुझे अल्लाह की कसम, क्या नबी ने जानवर की खाल के कपडे पहन ने से और उस पर बैठना मना नहीं फ़रमाया ???” मुआविया ने फिर कहा “हा”
हज़रत मिक़दाम ने कहा “ये तीनो हराम काम तेरे घर में होते मैंने देखा है।”
फिर मुआविया ने हज़रत मिक़्दाम को 200 दिरहम दिए और कहा “मैं जानता हु तुम से नहीं बच सकता” हज़रत मिक़्दाम ने वो उसी वक़्त गरीबो में बाँट दिए।
अब आप खुद सोचिये, हुज़ूर सलल्लाहो अलैहिवसल्लम ने जो काम हराम कहा ऐसे तीन काम मुआविया के घर में हो रहे है और इमाम हसन की शहादत पर खुसी मन रहा है। ये कैसा सहाबी है ?????
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जब मुआविया को खबर मिली की अमीरुल मोमिनीन इमाम हसन इब्ने अली अलैहिस्सलाम शाहिद हो चुके हैं, उसने उची आवाज़ में तकबीर बुलंद की और शुक्र का सजदा किया।
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Yahi riwayat ke aur bhi hawale ehle sunnat ki kai aur moatbar kitabo me hay



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हज़रत शैख़ कुतुबउद्दीन मुहम्मद मदनी अल
कड़वी:-
आप का नाम मुहम्मद, अमीरे कबीर और कुतुबउद्दीन आपके अलक़ाब और कुन्नियत अबुल हसन है! आपके सन् विलादत के मुताल्लिक अलग अलग क़ौल पाए जाते हैं! लेकिन सही ये है कि आपकी विलादत सन् ५५१ (551) हिजरी में मदीना मुनव्वरा में हुई!
आपके वालिद माजिद शैख़ुल आलम इमामुल आईम्मा व असफ़िया हज़रत सैय्यद रशीदउद्दीन अहमद अल मदनी अल ग़ज़नवी रहमतुल्लाह अलैह हैं जो अपने इल्मी हल्क़ा के साथ सरज़मीने मदीना से बग़दाद तशरीफ़ लाएं! उस वक़्त बग़दाद में शैख़ मोहीउद्दीन अब्दुल क़ादिर गिलानी रहमतुल्लाह अलैह की ज़ात मर्ज ख़लायक बनी हुई थी! जिस वक़्त हुज़ूर ग़ौसे आज़म को शैख़ अहमद मदनी के आमद की ख़बर मिली उस वक़्त अपनी ख़ानकाह से निकल कर आपका ख़ैर मख़दम किया और आपको अपनी ख़ानकाह में ठहराया! हज़रत शैख़ रशीदउद्दीन अहमद मदनी और हज़रत शैख़ मोहीउद्दीन अब्दुल क़ादिर गिलानी सादात हसनी और औलाद अब्दुल्लाह अल महज़ हसनी हुसैनी अलैहिस्सलाम से हैं! हज़रत शैख़ मोहीउद्दीन अब्दुल क़ादिर गिलानी ने अपनी बड़ी हमशीरह बीबी उम्मे ज़ैनब को हज़रत शैख़ रशीदउद्दीन अहमद मदनी की ज़ौजियत में दे दिया जिन के बत्न से हज़रत शैख़ क़ुतुबउद्दीन मुहम्मद मदनी पैदा हुएं! चुनाँनचे हज़रत शैख़ क़ुतुबउद्दीन मुहम्मद मदनी की परवरिश इन्हीं जलीलुल कद्र उलेमा व औलिया के आग़ोशे रहमत व शफ़क़त में परवान चढ़ी और अवाएल में तालीमों तरबियत भी अपने वालिद शैख़ रशीदउद्दीन अहमद अल मदनी और अपने मामू शैख़ मोहीउद्दीन अब्दुल क़ादिर गिलानी से पाई और इनके विसाल के बाद शैख़ ज़ियाउद्दीन अबुनजीब सोहरवर्दि के सामने ज़ानु-ए-तलम्मुज़ हुएं लेकिन मुकम्मल तसकीन हज़रत शैख़ नज्मउद्दीन कुबरा रहमतुल्लाह अलैह से हासिल हुई और कुबराविया फ़िरदौसिया रंग आप पर ग़ालिब रहा चुनाँनचे हज़रत शैख़ नज्मउद्दीन कुबरा फ़िरदौसी रहमतुल्लाह अलैह ने आपको ख़िरका व ख़लाफ़त से सरफ़राज़ फ़रमाया!
हज़रत शैख़ क़ुतुबउद्दीन मुहम्मद मदनी रहमतुल्लाह अलैह वस्ल के इमाम, मक़ामे समदियत और सिद्दीक़ियत पर फ़ाएज़ ऐसे मक़बूल बारगाहे इलाही बुज़ुर्ग हैं कि ज़ाहिर और पोशीदा तामाम औलिया आपके हुज़ूर सरे ख़म तसलीम रखते हैं! आपको आपके वालिद हज़रत शैख़ रशीदउद्दीन अहमद मदनी और आपके मामू हज़रत शैख़ मोहीउद्दीन अब्दुल क़ादिर गिलानी से आबाई बैअत व ख़लाफ़त और सज्जादा हज़रत इमाम हसन असकरी अलैहिस्सलाम भी हासिल है! इन तमाम ऐज़ाज़ो इकराम के अलावा आप ग़ाज़ी व फ़ातेह मारकाए हिंद भी हैं! आपको हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के बारगाह से फ़तेह व नुसरत, फ़रोग़ दीने हक़ और हिंदल वली होने की बशारत भी हासिल हुई! आपसे जारी होने वाला सिलसिला कुबराविया कबीरिया क़ुतबिया कहलाया और हिंद व सिंध में फैल गया लेकिन इस सिलसिले के मशाऐख़उज़ाम बेमिस्ल सिफ़अतों के हामिल होने के बावजूद अम्र मख़फ़ी के तहत पसे पर्दा रहें (इस मौज़ू पर मज़ीद मालूमात के लिए फ़कीर की तसनीफ़ “चिराग़ ख़िज़्र” का मुताला करें)!
जैसा कि ऊपर ज़िक्र हो चुका है कि हज़रत शैख़ क़ुतुबउद्दीन मुहम्मद मदनी रहमतुल्लाह अलैह को हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम के जानिब से हिंदुस्तान जाने का हुक्म और फ़तेह की बशारत मिली जिसके तहत आप मदीना मुनव्वरा से अपने तीनों शहजादों और तमाम मुरीदों के हमराह बग़दाद व ग़ज़नी होते हुए हिंदुस्तान तशरीफ़ लाएं और सरज़मीने दिल्ली पहुँचे जहाँ सुल्तान क़ुतुबउद्दीन ऐबक़ की हुकूमत थी जिसने आपकी आमद पर आपके हुरमत व तौक़ीर के ख़ातिर आपकी राहों में अपनी पलकें बिछा दिया और आपके दस्त हक़ परस्त पर बैअत होकर आपके हल्क़ा ए इरादत में शामिल हो गया! दिल्ली से होते हुऐ आप अपने फरज़न्दों व मुरीदों कि जिसमें कुतुबउद्दीन ऐबक भी शामिल था और उसके तमाम फौजी लशकरों के साथ राजा जय चँद राठौर पर हमलावर हुएं जिसकी हुकूमत हिन्दुस्तान के मरकज़ कन्नौज व कड़ा पर थी और जिसके हुकूमत की हद् बनारस तक थी! लिहाज़ा आपने बशारते नबवी के तहत राजा जय चँद राठौर के तमाम छोटे बड़े हुकूमती इलाकों को फतेह करते हुए पाये तख़्त “कन्नौज” को भी फतेह कर लिया और फिर उसके दारूल सल्तनत (राजधानी) “कड़ा” पर हमलावर होकर उसे अपनी हुकूमत में शामिल करके परचम इस्लाम को बुलन्द किया और इस बशारते नबवी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को भी पूरा कर दिया “कि सरज़मींने हिंद पर इस्लाम का परचम मेरे फ़रज़न्द क़ुतुबउद्दीन के हाथों फैरेगा”!
हज़रत शैख़ क़ुतुबउद्दीन मुहम्मद मदनी रहमतुल्लाह अलैह ने सरज़मीने कड़ा में फ़रोग़ उलूम दीन के लिए हिंदुस्तान की सबसे पहली दर्सगाह व ख़ानकाह की संग बुनियाद रखी जिससे हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ये भी बशारत पूरी हुई “कि हिंदुस्तान में इस्लाम की इशाअत मेरे फ़रज़न्द क़ुतुबउद्दीन पर मुनहसिर है”!
हिंदल वली हज़रत शैख़ क़ुतुबउद्दीन मुहम्मद मदनी अल कड़वी रहमतुल्लाह अलैह और हिंदल वली शैख़ मोईनउद्दीन संजरी अजमेरी रहमतुल्लाह अलैह एक ही वक़्त में हिंदुस्तान तशरीफ़ लाने वाले, सरकार अलैहिस्सलाम से हिंदल वली की बशारत पाने वाले, शैख़ नज्मउद्दीन कुबरा फ़िरदौसी से फ़ैज़याफ़्ता, हुज़ूर ग़ौसे आज़म के भांजे और आपस में ख़लेरे भाई लगते थें!
किताब “तबक़ात नासरी” में हैं कि हज़रत शैख़ क़ुतुबउद्दीन मुहम्मद मदनी अल कड़वी रहमतुल्लाह अलैह सुल्तान बहराम शाह बिन सुल्तान अलतमश के अहदे हुकूमत सन् ६३७ (637) हिजरी में देहली के शैख़ुल इस्लाम के मंसब पर फ़ाएज़ हुएं और सुल्तान नासिरउद्दीन महमूद के अहदे हुकूमत सन् ६५३ (653) हिजरी में सुबुग्दोश हुएं!
हज़रत शैख़ क़ुतुबउद्दीन मुहम्मद मदनी रहमतुल्लाह अलैह का विसाल सन् ६७७ (677) हिजरी में सर ज़मीने “कड़ा” पर हुआ और वहीं आपका मज़ार मुबारक मर्ज ख़लायक ख़ासो आम है!
आपसे सिलसिला फ़िरदौसिया का कुबराविया कबीरिया क़ुतबिया सिलसिला आगे बढ़ा!
सिलसिला व ख़ानदान कुबराविया कबीरिया क़ुतबिया से इस कसरत से जलीलुल क़द्र औलिया का ज़हूर हुआ कि दूसरे सिलसिला व ख़ानदान में ढूंढने से न मिलेगा जैसे-




Sajjadanashen Mir Qutubuddin Muhammad al Hasani urf Aquib Miyan