मुरीद 2 तरह के होते हैं

मुरीद 2 तरह के होते हैं:-

  1. वो जो ना-अहल हैं।
  2. जो अहल हैं।
  3. ना-अहल मुरीद वो हैं जिन्हें मालूम ही नहीं हैं कि वो मुरीद होकर क्या करेंगे?, मुरीद क्यों होना चाहिए?, वगैरह।

ये इसलिए मुरीद हो जाते हैं कि इनके वालिदैन मुरीद हैं।

या इसलिए मुरीद होते हैं कि इनके दोस्त किसी पीर से मुरीद हैं।

या इसलिए कि इनके यहाँ कोई जलसा हुआ और वहाँ एलाने हुआ कि फलां बड़ी शख़्सियत तशरीफ़ ला रही है जिसे मुरीद होना हो हो जाये।

इन्हें इसके अलावा और कुछ मालूम नहीं होता है। ये शायद ये भी सोच रखते हैं कि इनकी बख़्शिश का सामान हो जाएगा।
ये वो हैं जो पीरी-मुरीदी की अस्ल रूह को नहीं पहचानते हैं।

  1. अहल मुरीद वो होते हैं जिन्हें अल्लाह की हिदायत मिलती है और वो अपने रब को पाने का इरादा करता है। इस इरादे को ही मुराद कहते हैं और इरादा करने वाले को मुरीद कहते हैं। जो अल्लाह को पाने का इरादा करता है उसे अल्लाह का मुरीद कहते हैं और दुनियावी तौर पर बात करें तो जो इस दुनिया को पाने का इरादा करता है उसे दुनिया का मुरीद कहते हैं।

जो अल्लाह का मुरीद होता है वो अल्लाह को पाने की हर उस राह पर चलने की कोशिश करता है जिससे वो अल्लाह के और करीब होता चला जाये।

हदीसे पाक़ में है कि मेरा बन्दा नवाफ़िल के ज़रिए मुझसे क़रीब होता है। लिहाज़ा अल्लाह ने जो उसपे फ़र्ज़ किया है उसकी अदायगी के बाद वो नवाफ़िल की तरफ़ मज़ीद गामज़न होता है ताकि वो अल्लाह के क़ुर्ब को पा सके।

बंदा इस्लाम के 5 अहकाम (कलिमा, नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज) को जब पूरा करता है तो वो मुस्लिम बनता है। इसको इस्लाम लाना कहते हैं।

और जब ये शख़्स इस्लाम की इस रूह को पा ले तो ये ईमान को अपने दिल में उतार लेता है तब इस बंदे को मोमिन कहते हैं।

अब इस मोमिन के मरहले से वो शख़्स मज़ीद ऊपर उठना चाहता है और अपने रब का क़ुर्ब मज़ीद हासिल करना चाहता है और मुस्लिम से मोमिन और मोमिन से मोहसिन के दर्जे पर अपने रूहानी सफ़र का आग़ाज़ करता है तो उसे एक पीरो-मुर्शिद की ज़रूरत होती है क्योंकि शैतान नहीं चाहता है कि बंदा अल्लाह का क़ुर्ब हासिल करे इसलिए जब वो मुस्लिम के दर्जे पर होता है तो शैतान उसे नमाज़ में दुनिया के वस-वसे डालता है, और जब मोमिन के दरजे पर पहुँचता है तो नफ़्स के वस-वसे डालता है और जब बंदा मोमिन से मोहसिन के सफ़र पर चल पड़ता है तो शैतान के हमले मज़ीद खतरनाक हो जाते है और वो इसमें विलायत के वस-वसे डालना शुरू करता है, ये इतने ख़तरनाक वस-वसे होते हैं कि बन्दे को शैतान उसके कान में खुसपुसता है कि तू अब विलायत के दर्जे पर आ गया है और अब तुझे तेरे रब का वो क़ुर्ब हासिल हो गया है कि अब तुझे ना नमाज़ पढ़ने की ज़रूरत है, ना रोज़े रखने की ज़रूरत है और ना किसी इस्लामी फ़राइज़ की ज़रूरत है तू इन सभी से ऊपर उठ चुका है। अगर इस शैतान के हमले का बंदा शिकार हो जाये तो उसका ईमान ही ख़तरे में पड़ जाता है।

इसलिए हमारे बुजुर्गाने-दीन फ़रमाते हैं कि बिल-खुसूस इस मोमिन से मोहसिन की राह पर बन्दा तन्हा ना चले क्योंकि शैतान के हमलों का वो अकेला सामना नहीं कर सकेगा और उसके ईमान का ख़तरा सामने आ जाएगा, इसलिए ऐसे शख़्स को हिदायत दी गयी है कि इस राह पर चलने के लिए वो अपने लिए एक पीरे-क़ामिल की तलाश करे और उससे बैअत हो जाये ताकि जब भी शैतान का हमला हो तो पीर उसे शैतान के इस हमले से बचा ले और वो मोहसिन की राह की तरह ब-खैर चलता रहे।

इसलिए कहते हैं कि जिसका कोई पीर नहीं, उसका पीर शैतान होता है।

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