हाज़िर वा नाज़िर

हाज़िर वा नाज़िर

हाज़िर के लुग़वी माना हैं मौजूद जानने वाला और नाज़िर के माना हैं देखने वाला और गौर करने वाला। और अल्लामा शामी रहमतऊल्लाही तआला अलै फरमाते है कि हाज़िर होना जानने के माना में मशहूर है और नाज़िर होना देखने के माना में है।

📙( रददुल मुह़तार जिल्द :03, सफहा :307)

और शरीअ़त की ज़बान में हाज़िर नाज़िर के माना हैं। सारी दुनिया को देखना और दूर वा नज़दीक की आवाज़ो को सुनना। या थोड़े से वक़्त में दुनिया भर की सैर कर लेना और एक आन में रुहानी या जिस्म मिसाली के साथ सैंकड़ो किलोमीटर की दूरी पर मदद के लिए पहुंच जाना। अल्लाह के महबूब बन्दों का हाज़िर वा नाज़िर होना हक़ है हुज़ूर सय्यदे आलम सल्लललाहो अलैहि वसल्लम और बड़े बड़े उलमा - ए- किराम वा बुजुर्गोंने दीन का यही अक़ीदा है।

हदीस शरीफ से सुबूत मुलाहज़ा हो।

हदीस शरीफ : हज़रत अनस रज़ीअल्लाहु तआला अन्हो से रिवायत है कि उन्होंने फरमाया कि नबी करीम सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रत ज़ैद हज़रत जाफ़र और हज़रत इब्ने रवाहा रज़ीअल्लाहु तआला अन्हुम की शाहादत की ख़बर आने से पहले, उन लोगों के शहीद हो जाने की ख़बर देते हुए फरमाया कि ज़ैद ने झंडा हाथ मे लिया और शहीद किये गये फिर जाफ़र ने झंडा को संभाला और वह भी शहीद हुए। फिर इब्ने रवाहा ने झंडे को हाथ मे लिया और वह भी शहीद किये गये। आप यह वाक़िआ बयान फ़रमा रहे थे और आँखों से आँसू जारी थे। फिर आप ने फरमाया अब झंड़े को उस शख्स ने लिया जो खुदा ए तआला की तलवारों में से एक तलवार है यानी खालीद बिन वलीद ने यहाँ तक कि अल्लाह तआला ने मुसलमानों को फ़तह अ़ता फ़रमाई।

📙 ( बुखारी शरीफ जिल्द :02,सफहा : 611)

इस हदीस शरीफ से मालूम हुआ कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का अपने बारे में यह अक़ीदा है कि मैं हाज़िर वा नाज़िर हूं। इसलिए जंग मोता जो मुल्के शाम में हो रही है मदीने मुनव्वरा ही से उसके सारे वाक़िआत को जानता हूँ और देखता भी हूं।

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