तारीख कुछ यूं है

*🇹🇷तारीख कुछ यूं है🌍*

*अरब शरीफ में 1922 तक तुर्की की हुकूमत थी जिसे ख़िलाफ़ते उस्मानिया के नाम से जाना जाता था 1922 से पहले सऊदी अरब का नाम सऊदी अरब नहीं बल्कि हिजाज़े मुक़द्दस था खिलाफ़ते उस्मानिया दुनियां के 3 बर्रे आज़मो पे 623 साल 1299 से 1922 तक क़ायम रही*
जब भी दुनियां में मुसलमानों पे ज़ुल्मो सितम होता तो तुर्की की हुकूमत इसका मुहं तोड़ जवाब देती अमरीका बरतानिया यूरोपियन नसरानी यहूदियों को अगर सबसे ज़्यादा खौफ था तो वो खिलाफ़ते उस्मानिया हुकुमत का था अमेरिका यूरोप जैसों को मालुम था के जब तक खिलाफ़ते उस्मानिया है हम मुसलमानो का कुछ नही बिगाड़ सकते अमरीका यूरोप ने खिलाफ़ते उस्मानिया को खत्म करने की साज़िश शुरू की 19वीं सदी में सल्तनते उस्मानिया और तुर्की के दरमियान बहुत सी जंगे भी हुईं
चूंके मक्का और मदीना मुसलमानो के नज़दीक क़ाबिले अहतराम हैं इस लिए उसने सबसे पहले फितना वहीं से शुरू किया अमरीका यूरोप ने सबसे पहले 1 शख्स को खड़ा किया जो इसाई था ऐसी अरबी ज़बान बोलता था के किसी को उस पर शक तक नही आया उसने अरब के लोगों को खिलाफ़ते उस्मानिया के खिलाफ ये कह कर गुमाराह करने की नाकाम कोशिश की के तुम तो अरबी हो और ये तुर्की अजमी ( ग़ैर अरबी ) हैं हम अजमी की हुकूमत को कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं पर लोगों ने उसकी 1 न मानी ये शख्स लॉरेंस ऑफ अरबिया के नाम से मशहूर हुआ आप लॉरेंस ऑफ अरबिया गूगल पे सर्च कर सकते हैं

फिर अमरीका ने 1 शख्स को खड़ा किया जिसका इब्ने अब्दुल वहाब नज्दी था इब्ने अब्दुल वहाब नज्दी की मुलाकात अरब के 1 सौदागर से हुई जिसका नाम इब्ने सऊद था इसने इब्ने सऊद को अरब का हुक्मरान बनाने का लालच दिया फिर इब्ने सऊद ने मक्का मदीना और ताइफ में तुर्की के खिलाफ जंग शुरू कर दी मक्का मदीना शरीफ और ताइफ के लाखो मुस्लमान इब्ने सऊद की डाकू फौज के हांथो शहीद हुए जब तुर्की ने देखा इब्ने सऊद हमे अरब से निकलने और खुद अरब पे हुकुमत करने के लिए मक्का मदीना और ताइफ के बेकुसूर मुसलमानों को क़त्ल कर रहा है तब तुर्की ने आलमी तौर पे ये एलान कर दिया हम इस पाक सर ज़मीन पे क़त्लो ग़ारत पसन्द नहीं करते इसी वजा से ख़िलाफ़ते उस्मानिया को खत्म कर दिया गया

जिसकी वजा से 40 नए मुल्क वजूद में आए फिर अरब के मुसलमानो का ज़वाल शुरू हुआ हिजाज़े मुक़द्दस का नाम 1400 साल की तारीख में पहली बार बदला गया इब्ने सऊद ने हिजाज़े मुक़द्दस का नाम अपने नाम पे सऊदिया रख दिया

और इस फितने का ज़िक्र हदीस में भी मिलता है इसी वजा से अल्लाहः के प्यारे पैगम्बर ने नज्द के लिए दुआ नहीं फरमाई थी इसी नज्द में इब्ने अब्दुल वहाब नज्दी पैदा हुआ जिससे अंग्रेज़ो ने 1 नए मज़हब की बुनियाद डलवाई और यही शहर मुस्लिमा कज़्ज़ाब की जाए पैदाइश भी है
लेकिन दुनिया भर के मुसलमानों की आंखों में धूल झोंकने के लिए अंग्रेज़ो ने इसका नाम भी तब्दील कर के रियाद रख दिया जो आज कल सऊदिया का दारुल हुकुमत भी है जन्नतुल बकी और जन्नतुल मुअल्ला में सहाबा और अहले बैत अलैहिम रिदबान के मज़ारात पे बुलडोजर चलाया गया और इन तमाम की क़ब्रो की बेहुरमती कर के उन्हें मटिया मेट कर दिया गया बद किस्मती से कई मुस्लमान इन्ही क़ब्रो को सुन्नत के मुताबिक समझते हैं हालांके 1922 से पहले वो ऐसी न थीं

हरम शरीफ के जिन दरवाज़ों के नाम साहाबा और अहले बैत के नाम पर थे उन्हें आले सऊद के नाम पर रखा गया अब ये सारी मालूमात इन्टरनेट के अलावा तमाम
तारीख की किताबो में भी पड़ी जा सकती है

अंग्रेज़ो ने अपनी इस साज़िश की कामयाबी पर 1962 में हॉलीवुड में Lawrence off Arabia के नाम फ़िल्म भी बनाई जो बहुत ज़्यादा बार देखी जा चुकी है
यहूदो नसारा को अरब में आने की इजाज़त मिल गई जिस दिन इब्ने सऊद अरब का बादशाह बना उस दिन एक जश्न हुआ उस जश्न में अमरीका बरतानिया और दूसरे मुल्कों के प्राइम मिनिस्टर इब्ने सऊद को मुबारकबाद देने पहुँचे
जिस अरब के नाम से यहूदो नसारा कांपते थे वो सऊदिया अमरीका के इशारे पे नाचने लगा और आज भी रिंदो के साथ नाच रहा है

यहूदो नसारा की इस नापाक साज़िश का ज़िक्र करते हुए dr इक़बाल ने अपने कलाम में लिखा है

वो फ़ाक़ा कश मौत से डरता नहीं ज़रा
रूहे मुहम्मद ﷺ उसके सीने से निकाल दो
फिकरे अरब को देकर फरंगी तख्य्युलात
इस्लाम को हिजाज़ और यमन से निकाल दो

अल्लाहः तआला मुसलमानो को ऐसे फ़ितनों से बचा कर फिर से खिलाफत दौलत की अता फरमाऐ और हमे माज़ी के तल्ख हक़ाइक को समझने की तौफीक़ बख्शे

*🌹आमीन या रब्बुल अलामीन*

Sone ki Sunnatein

⭐Mai So Jau Ya_* *_Mustafa ﷺ_*
*_Kahte Kahte_*

*_Khule Aankh Salle Ala ﷺ Kahte Kahte_*
*👇🏻सोते वक़्त पढ़ने की दुआ 👇🏻*

*🍂ﺑِﺴْــــــــــــــــﻢِﷲِﺍﻟﺮَّﺣْﻤَﻦِﺍلرَّﺣِﻴﻢ🍃*
*🌹अल्लाहुम्मा बिस्मिका अमूतु व आहया🌹*

*⭐🌻🌹तर्जुमा🌹🌻⭐*

*🌹इलाही अजजवजल मै तेरे नाम पर मरता हूँ और जीता हूँ*

*🌟الصــلوة والسلام عليك يارسول الله ﷺ*

*❤Sone ki Sunnatein❤*

*1) Isha ke baad jaldi sone ki fikr karna, duniya ki baat na karna.*
*📩(Bukhari: 599)📩*

*2) Sone se pehle kapde tabdeel karna.*
*📩(Subulul Huda Warrashaad: 7/359)📩*

*3) Ba Wuzu sona.*
*📩(Bukhari: 6311)📩*

*4) Teen martaba bistar jhaad kar sona. (Bukhari: 7393)*

*5) Teen teen salaai surma lagaana.*
*📩(Tirmizi: 2048)📩*

*6) Teen martaba istigfaar (ﷺ) “Astagfirullaahal ‘azeemallazee laa ilaaha illaa huwal haiyyul qaiyyoomu wa atoobu ilaih” padhna.*
*📩(Tirmizi: 3397)📩*

*7) Tasbeeh-e-Faatimi Subhanallah 33 martaba, Alhamdulillah 33 martaba, Allahu akbar 34 martaba padhna.*
*📩(Bukhari: 5361)📩*

*8) Sura-e-Ikhlaas, Sura-e-Falaq aur Sura-e-Naas padhna.*
*📩(Bukhari: 5017)📩*

*9) Daahni karwat qibla rukh let kar haath rukhsaar (gaal) ke neeche rakhna.*
*📩(Bukhari: 4774, Musnad-e-Abi Ya’ala: 4774)📩*

*10) Pet ke bal aundha na letna.*
*📩(Bukhari: 2768)📩*

*11) Sone ki dua “Allahumma bismika amootu wa ahyaa” padhna.*
*📩(Bukhari: 6314)📩*

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*🌤👇🏻 sᴜʙᴀʜ ᴋᴏ ʙᴇᴅᴀʀ ʜᴏᴛᴇ ᴡᴀǫᴛ ᴋɪ ᴅᴜᴀ👇🏻*

*“`🌹🌟Alhamduw lillahil-lazi ‘ahyana baada ma amatana wailayhin-nushur🌟🌹_*“`

*🌹🍥अल्हम्दु लिल्लाहिल लजी अह-यना बा’अदा मा अमातना व इलैहि नुशूर..☘*

*🔮🌼 الْحَمْدُ للهِ الَّذِي أَحْيَانَا بَعْدَ مَا أَمَاتَنَا وَإِلَيْهِ النُّشُورُ💎🌹*

रस्म-ए-मिक़राज़-रानी

पहले चिश्ती ख़ानक़ाहों में मुरीदों के बाल काटने की परंपरा थी जो हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के समय तक थी . राहत उल क़ुलूब में इस बात का ज़िक्र आता है. उस का उदाहरण हम आगे देखेंगे पहले निज़ामी बंसरी से यह वाक़या देखते हैं –

हरदेव ने ख़्वाजा सैयद मुहम्मद से पूछा – हज़रत ने उस दुकानदार के कुछ बाल काट दिए थे जब वह मुरीद बना था .
ख़्वाजा सैयद मुहम्मद ने फ़रमाया –
इसे मिक़राज़ रानी कहते हैं .वह लोग जिन्हें ख़िलाफ़त दी जाती है उनका सर मुंडवाया जाता है और जिन्हें बैत किया जाता है उनके कुछ बाल काटे जाते हैं .

इसका वर्णन राहत उल क़ुलूब में यूँ आता है –

रस्म-ए-मिक़राज़-रानी

क़ैंची चलाने के मुतअल्लिक़ मशाइख़ में इख़्तिलाफ़ है। बा’ज़ कहते हैं कि तकबीर पढ़ते वक़्त नफ़्स-ए-अम्मारा की तरफ़ मु-तवज्जिह हो और समझे कि आज इस से जंग करनी है। तीसरी तकबीर से फ़ारिग़ हो कर एक-बार कलिमा-ए-तौहीद और बीस दफ़अ’ दुरूद शरीफ़ और एक दफ़अ’ इस्तिग़फ़ार पढ़े। जब सब कुछ हो चुके तो एक बाल मुरीद की पेशानी से ले ले और कहे- बादशाहों के बादशाह ! तेरी दरगाह से भागा हुआ ग़ुलाम फिर तेरे हुज़ूर में आया है और चाहता है कि तेरी इबादत करे और जो कुछ मा-सिवा है उस से बेगाना हो जाए। उस के बा’द एक बाल पेशानी की दाएँ तरफ़ से और एक बाएँ तरफ़ से कतरे।

दूसरा गिरोह कहता है कि सिर्फ़ एक बाल पेशानी से ले ले ज़्यादा की ज़रूरत नहीं। हसन बसरी अमीरुल मोमिनीन अ’ली रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं कि एक ही बाल लेना बेहतर है। हज़रत अ’ली अहल-ए-सुफ़्फ़ा के ख़लीफ़ा हैं और ये हदीस उन की शान में आई है। अना मदी-नतुल इल्मि व अ’लीयुन बाबुहा।

इस के बा’द दुआ-गो ने अ’र्ज़ किया कि हुज़ूर ये क़ैंची चलाने की रस्म कहाँ से पैदा हुई ? फ़रमाया इब्रहीम अलैहिस-सलाम से (सलवातुल्लाहि अलैहि व अ’ला नबियीना) और उन्हें तल्क़ीन किया था जिबरईल अलैहिस-सलाम ने।

फिर इसी के मु-तअल्लिक़ इरशाद फ़रमाया। एक दिन हबीब अ’जमी और हसन बसरी दोनों बैठे हुए थे, कोई शख़्स आया और बोला कि मैं फुलाँ फुलाँ का मुरीद हूँ। आप ने पूछा, तुम्हारे पीर ने तुम्हें क्या ता’लीम दी है ? उस ने कहा मेरे पीर ने बाल तो कतरे थे बाक़ी ता’लीम वग़ैरा कुछ नहीं दी। दोनों बुज़ुर्गों ने चिल्ला कर कहा हु-व मुज़िल्लुन व ज़ाल्लुन या’नी वो ख़ुद भी गुमराह है और औरों को भी गुमराह करता है।

इस वाक़िए से मा’लूम हुआ कि पीर को चाहिए कि मुरीद करने से पहले मुरीद को जांच ले। इस के बाद शैख़ुल-इस्लाम (बाबा फ़रीद ) ने तमाम हाज़िरीन से ख़िताब किया कि शैख़ ऐसा होना चाहिए कि जब कोई उस के पास ब-नीयत-ए-इरादत आए तो नूर-ए-मारिफ़त की नज़र से इरादत-मन्द के सीने को सैक़ल करे ताकि उस में किसी क़िस्म की कुदूरत बाक़ी ना रहे और वो मानिंद आईने के रौशन हो जाए।अगर ये क़ुव्वत नहीं है तो मुरीद ना करे क्योंकि इस से बेचारे गुमराह को क्या होगा।