61 Names of Sayyidina Hazrat Ali (Alayhis Salaam)

1 Names of Sayyidina Hazrat Ali (Alayhis Salaam) 😍

1: Wali Ullah ✋

2: Asad Ullah Al Ghaalib ✋

3: Yad Ullah ✋

4: Ayen Ullah ✋

5: Hizb Ullah ✋

6: Lisaan Ullah ✋

7: Khalifa-t Ullah ✋

8: Nafs e Rasool ✋

9: Kul e Imaan ✋

10: Mola e Kainaat ✋

11: Panjtani ✋

12: Lashkar e Khuda ✋

13: Haider e Karaar ✋

14: Naashir e Fuzto Birabbil Kaa’ba ✋

15: Abal Hasnayn ✋

16: Shauhar e Zahraa ✋

17: Al-Murtazaa ✋

18: Abu Turab ✋

19: Imaam ul Aa’ima ✋

20: Baab-ul-Madina Tul ILM ✋

21: Shah e Najaf ✋

22: Sahib e Zulfiqaar ✋

23: Ameer ul Mo’mineen ✋

24: Khalifa e Raabay

25: Mazhar al Ajaaib ✋

26: Sayyid us Saadaat ✋

27: Sultan ul Auliya ✋

28 Sultan ul Asfiya wal Atqiya ✋

29: Imaam ul Muttaqeen ✋

30: Noor e Nabi ✋

31: Akhi e Mustafa ✋

32: Ibn e Abi Talib ✋

33: Mushkil Kushaa ✋

34: Baab ul Hawaaij ✋

35: Faateh e Khyber ✋

36: Qaatil e Marhab ✋

37: Imam e Mashariq o Magharib ✋

38: Kaatib e Wahi ✋

39: Qur’an e Naatiq ✋

40: Dastgeer e Aghyaas Wa Aqtaab ✋

41: Molood e Ka’aba ✋

42: Shah e Mardaan ✋

43: Raees ush Shuja’aan ✋

44: Hashmi ✋

45: Qurayshi ✋

46: Ma’ al Haq ✋

47: Alamdaar ✋

48: Faqeeh ✋

49: Aalim e Kitaab ✋

50: Mufassir ul Injeel ✋

51: Zahid ✋

52: Aabid ✋

53: Jameel ✋

54: Khattaat ✋

55: Jaan e Jahaan ✋

56: Tahir ✋

57: Waris ✋

58: Khateeb ✋

59: Faseeh o Baleegh ✋

60: Misbah ul Quloob ✋

61: Shaheed e Kufa ✋

🌹 Assalaat-o-Wassalaam-o-Alaa Muhammad Wa’Aali Muhammad 🌹

🌹 Assalaat-o-Wassalamu Alaika Yaa Ali Ibn Abi Talib 🌹

हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) के कथन (101 – 114)

हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) के कथन (101 – 114)

101

दूसरों की मदद तीन बातों के बिना पायदार नहीं होतीः उसे छोटा समझा जाए ताकि वो बड़ी क़रार पाए, उस को छुपाया जाए ताकि वो लोगों को मालूम हो जाए और उस में जल्दी की जाए ताकि वो अच्छी लगे।

102

एक ज़माना ऐसा भी आए गा कि जब लोगों की बुराइयाँ चुनने वालों के अलावा किसी का महत्व न होगा, व्याभिचारी के अलावा कोई सभ्य नहीं समझा जाएगा, न्यायप्रिय व्यक्ति के अलावा किसी को कमज़ोर नहीं समझा जाएगा, अल्लाह की इबादत लोगों पर अपनी बड़ाई जताने के लिए होगी। ऐसे ज़माने में हुकूमत का कारोबार स्त्रियों से परामर्श, नवयुवकों की कोशिशों और ख़्वाजा सराओं की तिकड़मों के आधार पर चलेगा।

103

लोगों ने आप (अ.स.) के बदन पर पुराने और पेवन्द लगे कपड़े देखे। आप (अ.स.) से जब इस का कारण पूछा गया तो आप (अ.स.) ने फ़रमायाः इस से ह्रदय सुशील व मन नियंत्रित हो जाता है और मोमिन लोग उस का अनुसरण भी कर सकते हैं। याद रखो कि लोक व परलोक एक दूसरे के सख़्त दुश्मन हैं और एक दूसरे के विपरीत रास्ते हैं। जो दुनिया से मुहब्बत करेगा और उस से दिल लगाए गा वह परलोक को पसंद नहीं करेगा और उस से दुश्मनी रखेगा। लोक व परलोक पूरब और पश्चिम की तरह हैं और जो भी इन दोनों के बीच चलता है जब एक के निकट होता है तो दूसरे से दूर हो जाता है। इन दोनों के बीच वही रिश्ता है जो दो सौतनों के बीच होता है।

104

नौफ़ बिन फ़ज़ाला बकाली कहते हैं कि एक रात मैंने अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) को देखा कि वो अपने बिस्तर से उठे और सितारों पर नज़र की और फ़रमायाः “ऐ नौफ़, सो रहे हो या जाग रहे हो?”। मैं ने कहा कि, “ या अमीरुल मोमिनीन जाग रहा हूँ”। फरमाया, वो लोग भाग्यशाली हैं जिन्होंने इस दुनिया से दिल न लगाया और हमेशा परलोक की ओर नज़र रखी। इन लोगों ने ज़मीन को अपना फ़र्श और मिट्टी को अपना बिस्तर बनाया और पानी को शरबत समझा। जिन्होंने क़ुरान को सीने से लगाए रखा, दुआ को अपनी ढाल बनाया और इस दुनिया से हज़रत मसीह (अ.स.) की तरह दामन झाड़ कर अलग हो गए।

ऐ नौफ़, दाऊद (अ.स.) रात के ऐसे ही समय में इबादत किया करते थे और फ़रमाते थे कि यह वह घड़ी है कि जिस में बन्दा जो भी दुआ माँगेगा वह क़ुबूल होगी सिवाए उस व्यक्ति के कि जो सरकारी टैक्स वसूल करने वाला हो, ख़ुफ़िया जानकारी इकटठा करने वाला हो, पुलिस में काम करता हो या ढोल ताशे बजाने वाला हो।

105

अल्लाह ने तुम्हारे लिए कुछ कर्तव्य निर्धारित किए हैं उनकी अनदेखी न करो। तुम्हारे लिए कुछ सीमाएँ तय कर दी हैं उन का उल्लंघन मत करो। तुम को जो काम करने से मना किया गया है वह मत करो और जो चीज़ें तुम्हें नहीं बताई गई हैं वह भूले से नहीं छोड़ दी हैं अतः उन को जानने की कोशिश न करो।

106

जब लोग दीन की कुछ चीज़ों को सांसारिक लाभ के लिए छोड़ देते हैं तो अल्लाह उन के लिए उस लाभ से कहीं अधिक नुक़सान की सूरत पैदा कर देता है।

107

बहुत से पढ़े लिखों की (दीन से) बेख़बरी उन को तबाह कर देती है और जो ज्ञान उन के पास होता है उस से उन को ज़रा भी लाभ नहीं होता।

108

इस इंसान के शरीर में सबसे अचरज की चीज़ गोश्त का वो टुकड़ा है जो एक रग के साथ लटका दिया गया है और वह दिल है। इस दिल में बुद्घि व ज्ञान के भण्डार भी हैं और उस की विपरीत विशेषताएँ (अर्थात बेवक़ूफ़ी और अज्ञान) भी पाई जाती हैं। अगर उसे आशा की किरन दिखाई देती है तो लालच उस को अपमानित कर देता है और जब उस में लालच पैदा होता है तो लालसा उस को बरबाद कर देती है। अगर उस पर निराशा छाती है तो पश्चाताप उस को मार डालता है और जब उस पर क्रोध का क़ब्ज़ा होता है तो उस को बहुत कष्ट होता है और चैन नहीं मिलता। और जब उस को प्रसन्नता प्राप्त होती है तो वह संयम को भूल जाता है और अगर अचानक उस पर डर हावी हो जाता है तो एहतियात उस को दूसरी चीज़ों से रोक देती है। और जब उस के हालात सुधरते हैं तो वह सब कुछ भूल जाता है। और जब उस को माल मिलता है तो दौलत उस को सरकश बना देती है। और जब उस पर मुसीबत पड़ती है तो उस की बेताबी व बेक़रारी उस को अपमानित कर देती है। और जब वह फ़क़ीरी में फँस जाता है तो मुसीबतों में गिरफ़्तार हो जाता है। और जब उस पर भूख छा जाती है तो कमज़ोरी उस को उठने नहीं देती। और जब उस को पेट भर कर खाना मिलता है तो वह इतना खाता है कि खाना उस के लिए मुसीबत बन जाता है। अतः हर ग़लती से नुक़सान होता है और सीमाओं का उल्लंघन हानिकारक होता है।

109

हम (अहलेबैत) संतुलन का वह बिन्दु हैं कि जो पीछे रह गए हैं उन को हम से आकर मिलना है और जो आगे बढ़ गए हैं उन्हें हमारी तरफ़ पलटना है।

110

अल्लाह के आदेशों को वही लागू कर सकता है कि जो हक़ के मामले में किसी से मुरव्वत न करता हो, ख़ुद को कमज़ोर न दिखाता हो और लालच के पीछे न दौड़ता हो।

111

सहल बिन हुनैफ़ अंसारी हज़रत अली (अ.स.) के प्रिय सहाबी थे। यह आप के साथ सिफ़्फ़ीन के युद्ध से कूफ़ा पलट कर आए और उन का देहांत हो गया जिस पर हज़रत अली (अ.स.) ने फ़रमायाः

“यदि पहाड़ भी मुझ को दोस्त रखेगा तो कण कण हो कर बिखर जाएगा”।

112

जो हम अहलेबैत (अ.स.) से मुहब्बत करे उसे फ़क़ीरी का लिबास पहनने के लिए तैयार रहना चाहिए।

113

बुद्धि से ज़्यादा लाभदायक कोई दौलत नहीं है। अपने आप को पसंद करने से ज़्यादा डरावना कोई अकेलापन नहीं है। उपाय से बढ़ कर कोई बुद्धि नहीं है। संयम के समान कोई प्रतिष्ठा नहीं है। सदव्यवहार से अच्छा कोई साथी नहीं है। सदाचार से बढ़ कर कोई धरोहर नहीं है। सामर्थय जैसा कोई आगे चलने वाला नहीं है। अच्छे कर्मों से बढ़ कर कोई व्यापार नहीं है। पुण्य से बढ़ कर कोई लाभ नहीं है। मना किए गए कामों की ओर से अवरुचि से बढ़ कर कोई संयम नहीं है। चिन्तन से बढ़ कर कोई ज्ञान नहीं है। कर्तव्य को पूरा करने से बढ़ कर कोई इबादत नहीं है। मर्यादा व धैर्य से बढ़ कर कोई ईमान नहीं है। विनम्रता से बढ़ कर कोई जाति नहीं है। ज्ञान से बढ़ कर कोई आदर नहीं है। बुरदुबारी से बढ़ कर कोई इज़्ज़त नहीं है और परामर्श से मज़बूत कोई संरक्षक नहीं है।

114

जब समाज और लोगों में नेकी का चलन हो और कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति में कोई बुराई देखे बिना उस पर संदेह करे तो उस ने उस पर अन्याय व ज़्यादती की। और जब समाज और लोगों में बुराई फैली हुई हो और कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में अच्छा विचार रखे तो उस ने अपने आप ही को धोका दिया।