मुआविया इब्ने अबु सुफियान paar kyun mehrban hai yeh ulema e duniyadaar…

*( मुआविया इब्ने अबु सुफियान)*

आप जरा समझे की इस्लाम मे सिर्फ किरदार की लड़ाई है?

कोई दुर रहकर भी हज़रत औवेस करनी(रजिअल्लाह तआला अन्हो) बनजाते है।और कोई पास रहकर भी अबु जहल ही रहा..
मुआविया सन 8 हिजरी मे मुसलमान बने फतह मक्का के बाद..
उसके पहले इनके बाप की जिंदगी गुजर गइ नबी ए करीम से जंग करते करते जंगे ओहद, जंगे खंदक, जंगे बदर जंगे हुनेन,तबूक,फतेह मक्का और भी बहुत सी,,

मुसलमान बनने के बाद भी इनके खानदान ने अहले बैत से दुशमनी का सिलसिला जारी रखा अबु सुफियान ने पुरी उम्र नबी ए पाक से जंग की, उनके बेटे मुआविया ने मौला अली अलैहिस्सलाम से जंग की (जंग ए शिफ्फीन) , जमल,नैहरवा और उनके बेटे यजीद ने मौला हुसैन अल्लैहिस्सलाम से कर्बला मे जंग की..

नबी ए करीम का फरमान है जिसने मेरी अहले बैत से जंग की उसने मुझसे जंग की जिसने इनसे दुशमनी रखी उसने मुझसे दुशमनी रखी,, अब जो नबी का मुन्किर हो वो खुदा का मुन्किर होता है..

ख्वाजा इमाम हसन बसरी फरमाते है की मुआविया के चार काम ऐसे है जो कोई एक काम भी ऐसा करे तो वो फासिक की मौत मरेगा।

1.उम्मत के खिलाफ तलवार उठाना और बगैर मशवरे के खलीफा बन जाना जबकि उस वक्त बड़े बड़े सहाबा ए किराम मोजुद थे

2. अपने बेटे यजीद पलीद को वली अहद बना दिया जबकि यजीद शराबी, जानी,नशेबाज था। रेशमी लिबास पहनता था, तम्बूरा बजाता था जो कि सुन्नते रसुल के खिलाफ था।

3. हजरत हुजर (र.अ) और उनके साथियों को बेवजह बेरहमी से कत्ल किया

4. मे नही बता सकता आप खुद किताब पढ़ लेना
इब्ने अशीर भाग/3पेज-242
मनाकिब ऐ अहलेबैत।पेज-418.

लगभग 1,75000 सहाबा ए किराम है लेकिन आखिर क्यों इन हजरात को बड़ा चडा़ के पेश किया जाता है क्यों मोलवी साहब कि जुबान पर इन्ही का नाम रहता है, आखिर क्यों शहादत ए मौला हसन बयान नहीं होती।

जब एक सहाबी ने इन्हें खबर दी की इमाम हसन शहीद हो गये हैं ।
तो ये कहते है हसन एक कोयला था जिसे अल्लाह ने बुझा दिया। (अस्तगफिरुल्लाह)
और फिर मौला हसन के शहीद होने की खुशी में सज्दा ए शुक्र अदा किया (अस्तगफिरुल्लाह)
सुनन अबु दाउद किताब-32 हदीश, NO. 4119

नबी ए पाक ने कहा हसन मुझसे है मे हसन से हु जिसने इसे तकलीफ दी उसने मुझे तकलीफ दी, हसन मेरा बेटा है उस हस्ती कि शहादत पे सज्दा ए शुक्र करने वाले को आप क्या मानोगे।।

क्या उनके नाम पे मस्जिद बनना चाहिए, क्या उनका उर्स मनाना चाहिए, क्या उनके नाम पे अपने बच्चों के नाम रखना चाहिए,,
ठंडे दिमाग से सोचे

*जो सहाबा ए किराम को ना माने और अहले बैत कि शान में गुस्ताखी करे वो मुनाफिक,फासिक होता है ।*

*और जो सहाबा ए किराम को कत्ल कर दे और अहले बैत के सामने तलवार लेकर आ जाए उनके लिए क्या हुक्म है।*

*क्या अहले बैत के खिलाफ दुशमनी रखने पर इमान सही सलामत रहता है,