कर्बला के 61वें शहीद हज़रते जिनादह इब्ने कअब ख़ज़रजी
आप का पूरा नाम जिनादह इब्ने कअब इब्ने हरस अल-अन्सारी खज़रजी था। आप कबीला खज़रज की याद-गार थे। आले महोब्बत का शरफ रखते थे मक्का-ए-मोअज़्ज़मा जाकर इमाम हुसैन अलै० के हमराह हो गये थे। आप के अहल-ओ-अयाल आप के हमराह थे यौमे आशूरा आप ने 18 दुश्मनों को कत्ल किया और खुद इस्लाम पर कुर्बान होकर बरगाहे मोहम्मद व आले मोहम्मद में सुखरु हो गये।
कर्बला के 62वें शहीद हज़रते उमर बिन जिनादहे अन्सारी
आप अपने वालिदे माजिद जिनादः के हमराह मक्का-ए-मोअज़्ज़मा होते हुऐ करबला पहुँचे आप कमसिन थे आपकी मादरे गिरामी आपके साथ ही थीं जनाबे जिनादः की शहादत के बाद माँ ने बेटे को आलाते हर्ब से आरास्ता करके इज़्ने जिहाद की ख़ातिर इमाम हुसैन अलै० की ख़िदमत में भेजा। इमाम हुसैन अलै० ने फरमाया की बेटा अभी-अभी तुम्हारे बाप ने शहादत पाई है। मैं तुम्हें मैदान की इजाज़त देकर कैसे तुम्हारी माँ को नाराज़ और रंजीदा कर सकता हूँ उसने अर्ज़ की मौला ! मुझे मेरी माँ ने तय्यार करके भेजा है। इस के बाद इमाम हुसैन अलै० ने जंग की इजाज़त दी और उमर इब्ने जिनादः मैदान में जाकर शहीद हो गये।
आपकी शहादत के बाद दुश्मनों ने आपका सर काट कर ख़यामे हुसैनी की तरफ फेका उमर इब्ने जुनादः की माँ ने सर को उठा कर आँखों पर बोसे दिये और फिर उस को वापिस फेक कर कातिल कै सीने पर दे मारा और वह कत्ल हो गया।
कर्बला के 63वें शहीद हज़रते जिनादा बिन हरस अल-सलमानी
आप क़बीला-ए-मदहज की एक शाख मुराद के ब-मुराद र्ट्ज़न्द थे। आपको सलमानी खानदान के एतवार से कहा जाता था आप कूफ़े के रहने वाले और आले मोहम्मद के दोस्त दारो में से थे। आप की शीअत बहुत मशहूर थी और, आप हज़रत अली अलै० के असहाबे ख़ास में से थे। आपने जनाबे मुस्लिम इब्ने अकील की कूफे में पूरी रिफाकत की और उनकी हिमायत में अपना फ्रीज़ा अदा किया। वहा से रात के वक़्त रवाना हो कर ख़िदमते इमाम हुसैन में हाज़िर हुये और त-हयांत साथ रहे।
करबला में यौमे आशूर निहायत दिलेरी के साथ जंग की और नरगे में घिर गये। आप को बचाने के लिये हज़रत अब्बास तशरीफ ले गये और वापस ले गये। प्यास के गल्बे ने बेचैन कर रखा था। फिर दोबारा मैदान में जा कर शहीद हो गये।
कर्बला के 64वें शहीद हज़रते आबिस इब्ने शबीब अल-शाकरी
आपका पूरा नाम और नसब आबिस इब्ने अबी शबीब इब्ने शाकेरी इब्ने रबीया इब्ने मालिक इब्ने सअब इब्ने माविया इब्ने कसीर इब्ने मालिक इब्ने जशम इब्ने हाशिद हमदानी शाकरी था। आप कबीला-ए-बनी शाकिर की यादगार थे। आप निहायत बहादुर, रईस, आबिदे जिन्दादार और अमीरूल मोमिनीन के मुख़लिस तरीन मानने वाले थे। आपके क़बीले बनी शाकिर पर अमीरूल मोमिनीन को बड़ा ऐतेमाद था। इसी वजहा से आपने जंगे सिफ़्फ़ीन में प्रमाया था कि अगर क़बीला-ए-बनी शाकिर के एक हज़ार अफ्राद मौजूद हों तो दुनिया में इस्लाम के सिवा कोई मज़हब बाकी न रहेगा ।
जब जनाबे मुस्लिम इब्ने अकील कूफ़े पहुँचे थे आपने सबसे पहले मद्द का यकीन दिलाया था और उनके कूफा के दौरान क्याम में उनकी पूरी मद्द की थी। फिर जनाबे मुस्लिम का ख़त लेकर मक्का-ए-मोअज़्ज़मा इमाम हुसैन अलै० के पास गये और उन्हीं के हमराह करबला-ए-मोअल्ला पहुँचे।
यौमे आशूरा जब आप मैदान में तशरीफ लाये और मुबारज़ तलबी की तो कोई भी आप के मुकाबले के लिए न निकला। बिल आख़िर आप पर एजतेमाई तौर पर पथराओ किया गया। फिर बेशुमार अफ्राद ने मिलकर हमला करके शहीद कर दिया। इसके बाद सर काट लिया।
कर्बला के 65वें शहीद हज़रते शौज़ब इब्ने अब्दुल्लाह हमदानी
आप जनाबे आबिस शाकरी के गुलाम बड़े बहादुर ज़बरदस्त शहसवार और नमूदार शिया थे। आप हजरत अमीरूल मोमिनीन से हदीस की रिवायत किया करते थे। आप अपने मालिक जनाबे आबिस के साथ जब कि वह ख़ते मुस्लिम इब्ने अकील लेकर मक्के तशरीफ ले गये उन्हीं के हमराह मक्का-ए-मोअज़्ज़मा गये और ता-करबला साथ रहे और यहाँ तक कि यौमे आशूरा निहायत बहादुरी से इस्लाम पर कुर्बान हो गये।