कर्बला के 45वें शहीद हज़रते जौन बिन हवी गुलामे ग़फ़्फ़ारी

जनाबे जौन अबूज़र गफ्फारी के गुलाम थे। आप को आले मोहम्मद से वही खुसुसियत हासिल थी जो अबूज़र को थी। जौन पहले इमामे हसन अलै० की ख़िदमत में रहे फिर इमामे हुसैन अलै० की ख़िदमत गुज़ारी के शरफ से बहरावर हुये। आप इमामे हुसैन अलै० के हमराह मदीने से मक्का और वहाँ से करबला आये।

आशूरा के दिन आपने इज़्ने जेहाद तलब की यौगे तो आप ने फ्रमाया “जौन ! मुझे पसन्द नहीं कि मैं पर तुम्हें कत्ल होतें देखूँ”। जौन ने कदमों पर सर रखते हुये अर्ज़ की “मौला आप के कदमों में शहीद हो जा जाना मेरी ज़िन्दगी का मक्सद है।”

मौला ! मेरा पसीना बूदार है हसब ख़राब है और रंग काला सही, लेकिन जज़्बा-ए-शहादत में ख़ामी नहीं है मौला इजाज़त दीजिये कि सुर्ख़रू हो जाऊँ।

इमामे हुसैन अलै० ने इजाज़त दी और जौन मैदाने जंग में आये। आप ने जबरदस्त जंग की और दरजा-ए-शहादत पर फाऐज़ हुये। इमामे हुसैन अलै० लाशे जौन पर पहुँचे आपने दुआ देते हुऐ कहा ‘खुदाया ! इनके पसीने को मुश्कज़ार और के रंग को सफेद कर दे और हसब को आले मोहम्मद (स०) के इन्तेसाव से मुमताज कर दे।

इमामे मोहम्मद बाक़िर अलै० का इरशाद है कि शहादत के बाद आप का चेहरा रौशन हो गया था। और बदन से मुश्क की खुशबू आ रही थी।

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