कर्बला के 51वें शहीद हज़रते मालिक इब्ने अनस-अल-मलकी

कर्बला के 51वें शहीद हज़रते मालिक इब्ने अनस-अल-मलकी

इब्ने नमा का बयान है कि मालिक इब्ने अनस का नाम अनस इब्ने हरस इब्ने काहिल इब्ने उमर इब्ने सअब इब्ने असद इब्ने हज़ीमा असदी-अल-काहिली था। आप हुजूर सरवरे कायनात के सहाबी थे और रावी हदीस दोनो फिरको के ओलमा ने रवायत की है आप का कहना है कि मैने ऑ हज़रत को ये कहते हुये सुना है कि मेरा बच्चा हुसैन करबला में शहीद किया जायेगा जो उस वक़्त हाज़िर हो उसे मद्द करनी ज़रूरी है। ओलमा असकलानी और इब्ने जज़री ने असाबा और असदलगाबः में लिखा है। इब्ने जज़री का कहना है कि अनस का शुमार कूफी असहाब में था। यानी कूफ़े के बाशिन्दे थे। आप कूफ़े से रात को निकल कर करबला पहुँचे और रोज़े आशूरा इमामे हुसैन अलै० पर निसार हो गये आप निहायत कबीरूल सिन थे। इमामे हुसैन अलै० से इजाज़त लेकर मैदाने जंग में आये और रजज़ पढ़ते हुऐ शहीद हो गये।

कर्बला के 52वें शहीद हज़रते ज़ियाद इब्ने गरीब-अल-सारेदी

कर्बला के 52वें शहीद हज़रते ज़ियाद इब्ने गरीब-अल-सारेदी

आप पूरा नाम और नसब ये है कि ज़ियाद इब्ने गरीब इब्ने हन्जला इब्ने वारिम इब्ने अब्दुल्लाह इब्ने कअब इब्ने शरजील इब्ने उमर इब्ने जशम इब्ने हाशिद इब्ने जशम इब्ने खैरदान इब्ने औफ इब्ने हमदान। आप की कुन्नियत अबू उमरः थी। आप क़बाइल-ए-हमदान के क़बीलये बनी हाएद के चश्मों चराग थे।

आप के वालिद ग़रीब सहाबी-ए-रसूल थे और खुद आपको भी ऑ हज़रत की ज़ियारत नसीब हुई थी। आप अरब के शुजाओं में मशहूर शख़्स थे और बड़े आबिद व ज़ाहिद और तहज्जुद गुज़ार थे। आप का शुमार मुशाहीरे एबाद में था। आप ने इमाम हुसैन अलै० से करबला में मुलाकात की और यौमे आशूरा नबर्द आज़-माई के बाद दर्जा-ऐ-शहादत हासिल किया। आपका कातिल आमिर (ल०) इब्ने नहशल था।

कर्बला के 53वें शहीद हज़रते उमर इब्ने मताअ-अल-जअफी

कर्बला के 53वें शहीद हज़रते उमर इब्ने मताअ-अल-जअफी

आप ज़बरदस्त मोहिब्बे अहलेबैत थे। करबला रोज़े आशूरा इमामे हुसैन अलै० की ख़िदमत में हाजिर होकर अर्ज़ की ‘मौला ! मरने की इजाज़त दीजिये। इमान मज़लूम ने इज़्ने जंग अता फरमाया आप मैदान तशरीफ ले गये और अज़ीम नबर्दअज़माई के बाद शहीद हुये।

कर्बला के 54वें शहीद हज़रते हज्जाज इब्ने मसरूक अल मदहजी

कर्बला के 54वें शहीद हज़रते हज्जाज इब्ने मसरूक अल मदहजी

आप का पूरा नाम हज्जाज इब्ने मसरूक इब्ने जअफ इब्ने सअद अशीरा था। आप क़बीला मदहज के एक अज़ीम फर्द थे। आप का शुमार हज़रत अली अ० के खास शियों में था। आप कूफ़े में रहते और हज़रत अली अ० की ख़िदमत करते थे।

इमामे हुसैन अलै० की मक्के से रवानगी के वक़्त हज्जाज भी कूफ़े से रवाना हुये और मन्ज़िले कस बनी मकातिल में शरफे मुलाकात हासिल किया। जब अब्दुल्लाह इब्ने हुर्र जअफी (जिन का खेमा कस इब्ने मकातिल में पहले से नस्ब था) को दावते नुसरत देने के लिये इमामे हुसैन अलै० खुद के खेमे में तशरीफ ले गये तो हज्जाज आप के हमराह थे।

जनाबे हज्जाज यौने आशूरा इमामे हुसैन अलै० कि ख़िदमत में हाज़िर हो कर अर्ज की मौला ! मरने की इजाज़त दीजिये’। इमामे हुसैन अलै० ने इज़्ने जिहाद अता फरमाया और हज्जाज मैदान में तशरीफ लाये और नबर्दआज़माई शुरू की आप ने 15 दुश्मनों को कत्ल करने के बाद हाज़िरे ख़िदमते इमाम हुये और थोड़ी देर मौला की ख़िदमत में ठहर कर मैदाने जंग में फिर तशरीफ लाये और अपने “गुलामे मुबारक़” की मईयत में दुश्मनों से लड़ते रहे। आखिरकार एक सौ पचाँस (150) दुश्मनों को कत्ल कर के शहीद हो गये।

📝72 तारे अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम

कर्बला के 55वें शहीद हज़रते जु़हैर इब्ने कैने अल-जबली

कर्बला के 55वें शहीद हज़रते जु़हैर इब्ने कैने अल-जबली

जुहैर इब्ने कैन इब्ने कैस अल अनमारी जबली अपनी कौम के शरीफ और रईस थे। आपने कूफ़े में सुकूनत इख़्तेयार की थी और वहीं पर रहते थे। आप बड़े शुजा और बहादुर थे। अक्सर लड़ाईयों में शरीक रहते थे। पहले उसमानी थे फिर 60 हिजरी में हुसैनी-अल-अलवी हो गये।

60 हिजरी में हज के लिये अहलो अयाल समेत गये थे। वहाँ से वापस कूफ़े आ रहे थे कि रास्ते में इमाम हुसैन अलै० से मुलाकात हो गई। एक दिन ऐसी जगह उनके ख़याम नस्ब हुऐ कि इमाम हुसैन अलै० के खेमें भी सामने थे। जब जुहैर खाना खाने के लिये बैठे तो इमाम हुसैन अलै० का कासिद पहुँच गया। उसने सलाम के बाद कहा जुहैर तुम को र्ट्ज़न्दे रसूल ने याद किया है ये सुन कर सबको सकता हो गया और हाथों से निवाले गिर पड़े। जुहैर की बीवी जिस का नाम ‘वलहम बिन्ते उमर, था जुहैर की तरफ मुतावज्जो हो कर कहने लगी जुहैर क्या सोचते हो ? ख़ुशानसीब तुम को फर्ज़न्दे रसूल ने याद किया है उठो और उनकी ख़िदमत में हाज़िर हो जाओ।

जुहैर उठे और ख़िदमते इमाम हुसैन अलै० में हाज़िर हुये थोड़ी देर के बाद जो वापिस आये तो उनका चेहरा निहायत बश्शाश था। खुशी के आसार उनके चेहरे से ज़ाहिर थे।

उन्होने वापस आते ही हुक्म दिया कि सब खेमे इमाम हुसैन अलै० के ख़गाम के करीब नस्ब कर दें और बीवी से कहा मैं तुमको तलाक दिये देता हूँ तुम अपने कबीले को वापिस चली जाओ मगर एक वाक्या मुझ से सुनले।

जब लश्करे इस्लाम ने बलख़जर पर चढ़ाई की और फूनहेयाब हुऐ तो सब खुश थे और मैं भी खुश था। मुझे मसरूर देखकर सलमान फारसी ने कहा कि ज़ुहैर तुम उस दिन इससे ज़्यादा खुश होगे जिस दिन फ़रज़न्दे रसूल के साथ होकर जंग करोगे।”

(अल-बसार अल एैन)

मैं तुम्हे खुदा हाफिज़ कहता हूँ और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के लश्कर में शरीक होता हूँ इसके बाद आप इमामे हुसैन अलै० कि ख़िदमत में हाज़िर हुये और मरते दम तक साथ रहे यहाँ तक कि शहीद हो गये।

मोवर्रेख़ीन का बयान है कि जनाबे ज़ुहैर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के हमराह चल रहे थे मकामे “ज़ौहशम पर हुर्र की आमद के बाद आप ने खुतबे में असहाब से फरमाया कि तुम वापस चले जाओ उन्हें सिर्फ मेरी जान से मतलब है, इस जवाब में ज़ुहैर ने ही कहा था कि हम हर हाल में आप पर कुरबान होगें। जब हुर ने इमाम हुसैन अलै० से मुज़ाहेमत की थी तो जनाबे ज़ुहैर ने इमाम हुसैन अलै० की बारगाह में दरख़वास्त की थी कि अभी ये एक ही हज़ार है हुक्म दीजिये कि उनका ख़ातेमा कर दें। जिस के जवाब में इमामे मज़लूम ने प्रमाया था कि हम इब्तेदाऐ जंग – नहीं कर सकते।

मोअर्ररखीन का ये भी बयान है कि जब हज़रते अब्बास एक शब की मोहलत लेने के लिऐ शबे आशूर निकले थे तो जनाबे जुहैर भी आप के साथ थे।

शबे आशूर के खुतबे के जवाब में जनाबे जुहैर ने कमाले दिलेरी से अर्ज की थी कि ‘मौला अगर ७० मर्तबा भी हम आप की मोहब्बत में कत्ल किये जाऐ तो भी कोई परवाह नहीं।

मोअर्ररखीन का इत्तेफाक है कि सुबह आशूर जब इमाम हुसैन अलै० ने अपने छोटे से लश्कर की तरतीब दी तो मैमना जनाबे जुहैर ही के सिपुर्द किया था।

यौमे आशूर आपने जो कारे-नुमाया किया है वह तारीखे करबला के वरक में मौजूद है। नमाज़े ज़ोहर की जद्दो जेहद में भी आप का हिस्सा है आपने पै-दर-पै दुश्मनों पर कई हमले किये और 120 को फना के घाट उतार दिया बिल आख़िर अब्दुल्लाह इब्ने शबई और मुहाजिर इब्ने अदस तमीमी के हाथों शहीद हुऐ।

📝72 तारे अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम