कर्बला के 55वें शहीद हज़रते जु़हैर इब्ने कैने अल-जबली

कर्बला के 55वें शहीद हज़रते जु़हैर इब्ने कैने अल-जबली

जुहैर इब्ने कैन इब्ने कैस अल अनमारी जबली अपनी कौम के शरीफ और रईस थे। आपने कूफ़े में सुकूनत इख़्तेयार की थी और वहीं पर रहते थे। आप बड़े शुजा और बहादुर थे। अक्सर लड़ाईयों में शरीक रहते थे। पहले उसमानी थे फिर 60 हिजरी में हुसैनी-अल-अलवी हो गये।

60 हिजरी में हज के लिये अहलो अयाल समेत गये थे। वहाँ से वापस कूफ़े आ रहे थे कि रास्ते में इमाम हुसैन अलै० से मुलाकात हो गई। एक दिन ऐसी जगह उनके ख़याम नस्ब हुऐ कि इमाम हुसैन अलै० के खेमें भी सामने थे। जब जुहैर खाना खाने के लिये बैठे तो इमाम हुसैन अलै० का कासिद पहुँच गया। उसने सलाम के बाद कहा जुहैर तुम को र्ट्ज़न्दे रसूल ने याद किया है ये सुन कर सबको सकता हो गया और हाथों से निवाले गिर पड़े। जुहैर की बीवी जिस का नाम ‘वलहम बिन्ते उमर, था जुहैर की तरफ मुतावज्जो हो कर कहने लगी जुहैर क्या सोचते हो ? ख़ुशानसीब तुम को फर्ज़न्दे रसूल ने याद किया है उठो और उनकी ख़िदमत में हाज़िर हो जाओ।

जुहैर उठे और ख़िदमते इमाम हुसैन अलै० में हाज़िर हुये थोड़ी देर के बाद जो वापिस आये तो उनका चेहरा निहायत बश्शाश था। खुशी के आसार उनके चेहरे से ज़ाहिर थे।

उन्होने वापस आते ही हुक्म दिया कि सब खेमे इमाम हुसैन अलै० के ख़गाम के करीब नस्ब कर दें और बीवी से कहा मैं तुमको तलाक दिये देता हूँ तुम अपने कबीले को वापिस चली जाओ मगर एक वाक्या मुझ से सुनले।

जब लश्करे इस्लाम ने बलख़जर पर चढ़ाई की और फूनहेयाब हुऐ तो सब खुश थे और मैं भी खुश था। मुझे मसरूर देखकर सलमान फारसी ने कहा कि ज़ुहैर तुम उस दिन इससे ज़्यादा खुश होगे जिस दिन फ़रज़न्दे रसूल के साथ होकर जंग करोगे।”

(अल-बसार अल एैन)

मैं तुम्हे खुदा हाफिज़ कहता हूँ और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के लश्कर में शरीक होता हूँ इसके बाद आप इमामे हुसैन अलै० कि ख़िदमत में हाज़िर हुये और मरते दम तक साथ रहे यहाँ तक कि शहीद हो गये।

मोवर्रेख़ीन का बयान है कि जनाबे ज़ुहैर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के हमराह चल रहे थे मकामे “ज़ौहशम पर हुर्र की आमद के बाद आप ने खुतबे में असहाब से फरमाया कि तुम वापस चले जाओ उन्हें सिर्फ मेरी जान से मतलब है, इस जवाब में ज़ुहैर ने ही कहा था कि हम हर हाल में आप पर कुरबान होगें। जब हुर ने इमाम हुसैन अलै० से मुज़ाहेमत की थी तो जनाबे ज़ुहैर ने इमाम हुसैन अलै० की बारगाह में दरख़वास्त की थी कि अभी ये एक ही हज़ार है हुक्म दीजिये कि उनका ख़ातेमा कर दें। जिस के जवाब में इमामे मज़लूम ने प्रमाया था कि हम इब्तेदाऐ जंग – नहीं कर सकते।

मोअर्ररखीन का ये भी बयान है कि जब हज़रते अब्बास एक शब की मोहलत लेने के लिऐ शबे आशूर निकले थे तो जनाबे जुहैर भी आप के साथ थे।

शबे आशूर के खुतबे के जवाब में जनाबे जुहैर ने कमाले दिलेरी से अर्ज की थी कि ‘मौला अगर ७० मर्तबा भी हम आप की मोहब्बत में कत्ल किये जाऐ तो भी कोई परवाह नहीं।

मोअर्ररखीन का इत्तेफाक है कि सुबह आशूर जब इमाम हुसैन अलै० ने अपने छोटे से लश्कर की तरतीब दी तो मैमना जनाबे जुहैर ही के सिपुर्द किया था।

यौमे आशूर आपने जो कारे-नुमाया किया है वह तारीखे करबला के वरक में मौजूद है। नमाज़े ज़ोहर की जद्दो जेहद में भी आप का हिस्सा है आपने पै-दर-पै दुश्मनों पर कई हमले किये और 120 को फना के घाट उतार दिया बिल आख़िर अब्दुल्लाह इब्ने शबई और मुहाजिर इब्ने अदस तमीमी के हाथों शहीद हुऐ।

📝72 तारे अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम

कर्बला के 57वें शहीद हज़रते अबू समामा उमरु बिन अब्दुल्लाह सेदादी

कर्बला के 57वें शहीद हज़रते अबू समामा उमरु बिन अब्दुल्लाह सेदादी

आप का पूरा नाम उमरु इब्ने अब्दुल्लाह इब्ने कैब इने शरजील इब्ने शिराजील इब्ने उमर इब्ने हाशिद इब्ने जशम इब्ने हैरदन इब्ने औफ बिन हमदान साअएदी अल-सैदावी था और कन्नियत अबू समामा थी।

आप ताबई थी। आपका शुमार हज़रत अली के असहाब में था। आपने हज़रत अली के साथ तमाम जंगों में शिरकत की थी। आप बड़े शहसवार और शियों में बड़ी अज़मतों शौकत के मालिक थे। अमीरूल मोमिनीन के बाद इमाम हुसैन की ख़िदमत में रहे।

हज़रत मुस्लिम इब्ने अकील जब कूफ़े तशरीफ लाये तो आपने उनकी पूरी इमदाद की। उनके लिये असलहे ख़रीदे और दारुलअमारः पर हमले में बनी तमीम हमदान की क्यादत की हज़रते मुस्लिम की शहादत के बाद आप चंद रोज़ रू-पोश हो गये फिर इमाम हुसैन की ख़िदमत में हाज़िर हो गये।

करबला के बाद इब्ने सअद ल० ने कसीर इब्ने अब्दुल्लाह ने शअबी के जरिये से इमाम हुसैन अलै० के पास एक पैग़ाम भेजा कासिद चाहता था कि हथियार लगाऐ इमाम हुसैन से मिले मगर अबू समामा ने उस को कामयाब न होने दिया और वह बगैर पैग़ाम पहुँचाये वापस चला गया।

नमाज़े ज़ोहर के लिये आप ने ऐन हंगामा-ए-कारज़ार में इमाम हुसैन अलै० से दरख्वास्त की कि नमाज़े जमाअत होनी चाहिये। चुनान्चे इमामे मज़लूम ने नमाज़ पढ़ाई फिर जंग के मौके पर आपने कमाले म दिलेरी से शमशीर ज़नी की बिल-आख़िर आप के चचा ज़ाद भाई कैस ल० इब्ने अब्दुल्लाह अल-साअएदी ने आप को शहीद कर दिया।

कर्बला के 58वें शहीद हज़रते अनीस इब्ने मअकल असहबी

कर्बला के 58वें शहीद हज़रते अनीस इब्ने मअकल असहबी

आप आले रसूल के जाँनिसारों और ख़ास दोस्तदारों में थे। यौमे आशूरा आप ने इज़्ने जिहाद हासिल किया और मैदान में आकर निहायत दिलेरी और बहादुरी से लड़े और आप ने दस दुश्मनों को कत्ल करने के बाद शहादत पाई।

कर्बला के 59वें शहीद हज़रते जाबिर इब्ने अरवः अल-गफ़्फ़ारी

कर्बला के 59वें शहीद हज़रते जाबिर इब्ने अरवः अल-गफ़्फ़ारी

आप सहाबी-ए-रसूल थे। आपने सरवरे कायनात की मौजूदगी में जंगे बद्र-ओ-हुनैन वगैरह में शिरकत की थी आप निहायत कबीर-उल-सिन और ज़ईफ थे। करबला में यौमे आशूरा जब नबर्दआज़माई के लिये निकले तो आपने अम्मामे से कमर और एक कपड़े से अपनी पलकों को उठा कर बाँध लिया था। इज़्ने जिहाद के बाद ज़बरदस्त जंग की और साठ आदमियों को कत्ल कर खुद शहीद हो गये।