मनाकिबे अहले बैत अहादीस की रोशनी में

-: अहादीस की रोशनी में :-

सही मुस्लिम व तिर्मिज़ी शरीफ में वारिद है हज़रत ज़ैद बिन अरकम (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है सरकारे दो आलम (सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम) ने फ़रमाया मैं तुममें दो ऐसी चीजें छोड़े जा रहा हूँ कि अगर तुम लोग इनको मज़बूती से थामे रहोगे तो कभी गुमराह न होगे और अगर एक को भी छोड़ दिया तो गुमराह हो जाओगे इनमें से एक दूसरे से बड़ी अज़मत वाली हैं एक अल्लाह तआला की किताब (कुरान) जो आसमान से ज़मीन तक लटकी हुई रस्सी है इसमें हिदायत व नूर है तो अल्लाह तआला की किताब (कुरान) को मज़बूती से थामे रहो और दूसरी चीज़ मेरे अहले बैत हैं मैं तुमको अहले बैत के बाब में खुदा की याद दिलाता हूँ (अहले बैत की निसबत ये जुमला तीन बार इरशाद फरमाया) और कुरान व अहले बैत कभी आपस में जुदा न होंगे यहाँ तक कि दोनों हौज़े कौसर पर मेरे पास आयेंगे और जो इनकी पैरवी करेगा वो हिदायत पर होगा और जो इनको छोड़ देगा वो गुमराह हो जायेगा।

(सही मुस्लिम-6/94) (मिश्कात-3/254)(तिर्मिज़ी-2/736)

वज़ाहतः- मजकूरा हदीस में ये बात काबिले तवज्जो है
कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने कुरान मजीद का ज़िक्र एक बार फ़रमाया लेकिन अहले बैत का ज़िक्र तीन बार फ़रमाया इसमें हिकमते मुस्तफा ये थी कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम के इल्मे ग़ैब में ये बात थी कि मेरे बाद कुछ लोग मेरी उम्मत के दिलों से अहले बैत की मुहब्बत व अकीदत को मिटाने का काम
करेंगे और अहले बैत अतहार से एतकादी व मुहब्बती तआल्लुक को मुनक्ताअ करने के काम को बखूबी अंजाम देंगे आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की निगाहे नबूवत ये देख रही थी कि मेरी उम्मत के बाज़ लोग मेरे अहले बैत से बुग्ज़ व अदावत और दिलों में निफाक व कीना रखेंगे इसलिये एक ही मुकाम पर दोनो चीज़ों (कुरान व अहले बैत) का ज़िक्र किया मगर कुरान का ज़िक्र एक बार और अहले बैत का ज़िक्र तीन बार फ़रमाया ।

आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम के इल्म में ये बात थी कि कुरान अल्लाह का कलाम है जो नूर व राहे हिदायत है और लोग इसे अल्लाह का कलाम ही जानेंगे और इस पर इख़्तिलाफ व इन्कार का फित्ना न होगा मगर मेरे अहले बैत के मुताअल्लिक मेरी उम्मत के लोग इख़्तिलाफ व इन्तिसार और बुग्ज़ व अदावत का फित्ना खड़ा करेंगे ताकि लोग गुमराह हो जायें और इस फित्ने की इब्तिदा जंगे सिफ़्फ़ीन में हुई फिर कूफा में फिर मारका-ए-करबला बपा हुआ और दीगर मकामात पर भी फित्ने उठे ।


हज़रत उम्मे सलमा रज़िअल्लाहु तआला अन्हा से रिवायत है नबी करीम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फ़रमाया-ख़बरदार ये मस्जिद (नबवी) किसी जुनबी और हाइज़ा (औरत) के लिये हलाल नहीं सिवाये मेरे (हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम) और हज़रत मौला अली व सइयदा फातिमा ज़हरा और इमाम हसन व इमाम हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) के इनके अलावा किसी के लिये मस्जिद (नबवी) में (जनाबत, नापाकी व हालते हैज़ में) आना जाना जाइज़ नहीं (इमाम जलालुद्दीन सयूती-ख़साइसुल कुबरा-2/424) (बैहकी-सुनन कुबरा-7/65) (इब्ने असाकर-तारीख दमिश्क-14/166)



हज़रत इब्ने उमर बिन ख़त्ताब (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है कि रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया-मेरे रिश्ते और नसब के सिवा क्यामत के दिन हर रिश्ता और नसब मुनकताअ हो जायेगा । (मुअजम कबीर-तबरानी-3/44) (मुस्तदरक हाकिम-3 / 153) (मजमउज़्ज़वाइद-9/173)



हज़रत उमर बिन ख़त्ताब (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है कि सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया-बेशक अली,फातिमा, हसन व हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) जन्नतुल फिरदौस में सफेद गुम्बद में मुकीम होंगे जिसकी छत अर्थे इलाही होगी।
(इब्ने असाकर-तारीख दमिश्क-14/61)



हज़रत अली बयान करते हैं कि वो नबी करीम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की बारगाह में हाज़िर हुये आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने चादर बिछाई हुई थी पस उस पर हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम अली फातिमा, हसन व हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) बैठ गये फिर आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने उस चादर के किनारे को पकड़कर उन पर डालकर उसमें गिरह लगा दी फिर फ़रमाया- ऐ अल्लाह तू भी इनसे राज़ी हो जा जिस तरह मैं इनसे राज़ी हूँ। (मुअजम औसत – तबरानी-5/348 ह०-5514) (मजमउज़्ज़वाइद-9/169)



हज़रत उम्मे सलमा (रजिअल्लाहु तआला अन्हा) बयान करती हैं कि एक दिन हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम मेरे घर तशरीफ़ फरमा थे खादिम ने अर्ज किया दरवाज़े पर अली, फातिमा, हसन व हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) आये हैं आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने हुक्म फ़रमाया एक तरफ़ हो जाओ और मुझे अपने अहले बैत से मिलने दो उम्मे सलमा फ़रमातीं हैं मैं पास ही घर मैं एक तरफ हटकर खड़ी हो गयी पस हज़रत अली, फातिमा, हसन व हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) दाखिल हुये उस वक़्त वो कमसिन थे तो आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने दोनो बच्चों (हसन व हुसैन) को पकड़कर गोद में बिठा लिया और दोनों को चूमने लगे। (मुस्नद-अहमद बिन हम्बल-6/296 ह०-26582) (मजमउज़्ज़वाइद-9/166)

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