
18 ज़िलहज्ज: यौम-ए-ग़दीर की हक़ीक़त और नासिबियों के एतराज़ात का मुकम्मल जवाब
आजकल सोशल मीडिया और हमारे मुआशरे (समाज) में कुछ नासबी मौलवी और उनके पैरोकार यौम-ए-ग़दीर (18 ज़िलहज्ज) पर फ़तवेबाज़ी करते नज़र आते हैं। आज हम इसी मौज़ू पर तफ़सील से बात करेंगे, ताकि हक़ीक़त सबके सामने वाज़ेह हो सके। आप सभी से गुज़ारिश है कि इस पोस्ट को आख़िर तक ज़रूर पढ़ें।.🙏🏻
ग़लतफ़हमी और फ़तवेबाज़ी.👇
आज के दौर में, ख़ासकर कुछ मख़सूस फ़िरक़ों के नासबी मौलवी और उनके मानने वाले यौम-ए-ग़दीर की मुबारकबाद देने और इसकी खुशियां मनाने को ‘हराम’ क़रार देते हैं। वह अवाम को यह कहकर गुमराह करते हैं कि “यह सिर्फ़ शिया हज़रात का तरीक़ा है” और सुन्नियों को इससे दूर रहना चाहिए।
लेकिन जब इन मौलवियों से दलील मांगी जाती है कि आख़िर यौम-ए-ग़दीर की ख़ुशी मनाना हराम कैसे है? तो उनके पास कोई ठोस जवाब नहीं होता। वह सिर्फ़ गोल-मोल बातें करके लोगों को असल हक़ीक़त से दूर रखने की कोशिश करते हैं।
आइए, तारीख़ और क़ुरआन-ओ-हदीस की रौशनी में जानते हैं कि 18 ज़िलहज्ज को असल में क्या हुआ था और एक सच्चा मोमिन इसकी ख़ुशी क्यों मनाता है।
तारीख़ी पस-मंज़र: ग़दीर-ए-ख़ुम का वाक़िया.👇
18 ज़िलहज्ज, सन् 10 हिजरी का दिन था। हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) अपना आख़िरी हज (हज्जतुल वदा) अदा करने के बाद मक्का से मदीना वापस तशरीफ़ ला रहे थे। आपके साथ तक़रीबन सवा लाख (1,25,000) सहाबा किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) का अज़ीम लश्कर मौजूद था।
मदीने से कुछ फ़ासले पर ‘ग़दीर-ए-ख़ुम’ नामी मुक़ाम पर क़ाफ़िला पहुंचा, तो हुज़ूर पाक ﷺ पर हज़रत जिब्राईल (अलैहिस्सलाम) अल्लाह सुब्हानहु व तआला की “वही” लेकर नाज़िल हुए। यह क़ुरआन मजीद की सूरह अल-माइदा की आयत नंबर 67 थी:
۞ يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ ۖ وَإِن لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ ۚ وَاللَّهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ
तर्जुमा (अल-माइदा – 67):
“ऐ रसूल! जो हुक्म तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से तुम पर नाज़िल किया गया है, उसे पहुंचा दो। और अगर तुमने ऐसा न किया, तो (समझ लो कि) तुमने उसका कोई पैग़ाम ही नहीं पहुंचाया। और (तुम डरो नहीं) ख़ुदा तुमको लोगों के शर से महफ़ूज़ रखेगा। बेशक ख़ुदा काफ़िरों की क़ौम को हिदायत नहीं देता।”
इस👆 आयत-ए-करीमा के नाज़िल होने के फ़ौरन बाद,
रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) ने सहाबा-ए-किराम को एक जगह जमा होने का हुक्म दिया। ऊंटों के पलाणों (काठियों) का एक मिम्बर बनाया गया।
ऐलान-ए-विलायत और अज़ीम ख़ुतबा۔👇
हुज़ूर ﷺ मिम्बर पर तशरीफ़ ले गए और मौला अली (अलैहिस्सलाम) का हाथ बुलंद करके वह तारीख़ी ऐलान फ़रमाया, जिसे आज तक मुस्लिम उम्मा याद करती है:
“مَنْ كُنْتُ مَوْلَاهُ فَعَلِيٌّ مَوْلَاهُ”
तर्जुमा: “मैं जिसका मौला हूं, अली भी उसके मौला हैं।”
सहाबा किराम की सुन्नत: मुबारकबाद पेश करना.👇
रसूलअल्लाह ﷺ का यह फ़रमान सुनकर सहाबा किराम ने बेहद ख़ुशी का इज़हार किया और मौला अली (अ.स.) को मुबारकबाद पेश की।
एहले-सुन्नत की कीताबे और तारीख़ गवाह है कि सबसे पहले मुबारकबाद देने वालों में हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.) और हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) शामिल थे।
हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) ने मौला अली (अ.स.) से ख़ुशी का इज़हार करते हुए फ़रमाया था:
“बख़िन बख़िन ल-क या इब्न अबी तालिब…”
यानी, “ऐ अली! आपको बहुत-बहुत मुबारक हो, आज से आप मेरे और हर मोमिन मर्द और मोमिन औरत के मौला हो गए।”
🤷🧏ग़ौर करने का मुक़ाम: जब 18 ज़िलहज्ज सन् 10 हिजरी को मौला अली (अ.स.) को हर मोमिन का मौला बनाया गया, और हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) व हज़रत उमर (रज़ि.) ने उन्हें मुबारकबाद दी, तो आज हम मोमिन होकर इस दिन की ख़ुशी क्यों नहीं मना सकते? यौम-ए-ग़दीर की मुबारकबाद देना तो ख़ुद सहाबा किराम की सुन्नत है!
नासिबियों का एतराज़ और उसकी हक़ीक़त.👇
आजकल कुछ लोग यह बेबुनियाद एतराज़ करते हैं कि 18 ज़िलहज्ज को हज़रत उस्मान ग़नी (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शहादत हुई थी, इसलिए इस दिन मुबारकबाद नहीं देनी चाहिए या ख़ुशी नहीं मनानी चाहिए। यह दलील निहायत कमज़ोर और गुमराहकुन है। आइए इसका जायज़ा लें:
1. तारीख़ का फ़र्क़: हज़रत उस्मान ग़नी (रज़ि.) की शहादत का दिन 12 ज़िलहज्ज, सन् 35 हिजरी है, जबकि यौम-ए-ग़दीर 18 ज़िलहज्ज, सन् 10 हिजरी का वाक़िया है।
2. वक़्त का फ़ासला: हज़रत उस्मान ग़नी (रज़ि.) ऐलान-ए-ग़दीर के तक़रीबन 25 साल बाद शहीद हुए थे।
3. वाक़ियात की अहमियत: दीन की तकमील और रसूलअल्लाह ﷺ के ज़रिए किए गए ऐलान की ख़ुशी अपनी जगह एक अज़ीम नेअमत है। एक वाक़िया जो 25 साल बाद पेश आया, उसकी आड़ में दीन के इतने बड़े ऐलान (ऐलान-ए-विलायत) को कैसे छुपाया जा सकता है?
“ख़ुलासा-ए-कलाम”
इन तमाम दलीलों से यह पूरी तरह साबित हो जाता है कि 18 ज़िलहज्ज को मौला अली (अ.स.) की विलायत का जश्न मनाना और ख़ुश होकर एक-दूसरे को मुबारकबाद देना सहाबा किराम की सुन्नत है।
जो नासबी मौलवी और उनके चाहने वाले यौम-ए-ग़दीर के दिन “हराम-हराम” चिल्लाते हैं, असल में उन्हें तकलीफ यौम-ए-ग़दीर मनाने से नहीं होती, बल्कि उनकी असल तकलीफ मौला अली (अलैहिस्सलाम) की अज़ीम शान और फ़ज़ीलत से है। उनके दिलों में अहल-ए-बैत की अज़मत बर्दाश्त नहीं होती, इसीलिए वह अवाम को गुमराह करने के लिए ऐसे झूठे फ़तवे गढ़ते हैं।
हक़ीक़त को पहचानें, अहल-ए-बैत से सच्ची मुहब्बत करें और ग़दीर के पैग़ाम को आम करें!
वअल्लाहु आलम बिस्सवाब (अल्लाह बेहतर जानने वाला है)।



